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मंगलवार, अगस्त 30, 2011

मैटर लिख और कंप्यूटर में डाल, फिर भूल जा...

हमारे एक पत्रकार मित्र इन दिनों सभी मित्रों को एक ही बात कहते हैं, मैटर लिख कंप्यूटर में डाल और भूल जा। एक तरफ वे पत्रकारों से यह कहते हैं तो दूसरी तरफ फोटोग्राफरों से भी कहते हैं कि अबे फोटो खींच कंप्यूटर में डाल और भूल जा।
हमने उनसे पूछा कि नेकी कर दरिया में डाल तो सूना था, लेकिन तू ये नया जुमला क्यों कहता है। उसने जवाब दिया यार आज कल मीडिया में जिस तरह के हालात है, उसके लिए यही जुमाल ठीक है। आज आप मैटर लिखने के बाद यह पूछ नहीं सकते हैं कि आपका मैटर क्यों नहीं लगा। इसलिए मैं आज-कल के ने पत्रकारों और फोटोग्राफरों को नसीहत देने का काम करता हूं और उनको बताने का प्रयास करता हूं कि अब जमाना पेशेवर है, आज के जमाने में जो दिल से काम करता है, वह दिल का मरीज बनकर रह जाता है, इसलिए दिल से नहीं दिमाग से काम करो और भूल जाओ कि तुमने कल तुमने क्या काम किया था।
नया दिन नया काम
आखिर तुमको मिल रहे हैं
न मैटर लिखने के दाम

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रविवार, जुलाई 10, 2011

वरिष्ठ पत्रकारों के सामने ही धुआं उड़ाते हैं नए पत्रकार

आज के नए पत्रकारों में कितनी मर्यादा है इसका पता इसी बात से चलता है कि ये लोग अपने से बहुत ज्यादा वरिष्ठ पत्रकारों के सामने भी ठशन से खड़े होकर धुआं उड़ाने का काम करते हैं। एक समय वह था जब वरिष्ठ पत्रकारों के सामने जूनियर बैठने की क्या खड़े होने हिम्मत नहीं करते थे, लेकिन आज 21वीं सदी में सब चलता है।
हमने अक्सर पान दुकानों पर क्या प्रेस क्लब में भी नए-नवेले पत्रकरों को शान से खड़े होकर सिगरेट का धुआं उड़ाते देखा है। समझ में नहीं आता कि ये कैसे-कैसे पत्रकार आ गए हैं आज। जूनियरों में तो मर्यादा नाम की कोई चीज है नहीं, लेकिन सीनियरों से भी यह नहीं होता कि वे जूनियरों को कम से कम टोक सके। वैसे संभवत: सीनियर जानते हैं कि वे उनको टोकेंगे तो कहीं उनको उल्टा जवाब न मिल जाए।
हमारे साथ लंबे समय तक काम करने वाले एक पत्रकार मित्र ने कुछ दिनों पहले बताया कि वे एक पत्रकार वार्ता में गए थे,वहां एक नया-नवेला पत्रकार बैठा था, वह उनसे पूछने लगा कि तुम किस प्रेस में हो। उसका यह सवाल सुनकर वह हवाक रह गया कि कल का लड़का उनसे तुम कहकर बात कर रहा है। हमारे उस मित्र ने उसको फटकार लगाई तब जाकर उसकी समझ में आया कि वह गलती कर बैठा है।
यह महज एक उदाहरण है। यह आम बात है नए-नवेले पत्रकार सीनियरों को पहचानते नहीं हैं और कुछ भी पूछ बैठते हैं। यही नहीं प्रेस क्लब में भी सीनियरों के सामने नए लड़के बहुत ही गंदे तरीके से बैठे रहते हैं। लेकिन मजाल है कि कोई सीनियर उनसे कुछ कहे। कई बार ऐसा हुआ है कि हम जब प्रेस क्लब जाते हैं और किसी को ऐसी हरकत करते देखते हैं तो उसे फटकार लगाने से पीछे नहीं हटते हैं। हमारा ऐसा मानना है कि सीनियरों ने खुद ही अपना मान खो दिया है। अगर सीनियरों में दम हो तो मजाल है कि उनके सामने कोई जूनियर गलत हरकत कर दे। 

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शुक्रवार, मई 06, 2011

क्या अखबार में छपे अपने लेखों को ब्लाग में डालना गलत है?

हमारे एक पत्रकार मित्र हैं उनको इस बात से बहुत परेशानी होती है कि पत्रकार अपने उन्हीं लेखों को अपने ब्लाग में डाल देते हैं जो लेख वे अखबारों के लिए लिखते हैं। अब सोचने वाली बात यह है कि आखिर इसमें बुराई क्या है। अगर हम कोई अच्छा लेख अखबार में लिख रहे हैं और वहीं लेख हम अपने ब्लाग के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं तो इसमें गलत क्या है। हमें नहीं लगता है कि इसमें कुछ गलत है। वैसे भी अखबार में कम से कम कुछ अच्छा लिखा हुआ ही प्रकाशित करने की इजाजत संपादक देते हैं। ऐसे में उसी अच्छे लेख को ब्लाग जगत के पाठक भी पढ़ ले तो इसमें हर्ज क्या है। 
हमारे कुछ पत्रकारों मित्रों के साथ हम भी कई बार अपने अखबार में प्रकाशित लेखों को अपने ब्लाग में डाल देते हैं। इन लेखों पर अच्छी प्रतिक्रिया भी आती है। लेकिन अपने एक पत्रकार मित्र को यह बात जमती नहीं है कि हम या कोई भी पत्रकार ब्लाग में उन लेखों को डालें जो लेख अखबार में प्रकाशित हो चुके हैं। इस बात का उनके पास कोई ठोस जवाब तो नहीं है, वे कहते हैं कि ब्लाग एक अलग चीज है। अरे मित्र इसमें अलग जैसी क्या बात है। ब्लाग तो बल्कि आपकी अपनी बपौती है। इसमें तो आप जैसा चाहे लिख सकते हैं, लेकिन आप यह भूल रहे हैं कि अखबार में वह सब नहीं चलता है। अखबार में अच्छा लिखने के बाद भी संपादक से उनको प्रकाशित करने की इजाजत नहीं मिल पाती है। ऐसे में यह बात मान कर चलिए कि किसी भी पत्रकार या फिर किसी लेखक का कोई लेख किसी भी अखबार में प्रकाशित होता है तो उस लेख में कुछ तो दम होगा। अगर किसी भी लेख में कुछ दम है तो उस लेख को क्यों नहीं ब्लाग जगत के पाठक तक पहुंचाना चाहिए। इसमें बुराई क्या है? इसी के साथ हमारा यह भी मानना है कि अगर कोई पत्रकार किसी खबर को अपने अखबार के लिए बनाता है और उस अखबार के बारे में वह सोचता है कि इस खबर की जानकारी ब्लाग जगत के पाठकों को भी होनी चाहिए तो इसमें भी गलत क्या है?
छत्तीसगढ़ की कितनी ऐसा खबरें हैं जिनको राष्ट्रीय या फिर अंतरराष्ट्रीय  स्तर पर स्थान मिल पाता है। ऐसे में जबकि छत्तीसगढ़ की खबरों को कोई पूछने वाला नहीं है तो ऐसे में अगर कोई पत्रकार छत्तीसगढ़ की खबरों को अपने ब्लाग के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने का काम कर रहा है तो हमारी नजर में ऐसे पत्रकार साधुवाद के पात्र हैं। ऐसे ब्लागरों का हौसला बढ़ाने की जरूरत है।

