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मंगलवार, सितंबर 20, 2011

जिला अकादमियों की पहले से होगा खेलों का विकास

हंगरी से फुटबॉल का विशेष प्रशिक्षण लेकर आर्इं राजधानी की  एनआईएस कोच सरिता कुजूर का मानना है कि फुटबॉल सहित हर खेल में जिला स्तर से अकादमियों की पहल होने से ही राज्य में खेलों का विकास होगा। जिला अकादमियों होने से ही राज्य अकादमियों को प्रतिस्पर्धा मिलेगी और छत्तीसगढ़ में होने वाले 37वें राष्ट्रीय खेलों के लिए अच्छे खिलाड़ी तैयार हो सकेंगे। विदेशों में तो क्लब कल्चर है, लेकिन अपने राज्य में यह संभव नहीं है, इसलिए क्लब कल्चर के स्थान पर अकादमी कल्चर का विकास करने से खेलों का विकास संभव है। प्रस्तुत है उनसे हुई बात-चीत के अंश।
0 हंगरी में क्या सीखने को मिला?
00 हंगरी में कई खेलों के प्रशिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण के लिए साई ने भेजा था। वहां पर प्रशिक्षण का जो स्तर है उसकी कल्पना भी हम लोग नहीं कर सकते हैं।
0 किस तरह का प्रशिक्षण दिया जाता?
00 हंगरी ही नहीं हर देश में एक-एक खिलाड़ी पर मेहनत की जाती है। खिलाड़ियों को वहां इतना ज्यादा महत्व मिलता है जिसके बारे में भारत में हम सोच भी नहीं सकते हैं। हर खिलाड़ी के लिए अलग प्रशिक्षक होते हैं। खिलाड़ियों को पेशेवर तरीके से तैयार किया जाता है।
0 खिलाड़ियों को किस तरह से महत्व मिलता है?
00 हंगरी की ही बात करें तो वहां पर फुटबॉल खिलाड़ियों को तीन स्तरों में बांटा गया है। लेबल वन के खिलाड़ियों को जो सुविधाएं मिलती हैं, उसको देखकर तो मैं दंग रह गई थी। वहां पर लेबल वन के खिलाड़ियों की एक टीम जब एक स्पर्धा जीतकर आई तो उनके आगे-पीछे उसी तरह से लाल-पीली बत्ती वाली गाड़ियों चल रही थीं जैसे हमारे यहां मंत्रियों के आगे-पीछे चलती हैं। पहले तो मैंने समझा कि कोई मंत्री आया होगा, जब बाद में पता चला कि यह तो फुटबॉल टीम के खिलाड़ी हैं तो मैं हैरान रह गई। लेबल वन खिलाड़ियों को सरकार हर तरह की सुविधा देती है। कुछ इसी तरह की सुविधाएं लेबल टू के खिलाड़ियों को भी मिलती हैं। लेबल थ्री के खिलाड़ियों को कम सुविधाएं हैं, लेकिन इनकी सुविधाएं हमारे यहां पहले दर्ज के खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाओं से ज्यादा हैं।
0 लेबल थ्री वाले खिलाड़ियों के प्रशिक्षण के बारे में बताएं?
00 इन खिलाड़ियों को मिलने वाला प्रशिक्षण राष्ट्रीय स्तर का होता है। इस लेबल के खिलाड़ियों को भी अपने भविष्य के बारे में नहीं सोचना पड़ता है।
0 अपने राज्य में क्या होना चाहिए?
00 अपने राज्य में बिना प्रशासन की मदद के कुछ नहीं हो सकता है। जब मैं हंगरी से लौटी थी तो बहुत उत्साहित थी कि कम से कम अपने राज्य में बालिका खिलाड़ियों का स्तर सुधारने की दिशा में काम करूंगी। मैं काम करना चाहती हूं, लेकिन बिना प्रशासन की मदद के कुछ संभव नहीं है।
0 खिलाड़ियों और खेल का स्तर सुधारने के लिए क्या होना चाहिए?
00 जहां तक मैं सोचती हूं कि राज्य में फुटबॉल सहित हर खेल में पूरे राज्य में अकादमी कल्चर की नींव डालनी होगी। अकादमी की बात मैं इसलिए कर रही हूं क्योंकि मैं जानती हूं कि अपने राज्य में विदेशों की तरह क्लब कल्चर संभव नहीं है।
0 किस स्तर से अकादमी होनी चाहिए?
00 जिला स्तर से। जिला स्तर की बात मैं इसलिए कर रही हूं क्योंकि जिला स्तर पर अकादमी होने से ही राज्य अकादमी को प्रतिस्पर्धा मिल सकेगी। पूरे 18 जिलों में संभव न हो तो जिस खेल के खिलाड़ी जहां ज्यादा हों उन जिलों में जिला अकादमी बनने के साथ राजधानी में ज्यादा से ज्यादा खेलों की अकादमी बनानी चाहिए।
0 अकादमियों से क्या फायदा मिलेगा?
00 अकादमियां होने से ही खेलों का विकास तेजी से होगा। आज अगर हमारा पड़ोसी राज्य मप्र राष्ट्रीय खेलों में 100 पदकों के पार पहुंचा है तो उसके पीछे अकादमियां ही हैं। अपने राज्य में 37वें राष्ट्रीय खेल होने हैं इसलिए बिना अकादमियों के हम पदक तालिका में शीर्ष पर नहीं पहुंच सकते हैं।
0 राष्ट्रीय खेलों में सफलता के लिए और क्या जरूरी है?
00 राष्ट्रीय खेलों में सफलता के लिए अभी से तैयारी करनी होगी। हर खेल के लिए संभावितों खिलाड़ियों का चयन करके उनको तैयार करना होगा। कुछ माह पहले टीमें बनाने से सफलता मिलने वाली नहीं है।
0 अपने खेल के बारे में क्या संभावना दिखाती है राष्ट्रीय खेलों में?
00 अगर अभी से टीमें तैयार करके उनको राष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षकों से लगातार प्रशिक्षण दिलाया जाएगा तो जरूर फुटबॉल में पदक मिल सकता है। महिला वर्ग में ज्यादा संभावना दिखाती है, क्योंकि अभी जूनियर वर्ग में बहुत अच्छी खिलाड़ी हैं, यहीं सीनियर वर्ग में पहुंच कर पदक दिलाने का काम करेंगी। 2003 से मैं पेशेवर तरीके से खिलाड़ी तैयार करने का काम कर रही हूं। मैंने अब तक 30 राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी तैयार करने का काम किया है। दो खिलाड़ी सुप्रिया कुकरेती और निकिता स्विसपन्ना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेली हैं। सात खिलाड़ी भारतीय टीम के प्रशिक्षण शिविरों में गर्इं है। इन खिलाड़ियों को अगर अच्छा प्रशिक्षण मिले तो राज्य के लिए राष्ट्रीय खेलों में पदक पक्का है।

