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शनिवार, नवंबर 05, 2011

मीडिया कब पहचानेगा अपनी औकात

कहने को तो मीडिया को देश का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन हमें नहीं लगता कि मीडिया वास्तव में देश का चौथा स्तंभ है। अगर वास्तव में इसको चौथा स्तंभ माना जाता तो इस स्तंभ के शिल्पकारों की हालत छुट भईये नेताओं से तो कम से कम ज्यादा होती। ऐसा हम हवा में नहीं कह रहे हैं। इस चौथे स्तंभ में काम करते हमें भी दो दशक हो रहे हैं और इन सालों में हमने तो यही जाना है कि वास्तव में मीडिया ने अब तक अपनी सही औकात को नहीं पहचाना है। हमें बहुत अफसोस होता जब मीडिया से जुड़े लोगों को हम छोटे से पुलिस वालों के सामने असहाय पाते हैं।
जब-जब देश में या किसी भी राज्य में कहीं भी किसी बड़े नेता या मंत्री की कोई सभा या कोई भी छोटा-बड़ा कार्यक्रम होता है तो उस समय मालूम होती है मीडिया की असली औकात। ऐसे कार्यक्रमों में सभा स्थल तक सभी नेता और मंत्रियों के वाहन तो जाते ही हैं, साथ ही इनके चमचों और छोटे-मोटे नेताओं को भी रोकने की हिम्मत सुरक्षा व्यवस्था में लगे पुलिस वाले नहीं दिखा पाते हैं। लेकिन मीडिया की बात आती है तो मीडिया कर्मियों को सभा स्थल के  काफी दूर (कई बार तो एक किलो मीटर तक)  रोक दिया जाता है और कहा जाता है कि अपने वाहन कहीं भी रखे और पैदल जाएं। ऐसे समय में हमें बहुत गुस्सा भी आता है और मीडिया कर्मियों की बेबसी पर तरस भी आता है। अब बेचारे मीडिया कर्मी को अपनी नौकरी करनी है उसे पुलिस वाले एक किलो मीटर क्या चार किलो मीटर भी दूर रोककर पैदल जाने कहेंगे तो जाना पड़ेगा। जाना इसलिए पड़ेगा क्योंकि पापी पेट का सवाल है। अगर आप सभा की रिपोर्टिंग करके नहीं जाएंगे तो अपनी नौकरी से हाथ भी धो सकते हैं।
यह परंपरा आज से नहीं बल्कि बरसों से चली आ रही है और इससे लड़ना कोई नहीं चाहता है। अक्सर हम किसी कार्यक्रम में जाते हैं तो वाहन को दूर रखने को लेकर कई बार पुलिस वालों से बहस हो जाती है, कई बार वाहन अंदर ले जाने की इजाजत मिल जाती है तो कई बार मजबूरी में वाहन काफी दूर रखना पड़ता है। लेकिन हमें कम से कम इस बात की संतुष्टि है कि हम विरोध तो करते हैं, लेकिन ज्यादातर मीडिया कर्मी विरोध ही नहीं करते हैं। संभवत: उनको लगता है कि विरोध करने का फायदा नहीं है। लेकिन हमें लगता है कि उनका ऐसा सोचना गलत है। अगर मीडिया कर्मी एक हो जाए तो एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब उनको सफलता मिलेगी।