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मंगलवार, मई 03, 2011

अबे तुम पत्रकार क्या घुटना दिमाग होते हो?

एक मित्र का फोन आया और उसने एक सवाल दाग दिया कि क्या तुम पत्रकार घुटना दिमाग होते हो?
हमने पूछा अबे हुआ क्या है जो तू इतना भड़का रहा है?
उसने कहा होना क्या है, जब देखो बस तुम लोग अपने को ही तीस मार खां समझते हो?
हमने फिर कहा अबे बताएगा मामला क्या है?
उसने कहा एक तो हमने तुम्हारी सम्मान वाली पोस्ट देखी, और फिर दिल्ली में हुए ब्लागर सम्मेलन का विवाद भी देखा।
हमने पूछा तो क्या हुआ?
उसने कहा अबे दूसरों को भी अपने मन से चलने और जीने-खाने दोगे या नहीं।
अब दिल्ली में बेचारों ने ब्लागर सम्मेलन किया, तो सीधी सी बात है कि ब्लागर अपने खर्च से तो वहां रूके नहीं होंगे। जरूर उनको इतने बड़े आयोजन में खर्च करना पड़Þा होगा। ऐसे में वे अगर किसी ईमानदार साहित्यकार, या किसी और को बुलाते तो उनका खर्च कैसे निकलता। एक भ्रष्ट मंत्री ही तो ऐसे आयोजन के लिए बड़ा सा चंदा दे सकता है। क्या पत्रकारों के आयोजनों में कभी किसी भ्रष्ट मंत्री को नहीं बुलाया जाता जो ब्लागर सम्मेलन में एक भ्रष्ट मंत्री को बुलाए जाने पर बवाल किया जा रहा है।
उसने कहा तू एक बात ईमानदारी से बता, क्या तेरी बिरादरी के सारे पत्रकार ईमानदार हंै? जब तुम्हारी खुद की कौम में ईमानदारी नाम की चीज नहीं है तो फिर क्यों कर दूसरों के फटे में टांग अड़ाने का काम करते हो तुम लोग। अगर तुम लोगों को ऐसे आयोजन में नहीं जाना है तो मत जाओ, क्यों कर किसी के पेट में लात मारने का काम करते हो। जिसने भी दिल्ली में ब्लागर सम्मेलन करवाया होगा उसकी भी तो कुछ जरूरत रही होगी, आज के जमाने में कोई ईमानदार तो किसी की जरूरत पूरी नहीं करता है, ऐसे में किसी बेईमान को ही तो पकड़ना पड़ेगा न फिर उन बेचारों ने गलत क्या किया।
उसने फिर एक सवाल दागा- चल बता क्या देश के सारे अखबार अपना काम ईमानदारी से कर रहे हैं?
उसके इस सवाल का हमारे पास वास्तव में कोई जवाब नहीं था। हम जानते हैं कि आज देश के बहुत कम अखबार अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रहे हैं। सत्ता में बैठी सरकार के खिलाफ किसी भी अखबार में लिखने की हिम्मत नहीं होती है। कोई अखबार ऐसी हिम्मत करता भी है तो उसके पीछे उसका अपना स्वार्थ होता है। अब यह स्वार्थ किसी भी तरह का हो सकता है, संभवत है उसको कम विज्ञापन मिलता हो जिसके कारण सरकार पर दबाव बनाने वह उसके खिलाफ लिखने का काम कर रहा है, या फिर संभव है कि वह अखबार विपक्ष में बैठे लोगों के हाथों की कठपुतली हो। कुछ न कुछ तो बात रहती है, तभी कोई अखबार सत्ता में बैठी सरकार के खिलाफ जहर उगलता है।
एक बात हमारे मित्र की यह तो सही है कि हम पत्रकार घुटना दिमाग होते हैं। पत्रकारों पर पत्रकारिता का रंग इस कदर चढ़ा रहता है कि वे अपने से बड़ा और किसी को समझते ही नहीं हंै। हमने भी अक्सर पत्रकार साथियों को छोटी-छोटी बात पर किसी से भी उलझते देखा है। एक छोटा सा उदाहरण ही ले लीजिए। किसी बड़े मंंत्री के कार्यक्रम में जब किसी पत्रकार की तलाशी ली जाती है, तो अक्सर पत्रकार भड़क जाते हैं कि क्या हम चोर हैं।
अब हमारे पत्रकार मित्रों को भी समझना चाहिए कि तलाशी लेने वाले बेचारे तो बस अपना काम कर रहे हैं, अगर कहीं चूक हो गई तो उनकी नौकरी चली जाएगी, फिर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कई बड़ी वारदातों में लोग पत्रकार बनकर पहुंचे हैं। ऐसे में अगर सुरक्षा के लिहाज से आपकी तलाशी ली जा रही है तो इसमें गलत क्या है। ईमानदारी से बताए तो हमें भी ऐसे कई मौकों पर गुस्सा आता है, फिर हम सोचते हैं कि यार अगला आदमी तो बस अपना काम कर रहा है जिस तरह से हम अपना काम करने आए हैं। ऐसे में क्यों कर उसके काम में हम बाधा पहुंचाए।

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शुक्रवार, दिसंबर 25, 2009

दो दशक बाद किया बस का सफर

बस के अंदर से खींची गई सड़क की एक तस्वीर

हमें कल बस का सफर करने का मौका मिल गया। यह सफर वास्तव में सुहाना रहा। हमें बस में सफर करने का मौका करीब दो दशक बाद मिला था। वैसे बस में जाना कमोवेश हम पसंद नहीं करते हैं, जहां जाते हैं अपनी मोटर सायकल या फिर कार में जाते हैं। हमें जब राजधानी के नए अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम में रिपोर्टिंग करने जाना था तो क्रिकेट संघ ने कहा कि हम वाहन भिजवा देंगे ताकि सारे पत्रकार आ सके। हम वहां जाना तो अपने ही वाहन से चाहते थे, लेकिन पत्रकार मित्रों के आग्रह पर हमने साथ जाने मंजूर किया। जब यह वाहन आया तो यह कोई कार नहीं बल्कि एक बस थी जिसमें हम लोग करीब एक दर्जन पत्रकार और फोटोग्राफर मस्ती करते हुए स्टेडियम गए और वापस आए। इस सफर ने कॉलेज के दिनों की याद ताज कर दी।

हम जब नए स्टेडियम जाने के लिए प्रेस क्लब पहुंचे तो हमें मालूम नहीं था कि हमें किस वाहन से स्टेडियम जाना है, हम पहुंचे तो सभी पत्रकार मित्र पहुंच गए थे। ऐसे में हमने प्रदेश क्रिकेट संघ के उपाध्यक्ष राजय सिंह परिहार को फोन लगाया कि भाई साहब सारे पत्रकार प्रेस क्लब पहुंच गए हैं आपका वाहन कहां है? उन्होंने बताया कि महेन्द्रा की एक बस जिसका नंबर 0713 है, वहीं पास में खड़ी है। हम सभी लोग बस में सवार हो गए और चल दिए स्टेडियम की तरफ। हमने अपने पत्रकार मित्रों को बताया कि यार आज हमें करीब 20 साल बाद बस में सफर करने का मौका मिला है। हम बता दें कि हमें चाहे जितनी भी दूर जाना होता है हम अपनी मोटर सायकल या फिर कार से जाते हैं। हम रायपुर से करीब 300 किलो मीटर दूर जगदलपुर और करीब इतनी ही दूर कोरबा के साथ कई बार 300 से 500 किलो मीटर तक का सफर अपनी मोटर सायकल से कर चुके हैं। हमें ज्यादातर अपने वाहन और साधन में जाना पसंद है। इसके पीछे दो कारण हैं, एक तो किसी का अहसान नहीं रहेगा कि हम उनके वाहन में गए थे, दूसरे यह कि हम अगर किसी और के वाहन में जाते हैं तो हमें उनके हिसाब से वापस आना पड़ता है। अपने पत्रकारिता के दो दशक से ज्यादा के जीवन में महज एक बार जनसंपर्क के वाहन का उपयोग तब किया था, जब कोरबा में करीब पांच साल पहले भारत और पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटरों का एक मैच हुआ था। वैसे जनसंपर्क के वाहन का उपयोग करना हर पत्रकार अपना जन्म सिद्ध अधिकार सममझता है, पर कम से कम हमें यह बात पसंद नहीं है।

हमारा रायपुर से नए स्टेडियम तक का करीब 50 किलो मीटर का आने-जाने का सफर बहुत सुहाना रहा। हम लोग जिस तरह से मस्ती करते हुए गए और आए उसने कॉलेज के दिनों की याद ताजा कर दी। हमारे एक फोटोग्राफर मित्र दीपक पांडे ने किस तरह से कंडेक्टर बनकर मस्ती की इसका किस्सा हम बात में बताएंगे।

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रविवार, नवंबर 01, 2009

पत्रकार भी आ गए बाबा के झांसे में

अपने देश में बाबाओं का ही राज चल रहा है। बाबाओं के झांसे से भला कौन बचा सका है। बाबा जिसे चाहे उसे अपनी बातों से फंसा लेते हैं। बाबाओं की वाणी में ऐसा जादू होता है कि कलम के जादूगर भी कभी उनके जाल में फंस ही जाते हैं। ऐसा ही एक वाक्या अपने रायपुर के प्रेस क्लब में तब देखने को मिला जब एक बाबा आए थे पत्रकारवार्ता लेने। इन बाबा का जादू पत्रकारों के सिर ऐसा चढ़ा की शराब छोडऩे के साथ दूसरी बीमीरियों से मुक्त होने के मोह में सभी प्रेस कांफ्रेंस हॉल में जूते और चप्पल तक उतर कर बाबा के प्रवचन में मशगूल हो गए और भूल गए कि बाबा की पत्रकार वार्ता के बाद दूसरी पत्रकार वार्ता भी है।

हुआ कुछ यूं कि दो दिन पहले जब हम प्रेस क्लब गए तो देखा कि वहां पर प्रेस कांफ्रेंस हॉल के बाहर जूते-चप्पलों का अंबार लगा हुआ है। पूछने पर मालूम हुआ कि अंदर एक बाबा पत्रकार वार्ता ले रहे हैं। हमने सोचा यार ये ऐसे कौन से बाबा हैं जिनकी पत्रकार वार्ता में मंदिर की तरह जूते-चप्पल बाहर रखवा दिए गए हैं और हमारे पत्रकार मित्र, जो किसी की बात सुनने को तैयार नहीं रहते हैं अचानक उन बाबा के जादू में कैसे आ गए और जूते और चप्पल बाहर उताकर अंदर गए हैं। इसका राज जानने का प्रयास करने पर मालूम हुआ कि वे बाबा पत्रकारों को शराब छोडऩे के गुर बताने के साथ हर बीमारी से मुक्त होने का ज्ञान देने की बात कहकर अंदर ले गए थे और पत्रकार साथी भी ऐसे पढ़े-लिखे की उनके झांसे में आ गए और आधे घंटे की कांफ्रेंस में बैठ गए उनका प्रवचन सुनते हुए एक घंटे तक। उनको इस बात से भी मतलब नहीं था कि उनके बाद एक और प्रेस कांफ्रेंस है साथ ही प्रदेश के दो खिलाडिय़ों का सम्मान है। पत्रकारों को जैसे-जैसे करने के लिए कहा गया सब करते गए और हमारे पत्रकार मित्र इतने ज्ञानी हैं कि जब उनसे पूछा गया कि कैसा महसूस कर रहे हैं तो सभी को मजबूरी में कहना पड़ा था कि अच्छा महसूस कर रहे हैं। इन बाबा की एक सबसे बड़ी बात यह थी कि वे शराब छुड़ाने की बात कह रहे थे। ऐसे में शराब की लत से जकड़े हुए पत्रकारों को संभवत: लगा होगा कि चलो यार अच्छा मौका है शायद उनको इस लत से छुटकारा मिल जाए।

अब यहां हमें अपने पत्रकारों मित्रों की इस सोच पर तरास आ रहा था। अरे जो लोग अपने घर परिवार की बातों को मानकर शराब से किनारा नहीं कर सकते हैं वे भला किसी बाबा की बात से कैसे शराब से किनारा कर सकते हैं। घर में मां-बाप, भाई-बहन के साथ बीबी बच्चों के कहने के बाद भी तो लोग शराब नहीं छोड़ते हैं फिर किसी बाबा की क्या बिसात कि वे किसी को शराब छुड़वाने में सफल हो जाए। इंसान को अगर शराब जैसी किसी भी बुरी लत से किनारा करना है तो उसके लिए सबसे बड़ी जरूरत आत्म विश्वास की है। अगर आप में आत्मविश्वास है तो आप को दुनिया की कोई भी ताकत किसी भी बुरी सय से किनारा करने से नहीं रोक सकती है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि कम से कम हममें इतना आत्मविश्वास है। हम एक बार कोई बात ठान लेते हैं तो उसे करके रहते हैं। हम यहां पर बताना चाहेंगे कि हमें बचपन से चाय पीने की आदत नहीं थी। पर बीच में हमने चाय पीनी प्रारंभ की थी। कुछ साल तक चाय पीने के बाद जब हमें ऐसा लगने लगा कि हमें इससे बहुत ज्यादा नुकसान हो रहा है और जरूरत से ज्यादा चाय हो जाती है तो हमने उसे एक झटके में छोड़ दिया। हम अगर ऐसा करने में सफल हुए तो यह हमारे आत्म विश्वास का ही दम है जिसने हमसे ऐसा करवाया।

इस दुनिया में आत्मविश्वास से बड़ी कोई संजीवनी नहीं है। जिसके पास आत्मविश्वास की पूंजी है वही दुनिया का सबसे बड़ा धनी है और उसके आगे सारी बातें गौण हैं।

बहरहाल बाबा के प्रवचन का हमारे किसी पत्रकार मित्र को कोई फायदा होगा इसमें पूरा-पूरा संदेह है। इसके पीछे एक कारण यह भी है कि इन बाबा ने जो पर्चा प्रेस क्लब में दिया था उसमें एक बात यह भी लिखी हुई थी कि उनकी बताई बातों को अपनाने वाले उस व्यक्ति पर ही इसका असर होगा जिन पर भगवान की कृपा होगी। अगर भगवान की कृपा पर ही सब निर्भर है तो फिर बाबा की बातों का क्या मलतब है? भगवान की कृपा जिस पर होगी वह वैसे भी हर तरह के रोग से मुक्त हो जाएगा। यह बात भी इस बात का सबूत है कि किसी भी बाबा के बस में कुछ नहीं होता है, सब लोगों को बेवकूफ बनाने का काम करते हैं। अनपढ़ों की बातें ही छोड़ दें हमारे देश के नेता-मंत्री और पढ़े-लिखे लोगों के साथ पत्रकारों की कौम भी इनके झांसे में आ जाती है। कहते भी हैं कि जब तक इन दुनिया में बेवकूफ जिंदा हैं अक्लमंद कभी भूख नहीं मर सकते हैं। अपने देश के सारे बाबा वास्तव में अक्लमंद हैं जिनके आगे सभी बेवकूफ बन जाते हैं। एक बड़ी मिसाल सामने हैं। पता नहीं लोग कब ऐसे बाबाओं से किनारा करना सीखेंगे। भगवान ऐसे लोगों को सतबुद्धि दे, यही कामना करते हैं।

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मंगलवार, अगस्त 11, 2009

अखबारों में हिन्दी का भगवान ही मालिक

कुछ दिनों पहले किसी ब्लाग में एक अखबार की करतन के साथ यह पढऩे को मिला कि यह कैसी हिन्दी है। अखबार की जिस करतन को ब्लाग ने दिखाया था, उस छोटी सी करतन में इतनी गलतियां थीं कि सोचना पड़ता है कि वास्तव में हिन्दी के अखबार हिन्दी के साथ क्या कर रहे हैं। हमें जहां तक लगता है कि हिन्दी के साथ सबसे ज्यादा खिलवाड़ अगर आज कहीं हो रहा है तो वह अखबारों में हो रहा है। अखबारों की हिन्दी का भगवान ही मालिक है। हमको खुद अखबार में काम करते दो दशक से ज्यादा समय हो गया है, लेकिन इधर पिछले एक दशक में अखबारों में हिन्दी की ज्यादा ही दुर्गति हुई है कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

