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बुधवार, अक्तूबर 26, 2011

रहे न किसी की झोली खाली- ऐसी हो सबकी दीवाली

आज है दीपों का पर्व दीवाली
हर आंगन में दीप चले
हर घर में हो खुशहाली
सब मिलकर मनाए
भाई चारे से दीवाली
रहे न किसी की झोली खाली
ऐसी हो सबकी दीवाली
हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई
जब सब हैं हम भाई-भाई
तो फिर काहे करते हैं लड़ाई
दीवाली है सबके लिए खुशिया लाई
आओ सब मिलकर खाए मिठाई
और भेद-भाव की मिटाए खाई

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मंगलवार, अक्तूबर 25, 2011

प्रेस क्लब रायपुर चुनाव: जीतने वालों को बधाई

प्रेस क्लब रायपुर के चुनाव इस बात ऐतिहासिक हुए। पहली बार बहुत अच्छे तरीके से चुनाव का संचालन हाई पॉवर कमेटी के सदस्यों दैनिक तरूण छत्तीसगढ़ के संपादक कौशल किशोर मिश्रा, हरिभूमि के प्रबंध संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी, दैनिक नई दुनिया के स्थानीय संपादक रवि भोई के साथ पन्नालाल गौतम और शैलेष पांडे ने करवाए। इस चुनाव में दो पैनलों के बीच ही मुकाबला हुआ। इसमें अध्यक्ष पद के लिए बृजेश चौबे ने समरेन्द्र शर्मा को 28 मतों से, महासचिव पद के लिए विनय शर्मा ने चंदन साहू को 28 मतों से, उपाध्यक्ष पद के लिए केके शर्मा ने राजेश मिश्रा को 6 मतों से, संयुक्त सचिव पद के लिए दो उम्मीदवार कमलेश गोगिया और विकास शर्मा जीते। कोषाध्यक्ष पद के लिए सबसे ज्यादा 139 मत प्राप्त करके सुकांत राजपूत ने अजय सक्सेना को सबसे ज्यादा 42 मतों से पराजित किया।
इस चुनाव में कमलेश गोगिया की जीत प्रदेश के खेल पत्रकारों के साथ खेल बिरादरी के लिए सुखद रही। नामांकन के एक दिन पहले ही कमलेश गोगिया को हम लोगों ने चुनाव लड़ने तैयार किया था। ऐसे में उनका जीतना इस बात का परिचायक है कि प्रेस क्लब के चुनाव में साफ छवि को प्राथमिकता मिली है।
कमलेश गोगिया छत्तीसगढ़ खेल पत्रकार संघ के महासचिव भी हैं। उनकी जीत पर छत्तीसगढ़ खेल पत्रकार संघ के मुख्य संरक्षक होने के नाते हम (राजकुमार ग्वालानी) उनको बधाई देते हैं। इसी के साथ खेल पत्रकार संघ के अन्य सदस्यों मुख्य संरक्षक अनिल पुसदकर, सुशील अग्रवाल, चंदन साहू,  शंकर चन्द्राकर, आनंदव्रत शुक्ला, मंयक ठाकुर, प्रवीण सिंह, सुधीर उपाध्याय, सुरेन्द्र शुक्ला, विकास चौबे सहित सभी सदस्यों की तरफ बधाई है। इसी के साथ हम सभी जीतने वाले प्रत्याशियों को भी बधाई देते हैं और उम्मीद करते हैं कि अब प्रेस क्लब रायपुर में बहुत कुछ नया और अच्छा होगा।

