राजनीति के साथ हर विषय पर लेख पढने को मिलेंगे....

राजीव गांधी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजीव गांधी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, जुलाई 25, 2009

नेताओं को सुरक्षा क्या मौत से बचा लेगी?

अपने देश के नेताओं को आम जनता से कोई लेना-देना नहीं है। उनको तो बस अपनी सुरक्षा की पड़ी है। अरे भाई ऐसा काम ही क्यों करते हो कि इतने दुश्मन हो गए हैं आपके कि आपको कदम-कदम पर सुरक्षा की जरूरत पड़ती है। जिसे देखो उसे जेड़ प्लस सुरक्षा की दरकार लगती है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या सुरक्षा इस बात की गारंटी है कि नेताजी की मौत नहीं होगी? जब देश के पूर्व प्रधानमत्रियों श्रीमती इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को भी सुरक्षा मौत से नहीं बचा सकी, तो फिर कैसे बाकी लोग अपनी किस्मत में लिखी मौत से बच सकते हैं। जब मौत आनी है तो आएगी ही, तो फिर क्यों देश की जनता के धन का दुरुपयोग नेताओं की सुरक्षा में किया जाए। इनकी सुरक्षा के एवज में तो जनता को लाठियां भी खानी पड़ती हैं। लगता है कि अपने देश के नेताओं को सुरक्षा के लिए अगर जनता से भिक्षा भी मंगवानी पड़ी तो वे बाज नहीं आएंगे। वैसे भी नेताओं के सामने जनता की औकात भिखारियों से ज्यादा कुछ नहीं है। जिनको हम लोग जनप्रतिनिधि बनाकर मंत्री की कुर्सी पर बिठाते हैं उनके पास ही हमारी समस्याओं के लिए समय नहीं रहता है। तो ऐसे में जनता भिखारी हुई कि नहीं जो मंत्रियों के दरबार में जाकर अपने छोटे से काम के लिए फरियाद करती है और मंत्री जी खुश हुए तो भीख में दे देते हैं, काम करवाने का आश्वासन। ये महज आश्वासन की भीख ही होती है, काम की गारंटी की नहीं।

देश की सबसे बड़ी संसद में नेताओं की सुरक्षा के मामले में सरकार के हारने की खबर के बाद एक बार फिर से नेताओं की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़ा हो गया कि आखिर नेताओं को इतनी ज्यादा सुरक्षा की जरूरत क्यों पड़ती है? क्यों नहीं सारे नेताओं की सुरक्षा को हटा दिया जाता है। क्या किसी को आज तक सुरक्षा मौत से बचा सकी है। क्या देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों श्रीमती इंदिरा गांधी
और
राजीव गांधी को सुरक्षा नहीं दी गई थी। लेकिन उनकी मौत हो गई। किस तरह से इंदिरा गांधी को उनके ही सुरक्षा सैनिकों से मार गिराया था, यह बात सब जानते हैं। इसी तरह से राजीव गांधी का क्या हाल हुआ था, बताने की जरूरत नहीं है। तो जब सुरक्षा मौत से बचने की गारंटी है ही नहीं तो फिर क्यों देश की जनता के खून -पसीने की कमाई को मुफ्त में ऐसे नेताओं की सुरक्षा में बर्बाद किया जाता है, जिन नेताओं को अपने स्वार्थ के आगे कुछ नहीं दिखता है। क्या नेताओं ने कभी भी जनता की उन परेशानियों की तरफ ध्यान दिया है जो परेशानिया उनकी सुरक्षा को लेकर होती हैं। जब भी कोई वीआईपी किसी भी शहर में जाता है तो वहां की जनता उनकी सुरक्षा को लेकर किए जाने वाले इंतजाम से किस तरह से परेशान रहती है, बताने की जरूरत नहीं है।


एक तरफ नेताओं की सुरक्षा को लेकर आमजन परेशान रहते हैं तो दूसरी तरफ आमजनों की किसी भी परेशानी से नेताओं को कोई मतलब नहीं रहता है। अगर आपके शहर, कालोनी में कोई भी परेशानी है तो नेताजी को इसके लिए समय ही नहीं है। हाल ही में राजधानी की एक कालोनी में आवास मंत्री राजेश मूणत एक भवन का उद्घाटन करने गए थे, तो वहां पर कालोनी की महिलाएं उनके सामने अपनी समस्याएं लेकर पहुंचीं, तो मंत्री जी के पास उनकी समस्याएं सुनने के लिए समय ही नहीं था। लगातार अनुरोध के बाद भी जब मंत्री जी कालोनी का मुआयना करने के लिए तैयार नहीं हुए तो वहां पर उपस्थित एक लड़की को बहुत ज्यादा गुस्सा आ गया और वह भिड़ गर्इं मंत्री के साथ। मंत्री को उस लड़की ने इतनी ज्यादा खरी-खोटी सुनाई कि मंत्री भी पानी-पानी हो गए। मंत्री को उस लड़की ने यहां तक कह दिया कि आपके पास फीता काटने के लिए समय है, पर कालोनी की समस्याओं को देखने के लिए समय नहीं है।