जिन अखबारों को हिन्दी का रखवाला होना चाहिए, आज वही अखबार हिन्दी के लिए घातक साबित हो रहे हैं। हिन्दी की सबसे ज्यादा दुर्दशा तो अखबारों में ही हो रही है। हम खुद दो दशक से ज्यादा समय से पत्रकारिता कर रहे हैं, पर हमने अपनी जिंदगी में बहुत कम ऐसे संपादक और पत्रकार देखें हैं जिनकी हिन्दी अच्छी हो। आज अखबारों का जिस तरह से व्यावसायिककरण हो गया है उसके चलते नए-नए पत्रकारिता के छात्रों को ही अखबार में रखा लिया जाता है। अखबार मालिकों को अखबार निकालने से मतलब है न की हिन्दी से। अखबार में व्याकरण का ध्यान ही नहीं रखा जाता है, मात्राओं को ही हिन्दी मान लिया गया है। जिसको मात्राओं का थोड़ा सा भी ज्ञान होता है, वही अपने को हिन्दी का ज्ञानी समझने लगता है।

आज हर अखबार में बहुत ज्यादा रद्दी तरीके से लिखे समाचार रोज मिल जाएंगे। हमारी नजरों में तो हिन्दी के साथ रोज अखबार वाले ही खिलवाड़ कर रहे हैं। एक ब्लागर मित्र के एक अखबार की करतन में यह बताने का प्रयास किया कि वास्तव में अखबार में किस तरह से गलत हिन्दी का प्रयोग हो रहा है। यह तो महज एक छोटा सा उदाहरण मात्र था। आज आप किसी भी बड़े से बड़े अखबार को उठाकर देखेंगे तो आपको उसको पढऩे में शर्म आएगी कि ये कैसी हिन्दी है। एक वह समय था जब लोग अपनी हिन्दी ठीक करने के लिए अखबार पढ़ते थे, लेकिन आज के आधुनिक जमाने में अगर आप यह सोचकर अखबार पढ़ेंगे कि आपकी हिन्दी सुधर जाएगी तो उल्टे आपकी हिन्दी बिगड़ जाएगी।

हमें अखबार में दो दशक से ज्यादा समय काम करते हो गया है लेकिन हमको इस बात को मानने में कताई शर्म और झिझक नहीं है कि अखबारों की हिन्दी का भगवान ही मालिक है। इसका कारण यह है कि आज जहां अच्छे हिन्दी के जानकर पत्रकारों की कमी है, वहीं जो जानकार हैं उनको मालिक इसलिए नहीं रखना चाहते हैं कि उनको कम वेतन वाले पत्रकार चाहिए। अब आप कम पैसे खर्च करेंगे तो आपको बाजार में माल भी वैसा ही मिलेगा। हमारे कहने का मतलब यह है कि किसी भी गुणवत्ता वाली चीज के लिए तो ज्यादा पैसे लगते ही हैं अगर आपको असली की बजाए नकली सामान से काम चलाना है तो नकली सामान तो नकली जैसा ही रहेगा। अब इसमें बेचारे उस अखबार को पढऩे वाले पाठक का क्या दोष जो असली पैसे देकर असली अखबार की चाह में अखबार खरीदता है, पर उसको असली अखबार तो मिल जाता है, पर उस अखबार में असली हिन्दी नहीं मिल पाती है। ऐसे में बेचारा पाठक क्या कर सकता है। आज हर अखबार की एक ही कहानी है। हर अखबार में हिन्दी के जानकारों का टोटा है। अब इसके लिए कुछ किया ही नहीं जा सकता है। एक बात और यह कि कई अखबारों में संपादकों के पदों पर भी कई ऐसे लोग विराजमान हैं जिनकी हिन्दी का भगवान मालिक है। ऐसे में वे संपादक अपने साथ काम करने वाले हिन्दी के जानकारों की हिन्दी को गलत साबित करके अपनी हिन्दी को सही कहते हुए उनको डांट पिला देते हैं। अब एक कहावत है कि बॉस इज आलवेज राइट। अब बॉस सही कह रहा है तो भी सही है और गलत कह रहा है तो भी सही है क्योंकि वो बॉस है और बॉस कभी गलत नहीं होता है। ऐसा हम नहीं अंग्रेजी की कहावत कहती है।

हमें याद है एक घटना जब हम कुछ साल पहले एक अखबार में काम करते थे तो एक हेडिंग को लेकर हमारी संपादक से बहस हो गई थी। वो गलत हेडिंग को सही बताने पर तुले थे, हमने विरोध किया तो वे कहने लगे कि मैं प्रधान संपादक से बात करवा देता हूं। तब हमने अंत में कह दिया था कि किसी से बात करवाने की जरूरत नहीं है जनाब वैसे भी कहा जाता है कि बॉस इज आलवेज राइट। आप इस अखबार के बॉस हैं तो आप जो कह रहे हैं वो सही है। आपका अखबार है आप जो चाहें हम वही लिख देते हैं, हमारा क्या है। यह एक घटना मात्र नहीं है। ऐसा हमारे साथ कई बार हुआ है, हमने कई बार संपादक से गलत-सही के लिए पंगा लिया। लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ। अंत में हमें भी यह सोचकर हथियार डालने पड़े कि जब अखबार के संपादक और मालिक को ही अपने अखबार में सही और गलत हिन्दी से मतलब नहीं है तो हम लगातार अपना सर खपाकर क्यों अपनी नौकरी का खतरा मोल लें। संभवत: हमारे जैसे न जाने कितने ऐसे पत्रकार होंगे जिनको इस तरह से समझौता करना पड़ता होगा।