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शनिवार, अक्तूबर 22, 2011

जनचेतना नहीं जनआक्रोश यात्रा

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण अडवानी की जनचेतना यात्रा जिस मकसद से पार्टी ने निकाली है, वह मकसद तो पूरा होता नहीं दिख रहा है, लेकिन इस यात्रा से जनआक्रोश जरूर बढ़ रहा है। यह यात्रा जहां भी जा रही है, वहां आम जन इतने ज्यादा परेशान हो रहे हैं कि हर किसी से मुंह से भाजपा के लिए अपशब्द ही निकल रहे हैं। ऐसे में यह तय है कि भाजपा ने इस यात्रा से अपने लिए फायदा नहीं बल्कि नुकसान किया है। यह तय है कि यात्रा से परेशान देश का जनतंत्र कभी नहीं चाहेगा कि उनको परेशान करने वाली पार्टी सत्ता में आए। इस यात्रा में एक और अहम बात यह है कि अडवानी जी की यह कैसी यात्रा है जिसमें रथ पहले आता है और वे विमान से आते हैं।
अडवानी की यात्रा जब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आई तो यहां भी वही नजारा देखने को मिला जैसा नजारा देश के अन्य हिस्सों में देखने को मिला था। इस यात्रा के कारण दीपावली की तैयारी में लगे लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ा। यात्रा के कारण सारे बाजार इस तरह से सील हो गए कि लोगों की बाजार तक पहुंचने में हालात खराब हो गई। बहुतो को तो बाजार जाने की बजाए घर वापास जाना ज्यादा उचित लगा।
अब सोचने वाली बात यह है कि जो भाजपा देश की जनता में जनचेतना जगाने के लिए यात्रा कर रही है, उस यात्रा से लोग हलाकान और परेशान हो रहे हैं। यह तय है कि अडवानी की यात्रा से लोगों में जनचेतना तो आई है, लेकिन जिस तरह की जनचेतना है वह भाजपा के लिए ही घातक है। आज अडवानी की यात्रा जहां भी गई है, वहां के लोगों से इसके बारे में पूछेंगे तो पहले तो हर किसी के भी मुंह से अपशब्द ही सुनने को मिलेंगे। इस यात्रा ने लोगों को इस बात के लिए जरूर जागरूक कर दिया है कि ऐसी पार्टी को कभी सत्ता में मत लाना जो आम जनों का ख्याल नहीं रखती है। वैसे तो किसी भी पार्टी को जनता से सरोकार नहीं है, लेकिन कम से कम ऐसी यात्रा और पार्टियों तो नहीं करती हैं।
अब इसका जवाब किसके पास है कि अडवानी की यात्रा से किसका भला हुआ है। हमारे विचार से तो न तो इससे पार्टी का भला हुआ है और न ही आमजनों का। अगर वास्तव में किसी का भला हुआ है तो वो वे अधिकारी हैं जिनको अडवानी की यात्रा के कारण सड़कें बनाने का काम मिला या इसी तरह का कोई काम दिया गया। इन कामों की आड़ में खुलकर भ्रष्टाचार हुआ। अपने छत्तीसगढ़ में ही अडवानी की यात्रा के लिए 20 करोड़ से ज्यादा की सड़कें बनाई गर्इं। अब यह बात सभी जानते हैं कि 20 करोड़ में से कितने की सड़कें बनीं होंगी। सड़कों के बनाने में भ्रष्टाचार तो होना ही था। वैसे अडवानी की रथ यात्रा पर भ्रष्टाचार का साया तो पहले से ही है।
मप्र में इस यात्रा के समय मीडिया को पैसे बांटने की बात सामने आई। वैसे ऐसा होना कोई नई बात नहीं है। पता नहीं वह कौन का मुर्ख पत्रकार (ऐसा वे भाजपा नेता और वे पत्रकार सोच रहे होंगे जिनको पैसे मिले) था जिसने इस बात का खुलासा कर दिया। भगवान ऐसे ईमानदार लोग पैदा क्यों करते हैं, यही भ्रष्टाचारी सोच रहे होंगे। लेकिन पाप का घड़ा तो एक न एक दिन फुटता ही है। बहरहाल इतना तय है कि अडवानी की यात्रा भाजपा के लिए घातक साबित होगी। अडवानी जी के साथ भाजपा को इस बात का जवाब देना चाहिए कि यात्रा में रथ अलग और अडवानी जी अलग कैसे चल रहे हैं। क्यों कर रथ सड़क मार्ग से आता है और अपने नेता जी विमान से आते हैं। वास्तव में जनचेतना जगानी है और अगर दम  है तो बिना सुरक्षा के सड़क मार्ग से यात्रा करें। अगर आप वास्तव में जनता के चहेते हैं तो कोई आपको नुकसान नहीं पहुंचेगा लेकिन आप अगर जनता के हितैषी नहीं है तो नुकसान उठाने के लिए तैयार रहें।

