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शनिवार, अक्टूबर 03, 2009

क्या खुद पसंद का चटका लगाना अपराध है?

ब्लागवाणी की पसंद को लेकर प्रारंभ हुए विवाद का अंत होता नजर नहीं आता है। ब्लागवाणी के बंद होने से लेकर फिर से प्रारंभ होने के बाद भी इस पर बहस चल रही है। अपने ब्लागर मित्र खुशदीप सहगल ने खुले दिल से यह बात कबूल की है कि उन्होंने खुद पसंद बढ़ाने का काम किया है। सोचने वाली बात यह है कि आखिर पसंद को लेकर विवाद क्यों खड़ा किया जा रहा है। क्या खुद पसंद बढ़ाना अपराध है? दुनिया में ऐसा कौन सा लेखक होगा जो यह नहीं चाहेगा कि उनका लिखा ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़े। और ऐसे में वह लेखक क्या करेगा जब उनको मालूम होगा कि पसंद को बढ़ाए बिना उनका लेख पाठकों के सामने आने वाला नहीं है। ऐसे में उनको पसंद पर पहले पहल तो खुद ही चटका लगाना पड़ेगा। जहां तक हम समझते हैं कि खुद से चटका लगाना अपराध नहीं है। लेकिन यह चटका एक सीमा तक होना चाहिए। अगर हम स्वार्थ में फंस कर अपनी पोस्ट को सबसे ऊपर करने के लिए लगातार चटके लगाते हैं तो भले यह अपराध न हो लेकिन गलत तो है ही। हम भी यह बात मानते हैं कि हमने अपनी पोस्ट पर चटके लगाने का काम किया है ताकि हमारी पोस्ट कम से कम ब्लागवाणी में दिखने लगे।

ब्लागवाणी की पसंद को लेकर जो उस पर आरोप लगे उसकी वजह से इस वाणी पर एक दिन का विराम लगा था। यह एक दिन सभी ब्लागरों के लिए एक युग की तरह बीता कहा जाए तो गलत नहीं होगा। हो सकता है हमारी इस बात से कई लोग सहमत न हों, लेकिन इतना तो तय है कि ब्लागवाणी के बंद होने की खबर से ब्लाग जगत में भूचाल तो आ गया था। हर कोई चाहता था कि यह फिर से प्रारंभ हो जाए और ब्लागवाणी वालों ने इसको फिर से प्रारंभ कर दिया है। और इसको नए रूप में लाने की बात की जा रही है। ब्लागवाणी वालों के इस ऐलान से की अब आने वाले समय में खुद से चटका लगाने वालों के ब्लाग सार्वजनिक किए जाएंगे लगता है खुद से चटका लगाने वालों को एक झटका लगा है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या खुद से चटका लगाना गलत है।

हमारे लिहाज से तो यह कम से कम उस समय तक गलत नहीं माना जाना चाहिए जब तक कोई लेखक महज इतने चटके लगाए कि उसकी पोस्ट दिखने लगे। इसके बाद अगर कोई चटका लगाता है तो जरूर उसको सार्वजनिक किया जाना चाहिए। ऐसा कौन सा लेखक होगा जो यह नहीं चाहेगा कि उनका लिखा भी सबके सामने दिखे और लोग उसको पढ़े। लेकिन ऐसा नहीं हो पाता है और लेखक पाठकों के लिए तरस जाते हैं। ऐसे में पसंद का चटका खुद लगाने के अलावा कोई चारा नहीं होता है। ब्लाग बिरादरी में बहुत ऐसे लोग हैं जिनको पसंद के चटके के बारे में मालूम ही नहीं है। अपने अनिल पुसदकर जी को ही इस चटके के बारे में करीब साल भर तक मालूम नहीं था। एक बार जब बीएस पाबला पहली बार रायपुर आए थे, और हम लोग प्रेस क्लब में बैठे तो उन्होंने सवाल किया था कि यार आखिर ये पसंद क्या बला है, तब उनको हमने, पाबला जी और संजीत त्रिपाठी ने बताया था। अनिल जी जैसे और न जाने कितने ब्लागर होंगे जिनको यह मालूम ही नहीं होगा कि उनकी पोस्ट में जब तक पसंद का चटका नहीं लगेगा उनकी पोस्ट ब्लागवाणी में नहीं दिखेगी।

