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गुरुवार, जून 18, 2009

हे भगवान उन्हें माफ कर देना...

अरे छोड़ों न यार मैं किसी भगवान-वगवान को नहीं मानता, ये सब फालतू की बातें हैं। न जाने लोग एक पत्थर की मूर्ति में क्या देखते हैं जो उसको पूजने लगते हैं। ऐसा कहने वाले नास्तिकों की इस दुनिया में कमी नहीं हैं। लेकिन इस दुनिया में ऐसे नास्तिक कम और आस्तिक ज्यादा हैं। इस दुनिया को चलाने वाली कोई न कोई शक्ति तो है जिसके कारण इस दुनिया का वजूद है। अब इस शक्ति को आप भगवान कहें अल्ला कहें, गॉड कहें या फिर चाहे आप जो नाम दे दें। लेकिन ऐसी कोई शक्ति है इस बात से इंकार तो नहीं किया जा सकता है। चंद लोगों के न मानने से क्या होगा। हम तो नास्तिकों के लिए यह दुआ करते हैं कि भगवान उनको अक्ल दें और वे आस्तिक बन जाएं। अगर ऐसे लोग आस्तिक नहीं बनते हैं तो हम तो बस यही कह सकते हैं कि हे भगवान उन्हें माफ कर देना। वैसे ईसु मसीह ने भी एक ऐसा ही वाक्य कहा था कि हे ईश्वर उन्हें माफ कर देना क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। यही बात नास्तिकों पर भी लागू होती है। अब जबकि इस दुनिया में देवीय शक्ति है तो ऐसे में कहा जाता है कि शैतानी शक्ति भी है। यहां पर भी दो बातें हैं जिस तरह से लोग भगवान को नहीं मानते उसी तरह से शैतानी शक्ति को भी नहीं मानते हैं।

आज नास्तिक और आस्तिक की चर्चा यूं ही नहीं निकली है। अपने एक ब्लागर मित्र जाकिर अली रजनीश ने तस्लीम में एक लड़की लता के साथ हो रहे हादसों के उल्लेख के बाद उसमें हमने अपने एक टिप्पणी दी थी, कि इस दुनिया में जिस तरह से देवीय शक्ति है, उसी तरह से शैतानी शक्तियों से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसी के साथ एक और साथी ब्लागर अनिल पुसदकर ने भी एक टिप्पणी में बताया था कि कैसे उनकी बहन की ठीक होली के दिन ही तबीयत खराब होती थी। इसका कारण उन्होंने एक इमली के पेड़ की टहनियों को काटकर होली जलाना बताया था। यह सिलसिला कई साल तक ठीक होली के दिन ही होता रहा। उन्होंने बताया था कि काफी इलाज के बाद जब वह ठीक नहीं हो सकीं तो एक झाड़ फूंक करने वाले संत का सहारा लिया गया था। हमारी और अनिल जी की इन टिप्पणियों के बाद एक ब्लागर मित्र प्रकाश गोविंद की लंबी चौड़ी टिप्पणी आई कि जिसका सीधा सा मतलब यह है कि हम जैसे लोग अंधविश्वास फैलाने का काम कर रहे हैं। हमारा मकसद किसी भी तरह का अंधविश्वास फैलाना नहीं है। अंधविश्वास को रोकना हम पत्रकारों का काम हमेशा से रहा है। लेकिन किसी के साथ होने वाली अजीब घटनाओं से कैसे इंकार किया जा सकता है। इस दुनिया में न जाने ऐसे कितने उदाहरण होंगे जिससे यह साबित हुआ है कि कहीं न कहीं कुछ है जिसके कारण इंसान को परेशानी होती है। ऐसी कोई शक्ति तो है जो इंसान के साथ गलत करती है। ऐसे में इंसान ठीक उसी तरह से जिस तरह से भगवान को मानता है किसी शैतानी शक्ति को भी मानने के लिए मजबूर हो जाता है। ऐसे में उस इंसान को इस दुनिया को बनाने वाले भगवान की शरण में जाना पड़ता है।