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रविवार, अक्तूबर 16, 2011

किसी को क्यों नहीं होता भ्रष्टाचार पर अफसोस

हमें तो जरूर दिखती है अच्छाई और सच्चाई
क्योंकि हम नहीं खाते मुफ्त की दुध-मलाई
हमें नहीं जकड़ सका है भ्रष्टाचार का कसाई
उठो, जागो, देखों और सोचो भाई
अगर हमने अब भी नहीं खोलीं आंखें
तो निगल जाएगा देश को भ्रष्टाचार का कसाई
क्यों सोए हैं न जाने अब तक अपने देश के लोग
किसी को क्यों नहीं होता भ्रष्टाचार पर अफसोस

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शुक्रवार, अक्तूबर 14, 2011

छत्तीसगढ़ के स्वर्ण सपूतों को सलाम

अपने छत्तीसगढ़ के एक और लाड़ले सपूत जगदीश विश्वकर्मा ने दक्षिण अफ्रीका में तिरंगा फहराने का काम किया है। रूस्तम सारंग के बाद जगदीश ने भी कामनवेल्थ भारोत्तोलन में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। 17 साल की उम्र में स्वर्ण जीतने वाले वे पहले खिलाड़ी हैं। इन दोनों खिलाड़ियों की जीत ने बता दिया है कि छत्तीसगढ़ के खिलाड़ियों से अब ओलंपिक के पदक दूर नहीं हैं। यह बात तय है कि अब छत्तीसगढ़ के यही खिलाड़ी ओलंपिक में भी जरूर स्वर्ण जीतेंगे और प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की घोषणा के अनुरूप दो करोड़ की राशि पाने के हकदार होंगे।

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मंगलवार, अक्तूबर 04, 2011

क्यों बदले तुम्हारे खयालात

छुट गया उनका साथ
अब नहीं है हाथों में हाथ
नहीं करते वो हमसे बात
कटती नहीं अब तो रात
काश एक बार हो जाए मुलाकात
पूछे उनसे क्यों बदले तुम्हारे खयालात

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रविवार, अक्तूबर 02, 2011

महात्मा गांधी से क्या लेना-देना

आज गांधी जयंती है, इस अवसर पर हम एक बार फिर से याद दिलाना चाहते हैं कि भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के दर्शन करने का मन आज के युवाओं में है ही नहीं। यह बात बिना वजह नहीं कही जा रही है। कम से कम इस बात का दावा छत्तीसगढ़ के संदर्भ में तो जरूर किया जा सकता है। बाकी राज्यों के बारे में तो हम कोई दावा नहीं कर सकते हैं, लेकिन हमें लगता है कि बाकी राज्यों की तस्वीर छत्तीसगढ़ से जुदा नहीं होगी। आज महात्मा गांधी का प्रसंग इसलिए निकालना पड़ा है क्योंकि आज महात्मा गांधी की जयंती है और हमें याद है कि हमारे एक मित्र दर्शन शास्त्र का एक पेपर गांधी दर्शन देने गए थे। जब वे पेपर देने गए तो उनको मालूम हुआ कि वे गांधी दर्शन विषय लेने वाले एक मात्र छात्र हैं। अब यह अपने राष्ट्रपिता का दुर्भाग्य है कि उनके गांधी दर्शन को पढऩे और उसकी परीक्षा देने वाले परीक्षार्थी मिलते ही नहीं हैं। गांधी जी को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करने वालों की अपने देश में कमी नहीं है, लेकिन जब उनके बताएं रास्ते पर चलने की बात होती है को कोई आगे नहीं आता है। कुछ समय पहले जब एक फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस आई थी तो इस फिल्म के बाद युवाओं ने गांधीगिरी करके मीडिया की सुर्खियां बनने का जरूर काम किया था।

