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रविवार, जून 21, 2009

अश्लीलता पर सरकारी फंदा

सायबर कैफे ज्यादातर इसलिए बदनाम हैं कि वहां पर जाकर आज के युवा इंटरनेट पर ज्ञान की बातें जानने का काम कम और अश्लील साइट देखने का काम ज्यादा करते हैं। यही नहीं कई साइबर कैफे तो प्रेमी युगल को मिलने का स्थान देने का काम करते हैं। सायबर कैफे में प्रेमी युगलों की कई आपत्तिजनक तस्वीरें खींच कर उनको ब्लैकमेल करने का काम भी कई सायबर कैफे करते रहे हैं। कुल मिलाकर सायबर कैफे को अश्लीलता फैलाने के नाम से ज्यादा जाना जाता है। पर अब यह सब काम सायबर कैफे में नहीं हो सकेगा क्योंकि अश्लीलता फैलाने वाले ऐसे सायबर कैफे पर शिकंजा कसने का काम छत्तीसगढ़ सरकार ने किया है और ऐसे कड़े नियम बना दिए हैं कि अब कोई भी कम से कम सायबर कैफे में ऐसे किसी साइट को नहीं खोल पाएगा जिस साइट में अश्लीलता होती है। इसी के साथ सायबर कैफे में होने वाले दूसरे अपराधों पर भी रोक लगेगी। छत्तीसगढ़ सरकार से पूरे प्रदेश में सायबर कानून लागू कर दिया है। इस कानून के कारण अब यह लगता है कि गलत तरीके से सायबर कैफे से कमाई कराने वालों की सामत आनी तय है। अभी से कई सायबर कैफे बंद होने की तैयारी में हैं।

सायबर कैफे का उपयोग करने वाले ज्यादातर स्कूल-कॉलेज के ऐसे किशोर और युवा हैं जो अपने-स्कूल कॉलेज से गोल मारकर यहां जाते हैं और सायबर कैफे में बैठकर उन गंदी साइट्स को देखने का काम करते हैं जो साइट्स अश्लीलता परोसने का काम करते हैं। इसी के साथ सायबर कैफे में ज्यादातर कैफे केबिन भी उपलब्ध कराते हैं। ये केबिन महज 20 से 25 रुपए घंटे के किराए में उपलब्ध हो जाते हैं। ऐसे में इन केबिन का उपयोग ऐसे प्रेमी युगल ज्यादा करते हैं जिनके पास मिलने के लिए कोई ठिकाना नहीं रहता है। इतना सस्ता ठिकाने उनको और कहां मिल सकता है। ठिकाने के साथ इंटरनेट पर मनचाही साइट देखने का भी मजा। जब कोई प्रेमी युगल सायबर कैफे में बैठकर साइट्स के साथ दुगना मजा लेने में मस्त रहते हैं तो उनकी वीडियो फिल्म बनाने का काम करने में सायबर कैफे वाले मस्त रहते हैं। इसके बाद प्रारंभ होता है उनको ब्लैकमेल करने का सिलसिला। चूंकि प्रेमी युगल गलत रहते हैं इसलिए उनको ब्लैकमेलरों की हर जायज और नाजायज बात माननी पड़ती है। यहां पर सबसे ज्यादा परेशानी लड़कियों को होती हैं। उनके साथ न जाने क्या-क्या घटता है। सायबर कैफे में बैठकर अश्लील साइड देखने वाले नाबालिगों की भी कमी नहीं है। स्कूल के कई नाबालिग लड़के और लड़कियां इन सायबर कैफे के केबिनों में देखे जा सकते हैं। जिन भी कैफे में ऐसे किशोर या युवा जाते हैं उन कैफे के सर्वे से यह बातें एक बार नहीं कई बार सामने आई हैं कि उन कैफे में ये किशोर और युवा किसी शिक्षा की जानकारी लेने नहीं बल्कि अश्लील साइट देखने ही जाते हैं। वैसे भी सायबर कैफे वालों को अपने पैसों से मतलब रहता है उनको इस बात से कोई सरोकार नहीं रहता है कि उनका ग्राहक क्या कर रहा है। संभवत: यही वजह भी रही है कि सायबर कैफे से ही कई तरह के अपराध होते हैं।