क्यों कर मीडिया कर्मियों के वाहन भी वहां तक नहीं जाने चाहिए जहां तक नेता-मंत्रियों या अन्य छुटभईये नेताओं के जाता हैं। क्या मीडिया कर्मियों की औकात उन छुट भईये नेताओं जितनी भी नहीं है तो सिर्फ नेताओं की चमचागिरी करते हैं। हम जानते हैं कि किसी भी कार्यक्रम का बहिष्कार करना मीडिया कर्मियों के बस में नहीं है क्योंकि आज के प्रतिस्पर्धा वाले दौर में यह इसलिए संभव नहीं है क्योंकि कोई न कोई तो कार्यक्रम को कवर कर ही लेगा। जो लोग बहिष्कार करने की हिम्मत दिखाएंगे उनको अपने संस्थानों के क्रोध का सामना करना पड़ेगा, संभव है किसी की नौकरी भी चली जाए, शायद यही वजह है कि लोग ऐसा साहस नहीं करते हैं।
हम बताना चाहते हैं कि अगर मीडिया कर्मी हिम्मत करते हैं तो उनको सफलता मिल सकती है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि हमने ऐसा कई बार किया है और सफलता भी मिली है। हम बता दें कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ के अध्यक्ष भी हैं। दो बार ओलंपिक संघ की बैठक में मीडिया को बैठक से दूर रखा गया तो हम लोगों ने इस बैठक का बहिष्कार किया। जब यह बात मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह तक पहुंची तो वे खुद हम लोगों तक न सिर्फ आए बल्कि उन्होंने छमा भी मांगी।
हमारे कहने का मतलब यह है कि अक्सर ऐसा होता है कि ऊपरी स्तर पर तो कुछ जानकारी नहीं होती है और नीचे वाले अफसर अपनी मर्जी से कोई भी फैसला कर लेते हैं। जब तक अपनी बात को ऊपर तक नहीं पहुंचाया जाएगा तो कैसे मालूम होगा कि क्या हो रहा है। इसी के साथ एक बात हम और कहना चाहते हैं कि आज मीडिया के कारण ही नेता और मंत्री हैं। ऐसा कौन सा नेता और मंत्री होगा जो मीडिया की सुर्खियों में नहीं रहना चाहता है। जब उनको इस बात का अहसास कराया जाएगा कि मीडिया को सम्मान देने पर ही कोई कार्यक्रम कवर होगा तो हमें नहीं लगता है कि मीडिया की बात नहीं मानी जाएगी। बस जरूरत है मीडिया को अपनी ताकत और औकात को पहचाने की। जिस दिन हम मीडिया कर्मी अपनी ताकत और औकात को समझ जाएंगे, उस दिन एक नए युग की शुरुआत होगी। मीडिया कर्मियों को सम्मान दिलाने की दिशा में मीडिया से जुड़े संस्थान को भी अपने संस्थानों के कर्मियों का साथ देना होगा।
हमें एक घटना याद है जो यह बताती है कि मीडिया की ताकत क्या है। मप्र के समय रायपुर के रेलवे स्टेशन में एक घटना में पुलिस की लाठियों से कई मीडिया कर्मी घायल हो गए थे। ऐसे में रायपुर के सभी अखबारों ने यह फैसला किया था कि सरकार की कोई भी खबर प्रकाशित नहीं की जाएगी। इस फैसले का असर यह हुआ कि उस समय मप्र के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को 24 घंटे के अंदर   रायपुर आना पड़ा और घटना के लिए उन्होंने न सिर्फ छमा मांगी बल्कि घायल हुए हर मीडिया कर्मी के घर जाकर उनसे मिले और उनको मुआवजा दिया गया। यह एक उदाहरण बताता है कि वास्तव में मीडिया चाहे तो सरकार को झुका सकता है, लेकिन ऐसा किया नहीं जाता है।

