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बुधवार, जून 08, 2011

मुख्यमंत्री का सपना साकार करने वाले ओलंपियन तैयार करूंगा

मेरा ओलंपिक में खेलने का सपना तो कंघे की चोट के कारण पूरा नहीं हो सका, लेकिन अब मैं प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का सपना साकार करने के लिए कैनाइंग-कयाकिंग के ओलंपिक में खेलने वाले खिलाड़ी तैयार करने का काम करूंगा। खिलाड़ी तैयार करने के इरादे से ही मैंने हंगरी में लेबल-3 कोच का कोर्स किया है और अब मैं वहां से लौटते ही खिलाड़ियों को तराशने में जुट गया हूं। ये बातें कहने वाले अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और कोच नवीन साहू से हुई बात-चीत के अंश प्रस्तुत है।
0 हंगारी में लेबल 3 कोर्स करने का मकसद क्या था?
00 मेरा इरादा ओलंपिक में खेलकर प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का सपना साकार करने का था, लेकिन मेरे कंघे में चोट के कारण अब डॉक्टरों ने साफ कह दिया है कि मैं खेलने की स्थिति में नहीं हूं। ऐसे में मैंने सोचा कि क्यों न लेबल 3 कोच का कोर्स करके अपने राज्य के खिलाड़ियों को आधुनिक तरीके से तैयार करके उनको ओलंपिक में खेलने का रास्ता दिखाया जाए।
0 लेबल 3 कोर्स के बारे में बताएं?
00 यह कोर्स अंतरराष्ट्रीय कैनो फेडरेशन द्वारा कराया जाता है। अब तक लेबल 1 और 2 का कोर्स होता था। ये दोनों कोर्स मैं पहले ही कर चुका हूं। पहली बार हंगरी में लेबल 3 कोर्स कराया गया तो मैं वहां चला गया। पांच माह के इस कोर्स में दो माह वहां पर प्रशिक्षण दिया गया। बाकी तीन माह का कोर्स आनलाइन कराया गया। वहां पर प्रशिक्षण देने का काम 12 बार विश्व चैंपियन रहे हंगरी के जोनटान बाको ने किया। इस कोर्स में भारत से मैं अकेला गया था।
0 कोर्स के लिए आपका चयन कैसे हुआ?
00 कोर्स के लिए वैसे तो भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) भेजता है, लेकिन यह कोर्स नया था, इसलिए खुद के खर्च पर जाना पड़ा। कोर्स का शुल्क ही करीब साढ़े तीन लाख था। मुझे कोर्स करने में पांच लाख का खर्च करना पड़ा।
0 राज्य सरकार ने कोई मदद मिली?
00 कोर्स के बारे में इतने कम समय में मालूम हुआ कि मदद ले पाना संभव नहीं था। अब वहां से लौटा हूं तो अब मदद के प्रयास किए जा रहे हैं।
0 आपके कोर्स से राज्य के खिलाड़ियों को क्या फायदा होगा?
00 मैं हंगरी में जो कोर्स करके आया हूं, वह अति आधुनिक कोर्स है। आज ओलंपिक और अन्य अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में खेलने जाने के लिए यही तकनीक काम आती है। ऐसे में यहां के खिलाड़ियों को तैयार करके उनको ओलंपिक का रास्ता दिखाया जाएगा।
0 राजधानी में साई सेंटर खुलने से कयाकिंग को कितना फायदा होगा?
00 साई सेंटर से हर खेल को फायदा होता है। मैं खुद भोपाल के साई सेंटर में रहां हूं। आज मुझे जो राष्ट्रीय स्तर पर 150 से ज्यादा पदक मिले हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एशियन चैंपियनशिप में मैंने जो दो पदक जीते हैं, वह साई सेंटर में रहने का नतीजा है। रायपुर में कयाकिंग को डे-बोर्डिंग  के रूप में शामिल किया गया है। ऐसे में अभी सिर्फ रायपुर के खिलाड़ियों को फायदा होगा। आगे बोर्डिंग की सुविधा हो जाएगी तो प्रदेश के खिलाड़ियों को लाभ होगा।
0 प्रदेश में कयाकिंग के खिलाड़ियों की क्या संभावना है?
00 प्रदेश में आदिवासी क्षेत्र सरगुजा, बस्तर के साथ धमतरी और बिलासपुर में अच्छे खिलाड़ियों की भरमार है। इन खिलाड़ियों को साई के बोर्डिंग में मौका मिला तो राज्य के लिए हमारे खेल में पदकों की बारिश हो जाएगी।
0 अभी आप कितने खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दे रहे हैं और उनसे क्या संभावनाएं हैं?
00 साई के डे-बोर्डिंग के लिए मेरे पास 15 खिलाड़ी हैं। इनमें 4 बालिका खिलाड़ी संतोषी दलई, शिवांगी ठाकुर, हेमलता सार्वा और शारडा राखडे हैं। इसी के साथ बालक वर्ग में दिनेश साहू, अशोक साहू, सोनू साहू और धनेश फरिकार हैं जिनसे मुझे काफी उम्मीदे हैं। झारखंड के राष्ट्रीय खेलों में हमारी टीम के 4 में पांचवें स्थान पर थी और दिनेश के-1 में छठे स्थान पर था।
0 राष्ट्रीय खेलों में पदक क्यों नहीं मिल सका?
00 झारखंड के राष्ट्रीय खेलों के कुछ समय पहले ही हमें बोट मिल सकी थी जिसके कारण हमारे खिलाड़ियों को अभ्यास का मौका नहीं मिल सका था। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा आने वाले समय में केरल और गोवा के बाद हमारे खिलाड़ी छत्तीसगढ़ में होने वाले 37वें राष्ट्रीय खेलों में भी पदकों की बारिश करेंगे।
0 अभी जो सुविधाएं हैं, वो पर्याप्त हैं?
00 अभी तो हमारे पास खिलाड़ियों की संख्या के लिहाज से पर्याप्त बोट है। के-1 में आठ, के-2 में चार और के 4 में तीन बोट है। खिलाड़ियों की संख्या में इजाफा होने पर ही बोट की जरूरत पड़ेगी। अभी हमारे खिलाड़ी बूढ़ातालाब में अभ्यास करते हैं। अभ्यास के लिए एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का ट्रेक जरूरी है। भारतीय कयाकिंग फेडरेशन ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम के पास की झील में एक ट्रेक बनाने का सुझाव राज्य सरकार को दिया है, वह ट्रेक बन जाए तो खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने में ज्यादा आसानी होगी।

