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रविवार, अक्टूबर 16, 2011

किसी को क्यों नहीं होता भ्रष्टाचार पर अफसोस

हमें तो जरूर दिखती है अच्छाई और सच्चाई
क्योंकि हम नहीं खाते मुफ्त की दुध-मलाई
हमें नहीं जकड़ सका है भ्रष्टाचार का कसाई
उठो, जागो, देखों और सोचो भाई
अगर हमने अब भी नहीं खोलीं आंखें
तो निगल जाएगा देश को भ्रष्टाचार का कसाई
क्यों सोए हैं न जाने अब तक अपने देश के लोग
किसी को क्यों नहीं होता भ्रष्टाचार पर अफसोस

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रविवार, जुलाई 31, 2011

भ्रष्टाचार के लिए आखिर दोषी कौन

भ्रष्टाचार पर अन्ना हजारे जी के अनशन से आज पूरा देश ही नहीं बल्कि विश्व उबल रहा है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि भ्रष्टाचार से आज सभी त्रस्त हैं, लेकिन विचारणीय प्रश्न यह भी है कि आखिर इसके लिए दोषी कौन है। क्या हम इसके लिए दोषी नहीं है? हमारा जहां तक मानना है कि भ्रष्टाचार के लिए सबसे पहले दोषी तो हम ही लोग हैं।
कहने में यह बात बड़ी अटपटी लगती है, लेकिन यह एक कटु सत्य है कि आज अगर अपना देश भ्रष्टाचार में डूबा है तो उसके लिए पहले दोषी हम ही हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि इसके लिए हम दोषी कैसे तो हम आप से पूछना चाहते हैं कि जब आप किसी भी सरकारी काम से कहीं जाते हैं, मान लीजिए आपको निवास प्रमाणपत्र ही बनवाना है और आपको इसके लिए तहसील या जिलाधीश कार्यालय जाना पड़ता है, और आपको वहां पर नजर आती है, एक लंबी लाइन, ऐसे में आप क्या करते हैं? ऐसे समय में चाहे आप हो या हम शार्टकट का रास्ता अपनाने के लिए ऐसे आदमी को तलाश करते हैं जो हमें उस लाइन से बचाकर हमारा काम करवा सके। इसके लिए हम कुछ पैसे खर्च करने से नहीं चूकते हैं। जब हम किसी को किसी काम के लिए पैसे देते हैं तो उस समय हम सिर्फ यही सोचते हैं कि हमारा समय बच जाएगा, लेकिन हम यह कभी नहीं सोचते हैं कि हमारे ऐसा करने से क्या होगा। हमारे ऐसा करने से दो बातें होती हैं, एक तो जो लोग लाइन में लगे होते हैं, उनके साथ अन्याय होता है, दूसरे हम अपने काम के लिए किसी को पैसे देकर उसको रिश्वतखोर और भ्रष्टाचारी बनाने का काम करते हैं।
कहते हैं कि एक-एक बुंद से घड़ा भरता है। यह बात ठीक है, जिस तरह से एक-एक बुंद से घड़ा भरता है, उसी तरह से ही एक-एक करके अपने देश में भ्रष्टाचार का भी घड़ा भर गया है। आज घड़ा भर गया है तो उसका फूटना भी लाजिमी है। और अब वह फूट रहा है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि उस भ्रष्टाचार के घड़े को भरने का काम तो हमने और आपने किया है। क्यों कर हम यह मानने को तैयार नहीं होते हैं कि देश में भ्रष्टाचार के पीछे हम और आप हैं।
आज अगर आपको किसी काम का ठेका लेना है तो आपको इसके लिए पैसे देने पड़ेंगे। इसके बाद काम करने के बिल के एवज में भी पैसे देने पर ही बिल का भुगतान होगा। आज आपको किसी भी तरह का काम कराना हो, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, बिना पैसे दिए काम होने वाला नहीं है। नौकरी के लिए पैसे देने पड़ते हैं। हमने तो तीन हजार रुपए मासिक की एक साल की संविदा नियुक्ति के लिए लोगों को एक-एक लाख तक रिश्वत देते देखा और सुना है। ऐसे में आखिर देश में भ्रष्टाचार की सुनामी आएगी नहीं तो क्या होगा। देखा जाए तो भ्रष्टाचार अपने देश में काम करने वाले हर इंसान के खून में शामिल हो गया है। इसको समाप्त करना उतना आसान नहीं है। लेकिन जिस तरह से अन्ना हजारे जी सामने आए हैं, उससे आशा की एक किरण नजर रही है कि शायद अपने देश से भ्रष्टाचार की सुनामी का अंत सही, इससे कुछ तो राहत मिल जाएगी। हमारा ऐसा मानना है कि अपने देश से भ्रष्टाचार की सुनामी का अंत तभी संभव है जब हर आदमी इस बात का संकल्प लेगा कि वह अपने किसी भी काम के लिए चाहे कुछ भी हो जाए किसी को रिश्वत नहीं देगा। जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उस दिन भ्रष्टाचार की सुनामी कहां जाएगी यह बताने की जरूरत नहीं है। क्या आप ऐसा संकल्प लेने के लिए तैयार हैं। महज हजारे जी के समर्थन की बात करने से कुछ नहीं होने वाला है, ऐसा संकल्प ही कुछ कर सकता है।