हम जानते हैं कि अगर कोई भी पत्रकार अखबार में गलत और सही हिन्दी के चक्कर में पड़ता है और संपादक से कुछ कहता है तो अगर हिन्दी का जानकार और समझदार संपादक होगा तो बात जरूर सुन लेगा, लेकिन अगर कोई संपादक अपने को ही ज्ञानी समझने वाला होगा तो उस पत्रकार की सामत आ जाएगी और उसको बाहर का रास्ता भी देखना पड़ सकता है। ऐसे में सही जानकार पत्रकार हिन्दी की दुर्गति होते देखकर भी इसलिए कुछ नहीं कह और कर पाते हैं क्योंकि एक तो उनकी सुनने वाला कोई नहीं है और दूसरे उनको भी अपना घर चलाना है। अगर वे सही और गलत हिन्दी के पचड़े में पड़ेंगे तो उनकी नौकरी ही पचड़े में पड़ जाएगी। अब आप खुद ही तय कर लें कि ऐसे पत्रकार क्या कर सकते हैं। अखबारों में सही हिन्दी के जानकार कम अपने को डेढ़ होशियार समझने वाले पत्रकार और संपादक ज्यादा है जो ऊंचे पदों पर बैठे हैं। ऐसे में अखबारों की हिन्दी का तो भगवान ही मालिक होगा न। इसलिए मित्र इस पचड़े में पड़े ही नहीं कि अखबार में हिन्दी के साथ क्या हो रहा है। आज के अखबार महज हिन्दी फिल्म की तरह ही मनोरंजन का साधन रह गए हैं। इसको हिन्दी का ज्ञान लेने के लिए पढऩा सही नहीं है।

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मंगलवार, मई 05, 2009

अपना ही धंधा-मत करो गंदा

सुबह-सुबह मोबाइल की घंटी बजी... हमने जैसे ही मोबाइल उठाया उधर से प्यार भरी गालियों की बौछार शुरू हो गई। अबे गधे, नालायक, बेवकूफ और न जाने क्या-क्या। इन गालियों के साथ कहा गया कि तू कब सुधरेगा बे, तेरे को समझ में नहीं आता है क्या कि एक तेरे सच्चाई लिखने से कुछ होना जाना नहीं है। क्या पड़ी है तुझे ही राजा हरिशचन्द्र बनने की और वो एक ऐसी कौम के लिए जो खुद कौन सा दुध की धुली है। कम से कम तुमको अपने उस पेशे से तो खिलवाड़ करके उसको गंदा नहीं करना चाहिए जिसमें तुम भी काम करते हो।

ये सारी बातें हमसे हमारे एक मित्र जो कि हमारे बड़े भाई की तरह हैं, उन्होंने उस संदर्भ में कही जो पोस्ट हमने दो दिन पहले प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर लिखी थी। उन्होंने बताया कि आज ही वे बाहर से लौटे हैं और आते ही तेरा ब्लाग देखा तो मुझसे रहा नहीं गया और तुम्हें फोन लगा लिया। हमारे ये मित्र ऐसे हैं जिनकी बातों का हम चाहकर भी बुरा नहीं मान सकते हैं। कारण यह है कि हम उनका बहुत सम्मान करते हैं। बहरहाल उन्होंने हमें प्यार भरी गालियों के साथ बहुत सी नसीहतें भी दे डालीं कि क्या जरूरत है अखबार मालिकों को खराब कहने की जबकि तू भी जानता है कि तुम्हारी कौम यानी कि पत्रकार भी कैसे हैं। क्या आज के पत्रकार अपना काम पूरी ईमानदारी से करते हैं? तुम अगर ईमानदार हो तो इसका यह मतलब तो नहीं है कि सारे ही ईमानदार हैं? ऐसा ही अखबार मालिकों के साथ है क्या सारे अखबार मालिक ऐसे हैं जैसा कि तूने लिखा है? मैंने उनसे प्रतिवाद किया कि मैंने तो ऐसा कुछ नहीं लिखा है कि सारे मालिक ऐसे हैं। वैसे भी हम भी यह बात जानते हैं कि इस दुनिया में अच्छे और खराब लोग हैं उसी तरह से अखबारों में भी कुछ अच्छे मालिक हैं, लेकिन इसके बाद भी चूंकि वे पेशेवर हैं और उनको अखबार निकालना है तो उनको भी समझौता करना पड़ता है। हमारी इस बात पर उन्होंने कहा कि क्या तुम अपनी पत्रिका के लिए पेशेवर नहीं हो? क्या तुमने कभी समझौता नहीं किया है? हमने तपाक से जवाब दिया कि आप भी जानते हैं कि हम किसी ऐसी शर्त पर विज्ञापन लेने का काम नहीं करते हैं जिसमें हमें कहा जाए कि हमको सरकार या फिर किसी भी एक्स-वाई-जेड के खिलाफ कुछ नहीं लिखना है। आप जानते हैं भाई साहब ऐसे में हम पत्रिका निकालना बंद करना पसंद करेंगे।

ये तो रहीं हमारे एक परम मित्र और हमारे आदणीय भाई साहब की बातें जो हमें अपनी उस पोस्ट - कलम हो गई मालिकों की गुलाम-पत्रकार नहीं कर सकते मर्जी से काम - के संदर्भ में सुननी पड़ीं। वैसे इस पोस्ट को लेकर हमें हमारे संपादक ने भी कहा था कि जैसा हमने लिखा है वैसा हर अखबार मालिक नहीं होता है। संभवत: उनकी बातों में दम है, क्योंकि उनके पास हमसे ज्यादा अनुभव है। लेकिन हमने तो अपने वे विचार रखे थे जो हमने अपने पत्रकारिता जीवन में महसूस किए और झेले हैं। हो सकता है हमारे उन विचारों से हर कोई सहमत न हो और हमारे वे विचार छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के संदर्भ में ज्यादा ठीक बैठते हों। लेकिन हमको नहीं लगता है कि यहां से जुदा दूसरे राज्यों की पत्रकारिता हो सकती है। हमें तो फिर भी ऐसा लगता है कि दूसरे राज्यों की तुलना में अपने राज्य की पत्रकारिता काफी अच्छी है। यहां के पत्रकार और अखबार मालिक भी ठीक हैं। हमने जो लिखा है उसके पीछे सच्चाई है, लेकिन हम यह मानते हैं कि वास्तव में हर अखबार के मालिक ऐसे नहीं होते हैं। लेकिन क्या चंद अखबार मालिकों के सही होने से चौथा स्तंभ बचा रहेगा यह एक यक्ष प्रश्न है।

