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बुधवार, सितंबर 14, 2011

राष्ट्रभाषा को बचाने के लिए फ्रांसीस क्रांति की जरूरत

अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी को लेकर अपने देश के साहित्यकारों में ही बहुत ज्यादा मतभेद हैं। कोई यह मानता है कि हिन्दी भाषा का अंत नहीं हो सकता है तो कोई कहता है कि हिन्दी मर रही है। ऐसे में जबकि सबके अपने-अपने मत हैं तो भला कैसे अपनी राष्ट्रभाषा का भला हो सकता है। साहित्यकार और छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी विश्व रंजन मानना है कि अपने देश में भी राष्ट्रभाषा को बचाने के लिए फ्रांसीस क्रांति की जरूरत है। विश्व रंजन ने एक किस्सा सुनाया कि जब वे काफी बरसों पहले फ्रांस गए थे तो वहां पर एक टैक्सी में बैठे। ड्राईवर को अंग्रेजी आती थी, इसके बाद भी उन्होंने साफ कह दिया कि वे अंग्रेजी में बात नहीं करेंगे और अंग्रेजी में उनको जिस स्थान के लिए जाने कहा गया वहां ले जाने वह तैयार नहीं हुआ।
कहने का मतलब यह है कि फ्रांस जैसे देशों ने अपनी राष्ट्रभाषा को बचाने के लिए अंग्रेजी का बहिष्कार करने का काम किया। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या अपने देश भारत में फ्रांस जैसी क्रांति संभव है? हमें नहीं लगता है कि भारत में ऐसा संभव हो सकता है। अपने देश में जिस तरह से लोग अंग्रेजी की गुलामी में जकड़े हुए हैं, उससे उनको मुक्त करना अंग्रेजों की गुलामी से देश को मुक्त कराने से भी ज्यादा कठिन लगता है। अंग्रेज तो भारत छोड़कर चले गए, लेकिन उनकी भाषा की गुलामी से आजादी का मिलना संभव नहीं है।
भले अंग्रेजी से आजादी न मिले, लेकिन इतना जरूर करने की जरूरत है कि अपनी राष्ट्रभाषा का अपमान तो न हो। यहां तो अपने देश में कदम-कदम पर अपनी राष्ट्रभाषा का अपमान होता है। लोगों को अंग्रेजी बोलने में गर्व महसूस होता है। जो अंग्रेजी नहीं जानता है उसे लोग गंवार ही समझ ही लेते हैं। हमारी नजर में तो जिसे अपनी राष्ट्रभाषा का मान रखना नहीं आता है, उससे बड़ा कोई गंवार नहीं हो सकता है। वास्तव में हमें फ्रांस जैसे देशों से सबक लेने की जरूरत है। भले आप अंग्रेजी का बहिष्कार करने की हिम्मत नहीं दिखा सकते हैं, लेकिन अपनी राष्ट्रभाषा का मान रखने की हिम्मत तो दिखा ही सकते हैं। अगर आप हिन्दी जानते हुए भी हिन्दी नहीं बोलते हैं तो क्या राष्ट्रभाषा का अपमान नहीं है। अगर कहीं पर अंग्रेजी बोलने की मजबूरी है तो बेशक बोलें। लेकिन जहां पर आपको सुनने और समझने वाले 80 प्रतिशत से ज्यादा हिन्दी भाषीय हों वहां पर अंग्रेजी में बोलने का क्या कोई मतलब होता है। लेकिन नहीं अगर हम अंग्रेजी नहीं बोलेंगे तो हमें पढ़ा-लिखा कैसे समझा जाएगा। आज पढ़े-लिखे होने के मायने यही है कि जिसको अंग्रेजी आती है, वही पढ़ा-लिखा है, जिसे अंग्रेजी नहीं आती है, उसे पढ़ा-लिखा समझा नहीं जाता है।
विश्व रंजन ने एक बात और कही कि आज अपने देश में हिन्दी को मजबूत करने के लिए स्कूल स्तर से ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन यहां भी सोचने वाली बात यह है कि स्कूल स्तर से कैसे ध्यान देना संभव है। आज हर पालक अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में ही भेजना चाहता है। यहां पर पालकों की सोच को बदलने की जरूरत है, जो संभव नहीं लगता है। हमारा ऐसा मानना है कि हिन्दी को बचाने के लिए स्कूल स्तर की बात तभी संभव हो सकती है जब किसी भी नौकरी में अंग्रेजी की अनिवार्यता के स्थान पर हिन्दी को अनिवार्य किया जाएगा। आज हर नौकरी की पहली शर्त अंग्रेजी है, ऐसे में पालक तो जरूर चाहेंगे कि उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो और जब अंग्रेजी में ही भविष्य नजर आएगा तो लोगों का अंग्रेजी के पीछे भागना स्वाभाविक है। अंग्रेजी से मुक्ति के लिए फ्रांसीस क्रांति की नहीं जागरूकता क्रांति की जरूरत है।  अब यह कहा नहीं जा सकता है कि यह जागरूकता कब और कैसे आएगी।