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शनिवार, अप्रैल 09, 2011

भ्रष्टाचार के लिए आखिर दोषी कौन

भ्रष्टाचार पर अन्ना हजारे जी के अनशन से आज पूरा देश ही नहीं बल्कि विश्व उबल रहा है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि भ्रष्टाचार से आज सभी त्रस्त हैं, लेकिन विचारणीय प्रश्न यह भी है कि आखिर इसके लिए दोषी कौन है। क्या हम इसके लिए दोषी नहीं है? हमारा जहां तक मानना है कि भ्रष्टाचार के लिए सबसे पहले दोषी तो हम ही लोग हैं।
कहने में यह बात बड़ी अटपटी लगती है, लेकिन यह एक कटु सत्य है कि आज अगर अपना देश भ्रष्टाचार में डूबा है तो उसके लिए पहले दोषी हम ही हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि इसके लिए हम दोषी कैसे तो हम आप ेसे पूछना चाहते हैं कि जब आप किसी भी सरकारी काम से कहीं जाते हैं, मान लीजिए आपको निवास प्रमाणपत्र ही बनवाना है और आपको इसके लिए तहसील या जिलाधीश कार्यालय जाना पड़ता है, और आपको वहां पर नजर आती है, एक लंबी लाइन, ऐसे में आप क्या करते हैं? ऐसे समय में चाहे आप हो या हम शार्टकट का रास्ता अपनाने के लिए ऐसे आदमी को तलाश करते हैं जो हमें उस लाइन से बचाकर हमारा काम करवा सके। इसके लिए हम कुछ पैसे खर्च करने से नहीं चूकते हैं। जब हम किसी को किसी काम के लिए पैसे देते हैं तो उस समय हम सिर्फ यही सोचते हैं कि हमारा समय बच जाएगा, लेकिन हम यह कभी नहीं सोचते हैं कि हमारे ऐसा करने से क्या होगा। हमारे ऐसा करने से दो बातें होती हैं, एक तो जो लोग लाइन में लगे होते हैं, उनके साथ अन्याय होता है, दूसरे हम अपने काम के लिए किसी को पैसे देकर उसको रिश्वतखोर और भ्रष्टाचारी बनाने का काम करते हैं।
कहते हैं कि एक-एक बुंद से घड़ा भरता है। यह बात ठीक है, जिस तरह से एक-एक बुंद से घड़ा भरता है, उसी तरह से ही एक-एक करके अपने देश में भ्रष्टाचार का भी घड़ा भर गया है। आज घड़ा भर गया है तो उसका फूटना भी लाजिमी है। और अब वह फूट रहा है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि उस भ्रष्टाचार के घड़े को भरने का काम तो हमने और आपने किया है। क्यों कर हम यह मानने को तैयार नहीं होते हैं कि देश में भ्रष्टाचार के पीछे हम और आप हैं।
आज अगर आपको किसी काम का ठेका लेना है तो आपको इसके लिए पैसे देने पड़ेंगे। इसके बाद काम करने के बिल के एवज में भी पैसे देने पर ही बिल का भुगतान होगा। आज आपको किसी भी तरह का काम कराना हो, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, बिना पैसे दिए काम होने वाला नहीं है। नौकरी के लिए पैसे देने पड़ते हैं। हमने तो तीन हजार रुपए मासिक की एक साल की संविदा नियुक्ति के लिए लोगों को एक-एक लाख तक रिश्वत देते देखा और सुना है। ऐसे में आखिर देश में भ्रष्टाचार की सुनामी आएगी नहीं तो क्या होगा। देखा जाए तो भ्रष्टाचार अपने देश में काम करने वाले हर इंसान के खून में शामिल हो गया है। इसको समाप्त करना उतना आसान नहीं है। लेकिन जिस तरह से अन्ना हजारे जी सामने आए हैं, उससे आशा की एक किरण नजर आ रही है कि शायद अपने देश से भ्रष्टाचार की सुनामी का अंत न सही, इससे कुछ तो राहत मिल जाएगी। हमारा ऐसा मानना है कि अपने देश से भ्रष्टाचार की सुनामी का अंत तभी संभव है जब हर आदमी इस बात का संकल्प लेगा कि वह अपने किसी भी काम के लिए चाहे कुछ भी हो जाए किसी को रिश्वत नहीं देगा। जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उस दिन भ्रष्टाचार की सुनामी कहां जाएगी यह बताने की जरूरत नहीं है। क्या आप ऐसा संकल्प लेने के लिए तैयार हैं। महज हजारे जी के समर्थन की बात करने से कुछ नहीं होने वाला है, ऐसा संकल्प ही कुछ कर सकता है।