सायबर कैफे से ही से जहां अश्लील चैटिंग भी होती है, वहीं यही से हैकिंग भी होती है। वैसे छत्तीसगढ़ में किसी बड़ी हैकिंग की खबर अब तक नहीं आई है। लेकिन हैकिंग होती तो है। सायबर कैफे से होने वाले अपराधों के कारण सरकार ने अंत: में परेशान होकर अब एक कानून बना दिया है जिसके कारण यह तय हो गया है कि अब कोई भी सायबर कैफे अश्लीलता फैलाने का काम नहीं कर पाएगा। इसी के साथ किसी भी सायबर कैफे में अपराध नहीं हो सकेंगे। इस कानून के मुताबिक अब तो सायबर कैफे में बिना पहचान बताए कोई प्रवेश भी नहीं कर पाएगा। पहचान बताने के लिए अपना आईडी प्रूफ देना पड़ेगा। अपराध करने वाले अपनी सही पहचान नहीं बताएंगे। हो सकता है कि कोई गलत पहचान बताकर सायबर कैफे में प्रवेश कर जाए। लेकिन इसके बाद भी उसका वहां पर किसी भी तरह की आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देना संभव नहीं होगा। सायबर कैफे से जहां केबिन की सुविधा हटा दी गई है, वहीं यह तय किया गया है कि सभी कम्प्यूटर की स्क्रीन ऐसी होगी जो बाहर से नजर आएंगी, ताकि यह देखा जा सके कि कोई भी ग्राहक क्या उपयोग कर रहा है। कैफे में ग्राहकों के लिए एक रजिस्टार रखना होगा जिसमें पूरी जानकारी देनी होगी। इसी के साथ हर माह कैफे वालों को थाने में मासिक रिपोर्ट देनी होगी। इसी के साथ किसी भी कैफे में कभी भी पुलिस छापा मार देगी। कुल मिलाकर नियमों को इतना कड़ा बना दिया गया है कि यह बात तय है कि सायबर कैफे की आड़ में चलने वाला अश्लीलता का धंधा बंद ही हो जाएगा। ऐसा धंधा करने वाले तो कई सायबर कैफे अभी से बंद होने लगे हैं।


चलो छत्तीसगढ़ सरकार ने एक काम तो अच्छा किया है। अब दूसरे राज्यों में सायबर कानून की क्या स्थिति है इसकी जानकारी तो हमें नहीं है। हमारे ब्लागर मित्रों से आग्रह है कि वे अपने राज्यों के बारे में हो सके तो जानकारी देने की कृपा करें।

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शनिवार, जून 13, 2009

ये आधुनिकता है या अश्लीलता

आज की युवा पीढ़ी आधुनिकता के नाम पर न जाने क्या-क्या करने लगी है। जो युवाओं की नजर में आधुनिकता है, उसको सही नजरिये से देखा जाए तो वह अश्लीलता है। अपना शहर आज राजधानी बन गया है। अपने शहर के युवा भी आज अपने को मुंबई और दिल्ली के युवाओं से कम नहीं समझते हैं। अगर यह मुकाबला अच्छी चीजों के लिए होता तो फायदेमंद होता, लेकिन यह मुकाबला तो एक ऐेसी दौड़ का है जिसको अश्लीलता की दौड़ से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता है। आज शहर की कोई भी ऐसी सड़क नजर नहीं आती है जहां पर किसी बाइक में फर्राटे भरते किसी लड़के के साथ पीछे में कोई लड़की न बैठी हो। बुराई लड़के के साथ बैठने में नहीं है, बल्कि बैठने के ढंग में है। लड़के के कमर में हाथ डाले हुए लड़कियां इस तरह से चली जाती है मानो वो भारत में नहीं बल्कि किसी पश्चिमी देश में रह रही हैं। यहीं नहीं कई बार इनके हरकतें भी काफी शर्मनाक होती हैं। अब इसके बारे में कुछ कह दिया जाए तो आसानी से जवाब मिलता है कि भई हम तो मॉर्डन है। तो क्या मॉर्डन होना इसी को कहते हैं।