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बुधवार, सितंबर 16, 2009

हॉकी को रोल मॉडल की कमी मार गई

ओलंपियन अशोक ध्यानचंद ने कहा


हॉकी के ओलंपियन अशोक ध्यानचंद का कहना है कि देश में आज हॉकी की जो दुर्दशा है उसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि इसको रोल मॉडल की कमी मार गई। आज अगर हॉकी के जादूगर ध्यानचंद सहित हमारे जैसे ओलंपियन की वीडियो होती तो यह खिलाडिय़ों के लिए रोल मॉडल का काम करती। पर ऐसा नहीं है। क्रिकेट में अगर सचिन और धोनी को लोग खेलते न देखें तो कोई क्रिकेट की तरफ जाना नहीं चाहेगा। हॉकी को निचले स्तर से उठाने की जरूरत है।


अपने छत्तीसगढ़ प्रवास में रायपुर में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हॉकी के नवोदितों को बताने के लिए हॉकी फेडरेशन के पास आज कुछ नहीं है। माना कि मेजर ध्यानचंद के समय 1936 का जमाना ऐसा नहीं था जिसमें वीडियो बन पाता और उसको सहेज कर रखा जाता, पर इसके बाद जब हम लोग खेलते थे, उस समय 70 के दशक में तो वीडियो बनाकर उसको सहेज कर रखा जा सकता था। पर ऐसा नहीं किया गया और आज के हॉकी खिलाडिय़ों को क्या बताया जाए। उनके लिए कोई रोल मॉडल ही नहीं है तो उनका रूझान हॉकी की तरफ कैसे होगा। आज अगर हॉकी में नई पौध नहीं आ रही है तो इसके लिए फेडरेशन दोषी है।

निचले स्तर पर देना होगा ध्यान

1968 में रायपुर की नेहरू हॉकी में खेलने आए अशोक कुमार कहते हैं कि आज इस बात की जरूरत है कि हॉकी पर ग्रामीण, जिला और राज्य स्तर पर ध्यान दिया जाए। आज घरेलु स्पर्धाएं बंद हो गई हैं, जब तक स्पर्धाएं नहीं होगी खिलाड़ी कैसे निकलेंगे। वे कहते हैं कि सरकारी मदद की तरफ भी देखना बंद होना चाहिए, स्थानीय स्तर पर मदद लेकर खेलों को आगे बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने इटारसी का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां पर क्रिकेट के आईपीएल की तर्क पर हॉकी में आईपीएल प्रारंभ किया गया है। आज देश के कोने-कोने में हॉकी को जिंदा रखने के लिए ऐसे ही आईपीएल करवाने की जरूरत है। वे कहते हैं कि आज देश की हॉकी को मजबूत करने की जरूरत है। इसके लिए स्कूल स्तर के मैच भी जरूरी है। आज स्कूलों में आयोजन की खाना पूर्ति होती है। पहले स्कूलों में खेलों का पीरियड होता था, अब ऐसा नहीं होता है। उन्होंने कहा कि आज हॉकी के लिए एस्ट्रो टर्फ जरूरी है। लेकिन इसको बनाने की सरकारी कवायद इतनी कठिन है कि बिल्डिंग तो बन जाती है, पर एस्ट्रो टर्फ नहीं बन पाता है। वे कहते हैं कि एस्ट्रो टर्फ के लिए कोई बड़ा स्टेडियम बनाने की बजाए अगर एस्ट्रो टर्फ के साथ चारों तरफ बस गैलरी बना दी जाए तो वही काफी है।

पापा हॉकी खेलने से रोकते थे

हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के पुत्र अशोक कुमार बताते हैं कि उनके पापा कभी नहीं चाहते थे कि मैं हॉकी खेलूं। मुझे हमेशा उन्होंने खेलने से मना किया। वे कहते थे कि पढ़ाई करके नौकरी करके कुछ पैसे कमाओगे तो काम आएंगे। वे बताते हैं कि उनके खेल को देखकर 1970 में मोहन बागान की टीम में स्थान मिला, इसके बाद इंडियन एयर लाइंस में नौकरी मिली। इसके बाद भारतीय टीम, फिर एशियन एकादश और फिर विश्व एकादश में भी स्थान मिला। उन्होंने बताया कि जब हमारी टीम ने विश्व कप जीता था, तब देश में हमारी टीम के 14 मैच करवाए गए थे और हर मैच के लिए आठ-आठ सौ रुपए मिले थे। वे बताते हैं कि वे हॉकी से आज भी जुड़े हुए हैं और चाहते हैं कि इसके पुराने दिन फिर से लौटे, हालांकि यह बहुत कठिन है।

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