हम एक बात और यह भी कहना चाहेंगे कि आपकी पोस्ट अच्छी होगी तो जरूर उस पर भरपूर चटके लगेंगे। लेकिन यह पोस्ट पाठकों की नजर में अच्छी होनी चाहिए। जरूरी नहीं है कि हमें जो पोस्ट अच्छी लग रही है, वह सबको अच्छी लगे। हमारी तीन दिन पहले की पोस्ट ब्लागवाणी में सही जानकारी देने वालों का ही पंजीयन हो, में 15 चटके लगे। इसमें चटका लगाने का आगाज हालांकि हमने ही किया था। संभवत: हमारी यह ऐसी पहली पोस्ट रही है जिसमें इतने चटके लगे हैं। वैसे यह पोस्ट हमारी नजर में उतनी अच्छी नहीं थी, पर इसको सबसे ज्यादा पसंद किया गया। जिस पोस्ट को हमने अच्छा माना है उनको चटकों के लिए कई बार तरसना पड़ा है।

एक बार फिर से यह बात सामने आ रही है कि आप अगर किसी ग्रुप विशेष से जुड़े हैं तो जरूर आपको चटकों के साथ टिप्पणियां मिलेंगी। हमें भी कई मित्रों ने एक ग्रुप बनाने की सलाह दी। लेकिन कम से कम यह बात हमें अच्छी लगीं कि हम एक ग्रुप बनाएं और अपने मित्रों से कहे कि यार तुम हमारी पोस्ट में चटके लगाओ और टिप्पणी करो तो हम भी ऐसा करेंगे। हमारे जमीर ने ऐसा करने की इजाजत नहीं दी, इसलिए हमने ऐसा नहीं किया, वरना तो छत्तीसगढ़ में इतने ज्यादा ब्लागर हैं कि अगर इनका एक ग्रुप बन जाए तो सबसे ऊपर छत्तीसगढ़ की ही पोस्ट रहेंगी और सबसे ज्यादा टिप्पणियां भी मिलेंगी, लेकिन क्या ऐसा करके हमारे लेखक मन को संतोष मिल सकता है। कदापि नहीं। सच्चे लेखक को अगर एक टिप्पणी भी कोई गंभीरता और दिल से कर दे वह टिप्पणी 100 टिप्पणियों पर भारी होती है, इस पर हम पहले लिख चुके हैं।


अंत में हम ब्लाग बिरादरी से जानना चाहते हैं कि आप लोग क्या सोचते हैं पसंद के चटकों के बारे में क्या खुद चटके लगाना अपराध है? कितने चटके लगाने की इजाजत लेखकों को होनी चाहिए।

14 टिप्पणियाँ:

टीम ब्लागवाणी,  शनि अक्टू॰ 03, 07:16:00 am 2009  

खुद की पोस्ट को पसंद करना गलत नहीं है एक व्यक्ति एक पसंद का मामला होना चाहिये.

श्री खुशदीप सहगल मामले में स्पष्ट हो गया है ब्लागवाणी द्वारा बनाया सैन्डबाक्स सही काम कर रहा था. एक सीमा से अधिक जब एक ही व्यक्ति द्वारा पसंद बढाई जांय तो उनका आगे बढ़ना रोक देना गलत नहीं था.

आने वाली ब्लागवाणी में किसी पोस्ट पर लागिन करके सिर्फ एक पसंद देने की व्यवस्था होगी जैसे डिग आदि में होती है.

Udan Tashtari,  शनि अक्टू॰ 03, 07:18:00 am 2009  

मेरी समझ के तो अभी यही परे है कि पसंद बढ़ा कर पा क्या लोगे. लेखन और पठ्न पर ध्यान दो.

पसंद, रैकिंग, टिप्पणी सब काठ की हांडी हैं, बार बार नहीं चढ़ती...एक बार ले भी आओगे किसी को, तो बांधेगा तो लेखन ही.

विचारणीय आलेख.