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बुधवार, अक्टूबर 06, 2010

एक मीडिया कर्मी युवती से तीन मीडिया कर्मियों ने किया दुष्कर्म

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इन एक घिनौनी और शर्मनाक खबर की चर्चा है। चर्चा है कि रायपुर से प्रारंभ हुए एक नए नवेले अखबार के प्रबंधन में काम करने वाली एक युवती के साथ उनके तीन सहकर्मियों ने दुष्कर्म किया। मीडिया जगत में इस खबर को लोग चटखारे लेते हुए बताने से भी बाज नहीं आ रहे हैं, जितने लोग उतनी बातें हो रही हैं। खबर यह भी है कि एक प्रतिद्वंदी अखबार तो उस युवती की खोज कर रहा है, ताकि वह अपनी दुश्मनी भुनाने के लिए उसका उपयोग कर सके। इस मामले की पुलिस में रिपोर्ट होने के बाद भी मामले को दबा दिया गया है।
हम पिछले कुछ दिनों से लगातार एक खबर सुने रहे हैं। बहुत सोचा कि इस पर लिखा जाए या नहीं। फिर हमारे जमीर ने कहा कि ऐसा घिनौना और शर्मनाक काम अगर अपने मीडिया जगत में हुआ है और इस खबर को किसी ने प्रकाशित नहीं किया है तो इसे सबके सामने लाने का काम हमें करना ही चाहिए। जो खबरें सुनने को मिल रही हैं, उसके मुताबिक एक अखबार के प्रबंधन में काम करने वाली एक युवती की अपने एक सहकर्मी के साथ दोस्ती थी। बताते हैं कि वह युवती अपने उस सहकर्मी के साथ उनके कमरे तक गई थी। अब वहां वह उसके साथ जो भी कर रही थी, तभी उस सहकर्मी के दो मित्र और आ गए और तीनों ने उस युवती के साथ दुष्कर्म किया। इसकी जानकारी बाद में युवती ने अपने अखबार के आकाओं के साथ पुलिस में भी दी। अखबार के आकाओं ने युवती का साथ देने की बजाए, उन आरापियों को बचाने का काम किया, और पुलिस पर दबाव डालते हुए मामला दबा दिया गया। इस अखबार से जुड़े कुछ लोग बड़ी बेशर्मी से यह भी कहते फिर रहे हैं कि अरे वह युवती को ऐस करने गई थी। अब ऐस एक के साथ हो या तीन के साथ क्या फर्क पड़ता है। वास्तव मेें कम से कम हमें तो शर्म आती है कि कैसे लोग मीडिया जगत में आ गए हैं। इस घटना के बाद से युवती और वे तीनों युवक भी गायब हो गए हैं। बताते हैं कि ये युवक दूसरे राज्य के हैं जिनको वापस भेज दिया गया है।
एक तरफ जहां युवती के साथ हुई घटना को दबा दिया गया है तो दूसरी तरफ एक अखबार इस प्रयास में है कि अगर वह युवती मिल जाए तो उसको लेकर उस अखबार से बदला लिया जाए। आज जिस तरह से अखबार वार चल रहा है, उसमें अखबार वाले किसी भी हद तक जाने से परहेज नहीं कर रहे हैं। वास्तव में यह स्थिति बहुत ही शर्मनाक तो ही लेकिन भयावाह भी है। हमारा ऐसा मानना है कि उस युवती की मदद सभी मीडिया वालों को करनी चाहिए। लेकिन हम जानते हैं कि ऐसा होगा नहीं। मीडिया से जुड़े लोग बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं, पर जब अपने पर आती है तो पीठ दिखा देते हैं।

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रविवार, मई 31, 2009

राहुल...राहुल...राहुल... उफ.. हद हो गई...

इस बात में कोई दो मत नहीं है कि दुनिया उगते सूरज को सलाम करती है, लेकिन इतना भी क्या सलाम करना कि सलाम ही बोझ लगने लगे। ऐसा ही कुछ अपने राहुल बाबा के मामले में हो रहा है। जब से लोकसभा में यूपीए की जीत का डंका बजा है। हर कोई पेले पड़ा है राहुल का नाम लेकर। हर चैनल से लेकर सारे अखबार, चाहे वह दैनिक हों साप्ताहिक, पाक्षिक या फिर मासिक हों। कोई भी ऐसा मीडिया तंत्र नहीं है जो राहुल के पीछे पागल न हो। अरे हो गया न बाबा अब क्या पांच तक राहुल ही राहुल रटते रहोगे। राहुल चालीस लिख देने से कोई कांग्रेस या फिर यूपीए अपनी जमीन-जायजात आपके नाम करने वाली नहीं है। अब इतना भी मत सड़ाओ की कान भी पक जाएं और आंखें भी थक जाएं पढ़ते-पढ़ते।