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शुक्रवार, फ़रवरी 11, 2011

हजार-पांच सौ के नोट बंद करने से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा

एक दवाई दुकानदार का कहना है कि अगर हजार और पांच सौ के साथ साथ सौ रुपए के नोट भी बदं कर दिए जाने तो अपने देश में भ्रष्टाचार पर कुछ हद तक अंकुश लग सकता है। भ्रष्टाचार के साथ दो नंबर की काली कमाई में ही बड़े नोटों का उपयोग किया जाता है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि इन कामों में बड़े नोटों का उपयोग होता है, पर क्या महज नोट बंद कर देने से ही भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सकता है, यह सोचने वाली बात है। वैसे बड़े नोटों को बंद करवाने का दम है किसमें।
कल रात को हम एक मेडिकल स्टोर में दवाई लेने गए थे। हमने दवाई लेने के बाद जब दुकानदार को एक पांच सौ का नोट दिया, तो दुकानदार काफी देर तक उस नोट को परखता रहा कि वह असली है या नकली। ऐसे में हमने उनसे कहा कि सरकार अगर हजार और पांच सौ के नोटों को बंद कर दे तो परेशानी नहीं होगी। हमने तो महज आम जनों और दुकानदारों को नकली नोटों की वजह से होने वाली परेशानी को ध्यान में रखते हुए यह बात कही थी, पर उन दुकानदार महोदय ने कहा कि सर केवल आम जनों की ही परेशानी दूर नहीं होगी बल्कि भ्रष्टाचार के साथ दो नंबर के धंधों पर भी रोक लग जाएगी। उन दुकानदार महोदय ने कहा कि जिनता भी काला-पीला काम होता है सब बड़े नोटों से होता है। उन्होंने तो यह भी कहा कि सौ के नोट भी सरकार को बंद कर देने चाहिए।
सच में सोचने वाली बात है कि क्या वास्तव में इन बड़े नोटों को बंद कर देने से देश को भ्रष्टाचार से मुक्त किया जा सकता है। हमें तो लगता है कि जरूर ऐसा होने से कुछ हद तक को भ्रष्टाचार पर अंकुश लग ही सकता है। लेकिन सोचने वाली बात यह भी है कि जब सरकार में बैठे लोग ही पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं तो ऐसे में बड़े नोटों को बंद करने का फरमान कौन जारी कर सकता है। बहरहाल यह बात ठीक है कि बड़े नोट बंद कर लिए जाए तो नकली नोटों से भी जनता को मुक्ति मिल जाएगी, वरना नकली नोटों के चक्कर में गरीबों को भी काफी नुकसान हो जाता है। । 