विवेक रस्तोगी,  शनि अक्टू॰ 03, 07:23:00 am 2009  

पसंद नापंसद से क्या होता है अगर लेखन अच्छा है पाठ्कों को बांधता है तो पाठक स्वयं ही आपके पास आयेगा, वह कभी भी ब्लोग एग्रीगेटर से नहीं आयेगा। ये तो केवल मन बहलाने के लिये है।

बेनामी,  शनि अक्टू॰ 03, 07:31:00 am 2009  

पोस्ट दिखना या दिखाना मतलब एक तरह की विंडो शॉपिंग। जो दिखेगा वह पढ़ा जाएगा।

अपने लेखन (माल) को पाठकों की निगाह में लाने के लिए उसे कैसे सामने लाया जाए, यह प्रयास सभी करते हैं।

भौतिक संसार में भी यही होता है। जो मालिक होते है दुकान के, वह अपने निजी माल को पहले दिखाएँगे ही। मुफ्तखोरों को लतियाया ही जायेगा, शर्तें लादी जाएँगी, बंधन लगाए जाएँगे। जो किराया देंगें उन्हें जगह भी दी जाएगी और सुविधा भी। बाद में भले ही कोई हफ्ता मांगे तो उसे भी कुछ थमा दिया जाएगा।

ऐसा ही कुछ आभासी संसार में भी होता है, चाहे वह गूगल हो या फिर याहू!

मुफ्त की सुविधा उठाने वालों को अधिक चिंता रहती है अपने माल को सामने लाए जाने के लिए। इसलिए उसे चमकाते बुहारते रहते हैं। यह कोई अपराध नहीं है।

लेकिन कोई कितना भी अच्छा सृजन कर ले अगर वह किसी झोपड़ी में है तो कोई खरीदार नहीं आएगा। दो कौड़ी का सामान मॉल में रखिए हजारों देखेंगे और तारीफ करेंगे।

किराया दीजिए, अपने सामान को मॉल में रखिए।

रचना जी गलत कहती हैं क्या?

बी एस पाबला

Khushdeep Sehgal,  शनि अक्टू॰ 03, 08:47:00 am 2009  

ग्वालानी जी और पाबला जी से पूरी तरह सहमत...
ब्लॉगवाणी टीम ने इस पोस्ट पर आकर जवाब दिया, बड़ी खुशी की बात है...संवाद बढ़ने की ये अच्छी शुरुआत है...
मेरी कुछ जिज्ञासाएं हैं, आशा है ब्लॉगवाणी टीम उन्हें भी शांत करने का प्रयास करेगी...

1. क्या मेरे जैसे और भी ब्लॉगर भाई हैं जिन्होंने अपनी पसंद बढ़ाने का काम किया...क्या ब्लॉगवाणी सभी का रिकॉर्ड जाहिर करेगी..
2. कुछ पोस्ट पर पसंद 30-40 तक पहुंच जाती हैं...हालांकि उनकी पाठक संख्या और टिप्पणियों की संख्या कम ही होती है...क्या वो सब पसंद असली होती हैं...
3. सैंड ब़ॉक्स ठीक काम कर रहा है...लेकिन अगर कोई खुंदक में किसी दूसरे ब्ल़़ॉगर को नीचा दिखाना चाहता है...और बार-बार उसकी पोस्ट पर नकली पसंद के चटके लगाना शुरू कर दे...तो इसे रोकने के लिए भी क्या कोई व्यवस्था है...या जिसकी पसंद लगातार बढ़ाई जा रही है, उसकी पसंद पर बार या रोक लगा दी जाएगी...जबकि उस बेचारे का कोई कसूर भी नहीं होगा...
4. ब्लॉगवाणी अगर नापसंद का ऑप्शन शुरू करने की सोच रही है तो क्या उसे भी दूसरे ब्लॉगर को नीचा दिखाने के लिए दुरुपयोग करने की संभावना नहीं होगी...

ये सब प्रश्न इसलिए हैं कि ब्लॉगवाणी को निर्विवाद और सर्वोपरि बनाया जा सके...लेकिन ब्लॉगवाणी जो भी कर रहा है, उसकी जितनी तारीफ की जाए कम है...ये निस्वार्थ और समर्पण का भाव प्रशंसनीय है...ब्लॉगवाणी की कमी कितनी अखरी, ये अभी हाल में हुए ब्लैक आउट के दौरान सभी ब्लॉगर भाइयों को पता चला...