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रविवार, मई 30, 2010

अंग्रेजी से मुक्ति के लिए फ्रांसीस क्रांति की नहीं जागरूकता क्रांति की जरूरत

अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी को लेकर अपने देश के साहित्यकारों में ही बहुत ज्यादा मतभेद हैं। कोई यह मानता है कि हिन्दी भाषा का अंत नहीं हो सकता है तो कोई कहता है कि हिन्दी मर रही है। ऐसे में जबकि सबके अपने-अपने मत हैं तो भला कैसे अपनी राष्ट्रभाषा का भला हो सकता है। नामी साहित्यकारों के जो मत जानने को मिले उसमें भी यही बात सामने आई कि आखिर आज अपनी राष्ट्रभाषा के साथ क्या हो रहा है।  हम यहां पर फिलहाल साहित्यकार और छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्व रंजन की बात रख रहे हैं। उनका ऐसा मानना है कि अपने देश में भी राष्ट्रभाषा को बचाने के लिए फ्रांसीस क्रांति की जरूरत है। विश्व रंजन ने एक किस्सा सुनाया कि जब वे काफी बरसों पहले फ्रांस गए थे तो वहां पर एक टैक्सी में बैठे। ड्राईवर को अंग्रेजी आती थी, इसके बाद भी उन्होंने साफ कह दिया कि वे अंग्रेजी में बात नहीं करेंगे और अंग्रेजी में उनको जिस स्थान के लिए जाने कहा गया वहां ले जाने वह तैयार नहीं हुआ।
कहने का मतलब यह है कि फ्रांस जैसे देशों ने अपनी राष्ट्रभाषा को बचाने के लिए अंग्रेजी का बहिष्कार करने का काम किया। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या अपने देश भारत में फ्रांस जैसी क्रांति संभव है? हमें नहीं लगता है कि भारत में ऐेसा संभव हो सकता है। अपने देश में जिस तरह से लोग अंग्रेजी की गुलामी में जकड़े हुए हैं, उससे उनको मुक्त करना अंग्रेजों की गुलामी से देश को मुक्त कराने से भी ज्यादा कठिन लगता है। अंग्रेज तो भारत छोड़कर चले गए, लेकिन उनकी भाषा की गुलामी से आजादी का मिलना संभव नहीं है।
भले अंग्रेजी से आजादी न मिले, लेकिन इतना जरूर करने की जरूरत है कि अपनी राष्ट्रभाषा का अपमान तो न हो। यहां तो अपने देश में कदम-कदम पर अपनी राष्ट्रभाषा का अपमान होता है। लोगों को अंग्रेजी बोलने में गर्व महसूस होता है। जो अंग्रेजी नहीं जानता है उसे लोग गंवार ही समझ ही लेते हैं। हमारी नजर में तो जिसे अपनी राष्ट्रभाषा का मान रखना नहीं आता है, उससे बड़ा कोई गंवार नहीं हो सकता है। वास्तव में हमें फ्रांस जैसे देशों से सबक लेने की जरूरत है। भले आप अंग्रेजी का बहिष्कार करने की हिम्मत नहीं दिखा सकते हैं, लेकिन अपनी राष्ट्रभाषा का मान रखने की हिम्मत तो दिखा ही सकते हैं। अगर आप हिन्दी जानते हुए भी हिन्दी नहीं बोलते हैं तो क्या राष्ट्रभाषा का अपमान नहीं है। अगर कहीं पर अंग्रेजी बोलने की मजबूरी है तो बेशक बोलें। लेकिन जहां पर आपको सुनने और समझने वाले 80 प्रतिशत से ज्यादा हिन्दी भाषीय हों वहां पर अंग्रेजी में बोलने का क्या कोई मतलब होता है। लेकिन नहीं अगर हम अंग्रेजी नहीं बोलेंगे तो हमें पढ़ा-लिखा कैसे समझा जाएगा। आज पढ़े-लिखे होने के मायने यही है कि जिसको अंग्रेजी आती है, वही पढ़ा-लिखा है, जिसे अंग्रेजी नहीं आती है, उसे पढ़ा-लिखा समझा नहीं जाता है।
विश्व रंजन ने एक बात और कही कि आज अपने देश में हिन्दी को मजबूत करने के लिए स्कूल स्तर से ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन यहां भी सोचने वाली बात यह है कि स्कूल स्तर से कैसे ध्यान देना संभव है। आज हर पालक अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में ही भेजना चाहता है। यहां पर पालकों की सोच को बदलने की जरूरत है, जो संभव नहीं लगता है। हमारा ऐसा मानना है कि हिन्दी को बचाने के लिए स्कूल स्तर की बात तभी संभव हो सकती है जब किसी भी नौकरी में अंग्रेजी की अनिवार्यता के स्थान पर हिन्दी को अनिवार्य किया जाएगा। आज हर नौकरी की पहली शर्त अंग्रेजी है, ऐसे में पालक तो जरूर चाहेंगे कि उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो और जब अंग्रेजी में ही भविष्य नजर आएगा तो लोगों का अंग्रेजी के पीछे भागना स्वाभाविक है। अंग्रेजी से मुक्ति के लिए फ्रांसीस क्रांति की नहीं जागरूकता क्रांति की जरूरत है।  अब यह कहा नहीं जा सकता है कि यह जागरूकता कब और कैसे आएगी।