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मंगलवार, फ़रवरी 02, 2010

हजार-पांच सौ के नोट बंद करने से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा

एक दवाई दुकानदार का कहना है कि अगर हजार और पांच सौ के साथ साथ सौ रुपए के नोट भी बदं कर दिए जाने तो अपने देश में भ्रष्टाचार पर कुछ हद तक अंकुश लग सकता है। भ्रष्टाचार के साथ दो नंबर की काली कमाई में ही बड़े नोटों का उपयोग किया जाता है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि इन कामों में बड़े नोटों का उपयोग होता है, पर क्या महज नोट बंद कर देने से ही भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सकता है, यह सोचने वाली बात है। वैसे बड़े नोटों को बंद करवाने का दम है किसमें।

कल रात को हम एक मेडिकल स्टोर में दवाई लेने गए थे। हमने दवाई लेने के बाद जब दुकानदार को एक पांच सौ का नोट दिया, तो दुकानदार काफी देर तक उस नोट को परखता रहा कि वह असली है या नकली। ऐसे में हमने उनसे कहा कि सरकार अगर हजार और पांच सौ के नोटों को बंद कर दे तो परेशानी नहीं होगी। हमने तो महज आम जनों और दुकानदारों को नकली नोटों की वजह से होने वाली परेशानी को ध्यान में रखते हुए यह बात कही थी, पर उन दुकानदार महोदय ने कहा कि सर केवल आम जनों की ही परेशानी दूर नहीं होगी बल्कि भ्रष्टाचार के साथ दो नंबर के धंधों पर भी रोक लग जाएगी। उन दुकानदार महोदय ने कहा कि जिनता भी काला-पीला काम होता है सब बड़े नोटों से होता है। उन्होंने तो यह भी कहा कि सौ के नोट भी सरकार को बंद कर देने चाहिए।

सच में सोचने वाली बात है कि क्या वास्तव में इन बड़े नोटों को बंद कर देने से देश को भ्रष्टाचार से मुक्त किया जा सकता है। हमें तो लगता है कि जरूर ऐसा होने से कुछ हद तक को भ्रष्टाचार पर अंकुश लग ही सकता है। लेकिन सोचने वाली बात यह भी है कि जब सरकार में बैठे लोग ही पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं तो ऐसे में बड़े नोटों को बंद करने का फरमान कौन जारी कर सकता है। बहरहाल यह बात ठीक है कि बड़े नोट बंद कर लिए जाए तो नकली नोटों से भी जनता को मुक्ति मिल जाएगी, वरना नकली नोटों के चक्कर में गरीबों को भी काफी नुकसान हो जाता है।