आचार्य ललित मुनि,  शनि अक्टू॰ 03, 09:03:00 am 2009  

लेकिन कोई कितना भी अच्छा सृजन कर ले अगर वह किसी झोपड़ी में है तो कोई खरीदार नहीं आएगा। दो कौड़ी का सामान मॉल में रखिए हजारों देखेंगे और तारीफ करेंगे।
पावला जी मै आपकी इस बात से सहमत हु,
ऐसा ही होता है,

आचार्य ललित मुनि,  शनि अक्टू॰ 03, 09:07:00 am 2009  

पावला जी हमारा माल तो शो केस तक शायद ही पहुचा हो,कल का ही देख लो कहा है पता ही नही है,
फ़िर भी हम सन्तुष्ट है आज नही तो कल अपना भी माल झोपडी से निकल कर मोल मे पहुचेगा,

Anil Pusadkar,  शनि अक्टू॰ 03, 10:05:00 am 2009  

अच्छा लिखो,अच्छा पढो।फ़िर ब्लोग पर तो हम खुद की संतुष्टी के लिये लिख रहे हैं तो खुद को पसंद होगा ही।

Unknown,  शनि अक्टू॰ 03, 10:50:00 am 2009  

जैसा कि ब्लागवाणी टीम ने कहा कि कोई अपनी पसन्द खुद होकर कितनी बढ़ा सकता है, एक या दो… उदाहरण के लिये मेरे 400 से अधिक सब्स्क्राइबर हैं और लगभग इतने ही पाठक ब्लागवाणी सहित विभिन्न जरिये से लेख पढ़ने आते हैं, अब यदि मेरी पोस्ट पर 20-25 पसन्द के चटके लग भी गये तो यह कुल पाठक संख्या का कितने प्रतिशत हुआ? इसलिये मेरी समझ में पसन्द के चटके, पोस्ट की लोकप्रियता का पैमाना नहीं हो सकता…। अतः इस झंझट को भूलकर ब्लागर अपने लेखन, रिसर्च और गुणवत्ता बढ़ाने की ओर ध्यान दें…

अविनाश वाचस्पति,  शनि अक्टू॰ 03, 01:07:00 pm 2009  

लेखकों की पहली पसंद
पसंद को चटके लगवाना।
पाप नहीं है तो पुण्‍य भी नहीं
इसमें समय लगाने की जगह
इतना और समय पोस्‍ट लिखने
में
लगायेंगे तो पसंद के खुद ही
इतने झटके आयेंगे कि
हिल जायेंगे।

Unknown,  शनि अक्टू॰ 03, 03:19:00 pm 2009  

पसंद बटन का मुंख्य उद्देश्य है यह बताना कि किसी लेख को कितने पाठकों ने पसंद किया जैसे कि डिग की संख्या कई हजारों में पहुँचती है, डिग डॉट काम में आज जो प्रथम दस वाली सूची है उसमें अभी टॉप आर्टिकल को 2955 बार डिग किया गया है। हमारे यहाँ तो हमीं ब्लॉगर हैं और हमीं पाठक। ऐसा नहीं है कि हिन्दी में ही अपना पसंद बढ़ाने के लिए जुगाड़-तुगाड़ किया जा रहा है, अंग्रेजी में भी डिग की संख्या बढ़वाई जाती है, वहाँ तो एक डिग बढ़वाने के लिए एक से तीन डालर तक देने के लिए तैयार रहने वाले लोग भी हैं क्योंकि उनके ब्लोग से उन्हें कमाई होती है।

खुद पसंद का एक बार चटका लगाना कोई अपराध नहीं है। हाँ बार बार खुद चटका लगाना गलत बात है।

अफ़लातून,  शनि अक्टू॰ 03, 04:12:00 pm 2009  

@ खुशदीपजी, मैंने ब्लॉगवाणी को मेल में यह कबूला था कि मैं अपनी पोस्ट्स को ’पसंद’ करता हूँ।पहले दो बढ़ जाती थीं ।
कुछ चिट्ठेकार अपनी ही पोस्ट २४ घण्टे बीतने पर फिर प्रकाशित करते रहे/रहीं हैं - उनके नाम भी ब्लॉगवाणी जारी कर सकती है ।
समीरलाल उचित फरमा रहे हैं - अच्छा लिखो , लोग पढ़ेंगे ।

Arshia Ali,  शनि अक्टू॰ 03, 04:33:00 pm 2009  

काश, इन चर्चाओं से कुछ सत्व भी निकल पाता।
Think Scientific Act Scientific

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali),  शनि अक्टू॰ 03, 07:00:00 pm 2009  

jee nahi bilkul bhi apraadh nahi hai......

Shri.... Sameer lal ji se poorntah sahmat.....

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