इधर हमारे एक ब्लाग बिरादरी के एक मित्र ने अपने ब्लाग में पत्रकारों के बारे में लिखा है कि पत्रकार आज खेमों में बंटे हुए हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि आज वास्तव में पत्रकार राजनैतिक पार्टियों में एक तो अपनी रूचि और दूसरे अपने फायदे के कारण बंटे हुए हैं। इस ब्लागर मित्र ने अपने ब्लाग में एक बड़ी सच्चाई यह भी लिखी है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया। यह एक कड़वी सच्चाई है कि वास्तव में सच्चाई लिखने वाले चाहे वे पत्रकार हों या फिर अखबार मालिक उनका हश्र अच्छा नहीं होता है। पत्रकारों को नौकरी से बाहर कर दिया जाता है तो अखबार मालिकों को सत्ता में बैठी सरकारें विज्ञापनों से वंचित कर देती हैं। लेकिन इसका यह मलतब तो कदापि नहीं है कि सच्चाई का दामन छोड़ दिया जाए।

हम अपने उन मित्र और परम आदरणीय भाई साहब की उस बात से इंकार नहीं करते हैं कि कम से कम हमें अपने उस पेशे को गंदा करने का काम नहीं करना चाहिए जिससे हम जुड़े हैं। लेकिन सोचने वाली बात यह कि हमारे पेशे के बारे में हमसे ज्यादा अच्छा कौन जानता है। फिर अगर हमारे पेशे की कोई दूसरा बुराई करेगा तो क्या हमको गुस्सा नहीं आएगा, भले हम अपने पेशे की सच्चाई जानते हों लेकिन जब हमें कोई दूसरा सच का आईना दिखाने की कोशिश करता है तो बुरा तो लगता है न। ऐसे में भलाई इसी में है कि खुद ही सच का आईना देखने का काम किया जाए और दूसरो को भी दिखाया जाए ताकि इस अपने कौम की कुछ तो लाज बची रहे और कोई यह न कहें कि देखों पत्रकार बिरादरी को कैसे दूसरे लोग लताड़ रहे हैं।

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रविवार, मई 03, 2009

कलम हो गई मालिकों की गुलाम-पत्रकार नहीं कर सकते मर्जी से काम

प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर विशेष:

आज प्रेस स्वतंत्रता दिवस है। यहां पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में प्रेस स्वतंत्र है? क्या वास्तव में प्रेस में काम करने वाले पत्रकारों की कलम ऐसा कुछ लिखने के लिए स्वतंत्र है जिससे समाज और देश का भला हो? इसके जवाब में यही बातें सामने आती हैं कि न तो आज प्रेस स्वतंत्र है और न ही पत्रकार की कलम। हकीकत यह है कि प्रेस जहां सरकार के हाथों में नाचने वाली कठपुतली हो गई है, वहीं पत्रकार की कलम मालिकों की गुलाम हो गई है। आज जहां कोई प्रेस यह दावा नहीं कर सकती है कि वह पूरी तरह से स्वतंत्र है और उसके अखबार में वही छपता है जो उसके पत्रकार लिखते हैं। आज कोई पत्रकार भी यह दावा नहीं कर सकता है कि वह जिस हकीकत को लिखते हैं उसको छापने का हक उनके पास है। अगर हकीकत यही है तो फिर काहे का प्रेस स्वतंत्रता दिवस।
आज प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर हम वो सब लिखने का साहस कर रहे हैं जो हम लिखना तो बरसों से चाह रहे थे, पर जानते थे कि हमारे लिखे को कोई छापने वाला नहीं है। लेकिन आज हमारे मन में बरसों से भरी आग को सबके सामने रखने के लिए हमारे पास एक ब्लाग है जिसमें लिखने के लिए हमें कम से कम किसी अखबार के मालिक या फिर मालिक के चहेते संपादक की मंजूरी की जरूरत नहीं है। हम पत्रकारिता से करीब 25 सालों से जुड़े हैं। 20 साल तो प्रेस में नौकरी करते हो गए हैं। इसके पहले के पांच साल ग्रामीण संवाददाता के रूप में काम किया। हमने जब लिखने के लिए कलम उठाई थी तब हम यही सोचकर पत्रकारिता में आए थे कि हम समाज और देश के लिए जो लिखेंगे वो छपेगा तो अपने समाज और देश का कुछ तो भला होगा। लेकिन हम तब नहीं जानते थे कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं कि तरह पत्रकारिता का काम भी वैसा ही है। हम जब काम करने लगे तो हमें धीरे-धीरे अहसास होने लगा कि पत्रकार नाम का जो प्राणी होता है वो दुनिया के लिए तो सबका संकटमोचक होता है, पर हकीकत में ऐसा है नहीं।

आप एक पत्रकार हैं तो आपसे आपका समाज और आपके नाते-रिश्तेदार और सभी परिचित यह उम्मीद करते हैं कि उनके साथ अगर कहीं कोई अन्याय या फिर किसी तरह की भी ज्यादती हो रही है तो आपकी कलम उसके खिलाफ जहर उगले और आप उनको न्याय दिलाने का काम करें। लेकिन क्या कोई पत्रकार ऐसा कर पाता है? यह सवाल किसी भी पत्रकार से पूछा जाए तो उसका जवाब देने में वह सोचने लगेगा। क्योंकि हकीकत यह है कि कोई भी पत्रकार ऐसा कुछ भी लिखने की हिम्मत नहीं कर सकता है जो उसके अखबार मालिक को पसंद न हो। पसंद न हो का मतलब क्या है उसको भी समझना होगा। आज अखबार पूरी तरह से पेशेवर हो गए हैं। अखबारों में वही खबरें प्रकाशित की जाती हैं जिससे अखबार मालिकों को फायदा नजर आता है। समाज के सरोकार से जुड़ी काफी कम खबरों को ही अखबारों में स्थान मिल पाता है। यह होती है मालिकों की पसंद। अगर कोई पत्रकार एक असहाय अबला के लिए कुछ लिखना चाहता है, या फिर किसी गरीब परिवार की दास्तान लिखना चाहता है तो उसको ऐसा लिखने नहीं दिया जाता है। इन सब बातों को छोड़ भी दिया जाए तो एक पत्रकार खुद के साथ हो रहे अन्याय के बारे में भी अगर लिखना चाहे तो उसे लिखने नहीं दिया जाता है।

