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शुक्रवार, सितंबर 03, 2010

तैयार रहे जमाने की खाने लात

बहुत कठिन है जिदंगी को चलाना
ये सब हमने बहुत देर ने जाना
न जाने कितने गम हैं जमाने में
क्या रखा है एक मोहब्बत के फंसाने में
मोहब्बत करके गम ही मिलते हैं
फिर नहीं कभी ये गम सिलते हैं
मोहब्बत से हमेशा दूर रहना यारों
ये एक बात तुम भी हमारी मानो
नहीं मानेंगे गर ये बात
फिऱ तैयार रहे जमाने की खाने लात

एक ताजा तरीन कविता पेश है...

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रविवार, नवंबर 29, 2009

हम अब भी उनका एतबार करते हैं...


तुम्हें हमसे नफरत सही, हम तुम्हें प्यार करते हैं

इस हंसी गुनाह को हम बार-बार करते हैं।।


तुम आओगी नहीं, जानकर भी हम तुम्हें बुलाते हैं

दिल के आईने में हम अब भी तेरा दीदार करते हैं।।


ए मेरी हमदम तुम्हें तो वफा के नाम से भी नफरत है

मगर एक हम हैं जो जफा से भी मोहब्बत करते हैं।।

गम लिए फिरते हैं सारे जमाने का दिल में

मगर फिर भी न हम किसी से शिकायत करते हैं।।

आ जाओ लौटकर दिल की दुनिया फिर से बसाने

हम तो तेरा अब भी इंतजार करते हैं।।


सब कहते हैं बेवफा उसे प्रिंस

मगर हम अब भी उनका एतबार करते हैं।।

नोट: यह कविता भी हमारी 20 साल पुरानी डायरी की है

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