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शनिवार, अक्टूबर 10, 2009

बापू के नाम पर करो भ्रष्टाचार


अपने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आत्मा जरूर अब खून के आंसू रोते हुए यह सोच रही होगी कि क्यों कर उन्होंने भारत जैसी धरती पर जन्म लिया था। उनको क्या मालूम था कि जिस धरती को आजाद कराने के लिए उन्होंने इतनी मेहनत की, उसी धरती के वासी उनके नाम से भी भ्रष्टाचार करने का काम करेंगे। आपको लग रहा होगा कि आखिर बापू के नाम पर कैसे भ्रष्टाचार हो सकता है, तो हम बता दें कि भ्रष्टाचार हो नहीं सकता है, बल्कि हो रहा है और यह भ्रष्टाचार हो रहा है उस राष्ट्रीय रोजगार योजना में जिसका नाम अचानक इस बार गांधी जयंती पर बापू के नाम से कर दिया गया है। पता नहीं क्या सोच कर केन्द्र सरकार ने ऐसा किया है, जबकि उसको भी मालूम है कि इस योजना के नाम से पूरे देश में भ्रष्टाचार हो रहा है फिर क्यों ऐसा किया गया क्या केन्द्र सरकार बापू का मान करने की बजाए उनका अपमान नहीं कर रही है। इस योजना से बापू का नाम हटाने की मुहिम चलाने की जरूरत है।

विश्व में भारत का नाम भ्रष्टाचार के मामले में नंबर वन पर है। अपने देश में ऐसी कोई भी योजना नहीं होगी जिस योजना में भ्रष्टाचार न हो। ऐसे में जबकि हर योजना के साथ भ्रष्टाचार जुड़ा है तो फिर केन्द्र सरकार ने क्या सोचकर राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना का नाम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर कर दिया है। क्या केन्द्र सरकार बापू की आत्मा को खून के आंसू रूलाने पर तूली है। बापू का वैसे भी क्या अब अपमान होता है अपने देश में जो उनकी आत्मा को और दुखी करने का काम केन्द्र की उस सरकार ने किया है जो सरकार कांग्रेस समर्पित सरकार है। बापू का कांग्रेस से ही ज्यादा नाता रहा ऐसा माना जाता है। ऐसे में यह बात समझ से परे है कि ऐसा क्यों किया गया। वैसे देखा जाए तो कांग्रेसियों को ही सबसे ज्यादा बापू से मतलब नहीं रह गया है। क्या केन्द्र सरकार को यह लगता है कि इस योजना के साथ बापू का नाम जोड़कर इसमें हो रहे भ्रष्टाचार को समाप्त किया जा सकता है। अगर केन्द्र सरकार ऐसा सोचती है तो उसकी सोच पर तरस आता है। ऐसी कौन सी योजना है जिसमें होने वाले भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सका है कि इस योजना पर अंकुश लगेगा। अंकुश तो तब लगता जब केन्द्र में बैठे लोग पाक साफ होते। यहां तो हर साख पर उल्लू बैठे हैं वाली बात है तो फिर कैसे किसी योजना का नाम बापू के नाम पर रखने से ही भ्रष्टाचार रूक सकता है।

हमें लगता है कि केन्द्र सरकार को अपनी गलती को सुधारने का काम करते हुए बापू के नाम को कलंकित होने से बचाने के लिए इस योजना से बापू का नाम हटा लेना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो बापू का नाम लगातार कंलकित होता रहेगा। इस योजना में हम अपने राज्य छत्तीसगढ़ की ही बात करें तो प्रदेश में 25 हजार से ज्यादा मजदूरों को एक माह से मजदूरी ही नहीं मिली है। यही नहीं करीब 63 हजार मजबूरों को नियमित मजदूरी नहीं मिल पा रही है। यह बातें हवा में नहीं कही जा रही है बल्कि ऐसा सीएजी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है। इस रिपोर्ट की माने तो प्रदेश में योजना के लिए जिन दो हजार बेरोजगारों के कार्ड सरकार ने बनाए हैं उनको अब तक रोजगार ही नहीं मिला है। जिस योजना में पूरी तरह से भ्रष्टाचार हो रहा है और गरीबों का शोषण किया जा रहा है, उसी योजना का नाम बापू के नाम पर करना वास्तव में शर्मनाक है। इस योजना से बापू का नाम हटवाने के लिए एक मुहिम चलानी चाहिए।

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