हमारे एक मित्र हैं सीएल यादव.. नहीं.. नहीं उनका पूरा नाम लिखना उचित रहेगा क्योंकि उनके नाम से भी मालूम होता है कि वे वास्तव में पुराने जमाने के हैं और उनकी रूचि महात्मा गांधी में है। उनका पूरा नाम है छेदू लाल यादव। नाम पुराना है, आज के जमाने में ऐसे नाम नहीं रखे जाते हैं। हमारे यादव जी रायपुर की नागरिक सहकारी बैंक की अश्वनी नगर शाखा में शाखा प्रबंधक हैं। बैंक की नौकरी करने के साथ ही उनकी रूचि अब तक पढ़ाई में है। उनके बच्चों की शादी हो गई है लेकिन उन्होंने पढ़ाई से नाता नहीं तोड़ा है। पिछले साल जहां उन्होंने पत्रकारिता की परीक्षा दी थी, वहीं इस बार उन्होंने दर्शन शास्त्र पढऩे का मन बनाया। यही नहीं उन्होंने एक विषय के रूप में गांधी दर्शन को भी चुना। लेकिन तब उनको मालूम नहीं था कि वे जब परीक्षा देने जाएंगे तो उनको परीक्षा हाल में अकेले बैठना पड़ेगा। जब वे परीक्षा देने के लिए विश्व विद्यालय गए तो उनके इंतजार में सभी थे। दोपहर तीन बजे का पेपर था। उनको विवि के स्टाफ ने बताया कि उनके लिए ही आज विवि का परीक्षा हाल खोला गया और 20 लोगों का स्टाफ काम पर है। उन्होंने परीक्षा दी और वहां के स्टाफ के साथ बातें भी कीं। यादव संभवत: पहले परीक्षार्थी रहे हैं जिनको विवि के स्टाफ ने अपने साथ दो बार चाय भी पिलाई।

आज एक यादव जी के कारण यह बात खुलकर सामने आई है कि वास्तव में अपने देश में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की कितनी कदर की जाती है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि राष्ट्रपिता से आज की युवा पीढ़ी को कोई मतलब नहीं रह गया है। युवा पीढ़ी की बात ही क्या उस पीढ़ी के जन्मादाताओं का भी गांधी जी से ज्यादा सरोकार नहीं है। एक बार जब कॉलेज के शिक्षाविदों से पूछा गया कि महात्मा गांधी की मां का नाम क्या था। तो एक एक प्रोफेसर ने काफी झिझकते हुए उनका नाम बताया पुतलीबाई। यह नाम बिलकुल सही है।

एक तरफ जहां कॉलेज के प्रोफेसर नाम नहीं बता पाए थे, वहीं अचानक एक दिन हमने अपने घर में जब इस बात का जिक्र किया तो हमें उस समय काफी आश्चर्य हुआ जब हमारी छठी क्लास में पढऩे वाली बिटिया स्वप्निल ने तपाक से कहा कि महात्मा गांधी की मां का नाम पुतलीबाई था। हमने उससे पूछा कि तुमको कैसे मालूम तो उसने बताया कि उनसे महात्मा गांधी के निबंध में पढ़ा है। उसने हमें यह निबंध भी दिखाया। वह निबंध देखकर हमें इसलिए खुशी हुई क्योंकि वह अंग्रेजी में था। हमें लगा कि चलो कम से कम इंग्लिश मीडियम में पढऩे वाले बच्चों को तो महात्मा गांधी के बारे में जानकारी मिल रही है। यह एक अच्छा संकेत हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ हमारी युवा पीढ़ी जरूर गांधी दर्शन से परहेज किए हुए हैं। हां अगर गांधी जी के नाम को भुनाने के लिए गांधीगिरी करने की बारी आती है तो मीडिया में स्थान पाने के लिए जरूर युवा गांधीगिरी करने से परहेज नहीं करते हैं। एक बार हमने अपने ब्लाग में भी गांधी की मां का नाम पूछा था हमें इस बात की खुशी है ब्लाग बिरादरी के काफी लोग उनका नाम जानते हैं।