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शुक्रवार, जुलाई 08, 2011

सिंथेटिक ट्रेक होने से मिलेंगे पदक विजेता

अपने राज्य में एथलेटिक्स में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। हमारे खिलाड़ी आज अगर राष्ट्रीय स्तर पर पदक नहीं जीत पा रहे हैं तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण सिंथेटिक ट्रेक की कमी है। जिस दिन राज्य में एक भी सिंथेटिक ट्रेक हो जाएगा, उस दिन के बाद से पदकों की बारिश होने लगेगी।
यह कहना है छत्तीसगढ़ में दो दशक से प्रशिक्षण देने वाले एनआईएस कोच सुदर्शन कुमार सिंह का। वे कहते हैं कि यह अपने राज्य का दुर्भाग्य है कि राज्य बनने के दस साल बाद भी राज्य में एक भी सिंथेटिक ट्रेक नहीं बन सका है। वे कहते हैं कि राष्ट्रीय स्पर्धाओं का आयोजन सिंथेटिक ट्रेक में ही होता है। बीस साल पहले 1991 में कोलकाता से एनआईएस कोर्स में स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले सुदर्शन कहते हैं कि मैं दो दशक से देख रहा हूं कि छत्तीसगढ़ में एथलेटिक्स के खिलाड़ियों की खासकर बालिका खिलाड़ियों की भरमार है। दल्लीराजहरा की ही बात करें जहां मैं खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देता हूं तो यहां की खिलाड़ी लगातार राष्ट्रीय स्तर पर खेल रही हैं। खिलाड़ी मेहनत कर रहे हैं लेकिन वे पदक के करीब पहुंच कर पदकों से चूक जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनकी एक शिष्या टी. संजू ने छत्तीसगढ़ बनने के बाद 2000-01 में राष्ट्रीय स्कूली खेलों में पहले स्वर्ण पदक जीता, इसके बाद संजू ने जयपुर (2002) के साथ जगदलपुर में 2003 में हुए राष्ट्रीय महिला खेलों में कांस्य पदक जीते। राष्ट्रीय स्तर पर संजू ने बहुत उम्मीदे थीं, लेकिन उन्होंने आगे पारिवारिक कारणों से खेलना बंद कर दिया।
दल्लीराजहरा में हैं प्रतिभाएं
सुदर्शन कहते हैं कि एथलेटिक्स की प्रतिभाओं की जहां तक बात है तो यह प्रतिभाएं दल्लीराजहरा में हैं। राजधानी रायपुर के साई सेंटर के लिए दल्लीराजहरा की 10 बालिका खिलाड़ियों का चयन हुआ है। दल्लीराजहरा में सेल द्वारा डे-बोर्डिंग प्रशिक्षण केंद्र चलाया जा रहा है जिसमें मैं प्रशिक्षण देकर खिलाड़ियों को तैयार करने का काम कर रहा हूं। सुदर्शन कहते हैं कि बस्तर और सरगुजा क्षेत्र में एथलीटों की भरमार है, जरूरत है इनको सही दिशा दिखाने की। वे बताते हैं कि उनके पास जो दो एथलीट बिमला पटेल और भुवनेश्वरी हैं, इनमें राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर तक जाने की क्षमता है। यह खिलाड़ी अभी 12-13 की हैं और इनका प्रदर्शन काबिले तारीफ है।
साई में आने तैयार
सुदर्शन एक सवाल के जवाब में कहते हैं कि रायपुर के साई सेंटर में आने के लिए तैयार हैं। उनको अगर प्रदेश के साथ देश के खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने का मौका मिलेगा, तो इससे अच्छी बात हो ही नहीं सकती है। वे बताते हैं कि उनके अलावा छत्तीसगढ़ में एक और एनआईएस कोच पीजी जयकृष्णनन आदिमजाति कल्याण विभाग के बिलासपुर के एक गांव के स्कूल में पीटीआई हैं। इसी के साथ शिक्षा विभाग में एक महिला एनआईएस कोच शकीला देवदास हैं। इन कोच के नाम राष्ट्रीय स्तर पर 100, 200 और 400 मीटर दौड़ में पदक हैं। यह कोच दुर्ग के पुरई गांव में पीटीआई हैं। सुदर्शन कहते हैं कि हम में से किसी भी कोच की सेवाएं साई ले सकता है। सुदर्शन बताते हैं कि उनके द्वारा 400 मीटर में बनाया गया 48.4 सेकेंड का रिकॉर्ड आज भी कायम है।

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