भारत का युवा आज से नहीं काफी पहले से पश्चिमी सभ्यता की तरफ खींचा चला जा रहा है। अगर किसी भी देश की सभ्यता अच्छी हो तो उसको अपनाने में बुराई नहीं होती है, लेकिन कोई सभ्यता अगर अपने देश की सभ्यता से बिलकुल विपरीत हो तो उसका अपनाने में जरूर बुराई है। हर अच्छी चीज को अपनाना हमेशा सुखद होता है और लोग उसकी तारीफ करते हैं, लेकिन जहां भी आप गलत चीज को अपनाते हैं तो उसकी बुराई होना लाजिमी है। पश्चिमी देशों की कई बातें अच्छी हो सकती
हैं
, लेकिन जिस तरह से आज भारत का युवा हरकतें करने लगा है वह भारतीय समाज के लिए जरूर घातक है। आज हम अपने शहर और प्रदेश की बात करें तो हमें रायपुर के साथ प्रदेश के ज्यादातर बड़े शहरों में यह स्थिति नजर आती है कि लड़के-लड़कियां बाइक पर सवार होकर खुले आम अश्लीलता फैलाने का काम कर रहे हैं।


अगर किसी भीड़ भरी सड़क पर एक आदमी खड़ा है और बगल में उसकी लड़की अपने पुरुष मित्र के साथ खड़ी है और उसके चेहरे पर नकाब है तो वह आदमी अपने लड़की को पहचान ही नहीं पाएगा। ऐसे वाक्ये होते भी रहते हैं। कई लड़के काफी गर्व से अपने मित्रों को बताते हैं कि यार क्या बताऊं आज मैं रीना.. सोनिया.. टीना ... कविता.. सविता.. मीना.. या फिर कोई भी नाम जो उसकी गर्ल फ्रेंड का होगा, उसके साथ था और बगल में उसके पापा थे, पर क्या मजाल की उन्होंने हमें पहचाना हो।


ऐसी कोई सड़क नहीं होगी जहां पर कई ऐसे जोड़े मिल जाएंगे जो बाइक में बैठे हुए एक-दूसरे की कमर में हाथ डाले रहते हैं। यह नजारा महज खाली सड़कों पर नजर नहीं आता है बल्कि भीड़ भरी बाजार की सड़कों पर भी ऐसे नजारे आम है। लड़के-लड़कियां ऐसी हिम्मत करते हैं तो इसके पीछे एक सबसे बड़ा कारण यह है कि उनको पहचाने जाने का डर नहीं रहता है। यह डर इसलिए नहीं होता है कि ऐसी हरकतें करने वालों के चेहरों पर नकाब रहता है। अपने शहर में काफी समय से धूल और धूप से बचने के लिए लोग चेहरों पर स्कार्फ बांधने का काम कर रहे हैं। जिस स्कार्फ को सुविधा के लिए बनाया गया है उसका उपयोग कम और दुरुपयोग ज्यादा हो रहा है। हालात ये है कि अगर किसी भीड़ भरी सड़क पर एक आदमी खड़ा है और बगल में उसकी लड़की अपने पुरुष मित्र के साथ खड़ी है और उसके चेहरे पर नकाब है तो वह आदमी अपने लड़की को पहचान ही नहीं पाएगा। ऐसे वाक्ये होते भी रहते हैं। कई लड़के काफी गर्व से अपने मित्रों को बताते हैं कि यार क्या बताऊं आज मैं रीना.. सोनिया.. टीना ... कविता.. सविता.. मीना.. या फिर कोई भी नाम जो उसकी गर्ल फ्रेंड का होगा, उसके साथ था और बगल में उसके पापा थे, पर क्या मजाल की उन्होंने हमें पहचाना हो।

ये सब ऐसी बातें हैं जो आज के युवाओं को और ज्यादा पथभ्रष्ट करने का काम कर रही हैं। एक दोस्त के बताने पर दूसरा भी सोचता है कि हम भी ऐसा रोमांच ले। अब युवाओं को ऐसी बातें तो रोमांच ही लगती है। यह एक गंभीर मुद्दा है और सोचने वाली बात है कि वास्तव में आज का युवा किस दिशा में जा रहा है। क्या किसी लड़की को अपनी बाइक में बिठाकर उसको कमर में हाथ डलवाए रखना भारतीय सभ्यता है? भारतीय सभ्यता में यह कभी गंवारा नहीं किया जा सकता है। हो सकता है कि हमारी ये बातें उन लोगों को बुरी लग रही हों जो लोग इस तरह की हरकतों को ही आधुनिकता समझते हैं।