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गुरुवार, नवंबर 12, 2009

राज ठाकरे को हिन्दी से नफरत क्यों?

यह बात समझ से परे हैं कि अपनी ही राष्ट्रभाषा हिन्दी से राज ठाकरे को आखिर इतनी नफरत क्यों हैं। अपनी क्षेत्रीय भाषा से कोई दीवानगी की हद तक भले प्यार करे लेकिन इसका यह मतलब तो कदापि नहीं होता है कि आप इसके एवज में राष्ट्रभाषा का लगातार अपमान करें। अगर अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान करना नहीं जानते हैं तो फिर आपका अपनी क्षेत्रीय भाषा के प्रति प्यार किस काम का। राज ठाकरे का मराठी प्रेम तो उसी तरह से है जैसा पाकिस्तान का अपना देश प्रेम है। पाक को जिस तरह से भारतीय हमेशा दुश्मन लगते हैं, उसी तरह से राज ठाकरे तो भी हिन्दी हमेशा से दुश्मन ही लगी है। अगर ठाकरे ने ऐसा ही प्यार हिन्दी के प्रति दिखाया होता और अंग्रेजी से नफरत करते तो उनका मान पूरे देश में होता। अब भी समय है उनको अपना रास्ता बदलकर हिन्दी का विरोध करने की बजाए अंग्रेजी का विरोध करना चाहिए।

इन दिनों पूरे देश में राज ठाकरे के मनसे विधायकों द्वारा विधानसभा में किए गए कृत्य पर बवाल मचा हुआ है। यह सोचने वाली ही नहीं बल्कि एक गंभीर बात है कि राज ठाकरे की पार्टी ये क्या कर रही है। क्यों कर हिन्दी का इतना ज्यादा विरोध किया जा रहा है। जिस अंग्रेजी भाषा का विरोध होना चाहिए, उसका विरोध करने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा रहे हैं मनसे के लोग? हिन्दी तो अपनी राष्ट्रभाषा है फिर उससे आखिर इतनी नफरत क्यों? क्या महाराष्ट्र को एक तरह से राज ठाकरे ने पाकिस्तान बना दिया है कि यहां कोई हिन्दू कदम नहीं रख सकता है। अगर कोई कदम रखेगा तो उसका सर कलम कर दिया जाएगा। इतनी नफरत तो पाकिस्तान में भी हिन्दूओं के प्रति नहीं है जितनी नफरत मनसे में हिन्दी के प्रति नजर आती है। हिन्दी से नफरत करके आखिर क्या साबित करना चाहते हैं मनसे के लोग। क्या महाराष्ट्र को देश से अलग करने की साजिश की जा रही है? अगर नहीं तो फिर हिन्दी के प्रति यह रवैय्या क्यों है? इसका जवाब किसके पास है।

अपनी क्षेत्रीय भाषा से आप बेशक प्यार नहीं बल्कि दीवानगी की हद तक प्यार करें। लेकिन इसका यह मतलब कदापि नहीं होना चाहिए कि आप अपनी राष्ट्रभाषा का ही अपमान करते रहे। अगर आप राष्ट्रभाषा का अपमान कर रहे हैं तो फिर वंदेमातरम् का विरोध करने वालों और आप में क्या फर्क रह जाता है। फिर तो वंदेमातरम् का विरोध भी सही माना जाना चाहिए। जिस तरह से मनसे के लोगों को हिन्दी से कोई मतलब नहीं है वैसे ही मुस्लिम कौम के कुछ लोगों को वंदेमातरम् से मतलब नहीं है। ऐसे में तो एक दिन हर कोई देश की अस्मत से खिलवाड़ करने लगेगा और अपना-अपना राग अलापेगा कि उसे यह पसंद नहीं है। क्या देश की राष्ट्रभाषा, राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत अब लोगों की पसंद पर निर्भर रहेंगे? देश की अस्मत से खिलवाड़ करने वालों को बर्दाश्त करना जायज नहीं है।

अपने मनसे के लोग तो देश के संविधान और कानून से ऊपर हो गए हैं। एक तरफ राष्ट्रभाषा का अपमान करने के बाद उनके माथे पर शिकन नहीं है तो दूसरी तरफ खुले आम ऐलान किया जाता है कि अबू आजमी की सड़क पर पिटाई की जाएगी। क्या अपने देश का कानून इतना ज्यादा नपुंशक हो गया है कि खुले आम चुनौती देने वालों के खिलाफ भी कुछ नहीं किया जा सकता है। अगर यही हाल रहा तो देश में जो थोड़ा बहुत कानून बचा है, उसका भी अंत हो जाएगा और देश को अराजक होने से कोई नहीं बचा पाएगा।

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गुरुवार, जुलाई 23, 2009

अंग्रेजी बोलने में समझते हैं शान-हिन्दी बोलने में लगता है अपमान

न जाने क्यों अपनी राष्ट्रभाषा की दुर्गति करने पर हर कोई आमदा नजर आता है। खासकर अपने देश के नेता और मंत्री तो लगता है हिन्दी को कुछ समझते ही नहीं हैं। इनमें इतना ज्यादा गुरूर है कि हिन्दी को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं गंवाना चाहते हैं। हमें तो लगता है कि इनको अंग्रेजी बोलने में ही शान महसूस होती है और हिन्दी बोलने में अपमान लगता है। अरे भाई हिन्दी से इतनी ही खींज है तो फिर क्यों रहते हैं हिन्दुस्तान में? अगर हिन्दी जानते हुए भी आप हिन्दी नहीं बोलते हैं तो यह राष्ट्रभाषा का अपमान है। ऐसे किसी भी नेता-मंत्री, अफसर या चाहे वो कोई भी हो उन पर तो देश द्रोह का मामला चलाना चाहिए। जिसे देखो हिन्दी को कमजोर समझकर उनका अपमान किए जा रहा है। इनको बोलने वाला कोई नजर ही भी नहीं आता है। अरे भाई नजर आए भी कैसे। जो लोग देश के कर्णधार बने बैठे हैं वहीं तो हिन्दी का ज्यादा अपमान कर रहे हैं।