वास्तव में यह शर्मनाक है कि जिन मंत्री को जनता वोट देकर इस लायक बनाती है कि वह मंत्री की कुर्सी पर बैठ सकें, वही मंत्री कुर्सी पाने के बाद उसी जनता की समस्याओं से ही नहीं बल्कि उनसे भी किनारा कर लेते हैं। दाद देनी होगी उस लड़की की हिम्मत की जिसने बिना यह सोचे राजेश मूणत जैसे मंत्री से भिडऩे का काम किया कि उनके चंगु-मंगु उस लड़की का कुछ भी कर सकते हैं। जब उस लड़की ने मंत्री को झाड़ा तो वहां पर उपस्थित मंत्री की चमची एक महिला ने लड़की को चुप करवाने की बहुत कोशिश की, पर वाह रे लड़की उसने किसी की बात नहीं सुनी। जिस लड़की ने मंत्री तक को फटकार दिया, उस लड़की का कालोनी वालों ने साथ नहीं दिया और यह कहने लगे कि तुम्हारी वजह से देखना अब कालोनी का काम नहीं होगा। लेकिन हुआ इसके उल्टा दूसरे दिन ही कालोनी का नालियां की सफाई होने लगी। आज वास्तव में ऐसी ही साहसी लड़कियों की जरूरत है जो राजेश मूणत जैसे हर मंत्री को सबक सिखाने का काम कर सकें।

जब तक नेता और मंत्रियों को जनता सबक सिखाने का काम नहीं करेगी, ये लोग अपने को जनता का अन्नदाता समझने की भूल करते रहेंगे। क्यों नहीं इनकी सुरक्षा वापस लेने के लिए आंदोलन किए जाते हैं? क्यों नहीं इनकी सुरक्षा को लेकर होने वाली परेशानियों को लेकर मोर्चा निकाला जाता है? अगर हम लोग आज भी नहीं सुधरे तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब नेताओं की सुरक्षा के लिए जनता को भीख मांगनी पड़ जाए। बहुत हो गई नेता और मंत्रियों की गुलामी अब इससे आजाद होने के लिए एक अलख जगाने की जरूरत है। संसद में नेता सुरक्षा को लेकर सरकार को घेरते हैं और अपनी सरकार भी ऐसे है कि उनके सामने झूक जाती है। अब सरकार को तो झूकना ही है क्योंकि सरकार में भी तो ऐसे ही स्वार्थी मंत्री भरे पड़े हैं। न जाने अपने इस देश का क्या होगा।

Read more...

सोमवार, अप्रैल 27, 2009

राजीव गांधी के हत्यारे की एक खबर से निपटे आठ पुलिस वाले

लिब्रेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम यानी लिट्टे का अध्याय अब समाप्ति की ओर वाला एक लेख हमें अभी कल ही एक अखबार में पढऩे को मिला। इसी के साथ लिट्टे को लेकर लगातार खबरें आ रही हैं कि अब उसका अंत निकट है। इस एक अच्छी खबर ने ही अचानक हमारे मानसपटल पर अपनी एक उस खबर की याद दिला दी जिस खबर के कारण आठ लापरवाह पुलिस वाले निलंबित किए गए थे। हुआ कुछ यूं था कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों में शामिल काने शिवरासन के रायपुर से गुजरने की खबर को रेलवे पुलिस वालों ने गंभीरता से लिया और इस खबर को हमने प्रमुखता से प्रकाशित किया जिसके कारण वो सारे आठ पुलिस वाले निलंबित कर दिए गए जो इस मामले को गंभीरता से न लेने के दोषी थे।

बात आज से करीब डेढ़ दशक से पहले की है। यह वह समय था जब देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की लिट्टे ग्रुप के सदस्यों ने हत्या कर दी थी। इस हत्या में शामिल एक आरोपी काना शिवरासन था। इस आरोपी के बारे में उस समय देश के हर राज्य के हर शहर की पुलिस को यह सूचना दी गई थी कि शिवरासन से मिलती-जुलती शक्ल के आदमी को गिरफ्तार किया जाए। शिवरासन के उस समय कम से कम एक दर्जन ऐसे कैरीकेचर जारी किए गए थे जिस शक्ल में वह हो सकता था। ऐसे में ही रायपुर जीआरपी को बिलासपुर से यह सूचना मिली थी कि अहमदाबाद एक्सप्रेस में शिवरासन से मिलती-जुलती शक्ल का एक आदमी देखा गया है उसकी जांच की जाए। उन दिनों हम रायपुर के समाचार पत्र दैनिक अमृत संदेश में सिटी रिपोर्टर के रूप में काम करते थे और रेलवे का बीट हमारे जिम्मे था। अपने रूटीन के मुताबिक जब शाम को रेलवे स्टेशन गए तो हमारे वहां पहुंचने से कुछ समय पहले ही अहमदाबाद एक्सप्रेस प्लेटफार्म से रवाना हुई थी।