अगर किसी को हमारी बात बुरी लगती है तो लगे, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि समाज में कोई अश्लीलता फैलाए और उसे आधुनिकता का नाम दे दे तो उसको रोकना तो दूर उस पर कुछ लिखा भी न जाए। हमसे तो कम से कम ऐसा होने वाला नहीं है। हमने कोई समाज को सुधारने का ठेका नहीं लिया है, लेकिन अगर सामने कुछ गलत हो रहा हो तो उसके बारे में न लिखना जरूर हमारी नजर में गलत है। बहरहाल हमें ऐसा लगता है कि आज के युवाओं को एक सही दिशा दिखाने की बहुत ज्यादा जरूरत है और इसके लिए पालकों को ही पहल करनी पड़ेगी। हमें तो लगता है कि आज की युवा पीढ़ी अगर गलत रास्ते पर जा रही है तो इसके पीछे कहीं न कहीं पालकों का दोष ज्यादा है। आप अगर अपने सपूत या सुपुत्री को अच्छे संस्कार नहीं दे पा रहे हैं और उनको सही-गलत से अवगत नहीं करा पा रहे हैं तो आप खुद सोचिए क्या आप दोषी नहीं हैं? अगर आपको लगता है कि आप वास्तव में दोषी हैं तो अब भी वक्त है संभल जाए और अपने साथ आज की युवा पीढ़ी को असभ्यता की खाई में गिरने से बचा लें।