कहते हैं कि भगवान अपने चाहने वालों के संकट हरने के लिए इसी दुनिया में अपने बंदे को किसी न किसी रूप में भेजते हैं। तो ऐसे कई सच्चे साधु-संत हैं जो लोगों का कष्ट हरने का काम करते हैं। यहां पर भी दो बाते होती हैं जब अच्छे साधु-संत हैं तो बुरे भी हैं। ऐसे बुरे लोगों से जरूर सबको बचाने का काम करना चाहिए। जो इंसान परेशान होता है उसको किसी का भी सहारा मिल जाए तो वह अपने को धन्य समझता है। ऐसे में ही ठगी करने वाले लोग किसी भी इंसान की मजबूरी का फायदा उठाने का काम करते हैं। ऐसे ठगों से ही लोगों को बचाने का काम किया जाए तो वह सच्चा पुन्य है। ऐसे किसी काम में हम क्या कोई भी साथ देने को तैयार रहता है। हमें इस बात से इंकार नहीं है कि झाड़-फूंक और भूत-प्रेत भगाने के नाम पर ज्यादातर मामलों में लोग ठगे जाते हैं। इसका कारण यह है कि इस दुनिया में जहां सच्चे साधु-संतों की कमी है, वहीं इस बात को कोई नहीं जानता है कि जिनकी शरण में वे गए हैं वो सच्चे हैं या फिर ठग। जब इंसान परेशानियों से घिरा होता है तो उसको हर उस इंसान में भगवान नजर आता है जो उसकी किसी न किसी तरह से मदद करता है। अब ऐसे में किसी के साथ विश्वास का फायदा उठाकर कोई ठगता है को क्या किया जा सकता है।
हमारे मित्र गोविंद जी तो भगवान के अस्तित्व को भी नहीं मानते हैं। यह उनकी गलती नहीं है। ऐसे लोगों की इस दुनिया में कमी नहीं है जो भगवान को नहीं मानते हैं। लेकिन किसी के मानने न मानने से क्या होता है। जब कोई देवीय शक्ति को ही नहीं मानता है जिसके कारण आज सारे संसार का अस्तित्व है तो फिर यह अपने आप में स्पष्ट बात है कि वह शैतानी शक्ति को कैसे मान सकता है। दुनिया के वैज्ञानिकों ने काफी कोशिश की कि वे देख सकें कि आखिर इंसान के मरने के बाद उसकी आत्मा जाती कहां है, पर सफलता नहीं मिली। अगर सफलता मिल जाती तो उस न देखी हुई देवीय शक्ति को कौन मानता और वैज्ञानिक भगवान हो जाते। अगर किसी में दम है तो फिर इंसान की मौत को रोककर बताए, समय को रोक कर बताए, फिर कहे कि इस दुनिया में भगवान नाम की चीज नहीं होती है। क्या किसी ने आज तक हवा को देखा है, फिर क्यों मानते हैं कि हवा है। जिस तरह से वेद-पुराणों में देवताओं की बातें मिलती हैं, उसी तरह से राक्षसों की बातें भी हैं। हर चीज के दो पहलू होते ही हैं सिक्के का एक पहलू और ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है। फिर ये कैसे संभव है कि दुनिया में जहां देवीय शक्ति हैं, वहां उसके विपरीत शैतानी शक्ति न हो। कोई माने न माने सच को बदला नहीं जा सकता है।

जिस तरह से लोग देवीय शक्ति को नहीं मानते हैं उसी तरह से शैतानी शक्ति को भी नहीं मानते हैं। मत मानो न यार किसने कहा है कि आप मानो, लेकिन किसी और को क्यों कहते हैं कि यह गलत है। यहां पर सवाल एक अनिल पुसदकर का या किसी लता का नहीं है। दुनिया में काफी कुछ ऐसा घटता है जिससे इंकार नहीं किया जा सकता है। कई बार ऐसा हुआ है कि जो लोग ऐसी बातें नहीं मानते हैं, उनके साथ हादसे हो जाते हैं। फिर उनको भी मानना पड़ता है कि कुछ तो है। अगर किसी के साथ होने वाले अजीब हादसे बीमारी हैं तो फिर ऐसी बीमारी का इलाज डॉक्टर क्यों नहीं कर पाते हैं? इसका जवाब किसके पास है। डॉक्टर एक लाइन में जवाब दे देते हैं कि समझ में नहीं आ रहा है कि क्या बीमारी है। जहां पर विज्ञान की सरदह का अंत होता है वहीं से प्रारंभ होता देवीय शक्ति का दरवाजा। इंसान सब तरफ से थक हार कर अंत में भगवान की शरण में ही जाता है। फिर कैसे आप भगवान के होने से इंकार कर सकते हैं। आप भले भगवान को न मानें लेकिन आपके ऐसा करने से इस दुनिया को बनाने वाले को कोई फर्क पडऩे वाला नहीं है। भगवान ने वैसे भी किसी को बाध्य नहीं किया है कि कोई उन्हे माने। यह तो अपनी-अपनी श्रद्धा का सवाल है। वैसे भी कहा जाता है कि मानो तो देवता न मानो तो पत्थर। हम कौन होते हैं किसी नास्तिक को आस्तिक बनाने वाले। लेकिन हम तो कम से कम भगवान को जरूर मानते हैं और मानते रहेंगे।

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