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शनिवार, अक्तूबर 01, 2011

काम पढ़ाना, शौक निशाना लगाना

पॉलीटेक्निक में लेक्चरर के पद पर काम करने वाली सुमी गुहा का शौक निशाना लगाना है और उनके इस शौक ने उनको दूसरी बार मावलंकर में खेलने की पात्रता भी दिला दी है। अपने पति आलोक गुहा की प्रेरणा से निशानेबाजी में आई, सुमी गुहा के दोनों बच्चे भी अच्छे निशानेबाज हैं। यह गुहा परिवार माना में राज्य निशानेबाजी में अपने जौहार दिखा रहा है।
माना में चल रही राज्य निशानेबाजी के स्पोर्ट्स पिस्टल वर्ग में 245 अंकों के साथ स्वर्ण पदक जीतने के साथ सुमी गुहा ने 16 अक्टूबर से मावंलकर में होने वाली राष्ट्रीय स्पर्धा के पात्रता चक्र के लिए टिकट कटा लिया है। श्रीमती गुहा बताती हैं कि उनको तीन साल हो गए हैं राज्य स्पर्धा में खेलते हुए। पहले साल तो उनके हाथ सफलता नहीं लगी, लेकिन दूसरे साल उन्होंने एयर पिस्टल के साथ स्पोर्ट्स पिस्टल में रजत पदक जीते। 2010 के इस साल में उन्होंने एयर पिस्टल में मावलंकर जाने की भी पात्रता प्राप्त की। मावंलकर में वह राष्ट्रीय चैंपियनशिप में खेलने की पात्रता प्राप्त नहीं सकीं। लेकिन उनको इस बात की खुशी है कि उनको वहां तक जाने का मौका मिला। इस बार उनको स्पोर्ट्स पिस्टल में जाने का मौका मिला है। वैसे वह एयर पिस्टल में भी मावलंकर जाने का प्रयास करेंगी। इस वर्ग के मुकाबले अभी बचे हैं।
सुमी गुहा बताती हैं कि उनके परिवार में सबसे पहले निशानेबाजी उनके पति आलोक गुहा जो कि माइनिंग में काम, करते थे, इसके बाद उन्होंने और दोनों बच्चों जिसमें प्रथम वर्ष में पढ़ रही अनुषा गुहा और पीजी कर रहे आयुष गुहा शामिल हैं ने निशानेबाजी प्रारंभ की। उनकी पुत्री दिल्ली में पढ़ती हैं, लेकिन राज्य स्पर्धा में खेलने वह यहां आ रही हैं। एक सवाल के जवाब में सुमी गुहा कहती हैं कि निशानेबाजी में सफलता के लिए निरंतर अभ्यास जरूरी है और इसके लिए उन्होंने घर में छोटी सी रेंज बना रखी है। वह कहती हैं कि एयर और स्पोर्ट्स पिस्टल के लिए छोटी की रेंज की ही जरूरत होती है इसलिए घर में अभ्यास संभव है। उन्होंने बताया कि 80-80 हजार की दो विश्व स्तरीय पिस्टल खरीदी है। इस बार उनको मावलंकर में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद है। उन्होंने बताया कि मैंने यहां 245 अंक बनाएं हैं जबकि मावलंकर में 262 अंक बनाने पर ही राष्ट्रीय स्पर्धा में खेलने की पात्रता मिलेगी। अभी समय है और अभ्यास करने से मैं उस लक्ष्य तक पहुंच सकती हूं।

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