ऐसा हमारे साथ भी कई बार हो चुका है। हमारा वैसे खेल पत्रकारिता से ज्यादा नाता रहा है। ऐसे में हमने अपने राज्य के साथ देश के खेल और खिलाडिय़ों के साथ होने वाले अन्याय के लिए आवाज उठाने के मकसद से ही अपनी एक खेल पत्रिका खेलगढ़ का प्रकाशन प्रारंभ किया है। हमारी इस पत्रिका में हम वही छापते हैं जिसके बारे में हमें लगता है कि इससे खेल और खिलाडिय़ों का भला होगा। हमारी इस पत्रिका पर हमारा ही अधिकार है ऐसे में हम अपनी मर्जी से अपनी कलम का उपयोग तो कर सकते हैं। सबसे पहले हमने ही महिला खिलाडिय़ों के साथ होने वाले यौन शोषण का मामला उठाने का काम किया है। ऐसे और कई मुद्दे हैं जो हमने उठाए हैं।

बहरहाल हम उस मुद्दे पर लौटे जिसकी बात कर रहे हैं। हमारे एक पत्रकार मित्र ने अपने अखबार के लिए एक गरीब सब्जी वाली का साक्षात्कार लिया और उसको बनाकर संपादक के टेबल पर रखा तो इसके जवाब में उस पत्रकार को यह कहा गया कि इस सब्जी वाली का साक्षात्कार छापने से अखबार का क्या भला होगा। अगर साक्षात्कार छापना है तो किसी बड़े उद्योगपति के बच्चे का लेकर आओ जिसके छपने से कम से कम उस उद्योगपति का विज्ञापन तो मिलेगा। यह महज एक उदाहरण है। ऐसे अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं। वास्तव में देखा जाए तो आज अखबारों को चलाने का काम सरकारें कर रहीं हैं। सरकार के खिलाफ खबरें छाप कर आप अखबार निकाल ही नहीं सकते हैं। सरकार से जो विज्ञापन मिलते हैं उसी से अखबार का खर्च चलता है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि अगर सरकारी विज्ञापन न मिलें तो अखबार छपे ही नहीं। लेकिन इसका यह मतलब तो कदापि नहीं है न कि अखबार पूरी तरह से सरकार के गुलाम हों जाएं जैसा की आज हो गया है। किसी भी पत्रकार में इतना दम नहीं है कि वह किसी मंत्री के खिलाफ कुछ लिखने की हिम्मत करे। कुछ अखबारों में ऐसी खबरें अगर छपती हैं तो इसके पीछे का कारण भी सब जानते हैं कि उस अखबार को उस मंत्री ने उसके मन मुताबिक विज्ञापन नहीं दिया होगा। इधर खबर छपी नहीं कि उधर मंत्री जी पहुंच गए अखबार के मालिक के दरबार में सजदा करने के लिए। सजदा करने के साथ वहां पर दान पेटी में अपनी इच्छा के अनुसार नहीं बल्कि अखबार मालिक की इच्छा के अनुसार चढ़ावा भी चढ़ाना पड़ा।

एक वह समय था जब अखबारों को देश का चौथा स्तंभ कहा जाता था। वैसे कहा तो आज भी अखबार को चौथा स्तंभ जाता है, पर यह स्तंभ अब हिल चुका है और यह नेताओं, मंत्रियों और उद्योगपतियों के सहारे के बिना खड़े नहीं रह सकता है। अगर ये अपने हाथ खींच लें को चौथा स्तंभ इतना ज्यादा जर-जर हो चुका है कि उसको गिरने में एक पल का भी समय नहीं लगेगा। ऐसे में जबकि देश के इस चौथे स्तंभ के हाल से हर आम आदमी परिचित हो चुका है और आज सब यह जानते हैं कि अखबार कैसे चल रहे हैं तो फिर ऐसे में प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाने का कोई मतलब रह जाता है क्या? हमारी नजर में तो इसका कोई मतलब नहीं है। इस दिवस पर जो आयोजन होंगे उन आयोजनों में भी किसी वरिष्ठ पत्रकार को नहीं बल्कि किसी बड़े मंत्री या नेता को बुलाया जाएगा जो वही पुराना राग अलापेगे कि अखबार देश का चौथा स्तंभ है यह सरकार बना भी सकता है और सरकार गिरा भी सकता है। मगर क्या ऐसा आज के जमाने में होना संभव है कि एक अखबार सरकार बना दे। ऐसा करने का दम हमें तो किसी भी अखबार में नजर नहीं आता है। लिखने को तो और बहुत कुछ है। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर धाराप्रवाह लिखा जा सकता है, लेकिन ज्यादा लंबा लिखने से हमारी ब्लाग बिरादरी के भाई ही बोर हो जाते हैं। इसलिए फिलहाल इतना ही फिर आगे मौका मिला और ब्लाग बिरादरी के मित्रों ने चाहा तो जरूर और लिखा जाएगा। लिखने के लिए बहुत से किस्से हैं जिनको आगे जरूर लिखा जाएगा।

ब्लाग बिरादरी के मित्रों के विचार हम इस बारे में जरूर जानना चाहेगे। तो आप अपने विचारों से हमें जरूर अवगत कराएं। आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

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