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गुरुवार, अप्रैल 23, 2009

आईपीएल का खेल-भारत के बाहर फेल

इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल को आयोजक अपनी मनमर्जी के चलते भारत के बाहर द. अफ्रीका ले तो गए हैं, पर अफ्रीका में जिस तरह से लगातार बारिश के कारण मैच या तो रद्द हो रहे हैं, या फिर डकवर्थ लुईस नियम से मैचों का फैसला हो रहा है, उससे साफ लग रहा है कि आईपीएल के असली मजे तो पूरा तेल निकल गया है। वैसे भी आईपीएल का कार्यक्रम भारत के मौसम के हिसाब से बना था। आयोजकों को आईपीएल को भारत स बाहर करने का एक ही ऐसा फायदा मिला है, जो भारत में रहते नहीं मिल पाता। वह है जमकर चियर्स गर्ल्स का इस्तेमाल करते हुए अश्लीलता का नंगा नाच करने का। आईपीएल के बारे में क्रिकेटरों का नजरिया भले क्रिकेट के लिए सकारात्मक हो, लेकिन जहां तक आमजनों और खेल के पंडितों का सवाल है तो कोई भी यह मानने को तैयार नहीं है कि आईपीएल से क्रिकेट का कोई भला होने वाला है। आईपीएल से क्रिकेट का क्या होगा उसकी तस्वीर सामने आने लगी है। आईपीएल के कारण क्रिकेटर फ्रेंचाइजी मालिकों के हाथों की कठपुतली बनते जा रहे हैं।
आईपीएल का खेल इस समय द. अफ्रीका में चल रहा है और इस दूसरे संस्करण में मैचों का मजा जिस तरह से आना चाहिए, वह नहीं आ पा रहा है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि क्रिकेट का कोई भी मैच हो उसका पूरा मजा लेने का काम दर्शक तो करते ही हैं। ऐसे में आईपीएल का जादू इस समय पूरे विश्व के खेल प्रेमियों के सिर चढ़कर बोल रहा है। अब यह बात अलग है कि क्रिकेट प्रेमी जिस तरह का रोमांच इस दूसरे संस्करण में चाहते थे, वैसा उनको अब तक नहीं मिल पाया है। भारत में हुए पहले संस्करण को याद किया जाए तो इसका जलवा अलग ही था। वैसे भी यह बात सब जानते हैं कि भारत में ही क्रिकेट के चाहने वाले ज्यादा है। विदेशी खिलाड़ी भी यह मानते हैं कि उनको जितना मान-सम्मान भारत में मिलता उतना कहीं और नहीं मिलता है। चाहे कंगारू क्रिकेटरों की बात हो या फिर कैरेबियन क्रिकेटरों की हर देश का क्रिकेटर भारत की जमीन पर ही खेलना पसंद करता है। आईपीएल के दूसरे संस्करण में कोलकाता की टीम से खेलने वाले क्रिस गेल को इस बात का मलाल है कि आईपीएल का दूसरा संस्करण भारत में नहीं हो रहा है। लेकिन वे भी क्या कर सकते हैं उनको अपने फ्रेंचाइजी मालिक का आदेश मानना है। बकौल गेल उनके चाहने वाले भारत में ज्यादा हैं। यह एक गेल की ही बात नहीं है। आईपीएल में खेलने वाले हर विदेशी खिलाड़ी के साथ यह बात है। सब जानते हैं कि जब उनका बल्ला चलता है या फिर गेंदों से विकेट की गिल्लियां उखड़ती हैं तो किस तरह से भारतीय दर्शक उनकी तारीफ करते हैं। ऐसी तारीफ तो किस भी क्रिकेटर को और किसी देश में मिल ही नहीं सकती है। आईपीएल का आयोजन करने वाले शायद यह बात भूल गए थे कि भारत जैसा क्रिकेट का दीवान देश तो उनको विश्व के नक्शे में कहीं मिल ही नहीं सकता है। अगर आईपीएल के आयुक्त ललित मोदी ने थोड़ी सी समझदारी से काम लिया होता तो आईपीएल का खेल भारत के बाहर जाता ही नहीं और उसके फेल होने की बात ही नहीं होती। लेकिन श्री मोदी तो लगता है कि अपने आकाओं को खुश करने में लगे थे। श्री मोदी आईपीएल को द. अफ्रीका ले जाकर इतने ज्यादा खुश हैं कि वे यह भी भूल गए कि क्रिकेट और ओलंपिक में कितना अंतर होता है। उन्होंने तो ओलंपिक के आयोजकों को ही सलाह दे डाली कि आईपीएल से प्ररेणा लेनी चाहिए। कि कैसे कम समय में एक बड़ा आयोजन किया जा सकता है। मोदी साहब एक बार ओलंपिक का आयोयन करके देखिए फिर समझ में आएगा कि ओलंपिक क्या होता है। चंद देशों की टीमें वो भी एक खेल के लिए, उनकी व्यवस्था करना आसान होता है ओलंपिक में जितने देशों के खिलाड़ी कई खेलों के लिए आते हैं उतने के लिए व्यवस्था करने में तेल निकल जाता है।
बहरहाल हम बात करें आईपीएल की। आईपीएल में जिस तरह से लगातार बारिश के कारण मैचों का मजा किरकरा हो रहा है, उससे शुरुआती दौर में यह बात लगने लगी है कि आईपीएल का यह संस्करण सफल नहीं होने वाला है। वैसे तो यह बात तभी तय लग रही थी जब इसको भारत के बाहर किया जा रहा था। लंदन में इसका आयोजन इसलिए नहीं किया गया क्योंकि वहां पर इस समय बारिश का मौसम है। द. अफ्रीका में भी बारिश का समय है, लेकिन वहां बारिश से मैच कम बाधित होंगे ऐसा कहा गया था, लेकिन बारिश से मैच लगातार प्रभावित हो रहे हैं और खेल प्रेमी निराश हो रहे हैं। आईपीएल को देश के बाहर करने का एक ही फायदा आयोजकों को हुआ है कि वहां पर खुले आम अश्लीलता की छूट मिली हुई है। अफीका में इस बात के लिए कोई रोक नहीं है कि चियर्स गर्ल्स किस तरह के कपड़े पहनकर डांस करती हैं। वहां पर अगर बिना कपड़ों के भी चियर्स गर्ल्स डांस करने लगे तो कोई रोकने वाला नहीं है। भारत में पहले संस्करण में कोर्ट ने ही आयोजकों को फटकारा था और कोर्ट के आदेश के बाद ही चियर्स गर्ल्स को सभ्यता के दायरे में रखा गया था।

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