आज पूरा एक पखवाड़ा हो गया है लोकसभा चुनावों के नतीजों को आए हुए, लेकिन इस एक पखवाड़े में ऐसा कोई दिन खाली नहीं गया होगा जब मीडिया ने अपने राहुल बाबा यानी राहुल गांधी की महिमा का बखान न किया होगा। इसमें कोई दो मत नहीं है कि आज अगर केन्द्र में यूपीए की सरकार बनी है तो उसके पीछे बहुत बड़ा हाथ राहुल का रहा है। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जनता आज इतनी समझदार हो गई है कि उसको बेवकूफ बनाया ही नहीं जा सकता है। कहने का मतलब यह है कि अगर भाजपा गठबंधन के पास जनता को लुभाने वाले मुद्दे होते तो जरूर राहुल का जादू नहीं चलता। एक तो एनडीए ने लालकृष्ण अडवानी को प्रधानमंत्री के रूप में सामने पेश करके गलती की (ऐसा लोगों का मानना है)ऊपर से उसके पास कोई मुद्दा नहीं था। अब ऐसे में जनता के सामने एक ही विकल्प था कि वह फिर से यूपीए को ही मौका दे। और जनता ने ऐसा किया भी। वैसे इसमें भी कोई मत नहीं है कि यूपी में कांग्रेस को जो सफलता मिली है उसके पीछे राहुल और प्रियंका ही रहे हैं।

अगर राहुल बाबा आज मंत्री नहीं बने हैं तो उनको मालूम है कि मंत्री बनने से होना कुछ नहीं है। अब उन बेवकूफों को यह बात कौन समझाए जो राहुल को मंत्री बनवाने के पीछे पड़े हैं कि राहुल मंत्री बनकर मनमोहन के सामने खड़े होने से अच्छा मनमोहन को अपने सामने खड़ा रखना जानते हैं। जो सुपर प्रधानमंत्री का पावर रखता हो उसको क्या पड़ी है किसी छोटे से मंत्री का पद लेने की।

यूपी में फिर से गांधी परिवार के दिन लौटाने में राहुल का ही हाथ रहा है। यूपीए को मिली सफलता में राहुल के हाथ को कोई नकार भी नहीं रहा है और नकार भी सकता है। लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं है न की दिन-रात आप राहुल बाबा के राग को ही पेले पड़े हैं दर्शकों और पाठकों के सामने। एक तरफ अपने इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले हैं जो वैसे भी महान लोगों की श्रेणी में आते हैं। यहां हर चैनल वाला अपने कार्यक्रम को विशेष बताता है। लेकिन टीवी देखने वाला दर्शक तो जानता है कि वह कितना बड़ा झूठ बोल रहा है, क्योंकि जिस कार्यक्रम को वह विशेष बताता है वैसा ही कार्यक्रम उस चैनल से पहले कोई और चैनल दिखा चुका होता है। हर चैनल ने राहुल पर दिखाए कार्यक्रम को विशेष ही बताया है। अरे बाबा ये चैनल वाले कब समझेंगे कि ये पब्लिक है बाबू पब्लिक जो सब जानती है। अगर नहीं जानती तो आज केन्द्र में यूपीए की नहीं एनडीए की सरकार होती और प्रधानमंत्री होते लालकृष्ण अडवानी। और फिर अपने मीडिया वाले बंधु भी राग राहुल नहीं राग अडवानी गाते नजरे आते।

बहरहाल बात हो रही है राहुल बाबा की। राहुल बाबा को भुनाने का काम जहां एक तरफ इलेक्ट्रानिक मीडिया कर रहा है, वहीं प्रिंट मीडिया भी पीछे नहीं है। टीवी चैनलों के बाद दैनिक फिर साप्ताहिक और पाक्षिक अंत में मासिक, त्रैमासिक सबके सब पेले पड़े हैं राहुल की जय करने में। अरे बाबा कितनी जय करोगे हो गया न यार क्या पांच साल तक जनता के सामने यही परोसने का इरादा है कि राहुल त्याग की मूर्ति हैं, राहुल ने ये कियास राहुल ने वो किया। अगर राहुल बाबा आज मंत्री नहीं बने हैं तो उनको मालूम है कि मंत्री बनने से होना कुछ नहीं है। अब उन बेवकूफों को यह बात कौन समझाए जो राहुल को मंत्री बनवाने के पीछे पड़े हैं कि राहुल मंत्री बनकर मनमोहन के सामने खड़े होने से अच्छा मनमोहन को अपने सामने खड़ा रखना जानते हैं। जो सुपर प्रधानमंत्री का पावर रखता हो उसको क्या पड़ी है किसी छोटे से मंत्री का पद लेने की।

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