ससंद में एक मंत्री जयराम रमेश के अंग्रेजी प्रेम ने बवाल खड़ा किया तो एक बार फिर ये कम से कम हमें तो हिन्दी का अपमान होने पर बहुत ज्यादा दर्द हुआ। न जाने क्यों कर ये नेता और मंत्री अंग्रेजी की गुलामी से आजाद होना नहीं चाहते हैं। इनको लगता है कि अगर वे हिन्दी में बोलेंगे ेतो लोग उनको कम पढ़ा लिखा समझेंगे। क्या पढ़े-लिखे होने का पैमाना अंग्रेजी ही है। अपने देश में आज से नहीं बरसों से अंग्रेजी का हौवा इस तरह से खड़ा किया गया है कि सब अंग्रेजी के मोह में फंस गए हैं। आज हर शहर और गांव में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बाढ़ आ गई है। आज एक गरीब किसान हो या फिर मजदूरी करने वाला, वह भी यही सोचता है कि अपने बच्चे को अंग्रेजी में शिक्षा दिलानी है। यह एक बड़ा ही दुखद पहलू है कि जिस देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी है वहां पर हिन्दी में अपने बच्चों को पढ़ाने की कोई नहीं सोचता है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण भी है, और वह कारण है कि अपने देश में सरकारी के साथ निजी नौकरियों में उन्हीं को प्राथमिकता दी जाती है जिनको अंग्रेजी आती है। अब ऐसे में कोई क्या कर सकता है, एक तो अपने देश में बेरोजगारी इतनी ज्यादा है कि जिसकी कोई सीमा नहीं है। ऐसे में हिन्दी माध्मय से पढऩे वालों को नौकरी कैसे मिल सकती है। आज यही वजह है कि हर कोई चाहता है कि उनका बच्चा भी अंग्रेजी माध्यम से पढ़े ताकि उसको नौकरी मिल सके। अगर अपने देश में अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी पर ध्यान दिया जाता और हर नौकरी में हिन्दी को अनिवार्य माना जाता तो ऐसी स्थिति नहीं होती।

हम याद करें आज से कोई तीन दशक पहले का जमाना जब हम लोग स्कूल में पढ़ते थे, तब छठी क्लास में जाकर ए, बी, सी, डी पढऩे को मिलती थी। लेकिन आज नर्सरी के बच्चे की स्कूली किताबें देखकर सिर चकरा जाएगा। हमारा अंग्रेजी से कोई विरोध नहीं है। लेकिन हिन्दी की शर्त पर अंग्रेजी को रखा जाना नितांत गलत है। अपनी राष्ट्रभाषा को किनारे लगा कर आज अंग्रेजी को अनिवार्य इस तरह से कर दिया गया है कि लगता है कि अंग्रेजी ही हमारी राष्ट्रभाषा हो गई है। तो क्या यह अपनी राष्ट्रभाषा का अपमान नहीं है। जिसे देखो बस हिन्दी के पीछे पड़ा है नहा-धोकर। हिन्दी को लोग आज अछूता कन्या की तरह समझने लगे हैं। एक तरफ जहां अपने देश में ही हिन्दी को पराया कर दिया गया है, वहीं दूसरे कई देशों में हिन्दी को अनिवार्य कर दिया गया है। विदेशों में हिन्दी के जानकारों की पूछ-परख बढ़ गई है तो क्या यह सब अपने देश के मंत्रियों और नेताओं को नजर नहीं आता है। क्या देश के कर्णधार इससे सबक लेना जरूरी नहीं समझते हैं। हमें तो ऐसा लगता है कि जिस तरह से देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए लंबी लड़ाई लडऩी पड़ी थी, उसी तरह से हिन्दी को भी अंग्रेजी की गुलामी से आजाद करने की लिए एक लंबी लड़ाई की जरूरत है।

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