हम स्टेशन के अंदर जैसे ही घुसे तो हमें जीआरपी के जवान मिले जिन्होंने हमें कहा , क्या भईया कुछ समय पहले आते तो देखते यहां से काना शिवरासन गया। हमने उनसे जब पूरा किस्सा पूछा तो उन्होंने बताया कि बिलासपुर से खबर आई थी कि अहमदाबाद में शिवरासन जैसा एक आदमी देखा गया है। हमने उनसे पूछा कि आप लोगों ने क्या किया तो उन्होंने बताया कि भाई साहब अब हम क्या करते, हम लोगों ने जब उस डिब्बे में देखा तो एक आदमी शिवरासन जैसा लग तो रहा था, पर हम लोगों की हिम्मत उससे कुछ पूछने की इसलिए नहीं हुई क्योंकि हमको मालूम था कि शिवरासन के पास ताबीज की शक्ल में साइनाइट है अगर वह खा लेता तो हमारा क्या होता। उनसे जब पूछा गया कि क्या इस मामले की खबर आलाअफसरों को दी गई तो उन्होंने बताया कि किसी को खबर नहीं की गई और एक एएसआई के साथ सात सिपाहियों ने डिब्बे में जाकर देखा था। उनकी इस बात पर हमें काफी गुस्सा आया कि देश के प्रधानमंत्री के हत्यारे का मामला है और उसको भी पुलिस वालों ने गंभीरता से नहीं लिया और किसी आला अफसर को सूचना देना भी जरूरी नहीं समझा।

बहरहाल वह खबर लेकर हम प्रेस आ गए और अपने सिटी चीफ को इस बात की जानकारी देते हुए खबर बना दी। खबर के लिए जब रेलवे पुलिस अधीक्षक से संपर्क किया गया तो उन्होंने इस तरह की किसी भी जानकारी से इंकार किया और बाद में जानकारी देने की बात कही। जब उनको मामले की गंभीरता को बताया गया तो उन्होंने कई घंटों बाद रात के 12 बजे के बाद इस बात की जानकारी दी कि बिलासपुर से ऐसी सूचना तो आई थी इस मामले में जीआरपी ने क्या किया है इसकी जानकारी कल देंगे। उनका पक्ष लेकर खबर प्रकाशित करने के लिए भेजी गई। यहां पर हमने एक काम यह किया कि यह खबर और किसी अखबार को न मिल सके इसके लिए हमने संपादक से आग्रह करके खबर को पहले संस्करण में न छापने को कहा। होता यह है कि दूसरे अखबार वाले हर अखबार का बस्तर का संस्करण मंगवा लेते हैं ताकि देख सकें कि कोई महत्वपूर्ण खबर छूटी तो नहीं है। उस दिन बस्तर संस्करण के बाद के संस्करणों में खबर लगने के कारण दूसरे अखबारों को इस खबर की भनक भी नहीं लगी। दूसरे दिन खबर के छपते ही हंगामा मच गया। राजीव गांधी के हत्यारे के रायपुर से गुजरने की खबर काफी बड़ी थी।

इस खबर के कारण जहां दूसरे अखबार के सिटी रिर्पोटरों की क्लास लगी, वहीं रेलवे एसपी को अंतत: उन सभी आठ पुलिस वालों को निलंबित करना पड़ा। इन सबके निलंबन की जानकारी भी रेलवे एसपी ने सिर्फ हमें दी। इस खबर के बाद भी दूसरे अखबार के सिटी रिर्पोटरों की खूब खींचाई हुई। आज भी जब हमारे कुछ जूनियर साथी रेलवे में रिपोर्टिंग करने जाते हैं तो पुराने पुलिस वाले जहां हमारे बारे में पूछते हैं, वहीं उनको पुलिस वाले ही बताते हैं कि कैसे एक खबर में आठ पुलिस वाले निलंबित हुए थे। हमारे जूनियर जब हमसे आकर उस खबर के बारे में पूछते हैं तो हम उनको बताते हैं। इसी के साथ हमें इस बात पर गर्व होता है कि हमारी एक खबर को आज भी लोग बरसो बाद याद करते हैं और जब जूनियरों को इस खबर के बारे में मालूम होता है तो वो जानने को उत्सुक हो जाते हैं कि आखिर वह खबर क्या थी। वैसे भी पत्रकारों के जीवन में काफी कम ऐसे अवसर आते हैं जब उनकी खबरों को बरसों याद किया जाता है। आज उस बात को इतने साल हो गए, लेकिन इसके बाद भी हमें उस खबर की एक-एक बात याद है। हम उस खबर को भूल भी कैसे सकते हैं यह खबर तो हमारे पत्रकारिता जीवन की यादगारों खबरों में से सबसे अहम खबर है। वास्तव में अगर लिट्टे का अंत हो जाता है तो इससे बड़ी खबर पूरे विश्व के लिए कोई और नहीं हो सकती है।

Read more...
Related Posts with Thumbnails

ब्लाग चर्चा

मेरी ब्लॉग सूची

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP