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गुरुवार, दिसंबर 31, 2009

डॉक्टर कर न पाएं दर्द का इलाज-तो जाने पिछले जन्म का राज

आपको शरीर में किसी खास स्थान पर लगातार दर्द है और डॉक्टरों के चक्कर काट-काट कर परेशान हो गए हैं। किसी भी डॉक्टर को यह बात समझ ही नहीं आ रही है कि आपके दर्द का कारण क्या है। ऐसे में चिंता की बात नहीं है आप भी पहुंच जाएं अपने एनडीटीवी वालों के पास और खुलवा ले राज अपने पिछले जन्म का। यकीन मानिए वे जरूर उस दर्द का आपके पिछले जन्म से रिश्ता निकाल कर दिखाएंगे। लेकिन इस बात की गारंटी नहीं रहेगी कि आपका दर्द समाप्त हो जाएगा।


वास्तव में अपने ये टीवी वाले पगला गए हैं लगता है जो पूरे देश भर में एक ऐसा अंध विश्वास फैलाने का काम कर रहे हैं जिससे बच पाना पढ़े लिखे लोगों के लिए भी संभव नजर नहीं आता है। एनडीटीवी के कार्यक्रम राज पिछले जन्म का में ज्यादातर पढ़े-लिखे लोग ही जा रहे हैं और वे भी इस टीवी कार्यक्रम के मोह में फंस कर अंधविश्वासी होते जा रहे हैं। हम कल के कार्यक्रम की बात करें तो पंजाबी फिल्मों की एक कलाकार मन्नत सिंह पहुंचीं थीं इस कार्यक्रम में इस वजह से की उनकी पीठ में लगातार पिछले 20 सालों से दर्द रहता है और कोई भी डॉक्टर न तो इसका कारण मालूम कर सका है और न ही इस दर्द से उनको निजात दिला सका है।


अब ऐसे में राज पिछले जन्म की डॉक्टर तृप्ति जैन ले जाती हैं मन्नत सिंह को अपने जादू के उस उडऩ खटोले पर जिस पर वह लोगों को लिटाकर पिछले जन्म की सैर करवाती हैं। चलिए हम लोग भी देखें कि इस सैर से क्या बात सामने आती हैं।


मन्नत सिंह को पिछले जन्म में ले जाकर दिखाया गया है कि वह लाहौर में एक मुस्लिम लड़की के रूप में जन्म लेती हैं, जहां उनका एक प्रेमी सुल्तान है। वहां पर 1947 के भारत-पाकिस्तान के दंगे दिखाए जाते हैं जिनसे घबराकर मन्नत सिंह जिनका पिछले जन्म में यास्मीन नाम रहता है अपने प्रेमी सुल्तान के साथ भागती हैं और जंगल में पहुंच जाती हैं, यहां पर उनके पीछे पाकिस्तानी सैनिक पड़ जाते हैं, इन सैनिकों में से एक का नाम वह मो। अली बताती हैं। ये सैनिक उनको और उनके प्रेमी को पहले तो पीठ में संगीन लगी बंदूकों से मारते हैं फिर यास्मीन को पीठ और सुल्तान के पेट में गोल मार देते हैं।


इस सारे वाक्ये को बताने के दरमियान डॉ। जैन यास्मीन से यह भी जान लेती हैं कि यास्मीन रावलपिंडी में महाराजा रणजीत सिंह और महारानी जिंदा की समाधि पर जाती हैं। जब दंगे होते हैं तब वह एक उर्दू अखबार देखती हैं जिसमें 1947 का साल लिखा है और इस अखबार में पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर रहती हैं। इसी के साथ यास्मीन यह भी बताती हैं कि पूर्व जन्म में उनका जो प्रेमी रहता है वह इस जन्म में उनका दोस्त दक्ष है। जब मन्नत सिंह वापस अपने इस जन्म में लौटकर आती हैं तो उनके साथ आए उनके मित्र दक्ष भी यह कहते हैं कि उनको भी पेट में ठीक वहीं पर दर्द होता है जहां पर गोली लगी थी।


मान गए एनडीटीवी वालों को अब लगता है कि उनकी अक्ल काम करने लगी है, तभी तो अब वे ऐसे स्थानों को दिखाने का काम कर रहे हैं जिन स्थानों के बारे में लोग जानते हैं। सभी को मालूम है कि रावलपिंडी में राजा रणजीत सिंह और महारानी जिंदा की समाधि है। इस समाधि में इस जन्म में भी जाने की बात मन्नत सिंह ने की है। वह यह भी कहती हैं कि उनका मुस्लिम धर्म से जरूर कोई रिश्ता रहा है तभी तो उन्होंने अपना नाम सुखविंदर कौर से बदल कर मन्नत सिंह रख लिया है।


मात्र किसी स्थान के बारे में और उन दंगों के बारे दिखाने से क्या होगा जिनके बारे में सब जानते हैं। इन टीवी वालों की बातों पर महज इतने से कैसे यकीन किया जा सकता है। क्या ये टीवी वाले ऐसा कोई सबूत किसी भी एक पिछले जन्म के राज वाले का पेश कर सकेंगे जिनका राज इन्होंने खुलवाया है। क्या टीवी वाले मन्नत सिंह के उस दक्ष को उसी उडऩ खटोले में सुलाने की हिम्मत दिखा सकते हैं जिस पर मन्नत को सुलाया गया था। अगर नहीं तो फिर बेवकूफ बनाना बंद किया जाए दर्शकों को।

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बुधवार, दिसंबर 30, 2009

11 माह में 905 पोस्ट

ब्लाग जगत में हमें अभी एक साल नहीं हुआ है, लेकिन यह 2009 का वह साल बस जाने ही वाला है जिस साल में हमने ब्लाग बिरादरी में कदम रखा था। यहां हमने फरवरी में खेलगढ़ के साथ राजतंत्र के माध्यम से कदम रखा था। हमने अपने 11 माह के ब्लागर जीवन में अब तक अपने दोनों ब्लागों में 905 पोस्ट लिखी है। हमें ब्लाग बिरादरी का ऐसा प्यार मिला है जिसकी कल्पना हमने नहीं की थी।

2009 का साल एक दिन बाद चला जाएगा। ऐसे में हमने सोचा कि इस साल का अपना लेखा-जोखा ब्लाग बिरादरी से साझा कर लिया जाए। हमने ब्लाग जगत में फरवरी में खेलगढ़ के माध्यम से कदम रखा था। इस माह में हमने खेलगढ़ के लिए 57 पोस्ट लिखी। अपना दूसरा ब्लाग राजतंत्र हमने प्रारंभ तो फरवरी में ही कर लिया था, पर इस माह इसमें हम महज तीन पोस्ट ही लिख सके। अगले माह मार्च में जहां खेलगढ़ में हमने 45 पोस्ट लिखी, वहीं राजतंत्र में मात्र 8 पोस्ट ही लिख सके। राजतंत्र ने रफ्तार पकडऩे का काम अप्रैल में तब किया जब हमें चाणक्य को यूनीकोड में बदलने का तरीका मिला। इसके बाद हमने राजतंत्र में जो लिखना प्रारंभ किया तो अब तक लिख रहे हैं। हमें खेलगढ़ से ज्यादा इस ब्लाग में प्यार मिला है। राजतंत्र में हमने अब तक 325 पोस्ट लिखी है। इन पोस्टों को जहां 26470 पाठक मिले हैं, वहीं इन पोस्टों पर 3228 टिप्पणियां मिली हैं। इसी के साथ हमारा यह ब्लाग चिट्ठा जगत की रेटिंग में आज की तारीख में 41वें स्थान पर है। हमारे इस ब्लाग की 138 पोस्ट की चर्चा दूसरे ब्लागों में हमारे ब्लागर मित्रों ने की है।

अब जहां तक खेलगढ़ का सवाल है तो हमने इस ब्लाग में अब तक सबसे ज्यादा 580 पोस्ट लिखी है। इस ब्लाग में हमें अब तक पांच हजार पाठक भी नहीं मिले हैं, टिप्पणियां 147 मिली हैं। इसका चिट्ठा जगत की वरीयता में 195वां स्थान है।

बहरहाल हम ब्लाग जगत से जुड़कर काफी खुश हैं कि चलो हमें इसके माध्यम से कई मित्र बनाने का मौका मिला है। इन मित्रों की बातें फिर करेंगे। फिलहाल इतना ही। हम अपने उन सभी ब्लागर मित्रों के साथ पाठकों के तहे दिल से आभारी हैं जिन्होंने हमारे ब्लाग के लिए अपना कीमती समय दिया है और अपान प्यार तथा स्नेह बरसाया है।

अंत में सभी ब्लागर मित्रों और पाठकों को आने वाले नए साल की शुभकामनाएं और प्यार भरी बधाई

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मंगलवार, दिसंबर 29, 2009

गुस्सा आए तो जाने राज पिछले जन्म का

एक महिला राह में जा रही है, उसको लोग गंदी नजरों से देख रहे हैं, उसको बहुत गुस्सा आ रहा है। यह कोई नई बात नहीं है, अपने देश में हर दूसरी महिला के साथ ऐसा होता है। लेकिन क्या ऐसा होने का मतलब यह है कि आपके साथ जरूर पिछले जन्म में ऐसा कुछ हुआ है जिसकी वजह से आपको गुस्सा आता है। अगर यह सच है तो जरूर हर दूसरी महिला के साथ पिछले जन्म में ऐसी कोई घटना हुई होगी जिसका लावा इस जन्म में फूट रहा है। दरअसल ऐसा होता नहीं है। लेकिन इसका क्या किया जाए कि अपने एनडीटीवी वालों को यही लगता है कि अगर किसी महिला को पुरुषों की नजरें देखकर ही गुस्सा आता है तो इसका मतलब यह है कि उस महिला के साथ पिछले जन्म में जरूर कुछ घटा है। इसी को प्रमाणित करने के लिए लगता है उन्होंने टीवी कलाकार संभावना सेठ के पिछले जन्म का राज खोलने का काम किया, जिनको बहुत ज्यादा गुस्सा आता है। यही नहीं टीवी वालों ने यह भी साबित कर दिया है कि अगर आप इस जन्म में हिन्दु हैं तो पिछले जन्म में मुसलमान या फिर किसी और धर्म के भी हो सकते हैं।

एनडीटीवी के बकवास कार्यक्रम में राज पिछले जन्म का में कल के एपीसोड में संभावना सेठ को बुलाया गया था। वह अपने पिछले जन्म का राज यह सोचकर जानने आई थीं कि उनको कोई पुरुष गलत नजरों से देखता है तो उनको बहुत ज्यादा गुस्सा क्यों आता है। अपने टीवी वालों को तो एक बकवास विषय चाहिए। इसमें कोई दो मत नहीं है कि ज्यादातर पुरुषों की गंदी नजरों का सामना हर दूसरी महिला को करना पड़ता है तो क्या इसका यह मतलब है कि हर दूसरी महिला पहुंच जाए एनडीटीवी वालों के दरबार में।

बहरहाल संभावना सेठ को जब डॉक्टर तृत्ति जैन उनके पिछले जन्म में ले गईं तो यह राज खोला गया कि वह पिछले जन्म में एक 18 साल की मुसलमान लड़की थीं, जिसकी एक 15 साल की बहन की बीमारी के कारण मौत हो जाती है क्योंकि इलाज कराने के लिए पैसे नहीं रहते हैं। यह तस्नीम नामक लड़की अपने मां और मामा के साथ रहती है, मामा उस पर गलत नीयत रखता है। वह अपने दोस्तों को भी घर लेकर आता है जो तस्नीम को पसंद नहीं है। तस्नीम एक जाकिर नाम के लड़के से प्यार करती हैं, वह अपने मामा की हरकतों के बारे में उसको बताती हैं और उसके साथ रहना चाहती हैं, पर जाकिर नहीं मानता तो तस्नीम कुछ देर के लिए कहीं चली जाती हैं, फिर वापस आती है तो जाकिर उसे उसके घर छोडऩे जाता है तो उसके मामा पहले जाकिर की पिटाई करते हैं, फिर उसके साथ जबरदस्ती करते हंै। उसके साथ बलात्कार हुआ या नहीं इसका खुलासा नहीं किया गया है।

यहां पर डॉक्टर जैन उनसे पूछती हैं कि तुम्हारे साथ कुछ क्या हो रहा है, क्या कुछ गलत हो रहा है, क्या तुम इसके बारे में कुछ बताना चाहती हो, तो अवचेतना में पड़ी संभावना सेठ का जवाब आता है कि वह कुछ बताना नहीं चाहती है। क्या यह संभव है कि अवचेतना में पड़े इंसान को इस बात का ज्ञान हो कि क्या सही है और क्या गलत कि वह यह सोचने लगे कि इसको बताना ठीक है या नहीं है।
तस्नीम के साथ उसका मामा संभवत: बलात्कार करने के बाद उसके भागने पर उसकी गला काटकर हत्या कर देता है। संभावना वापस चेतना में आने पर बताती है कि शायद यही वजह है कि मैं किसी की गलत नजरों को बर्दाश्त नहीं कर पाती हूं। वह बताती हैं कि उनको लगता था कि उनका मुस्लिम कौम से कोई गहरा नाता है, क्योंकि उनको मुस्लिम परिवेश अच्छा लगता है। किसी को मुस्लिम या फिर हिन्दु परिवेश अच्छा लगने का यह मतलब कतई नहीं होता है कि वह पिछले जन्म में उस कौम में पैदा हुआ था।

डॉक्टर जैन का यह तर्क बचकाना लगता है कि पिछले जन्म में उसके साथ जो कुछ हुआ था उसी का यह परिणाम है कि वह किसी पुरुष की गंदी नजरों को बर्दाश्त नहीं कर पाती है। तो क्या जिनके साथ ऐसा कुछ नहीं हुए रहता है वो पुरुषों की गंदी नजरों को बर्दाश्त कर लेती हैं।

इस दुनिया में ऐसी कौन सी महिला होगी जिनको किसी पुरुष की गंदी नजरों का सामना करने पर गुस्सा नहीं आता होगा। तो क्या हर वह महिला ऐसे ही किसे हादसे का शिकार हुई होंगी पिछले जन्म में। चलिए एनडीटीवी वालों के पास भेजा जाए ऐसी सारी महिलाओं को जिनको गुस्सा आता है, फिर देखें क्या राज खुलता है उनके पिछले जन्म। टीआरपी की भूख में ये टीवी वाले लोगों की आस्था के साथ भी खिलवाड़ करने लगे हैं। इस कार्यक्रम ने तो धर्मगंरथों में लिखी बातों को भी गलत साबित करने का काम किया है। ये तो सीधे एक जन्म के बाद सीधे दूसरे जन्म होने की बात करते हैं, क्या ऐसा संभव है? अब तक किसी कार्यक्रम में किसी के पिछले जन्म का प्रमाणित करने का काम नहीं किया गया है। क्या ये टीवी वाले किसी के पिछले जन्म के रिश्तेदारों को लाने का साहस दिखा सकते हैं। अगर उनके कार्यक्रम में सच्चाई है तो किसी के पिछले जन्म के रिश्तेदारों को भी खोजकर सामने लाया जाए।

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सोमवार, दिसंबर 28, 2009

हमारी सहपाठी बन गई मेयर-अब दिखाएंगी अपना डेयर

जीत के बाद किरणमयी नायक भाजपा के पूर्व मेयर सुनील सोनी के साथ



कल सुबह से प्रारंभ हुई वोटों की गिनती ने अंतत: देर रात को यह अच्छी खबर दे ही दी कि हमारी सहपाठी किरणमयी नायक मेयर का चुनाव जीत गई हैं। उनकी इस जीत से जहां राजधानी की जनता खुश है कि चलो एक अच्छी मेयर मिली है, वहीं प्रदेश की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के उन मंत्रियों और नेताओं की नींद उड़ गई है जो गोरखधंधा करते हैं। अब इसमें कोई दो मत नहीं है कि मेयर मैडम अपना डेयर दिखाएंगी और राजधानी से जरूर उन भूमाफियाओं को साफ कर देगीं जिनके कारण राजधानीवासी परेशान रहते हैं। हमारे लिए जहां एक खुशी की खबर यह रही है कि हमारी सहपाठी मेयर बन गई हैं, वहीं इस खुशी में उस समय और इजाफा हो गया जब दूसरी खबर यह आई कि हमारी भाभी कविता ग्वालानी पार्षद का चुनाव कांग्रेस की टिकट से जीत गई हैं।



23 दिसंबर को नगरीय निकाय के लिए हुए मतदान की गिनती जब 27 दिसंबर को सुबह 8 बजे से प्रारंभ हुई तो पहले चरण से ही सभी की जुबान पर एक ही नाम था किरणमयी नायक का और देर रात अंत में उन्होंने जीत का परचम लहरा कर राजधानी की पहली महिला मेयर होने का इतिहास रच दिया। उनकी जीतने की उम्मीद तो सबको पहले से थी पर एक शंका यह जरूर थी कि सत्ता में बैठी भाजपा के वे मंत्री और नेता कभी नहीं चाहेंगे कि मेयर का पद कांग्रेस की एक ऐसी नेत्री के हाथ लगे जो उनके लिए किसी पद में न रहते हुए भी हमेशा सिरदर्द रही है। किरणमयी ने एक अच्छी वकील होने के नाते हमेशा जनता का साथ दिया है।



ऐसे में सत्ता के लाल इस बात को भली भांती जानते थे कि अगर राजधानी में नई किरण आ गई तो उनकी खैर नहीं। उनकी हर संभव कोशिश को नाकाम करते हुए किरणमणी जनता के लिए एक नई किरण बनकर सामने आ गई हैं। अब जनता को इस बात का पूरा भरोसा है कि उनकी अगुवाई में जहां राजधानी का विकास होगा, वहीं गरीबों के साथ न्याय होगा और वह जरूर उन भूमाफियाओं को समाप्त करने का काम करेगी जो सत्ता के दमदार मंत्रियों के संरक्षण में लगातार पनप रहे हैं। इन मंत्रियों की शह पर ही राजधानी की न जाने कितनी जमीनों को भूमाफिया हड़प गए हैं। अब इनकी खैर नहीं कहा जाए तो गलत नहीं होगा। देखना है कि अब अपनी मेयर ऐसा डेयर दिखाने का काम कब से प्रारंभ करती हैं।

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शनिवार, दिसंबर 26, 2009

इस महिला की हिम्मत की दाद दें या....

हम सुबह-शाम जब भी प्रेस जाते हैं तो राजधानी रायपुर के लाखेनगर चौक के पास एक महिला के परिवार को देखते हैं। यह महिला बिंदास होकर घरेलू गैस की कालाबाजारी करती हैं और अपने पूरे परिवार का पेट भरती हैं। इस महिला में जो साहस है इस तरह की कालाबाजारी करने का उसको लेकर हम काफी समय से यही सोच रहे हैं कि इस महिला की हिम्मत की दाद देनी चाहिए या फिर उसके गलत काम करने के लिए उसको
धिक्कारना
चाहिए। हमें कुछ समझ नहीं आता है।


जब भी रास्ते में जाते हुए इस महिला के घर पर नजरें पड़ती हैं तो हम कई बार यह सोचते हैं कि यार इस जमाने में जब कई महिलाओं को पापी पेट की खातिर अपना जिस्म तक बेचना पड़ता है, ऐसे में अगर यह महिला अपने साहस के दम पर कोई ऐसा काम रही है जिसमें कम से कम उसको अपने जिस्म से समझौता नहीं कर पड़ रहा है तो लगता है कि महिला कुछ ग़लत नहीं कर रही है। आज के जमाने में काम करने वाली कितनी महिलाएं सुरक्षित हैं, हर तरफ उनको नोंचने के लिए बहशी बैठे हुए हैं, जो मौके की तलाश में रहते हैं कि कब किसका शोषण करने का मौका मिल जाए। ऐसे में यह महिला कम से कम कालाबाजारी करके अपने और अपने परिवार की लड़कियों को ऐसे बहशियों से तो बचाने में सफल रही हैं।

इस महिला के खिलाफ एक बार नहीं कई बार केस बन चुका है, पर फिर से इस महिला का परिवार यही काम करने लगता है। वैसे कालाबाजारी का काम करना आसान नहीं होता है, आज जबकि इस काम को करने में वक्त पडऩे पर बड़े-बड़े शूरमा घबरा जाते हैं तो एक महिला खुले आम मुख्य मार्ग पर अपने घर के सामने ऐसा काम कर रही है तो उसमें दम तो जरूर होगा।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि महिला कालाबाजारी करने का जो काम कर रही है, उसके पीछे उसके घर चलाने की ही मजबूरी है। वरना गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार ऐसा काम करने की हिम्मत नहीं दिखाता है। हम ब्लाग बिरादरी के मित्रों से जानना चाहते हैं कि महिला के इस काम को ठीक समझा जाए या गलत।

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शुक्रवार, दिसंबर 25, 2009

दो दशक बाद किया बस का सफर

बस के अंदर से खींची गई सड़क की एक तस्वीर

हमें कल बस का सफर करने का मौका मिल गया। यह सफर वास्तव में सुहाना रहा। हमें बस में सफर करने का मौका करीब दो दशक बाद मिला था। वैसे बस में जाना कमोवेश हम पसंद नहीं करते हैं, जहां जाते हैं अपनी मोटर सायकल या फिर कार में जाते हैं। हमें जब राजधानी के नए अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम में रिपोर्टिंग करने जाना था तो क्रिकेट संघ ने कहा कि हम वाहन भिजवा देंगे ताकि सारे पत्रकार आ सके। हम वहां जाना तो अपने ही वाहन से चाहते थे, लेकिन पत्रकार मित्रों के आग्रह पर हमने साथ जाने मंजूर किया। जब यह वाहन आया तो यह कोई कार नहीं बल्कि एक बस थी जिसमें हम लोग करीब एक दर्जन पत्रकार और फोटोग्राफर मस्ती करते हुए स्टेडियम गए और वापस आए। इस सफर ने कॉलेज के दिनों की याद ताज कर दी।

हम जब नए स्टेडियम जाने के लिए प्रेस क्लब पहुंचे तो हमें मालूम नहीं था कि हमें किस वाहन से स्टेडियम जाना है, हम पहुंचे तो सभी पत्रकार मित्र पहुंच गए थे। ऐसे में हमने प्रदेश क्रिकेट संघ के उपाध्यक्ष राजय सिंह परिहार को फोन लगाया कि भाई साहब सारे पत्रकार प्रेस क्लब पहुंच गए हैं आपका वाहन कहां है? उन्होंने बताया कि महेन्द्रा की एक बस जिसका नंबर 0713 है, वहीं पास में खड़ी है। हम सभी लोग बस में सवार हो गए और चल दिए स्टेडियम की तरफ। हमने अपने पत्रकार मित्रों को बताया कि यार आज हमें करीब 20 साल बाद बस में सफर करने का मौका मिला है। हम बता दें कि हमें चाहे जितनी भी दूर जाना होता है हम अपनी मोटर सायकल या फिर कार से जाते हैं। हम रायपुर से करीब 300 किलो मीटर दूर जगदलपुर और करीब इतनी ही दूर कोरबा के साथ कई बार 300 से 500 किलो मीटर तक का सफर अपनी मोटर सायकल से कर चुके हैं। हमें ज्यादातर अपने वाहन और साधन में जाना पसंद है। इसके पीछे दो कारण हैं, एक तो किसी का अहसान नहीं रहेगा कि हम उनके वाहन में गए थे, दूसरे यह कि हम अगर किसी और के वाहन में जाते हैं तो हमें उनके हिसाब से वापस आना पड़ता है। अपने पत्रकारिता के दो दशक से ज्यादा के जीवन में महज एक बार जनसंपर्क के वाहन का उपयोग तब किया था, जब कोरबा में करीब पांच साल पहले भारत और पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटरों का एक मैच हुआ था। वैसे जनसंपर्क के वाहन का उपयोग करना हर पत्रकार अपना जन्म सिद्ध अधिकार सममझता है, पर कम से कम हमें यह बात पसंद नहीं है।

हमारा रायपुर से नए स्टेडियम तक का करीब 50 किलो मीटर का आने-जाने का सफर बहुत सुहाना रहा। हम लोग जिस तरह से मस्ती करते हुए गए और आए उसने कॉलेज के दिनों की याद ताजा कर दी। हमारे एक फोटोग्राफर मित्र दीपक पांडे ने किस तरह से कंडेक्टर बनकर मस्ती की इसका किस्सा हम बात में बताएंगे।

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गुरुवार, दिसंबर 24, 2009

रास्ते में मौत का सामान

सड़क के बीच में किस तरह से लोग मौत का सामान लेकर चलते हैं इसका नमूना कई बार देखने को मिलता है। हम राजधानी रायपुर ने जब नई राजधानी के अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम में मैच की रिपोर्टिंग करने जा रहे थे, तो रास्ते में ऐसा ही एक नजारा देखने को मिला, जिसे हमने अपने कैमरे में बस में बैठे-बैठे ही कैद कर लिया। इस लंबे चौड़े मौत के सामान वाले ट्रक के कारण काफी समय रास्ता जाम रहा।

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बुधवार, दिसंबर 23, 2009

राज पिछले जन्म का-दर्शक बेवकूफ जन्म-जन्म का


लगता है कि अपने टीवी वालों को दर्शक जन्म-जन्म के बेवकूफ ही नजर आते हैं, तभी तो एनडीटीवी इम्जेजिंग में दिखाए जाने वाले एक बहुत ही ज्यादा बकवास और वाहियात सीरियल राज पिछले जन्म का में कुछ भी दिखाया जा रहा है। सेलिना जेटली के एक नहीं बल्कि दो-दो जन्मों का राज खोल दिया गया। वास्तव में इस कार्यक्रम को देखने के बाद तो कम से कम हमें यही लगा कि टीवी चैनल वाले दर्शको को बेवकूफ से ज्यादा कुछ नहीं समझते हैं।

इन दिनों एनडी टीवी पर एक कार्यक्रम बड़े जोरशोर से चल रहा राज पिछले जन्म का। इस कार्यक्रम को संभवत: बड़ा वर्ग देख रहा है। अब यह वर्ग इस कार्यक्रम के बारे में क्या सोचता है, यह तो वही जाने, पर हमारे एक मित्र को यह कार्यक्रम बड़ा पसंद है। वे अपना काम छोड़कर इसको देखने के लिए दौड़े-दौड़े घर पहुंच जाते हैं। उनके खास आग्रह पर हमने इस कार्यक्रम की कुछ कडिय़ों को देखा है। हमें तो यह कार्यक्रम पूरी तरह से वाहियात और बकवास लगा। इसमें ऐसी-ऐसी बातों का खुलासा किया जाता है,जो संभव नहीं लगती है। इस कार्यक्रम के पीछे इन टीवी चैनल वालों का मकसद क्या है, वही जाने, लेकिन इस कार्यक्रम से लगता है कि अंध विश्वास में जरूर इजाफा हो जाएगा। वैसे भी अपने देश में अंधविश्वास पर विश्वास करने वालों की कमी नहीं है। हम अगर २१ दिसंबर को दिखाए गए सेलिना जेटली के कार्यक्रम पर नजरें डालें तो मालूम होता है कि वास्तव में यह कितना बड़ा फर्जी कार्यक्रम है।

सेलिना को एक जन्म में जर्मन का सैनिक बताया जाता है जो १९४२ के विश्व युद्ध में मारा जाता। इसके बाद फिर से उसका जन्म अमरीका में महिला के रूप में होता है। इसमें बताया गया है कि वह १९७४ में २८ साल की रहती है। यानी १९४२ में मौत के ६ साल बाद ही उनका दूसरा जन्म हो गया। इसके बाद अब यानी वह इस समय भी करीब उतने ही साल की होंगी। यानी फिर से १९७४ में मौत के करीब ६ साल बाद उनका तीसरा जन्म हो गया। सोचने वाली बात यह है कि क्या यह संभव है?

सेलिना से सवाल करने वाली कोई डॉक्टर जैन उनसे ऐेसे सवाल करती हैं मानो वह उस स्थान पर पहले से रही हो और उनको पिछला सारा घटनाक्रम मालूम हो। एक बात और यह भी खटकी कि सेलिना पिछले एक जन्म में जर्मन थीं, वहीं दूसरे जन्म में वह अमरीकन थीं। उनसे डॉक्टर जैन सवाल तो हिन्दी में पूछ रही थीं, पर वह जवाब अंग्रेजी में दे रही थीं। जब सेलिना अपने पिछले जन्मों में थीं तो उनको हिन्दी कैस समझ आ रही थी, अगर उनको हिन्दी समझ आ रही थी तो जवाब हिन्दी में क्यों नहीं दिए गए।


बहुत सारे सवाल ऐसे हैं जो इस बात को साबित करते हैं कि यह कार्यक्रम पूरी तरह से बकवास है। कुछ समय पहले हमने किसी ब्लागर मित्र के ब्लाग में इस कार्यक्रम के बारे में बहुत अच्छी जानकारी पढ़ी थी उन्होंने बताया था कि वास्तव में यह कार्यक्रम कैसे बकवास है। जब इंसान की मौत के बाद हिन्दु धर्म में इंसान को जला दिया जाता है और इंसान के साथ उसका दिमाग भी जलकर राख हो जाता है तो उस जन्म की यादें कैसे उसके अगले जन्म में बाकी रह जाती हैं। इसी के साथ हिन्द धर्म में ६४ हजार यौनियों का उल्लेख मिलता है। कैसे कोई इंसान मरने के ६-६ साल के अंतराल में जन्म ले सकता है। ऐसे बकवास कार्यक्रमों का तो बहिष्कार होना चाहिए। हमें तो कुछ लिखना था इसलिए हमने अपने एक मित्र के आग्रह पर यह कार्यक्रम देखने की गलती की है, लेकिन आप लोग ऐसी गलती मत करना।

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मंगलवार, दिसंबर 22, 2009

लखपति ही लड़ सकते हैं पार्षद चुनाव

अगर आप वास्तव में ईमानदार हैं और समाज की सेवा करना चाहते हैं। इसके लिए आपने पहले कदम पर अपने वार्ड की समस्याओं से आम जनों को मुक्ति दिलाने का मन बनाया है और आप वार्ड के पार्षद का ही चुनाव लडऩा चाहते हैं, तो सबसे पहले यह तय कर लें कि आपकी अंटी में लाखों रुपए हैं या नहीं। पार्षद चुनाव लडऩा किसी आम आदमी के बस की बात नहीं है। भले आपके मन में जनसेवा करने की सच्ची लगन है, लेकिन आपके पास दमड़ी नहीं है तो भूल जाइये कि आप चुनाव लड़ सकते हैं। अगर आप चुनाव लडऩे के लिए मैदान में आ भी गए तो यह तय है कि आपको मीडिया के गिद्ध इस बुरी तरह से नोंचने के लिए पहुंच जाएंगे कि आप यह सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि यार मैंने किस मनहूस घड़ी में चुनाव लडऩे का मन बनाया था।

अपने राज्य में नगरीय चुनाव हो रहे हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के 70 वार्डों में भी चुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस पार्टी के साथ कई निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में हैं। जो भी प्रत्याशी मैदान में हैं, वे इस बात को लेकर बहुत ज्यादा परेशान हंै कि क्यों कर वे चुनाव लड़ रहे हैं। चुनाव लडऩे वालों में से शायद ही कोई ऐसा होगा जो जनसेवा की भावना से चुनाव मैदान में होगा। हर कोई वार्ड पार्षद का चुनाव जीतकर अपना भला करने की मानसिकता से ही चुनाव मैदान में है। अब उसका भला तो तब होगा जब वह मैदान मार लेगा। लेकिन इनके मैदान मारने से पहले अपने मीडिया वाले जरूर अपना मैदान मारने को तैयार रहते हैं। रायपुर से इतने ज्यादा अखबार निकलते हैं कि अगर कोई प्रत्याशी हर अखबार को थोड़ा-थोड़ा सा ही नजराना देने के बारे में सोचे तो बजट एक लाख से ज्यादा हो जाएगा। लेकिन किसी के अपने मुताबिक सोचने से भी कुछ नहीं होना है। बड़े अखबारों के पार्षद चुनाव के लिए पैकेज सुनकर ही आदमी को चक्कर आने लगता है।

रायपुर के कुछ बड़े अखबारों का पैकेज एक पार्षद के लिए 50 हजार से कम नहीं था। जब बड़े अखबारों का पैकेज इतना है तो फिर भला छोटे अखबार कैसे कम हो सकते हैं। छोटे से छोटा अखबार वाला हर पार्षद प्रतिनिधि के पास पहुंच गया अपना पैकेज लेने। किसी का भी पैकेज 10 हजार से कम नहीं दिख रहा था। ऐसे में अगर कोई पार्षद 10 छोटे अखबारों को ही अपना भाग्यविधाता बनाने का मन बनाता है तो उसकी अंटी में प्रिंट मीडिया के लिए ही कम से एक एक लाख होने चाहिए। इलेक्ट्रानिक मीडिया का पैकेज इससे अलग है। इलेक्ट्रानिक मीडिया का हाल भी वैसा ही है। यहां भी चैनलों की बाढ़ है। चैनल वाले भला अखबार वालों से कम पैकेज में कैसे मान सकते है, उनका पैकेज तो और ज्यादा रहता है। कुल मिलाकर आज पार्षद का चुनाव भी आम आदमी लडऩे के बारे में नहीं सोच सकता है।

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सोमवार, दिसंबर 21, 2009

मेयर का चुनाव लड़ रही है हमारी सहपाठी



छत्तीसगढ़ में इन दिनों नगरीय निकाय चुनावों की बयार बह रही है। पहले चरण का मतदान भी आज होने वाला है। दूसरे चरण का मतदान 23 दिसंबर को होगा। इसी दिन रायपुर के मेयर का भी फैसला होगा। रायपुर के कांग्रेस ने मेयर पद का प्रत्याशी जिन श्रीमती किरण नायक को बनाया है, वह हमारे साथ कुसुम ताई दाबके लॉ कॉलेज में पढ़ीं हैं। यह बात हमें पिछले साल तक मालूम भी नहीं थी यह बात एक पत्रवार्ता के समय खुद श्रीमती नायक ने बताई थी।

पिछले साल जब हम एक दिन प्रेस क्लब गए थे तो वहां से एक पत्रकार वार्ता के बाद श्रीमती किरण नायक निकलीं और प्रेस क्लब के बाहर खड़े होकर बात कर रही थीं, उनके साथ हमारे कॉलेज के एक मित्र संजय चोपड़ा भी खड़े थे, हमने उनको मजाक में कहा कि क्यों बे भईया यानी हमें पहचानता नहीं है क्या? उन्होंने कहा कि नहीं राजू भईया ऐसी बात नहीं है। तभी किरणमणी ने हमसे पूछा कि इनको कैसे जानते हैं, हमने बताया कि हम लोग साथ में पढ़े हैं, तब उन्होंने कहा कि जब आप कुसुम ताई दाबके में पढ़े हैं तो मुझे कैसे नहीं जानते हैं? हमने कहा कि हम तो आपका नहीं जानते हैं, तब उन्होंने ही बताया कि वह भी हमारे साथ पढ़ीं हैं।

वास्तव में हमें इसके पहले मालूम ही नहीं था कि किरणमणी नायक जैसी अधिवक्ता हमारे साथ कभी पढ़ीं थी जिनका इनता नाम है अपने राज्य में। संभवत: हम उनको इसलिए भी नहीं पहचान सके क्योंकि एक तो कॉलेज में हमने कभी किसी लड़की से खुद से बात नहीं की, दूसरे यह कि हम कॉलेज काफी कम जाते थे। इसके पीछे कारण यह था कि हम जब कॉलेज जाते थे तो हमारे सवालों से प्रोफेसर परेशान हो जाते थे, कहते थे कि यार तुम तो क्लास में आया मत करो।

किरणमयी एक अच्छी वकील हैं। उन्होंने ही रायपुर के मेयर तरूण चटर्जी के खिलाफ हाई कोर्ट में एक मामला दर्ज कराया था, जब वे महापौर के साथ प्रदेश सरकार में मंत्री थे। उन्होंने जन हित से जुड़े कई मुद्दों पर मुकदमें लड़ हैं। ऐेसी प्रत्याशी को कांग्रेस ने मैदान में उतार कर प्रदेश की भाजपा सरकार की परेशानी बढ़ाई है। अब यह बात अलग है कि वह जीतती हैं या हारती हैं।

किरणमणी की छबि पर अगर मतदाता मुहर लगाने की मानसिकता बनाएंगे तो जरूर वह जीत जाएंगी, लेकिन मतदाताओं को अगर यह लगा कि प्रदेश में भाजपा की सरकार है और कांग्रेस की मेयर बनने से विकास बाधित हो सकता है तो जरूर किरणमणी हार सकती हैं। अब यह तो मतदान के बाद होने वाली मतगणना से मालूम होगा कि क्या होता है।

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रविवार, दिसंबर 20, 2009

चोरी की मया



छत्तीसगढ़ी फिल्म मया को लेकर छत्तीसगढ़ का फिल्म जगत काफी उत्साहित था कि लंबे समय बाद एक ऐसी फिल्म आई है जो छत्तीसगढ़ फिल्म जगत को आक्सीजन देने का काम कर सकती है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि यह फिल्म काफी अच्छी है, और १०० से ज्यादा दिनों तक राजधानी रायपुर में चली। लेकिन अब यह बात सामने आई है कि इस फिल्म की कहानी दो दशक पहले ही हिट फिल्म स्वर्ग से सुंदर से ली गई है। बात इतनी ही नहीं है हिन्दी फिल्म स्वर्ग से सुंदर बनाने वाली कंपनी ने तो मया फिल्म बनाने वालों पर पांच करोड़ का दावा भी ठोंक दिया है। ऐसे में अब छत्तीसगढ़ी फिल्मों का क्या हश्र होगा समझा जा सकता है। इस फिल्म को निर्देशित करने वाले वही सतीश जैन हैं जो लंबे समय तक मायानगरी मुंबई में रहे हैं।

आज से करीब चार माह पहले जब छत्तीसगढ़ी फिल्म मया आई थी तो किसी ने नहीं सोचा था कि इस फिल्म को लेकर इतना बड़ा बवाल मच सकता है। पहले कदम पर जब इस फिल्म ने सफलता के झंडे गाड़े तो लगा कि वास्तव में सतीश जैन ऐसे फिल्मकार हंै जिनकी फिल्म वास्तव में सफल फिल्म होती है। इस फिल्म ने जब १०० दिनों का सफर तय किया तो सभी तरह फिल्म के निर्देशक सतीश जैन की वाह-वाही होने लगी। इसी के साथ फिल्मों के कलाकार भी सातवें आसमान में उडऩे लगे। इस फिल्म की सफलता से लगा कि यह फिल्म संकट के दौर में चल रहे छत्तीसगढ़ी फिल्म जगत के लिए आक्सीजन का काम करेगी। इस फिल्म के बाद छत्तीसगढ़ी में फिल्में बनने की बाढ़ सी आ गई।

लेकिन अब इधर एक ताजा खबर यह है कि मया पर भी चोरी का आरोप लग गया है। फिल्म के बनाने वालों पर मायानगरी की एक फिल्म कंपनी टीना फिल्मस से दावा किया है कि मया उनकी दो दशक पहले ही फिल्म स्वर्ग से सुंदर का रिमेक है। इस रिमेक को बनाने से पहले किसी भी तरह की मंजूरी न लेने के कारण मया पर पांच करोड़ का दावा करते हुए एक मामला मुंबई हाई कोर्ट में लगाया गया है। मया को हम तो अब तक नहीं देख पाएं हैं लेकिन जिन लोगों ने भी यह फिल्म देखी है, उनका साफ कहना है कि इस फिल्म की कहानी में और फिल्म स्वर्ग से सुंदर की कहानी में रती भर का भी अंतर नहीं है। पूरी की पूरी फिल्म वैसे ही बना दी गई है। फर्क है तो बस भाषा और कलाकारों का।

ऐसे में जबकि छत्तीसगढ़ के मनमोहन देसाई माने जाने वाले सतीश जैन की फिल्म पर ही चोरी करने का एक आरोप लग गया है तो यह बात तय है कि इस आरोप के बाद छत्तीसगढ़ी फिल्मों पर काफी बुरा असर पड़ेगा। इसी के साथ अब सतीश जैन के उस दावे का क्या होगा जो मुंबई से लौटते समय वहां करके आए थे कि वे छत्तीसगढ़ में जाकर बता देंगे कि कैसे हिट फिल्में बनती हैं। उनकी पहली फिल्म मोर छईयां भुईयां की सफलता से उनको छत्तीसगढ़ का मनमोहन देसाई साबित किया था, पर अब उनकी फिल्म पर लगे चोरी के आरोप के बाद क्या होगा कहा नहीं नहीं सकता है।

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शनिवार, दिसंबर 19, 2009

राज खुला हमारी पिछली टिप्पणियों का-शुक्रिया आशीष खंडेलवाल जी का



अचानक कल आशीष खंडेलवाल जी के ब्लाग में नजरें पड़ीं तो मालूम हुआ कि हम भी जान सकते हैं कि हमारी टिप्पणियां कहां और कितनी हैं। ऐसे में उनके बताए रास्ते पर चलते हुए जब हमने देखा तो हमें यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि हमारे खाते में भी ५०० से ज्यादा टिप्पणियां हैं। हमारे लिए यह बात इसलिए सुखद है कि हमें वैसे भी टिप्पणियां करने के लिए समय नहीं मिलता है।

ब्लाग जगत में कदम रखे हुए हमें एक साल भी नहीं हुआ है। इस अवधि में हमने कितनी पोस्ट लिखी है, इसका लेखा-जोखा तो हमारे पास है कि हमने कितनी पोस्ट राजतंत्र और कितनी खेलगढ़ में लिखी है। इसी के साथ हमें यह भी मालूम है कि हमारे ब्लाग में कितनी टिप्पणियां आईं हैं लेकिन हमने किस-किस के ब्लाग में टिप्पणी की है और अब तक कितनी टिप्पणियां की हैं, यह नहीं जानते थे। लेकिन कल आशीष खंडेलवाल जी की एक पोस्ट ने हमारे सामने यह राज उसी तरह से खोल दिया जिस तरह से इन दिनों राज पिछले जन्म का खोलने का सिलसिला एक तरफ टीवी चैनल में तो दूसरी तरफ ब्लाग बिरादरी में चल रहा है।

हमने जब उनके बताए अनुसार गुगल में अपने नाम के साथ शेड लिखा तो हमारे सामने खुल गया हमारी टिप्प्पणियों का एक ऐसा पिटारा जिसके बारे में कम से कम हम तो अंजान थे। हम की क्या हमें लगता है कि सभी ब्लागर इसके बारे में अंजान रहे होंगे। हमारे खाते में ५०९ टिप्पणियां हैं। हमारे लिए यह सुखद है, क्योंकि हमें टिप्पणियां करने के लिए काफी कम समय मिल पाता है। ऐसे में हमारे लिए ५०० से ज्यादा टिप्पणियां मायने रखती हैं। हम जानते हैं कि कई ब्लागर ऐसे होंगे जिनके खाते में हजारों टिप्पणियों होंगी। अपने समीर लाल जी के खाते में जरूर सबसे ज्यादा टिप्पणियों होंगी कहा जाए तो यह बात गलत नहीं होगी। समीर जा अपेन ब्लाग के नाम के अनुरूप ही उडऩ तश्तरी की तरह कभी भी किसी भी समय किसी के भी ब्लाग में आ धमकते हैं और टिप्पणियों का प्यार बरसाकर चले जाते हैं ठीक उसी तरह से जैसे कोई उडऩ तश्तरी अचानक आकर गायब हो जाती है। उनकी टिप्पणियों से कोई ब्लाग अछूता नहीं रहता है। बहरहाल हम भी आभारी हैं आशीष जी के जिनके कारण हमारी टिप्पणियों का राज खुला है।

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शुक्रवार, दिसंबर 18, 2009

तेरे बिना अब जिया जाता नही...



चल दी तुम साथ छोड़कर मझधार में हमारा

किनारे तक पहुंचाने का वादा निभाया नहीं।।


कश्ती में ही संवार मझधार में खड़े हैं हम

किसी ने मंजिल का रास्ता बताया नहीं।।


किसे बताएं हम अपने दिल के दर्द को

कैसे छुपाएं हम अपने छलकते अश्क को।।

किसे दिखाएं अपने रिस्ते जख्म को

कैसे भूलाएं हम तेरे मोहब्बत के गम को।।


हर पल तुम ही तुम दो दिल में मेरे

उफ.. कितना दर्द है बिन तेरे जीने में मेरे।।


तुम्हारी जुदाई का गम अब सहा जाता नहीं

तेरे बिना अब जिया जाता नहीं।।

(हमारी यह कविता भी 20 साल पुरानी डायरी से ली गई है)

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गुरुवार, दिसंबर 17, 2009

मैं समीर लाल बोल रहा हूं कनाडा से ...

अचानक सुबह को करीब 9 बजे मोबाइल की घंटी बजी..
श्रीमती जी ने बताया कि आपका मोबाइल बज रहा है
हमने मोबाइल उठाया...
उधर से जैसे ही कहा गया कि मैं समीर लाल बोल रहा हूं कनाडा से..
इधर हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।
हमारी हालत ठीक वैसे हो गई थी जैसे किसी की बिग-बी यानी अमिताभ से बात करते समय हो सकती है। वैसे भी कम से कम हम तो समीर लाल जी को ब्लाग जगत का बिग-बी मानते हैं।
हमें यकीन ही नहीं हुआ कि हम समीर जी से बात कर रहे हैं।

हमें इतना तो मालूम था कि वे फोन करेंगे, लेकिन इतनी जल्दी करेंगे इसकी उम्मीद नहीं थी।
हम बता दें कि हमारी कल की एक पोस्ट महेन्द्र मिश्र से मोबाइल पर हुई बात-ऐसा लगा सामने हो गई मुलाकात... में समीर जी की टिप्पणी आई थी और उन्होंने ई-मेल से हमारा फोन नंबर मांगा था। हमें उनका ई-मेल मालूम नहीं है, ऐसे में हमने उनका फोन आने के एक मिनट पहले ही टिप्पणी देकर अपना मोबाइल नंबर लिखा था। इसीलिए आश्चर्य हो रहा था कि अपने समीर भाई ने इतनी तेजी कैसे दिखाई।
समीर भाई ने इतनी नहीं बल्कि इससे ज्यादा तेजी दिखाई थी और उन्होंने ललित शर्मा जी से हमारा नंबर लेकर फोन किया था।
समीर जी से जब हमने पूछा कि अभी तो हमने अपने ब्लाग में आपके लिए अपना मोबाइल नंबर डाला है और अभी आपका फोन आ गया तो उन्होंने बताया कि उन्होंने ब्लाग तो नहीं देखा है, बल्कि ललित शर्मा से नंबर लेकर बात कर रहे हैं।
हमें समीर भाई का फोन आने से इतना सुखद आश्चर्य हुआ कि हमें समझ ही नहीं आ रहा था कि हम उनसे क्या बात करें। यह सब इतना अचानक हुआ कि कुछ सोचने और समझने का मौका ही नहीं मिला।
समीर भाई से यही कोई तीन मिनट बात हुई होगी। इतने कम समय में हमें जो एक सबसे बड़ी बात समझ आई वह यह कि वास्तव में समीर भाई कितने साधारण हैं। वैसे तो ब्लाग में उनकी दिनचर्या और उनके बारे में जानकर लगता नहीं था कि ये इंसान इतने साधारण हो सकते हैं। उनसे बात करके ऐसा लगा ही नहीं कि हम एक ऐसे इंसान से बात कर रहे हैं जिनको ब्लाग जगत का बिग-बी कहा जा सकता है।
समीर भाई ने हमारा हाल-चाल पूछा और बताया कि वे अगले साल भारत आने का विचार कर रहे हैं। उन्होंने हमसे पूछा कि आप लोग नए साल में जबलपुर जाने वाले हैं। हमने बताया कि ललित शर्मा जी ऐसी कोई योजना बना तो रहे हैं, संभवत: नए साल में जबलपुर में एक छोटा ब्लागर सम्मेलन हो सकता है।
समीर भाई ने फिर बात करने का वादा किया। हमने भी उनका मोबाइल नंबर अपने मोबाइल में सहेज कर रख लिया है।

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बुधवार, दिसंबर 16, 2009

महेन्द्र मिश्र से मोबाइल पर हुई बात-ऐसा लगा सामने हो गई मुलाकात

हलो.. हलो... महेन्द्र मिश्र जी बोल रहे हैं?
जी हां.. बोल रहा हूं।
भाई साहब हम ग्वालानी बोल रहे हैं रायपुर से।
उधर से खुशी भरी आवाज आती है.. हां बोलिए ग्वालानी भाई कैसे हैं।
बस ठीक है, आप सुनाईए कैसे हैं? हम काफी दिनों से आपका नंबर आपके ब्लाग में देखकर बात करने के बारे में सोच रहे थे, लेकिन बात नहीं हो पा रही थी, आज सोचा कि बात कर ही ली जाए।
मिश्र जी ने कहा- चलिए अच्छी रही आपसे मुलाकात।


मोबाइल पर हुई बात को जैसे ही मिश्र जी ने मुलाकात कहा तो हमें उनकी यह बात जहां भा गई, वहीं उनसे यहां कोई करीब 8 मिनट की बात में हमें लगा कि वास्तव में हम मिश्र जी से बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि हमारी उनसे आमने-सामने मुलाकात हो रही है।
वास्तव में यही तो अपनी ब्लाग बिरादरी का प्यार और स्नेह है जो दो अंजान व्यक्तियों को जोड़ देता है और ऐेसा लगता ही नहीं है कि हम पहली बार बात कर रहे हैं,या मिल रहे हैं।
मिश्र जी ने हमें जबलपुर आने का निमंत्रण दिया। हमने उनसे कहा कि कोशिश करेंगे, वैसे जबलपुर गए हमें 20 साल से भी ज्यादा समय हो गया है। एक समय हम जबलपुर बहुत जाते थे, व्यापार के सिलसिले में। ये बातें फिर कभी ।

मिश्र जी ने उडऩ तश्तरी यानी समीर लाल जी की बात निकाली और बताया कि उनसे उनके कैसे रिश्ते हैं। उन्होंने कहा कि लगता है इस बार समीर लाल जी शायद नहीं आ पाएंगे या फिर विलंब से आएंगे।
हमने मिश्र जी को बताया कि हमने आज ही समीर भाई पर एक पोस्ट लिखी है, जिसमें उन्होंने मार्च-अप्रैल में आने की बात कही है।
मिश्र जी ने कहा कि मैं वह पोस्ट देखता हूं।


मिश्र जी ने हमने पूछा कि हम क्या करते हैं?
हमने उनको बताया कि दो दशक से ज्यादा समय से पत्रकारिता से जुड़े हैं और वर्तमान में रायपुर के दैनिक हरिभूमि में काम कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि वे भी लंबे समय से प्रकाशन से जुड़े रहे हैं। मिश्र जी ने बताया कि रायपुर में उनकी अनिल पुसदकर जी से भी बात हो चुकी है।

मिश्र जी से कुछ और बातें हुई, फिर हम लोगों ने लगातार संपर्क में रहने का वादा करते हुए मोबाइल रख दिया।
महेन्द्र मिश्र जी से बातें करके वास्तव में बहुत अच्छा लगा। वैसे अपने ब्लाग बिरादरी के इन बड़े भाई मिश्र जी के ब्लाग समयचक्र में जब भी हमारी आमद होती थी, हमारे सामने होता था उनका मोबाइल नंबर। हमने कई बार उनका नंबर मोबाइल में डाला और सोचा कि यार चलो आज बात कर लेंगे। लेकिन क्या करें आज-कल करते करते कई दिन निकल गए। लेकिन कल दोपहर को हम जब घर खाना खाने आए और थोड़ा सा समय नेट पर बैठने का मिला, तो फिर पहुंच गए मिश्र जी के ब्लाग में औैर इस बार उनका नंबर मोबाइल में डायल करके बात नहीं बल्कि मुलाकात कर ही डाली।

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मंगलवार, दिसंबर 15, 2009

सीरियल ब्लास्ट का दूसरा धमाका पाबला जी के नाम

भिलाई की चिंतन बैठक के बाद हमने ब्लाग बिरादरी में सुखद सीरियल ब्लास्ट की बात की थी। इसका पहला ब्लास्ट भी हमने कर दिया था, इसके बाद इसका दूसरा ब्लास्ट जो कि काफी बड़ा है, उसे बीएस पाबला जी ने रविवार को किया है। इस ब्लास्ट में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ के ब्लागर क्या करने वाले

पाबला जी की पोस्ट में कुछ मित्रों ने एक सवाल खड़ा किया है कि गुटबाजी के बिना बात नहीं बन रही थी। वैसे संजीव तिवारी जी ने भी इसका जवाब अपनी टिप्पणी से दे दिया है, लेकिन फिर भी हम साफ करना चाहते हैं कि हम लोग जो भी काम कर रहे हैं उसमें किसी भी तरह की कोई गुटबाजी नहीं है। हम लोग ब्लाग बिरादरी के भले के लिए ही काम करेंगे। अब अगर इसको कोई गुटबाजी की संज्ञा देता है तो यह उसका अपना ज्ञान है।

वैसे हम एक सवाल करना चाहते हैं कि क्या अभी ब्लाग बिरादरी गुटबाजी से बची हुई है जो अब गुटबाजी प्रारंभ हो जाएगी। ये दुनिया है मित्र जब अपने देश के 11 खिलाडिय़ों की टीम में गुटबाजी हो सकती है तो फिर यह तो एक अथाह सागर वाली ब्लाग बिरादरी है, इसको गुटबाजी से कैसे बचाया जा सकता है। लेकिन हम लोग इतना जरूर यकीन दिला सकते हैं कि हम लोग कोई भी काम किसी गुटबाजी के तहत नहीं कर रहे हैं। हम लोगों को जरूरत महसूस हुई कि अपने राज्य का एक ब्लाग एसोसिएशन होना चाहिए, इसी के साथ लगा कि एक और चिट्ठा चर्चा होनी चाहिए जिससे ब्लागरों को आगे बढऩे का मौका मिले। हमारा ऐसा सोचना है कि जितनी ज्यादा चिट्ठा चर्चा का प्रारंभ हो, यह ब्लाग बिरादरी के लिए अच्छा ही है। यह चर्चा एक तरह से एंग्रीकेटर का काम करती है जहां पर कई अच्छे ब्लागों की पोस्ट एक साथ देखने को मिल जाती है।

अब कोई चिट्ठा चर्चा प्रारंभ करना, किस तरह की गुटबाजी का संकेत देता है, यह बात समझ से परे है। बहरहाल छत्तीसगढ़ के ब्लागर क्या करने वाले हैं इसका खुलासा पाबला जी ने कर दी दिया है। हम आदरणीय पंकज मिश्रा जी को बताना चाहते हैं कि हमने जो सीरियल ब्लास्ट की बात कही थी, पाबला जी ने उसी ब्लास्ट का एक बड़ा धमाका किया है, लेकिन इस धमाके से कोई आहत होने वाला नहीं है बल्कि इस धमाके से ब्लाग बिरादरी सुख के सागर में गोते लगाने का काम करेगी। आगे और भी ऐसे धमाके होंगे जिससे सुख सागर में आप सबको गोते लगाने के मौके मिलेंगे तो तैयार रहे सुख का परमानंद लेने के लिए।

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सोमवार, दिसंबर 14, 2009

उडऩ तश्तरी का छत्तीसगढ़ में स्वागत है

हमारी कल की पोस्ट ऐसा स्टेडियम देखा नहीं कहीं.. में उडऩ तश्तरी यानी समीर लाल जी की एक टिप्पणी... रायपुर आएंगे तो आपके साथ देखेंगे.. पढ़कर यह लगने लगा है कि समीर जी छत्तीसगढ़ आने की तैयारी कर रहे हैं। अगर ऐसा है तो इससे बड़ी बात तो छत्तीसगढ़ के ब्लागरों के लिए हो ही नहीं सकती है।

समीर जी का ब्लाग बिरादरी में क्या स्थान है, यह बताने की जरूरत नहीं है। अगर समीर जी को कम से कम हिन्दी ब्लाग बिरादरी का बिग-बी कहा जाए तो हमें नहीं लगता है कि कोई इस पर आपति कर सकता है। अगर किसी को आपति हो भी तो क्या फर्क पड़ता है। ऐसे में जबकि उनको ब्लाग बिरादरी का बिग-बी समझा जाता है तो ऐसा कौन सा ब्लागर होगा जो बिग-बी से मिलना नहीं चाहेगा। जब समीर जी ने रायपुर आने की बात टिप्पणी में लिखी तो लगा कि हमें अब उनको आमंत्रित करने में विलंब नहीं करना चाहिए। हम उनको अपने राज्य के सभी ब्लागरों की तरफ से छत्तीसगढ़ आने के लिए आमंत्रित करते हैं कि वे जितनी जल्दी हो सके छत्तीसगढ़ जरूर आएं। हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि यहां आकर आप इतना अपार प्यार और स्नेह पाएंगे जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। छत्तीसगढ़ के हर इंसान में इतना प्यार भरा है कि इसमें सारी दुनिया समा सकती है।

छत्तीसगढ़ जैसा शांत और कोई राज्य भारत क्या पूरी दुनिया में नहीं हो सकता है। वैसे आप छत्तीसगढ़ के बारे में अच्छी तरह से जानते होंगे क्योंकि आप वैसे भी छत्तीसगढ़ के अंग रहे हैं। यानी आप मप्र के हैं तो मप्र और छत्तीसगढ़ पहले एक ही थे। एक तो हम लोग पहले एक राज्य के थे, ऐसे में हम सब भाई-भाई हुए। वैसे अपने देश में रहने वाले हर इंसान का एक-दूसरे से कोई न कोई रिश्ता तो है ही। भारत ही एक ऐसा देश है जहां पर इंसानी रिश्तों को समझा जाता है। हर इंसान दूसरे इंसान को उम्र के हिसाब से सम्मान में भाई, चाचा, मामा, दादा, ताऊ, नाना चाहे जैसे रिश्तों में बांध ही लेता है।

समीर जी अब जबकि आपने रायपुर आएंगे तो स्टेडियम देखेंगे कह ही दिया है तो आ भी जाईए रायपुर हम सब आपका स्वागत करने के लिए बेताब हैं। तो बताईये कब पड़ेंगे आपके कदम हमारी छत्तीसगढ़ की घरा पर।

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रविवार, दिसंबर 13, 2009

ऐसा स्टेडियम देखा नहीं कहीं..



छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के नए अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम में जैसे ही बीसीसीआई के मैच रेफरी भास्कर पिल्लई के कदम पड़े उनके मुंह से आह के साथ वाह निकली। यह स्टेडियम वास्तव में इतना खुबसूरत है कि इसकी तारीफ यहां आएं सभी अंतरराष्ट्रीय खिलाडिय़ों ने भी की है। सभी एक स्वर में मानते हैं कि ऐसा स्टेडियम देखा नहीं कहीं।


श्री पिल्लई ने कहा कि उनको आश्चर्य है कि इतना सुंदर और अच्छा स्टेडियम भारत में है। उन्होंने कहा कि जब वे यहां आए थे तो उन्होंने कल्पना ही नहीं की थी कि ऐसा स्टेडियम छत्तीसगढ़ जैसे छोटे और नए राज्य में देखने को मिल सकता है। यहां पर अंडर १९ क्रिकेट चैंपियनशिप में मैच रेफरी के रूप में आए श्री पिल्लई ने एक सवाल के जवाब में कहा कि इसमें कोई दो मत नहीं है कि यहां का स्टेडियम अंतरराष्ट्रीय मैचों के लायक है। उन्होंने कहा कि यहां के होटल भी ठीक है। स्टेडियम में जो थोड़ा सा काम बचा है उसके होने के बाद जरूर बीसीसीआई से रायपुर को अंतरराष्ट्रीय मैच मिल सकता है। उन्होंने कहा कि यहां पर दिलीप, रणजी और ईरानी ट्रॉफी के मैच तो आसानी से हो सकते हैं।


एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि रायपुर के स्टेडियम की मोहली से तुलना करना ही गलत है, मोहाली का स्टेडियम अब पुराना हो चुका है, अपने देश में रायपुर से अच्छा स्टेडियम कहीं नहीं है यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं। उन्न्होंने पूछने पर कहा कि वे बीसीसीआई को अपनी जो मैच रिपोर्ट देंगे उसमें इस बात का उल्लेख जरूर रहेगा कि यह स्टेडियम सबसे अच्छा है।
इस स्टेडियम के उद्घाटन अवसर पर पिछले साल जब देश के कई जाने माने क्रिकेटर दिलीप वेंगसकर, नयन मोंगिया, सुनील जोगी, वेंकटपति राजू के साथ कई स्टार आए थे तभी सभी ने इसकी तारीफ की थी।

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शनिवार, दिसंबर 12, 2009

ये हैं खानाबदौश-जिनमें है काम करने का जोश





हमें एक दिन छत्तीसगढ़ की राजधानी से कोई 130 किलो मीटर दूर रायपुर जिले के कसडोल जाने का मौका मिला तो वहां से लौटते समय रास्ते में लवन पड़ा। वहां पर सड़क पर मजमा देखकर हमने अपनी कार रोकी और देखा कि वहां पर राजस्थान के ये खानाबदौश अपने पेट की खातिर किस तरह से काम करने का जोश दिखा रहे थे। इनके जोश को देखने पूरा गांव उमड़ पड़ा था। ये लोग लोहे के औजार बनाकर बेच रहे थे। ये खानाबदौश यहां हर साल आते हैं।

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शुक्रवार, दिसंबर 11, 2009

लंबी चली चर्चा- कोकास जी से पूछे कितना हुआ खर्चा



भिलाई की ब्लागरों की चिंतन बैठक में जब हम लोग शरद कोकास जी के यहां गहन चिंतन करने के बाद होटल खाना खाने के लिए गए तो खाना खाने के बाद जब हम लोग वहां से अनिल पुसदकर जी के आने की सूचना पर बाहर निकले तो एक चौक के पास खड़े होकर सभी बतिया रहे थे, ऐसे में वहां पर हंसी मजाक वाले माहौल में जब हमने कहा कि लंबी चली चर्चा-कोकास जी से पूछे कितना हुआ खर्चा.. तो इस बात पर सभी हंस पड़े। हमारी यह हेडिंग खासकर कोकास जी को बहुत पसंद आई। हम तो दूसरे ही दिन इस हेडिंग के साथ एक पोस्ट लिखना चाह रहे थे, पर चिंतन बैठक की महत्वपूर्ण बातों को पहले लिखना जरूरी था और मौका मिला तो सोचा चलो इसको लिख ही लिया जाए नहीं तो अपने कोकास जी नाराज हो जाएंगे और कहेंगे कि राजकुमार तुम तो बस हेडिंग सुना देते हो उस पर कुछ लिखते नहीं हो।

छत्तीसगढ़ के करीब एक दर्जन ब्लागरों की एक चिंतन बैठक पिछले रविवार को अचानक भिलाई-दुर्ग में हुई थी। इस बैठक के बारे में सोचा नहीं गया था कि यह इतनी लंबी चलेगी। हम लोगों से सोचा था कि एक-दो घंटे बैठने के बाद खाना खाएंगे और रवाना हो जाएंगे। लेकिन जब हम ललित शर्मा जी के साथ शरद कोकास के निवास पर पहुंचे तो एक तो बैठक बहुत ज्यादा लंबी चली, फिर जब होटल जाकर खाना-खाने की योजना बनी तो कोकास जी के कम्प्यूटर की ललित शर्मा जी के पैन ड्राइव के कारण वाट लग गई। यह किस्सा हम पहले लिख चुके हैं। जैसे तैसे कोकास जी का कम्प्यूटर बीएस पाबला जी ने ठीक किया और हम लोग चल पड़े होटल की तरफ। होटल में बालकृष्ण अय्यर जी भी आए और थोड़ी देर रूकने के बाद अपने बैंक के लिए निकल गए, यह कहते हुए कि वे वापस आ रहे हैं। हम लोग जब होटल में खाने का आर्डर देने की तैयारी कर रहे थे तभी अनिल पुसदकर जी का फोन आया और उन्होंने अपने अंदाज में पूछा अबे कहां हैं? हमने बताया कि हम लोग दुर्ग के होटल में बैठे हैं। उन्होंने नाराजगी जताई कि हम लोगों ने उनको बताया नहीं और भिलाई आ गए। हमने उनसे कहा कि भईया जब आपकी तबीयत ठीक नहीं है तो फिर काहे परेशान हो रहेे हैं। अनिल जी के फोन आने की बात उधर अय्यर जी को मालूम हुई तो उन्होंने तपाक से अनिल जी से बात की। हमें बाद में मालूम हुआ कि वे दोनों पुराने मित्र हैं। अय्यर जी ने खबर दी कि अनिल जी आने वाले हैं।

अनिल जी के आने की सूचना मिलने पर हम लोगों ने खाना खाने के बाद उस चौक का रूख किया जहां पर अनिल जी आने वाले थे। हम लोग वहां पर खड़े होकर बतिया रहे थे और योजना भी बन रही थी कि क्या लिखना है। हमने तभी कहा कि सब सोचते रहेंगे और हम तो यहां से जाते ही एक पोस्ट लिख देंगे। लेकिन क्या लिखना है इसके लिए सामूहिक सहमति जरूरी थी। ऐसे में पहली पोस्ट और दूसरी पोस्ट तो तय हो गई थी। लेकिन इस बीच हमने पोस्ट लिखने की चर्चा के बीच में सबसे पहले कहा था कि लंबी चली चर्चा-कोकास जी से पूछे कितने हुआ खर्चा। यह हमने इसलिए कहा था क्योंकि होटल का बिल पटाने का काम कोकास जी ने किया था। अब होटल का बिल कितना देना पड़ा, यह तो कोई नहीं जानता सिवाए कोकास जी के। ऐसे में हमने यह बात मजाक में कही थी, हमारी इस बात पर जहां सबको हंसी आ गई, वहीं कोकास जी को यह हेडिंग जम गई। हमने उनसे वादा किया था कि इस हेडिंग पर एक पोस्ट जरूर लिखेंगे। आज वादा पूरा कर रहे हैं।

बहरहाल हम लोगों के हंसी-मजाक के बीच अनिल जी का आगमन हुआ और वहीं चौक पर ही एक ब्लागर मीट हो गई। न सिर्फ ब्लागर मीट बल्कि फोटो ग्राफी भी खूब हुई। चौक पर ही एक घंटे की चर्चा के बाद जहां ललित शर्मा और हम रायपुर के लिए निकल पड़े, वहीं कोकास जी अनिल जी के साथ अन्य मित्रों को लेकर अपने घर चले गए। कोकास जी के घर में उनकी बैठक कुछ समय चली। फिर सभा समाप्त हो गई। अब इस लंबी मैराथन बैठक में जो ऐतिहासिक फैसले हुए हैं वो धीरे-धीरे सामने आएंगे। एक साथ ब्लास्ट करना ठीक नहीं है। वैसे हमारे सीरियल ब्लास्ट शब्द पर कुछ मित्रों को आपति हुई है, अगर किसी अच्छी बात के लिए ब्लास्ट का उपयोग किया जाए तो क्या गलत है। ब्लास्ट खतरनाक होता है, यह तो सब जानते हैं लेकिन कोई ब्लास्ट सुखद भी हो सकता है हम इसका अहसास ब्लाग बिरादरी को करवाना चाहते हैं। तो आप लोग इंतजार करें ऐेसे सुखद ब्लास्टों का जो हम लोग लेकर आएंगे जरूर।

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गुरुवार, दिसंबर 10, 2009

लड़की हंसते हुए देख रही है या देख के हंस रही है?

हमारे एक मित्र का एसएमएस मिला जिसमें एक जोक है। इसे हम यहां ब्लाग बिरादरी के लिए पेश कर रहे हैं।

एक सरदार अपने मित्र से: यार वह खुबसूरत लड़की मुझे काफी देर से हंसते हुए देख रही है।

मित्र- दोस्त पहले कंफर्म कर लो हंसते हुए देख रही है या देख के हंस रही है।

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बुधवार, दिसंबर 09, 2009

कोकास जी का कम्प्यूटर भी चढ़ ही गया था टंकी पर



शरद कोकास जी के कम्प्यूटर में अचानक ललित शर्मा जी के एक वारयस का हमला हो गया और उनके कम्प्यूटर की वाट लगते-लगते बच गई। हम लोगों के साथ अगर उस समय बीएस पाबला जी नहीं होते तो शायद कोकास जी के कम्प्यूटर की वाट लग जाती और हमारे साथ ललित शर्मा को भी खानी पड़ती डाट। हमें तो डाट खानी पड़ती लेकिन हमारे पाबला जी का क्या होता, उनके सिर तो एक और तोहमत लग जाती कि उनके कारण कोकास जी का कम्प्यूटर भी टंकी पर चढ़ गया।

दरअसल जब भिलाई की ब्लागर मीट के समय हम सब लोग शरद कोकास जी के यहां बैठे थे तो जैसे ही बातों का सिलसिला प्रारंभ हुआ तो एक तरफ जहां पाबला जी का कैमरा चमकने लगा, वहीं दूसरी तरफ हमारे कैमरे ने भी अपना कमाल दिखाना प्रारंभ कर दिया। फिर ऐसे में भला संजीव तिवारी का कैमरा कैसे चुप रह सकता था, उन्होंने भी दे दनादन फोटो लेने प्रारंभ कर दिए। फोटोग्राफी के बाद कोई शाम को करीब चार बजे जब सबके पेट में चुहों ने अपना ताड़ंव नृत्य प्रारंभ किया तो सबको खाने की याद आई। वैसे इसके पहले श्रीमती शरद कोकास ने जरूर लगातार हम सबके पेट का ख्याल रखा था और बातों के दौर के बीच में सभी का मुंह चल ही रहा था। लेकिन खाना खाने तो जाना ही था, क्योंकि किसी की जेब तो हल्की करनी ही थी। ऐसे में जबकि सबको होटल जाना था तो विचार किया गया कि इससे पहले सभी के कैमरों के फोटो कोकास जी के कम्प्यूटर में डाले जाएं और जिनके पास पैन ड्राइव है उसमें रख लिए जाएं ताकि फिर किसी को शिकायत न रहे कि हमें तो फोटो नहीं मिली। ऐसे में कोकास जी के कम्प्यटूर में सभी कैमरों के फोटो कम्प्यूटर में डालने का काम हमने किया। सभी फोटो जब एक स्थान पर एकत्रित हो गए तो सबसे पहले हमने संजीव तिवारी जी के पैन ड्राइव में फोटो डाले। इसके बाद नंबर आया हमारे पैन ड्राइव का। जब पाबला जी के पैन ड्राइव का नंबर आया तो उन्होंने कहा कि इस पैन ड्राइव को तो हम ही कम्प्यूटर में लगाएंगे। बाद में कारण मालूम हुआ कि उनका पैन ड्राइव भी कम खतरनाक नहीं है, बड़े झटके मारता है।

बहरहाल पाबला जी ने भी अपने पैन ड्राइव में फोटो ले लिए। इसके बाद अंतिम पैन ड्राइव अपने ललित शर्मा जी था उनका पैन ड्राइव जैसे ही कम्प्यूटर में लगाया, तत्काल एक वायरस से कोकास जी के कम्प्यूटर पर ठीक उसी तरह से हमला कर दिया मानो कोकास जी का कम्प्यूटर भारत हो और शर्मा जी का पैन ड्राइव पाकिस्तान का कोई आतंकवादी। फिर क्या था। कम्प्यूटर से वायरस हटाने की मशक्कत प्रारंभ हुई। सभी अपना-अपना तर्क दे रहे थे। उधर कोकास जी के माथे की सिकन बढ़ते जा रही थी, जरूर वे सोच रहे होंगे यार अगर मेरे कम्प्यूटर की वाट लग गई तो अपनी ब्लागिंग का क्या होगा? कहीं कुछ दिन नहीं लिख पाए तो लोग यह न समझने लगे कि हम भी तो टंकी पर नहीं चढ़ गए हैं। उन्होंने तत्काल अपने कम्प्यूटर के डॉक्टर मित्र को फोन लगाकर पूछा कि क्या किया जाए। एक तरफ कोकास जी बात कर रहे थे, दूसरी तरफ अपने पाबला जी कम्प्यूटर को ठीक करने का प्रयास कर रहे थे। इस बीच हमें मजाक सुझा और हमने पाबला जी से कहा पाबला जी कोकास जी का कम्प्यूटर अगर ठीक नहीं हुआ तो सोच लीजिए लोग क्या कहेंगे?

यहां हम बता दें कि जब पाबला जी नई दिल्ली में अजय कुमार झा से मिलकर आए थे और अचानक झा जी के ब्लागिंग से विदा होने की खबर उड़ी थी तो कहा जा रहा था कि और ठहराए अपने घर पर ब्लागर को। हमने पाबला जी से कहा कि अजय झा के घर आप गए थे तो कहा कि झा जी टंकी पर चढ़ गए हैं और अब एक ब्लागर मीट कोकास जी के घर पर हुई तो उनका कम्प्यूटर भी कहीं टंकी पर न चढ़ जाए। पाबला जी को बात समझ आ गई और उन्होंने अपनी सारी ताकत कम्प्यूटर को ठीक करने में लगा दी और उसे ठीक करके ही दम लिया। हम लोग जब तक वहां थे कम्प्यूटर ठीक था, उसके बाद उसका क्या हुआ, यह हमें मालूम नहीं है। अब यह को कोकास जी ही बता सकते हैं कि उनके कम्प्यूटर का क्या हाल है। उसकी बीमारी का अंत हुआ है या नहीं या फिर उसकी वाट लग गई है।

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मंगलवार, दिसंबर 08, 2009

ये रहा है हमारा पहला ब्लास्ट-जल्द मिलेगा दिग्गजों की नई चर्चा का ब्रेक फास्ट

मस्ती के पलों में संजीव तिवारी, बीएस पाबला, राजकुमार ग्वालानी, ललित शर्मा, शरद कोकास, और सूर्यकांत गुप्ता

भिलाई की ब्लागर बैठक में जो सीरियल ब्लास्ट करने की योजना बनी है, उस योजना के पहले ब्लास्ट के रूप में फिलहाल इतना जान लें कि जल्द ही दिग्गज ब्लागर एक नई चिट्ठा चर्चा प्रारंभ करने वाले हैं। इस चर्चा में अपने देशी के साथ कुछ विदेशी ब्लागर भी शामिल होंगे। अभी हम किसी भी नाम का खुलासा नहीं करेंगे। लेकिन इतना तय है कि जो नाम सामने आएंगे उसमें जरूर कुछ नाम चौकाने वाले होंगे। जो लोग इस चर्चा में शामिल होंगे उनसे बात हो गई है। बस ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। यहां जो चर्चा होगी वह साफ-सुधरी और स्वस्थ मानसिकता वाली होगी इतना जरूर कह सकते हैं। वैसे आप चाहें तो कयास लगा सकते हैं कि कौन-कौन दिग्गज ब्लागर चर्चा करने वालों में शामिल हो सकते हैं।

यह एक छोटा सा ब्लास्ट है। इसके आगे अभी और ब्लास्ट होने हैं, लेकिन उसके लिए भी इंजतार करना होगा। आप सोच भी नहीं सकते हैं कि ब्लाग बिरादरी को एक नई दिशा देने के लिए कैसी-कैसी योजना बना चुकी है। लेकिन किसी भी योजना तब तक खुलासा नहीं किया जाएगा जब तक उस योजना को अंजाम तक नहीं पहुंचा दिया जाता है। किसी भी योजना के अंजाम तक पहुंचने की स्थिति में उस योजना यानी उस ब्लास्ट का धमाका किया जाएगा।

तब तक के लिए विदा.. वंदेमातरम् जय हिन्द, जय भारत, जय छत्तीसगढ़ बैठक के मस्ती के पलों में बीएस पाबला, शरद कोकास, संजीव तिवारी,ललित शर्मा, राजकुमार ग्वालानी, और सूर्यकांत गुप्ता

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रविवार, दिसंबर 06, 2009

भिलाई में ब्लागरों की मैराथन बैठक के बाद अब सीरियल ब्लास्ट की तैयारी

संजीव तिवारी, बीएस पाबला, शरद कोकास, राजकुमार ग्वालानी, ललित शर्मा एवं सूर्यकांत गुप्ता

भिलाई में अचानक छत्तीसगढ़ के ब्लागरों की एक आकस्मिक चिंतन बैठक हुई। इस लंबी आठ घंटे से ज्यादा समय तक चली मैराथन बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर लंबी चर्चा चली। 12 बजे शरद कोकास के निवास में प्रारंभ हुई यह बैठक रात 8 बजे तक चली। इस बैठक में जो फैसले किए गए हैं वो हंगामाखेज है जो सीरियल ब्लास्ट के रूप में सामने आएंगे। फिलहाल करना होगा इन ब्लास्टों के लिए सबको थोड़ा सा इंतजार। लेकिन इतना जान ले कि इस बैठक में करीब एक दर्जन ब्लागर शामिल हुए लेकिन जिन मुद्दों पर चर्चा चली उन मुद्दों पर देश के साथ विदेशी ब्लागरों से भी चर्चा कर सहमति ले ली गई है कि कैसे-कैसे सीरियल ब्लास्ट करने हैं।
शरद कोकास
, सूर्यकांत गुप्ता, ललित शर्मा, अनिल पुसदकर, बालकृष्ण अय्यर, बीएस पाबला, राजकुमार ग्वालानी, एवं संजीव तिवारी

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चिट्ठा जगत से नहीं आ रहे पाठक?




चिट्ठा जगत में लगता है वास्तव में कोई बड़ी तकनीकी समस्या आ गई है। पिछले तीन दिनों से हर ब्लाग में पाठक संख्या शून्य हो गई है। क्या चिट्ठा जगत में कोई काम चल रहा है? अगर हां तो इसकी जानकारी किसी ब्लाग को नहीं है। हमने इस तरफ इसके संचालकों का ध्यान भी दिलाया। हम पिछले दो दिनों से मेल कर रहे हैं, पर कोई जवाब नहीं है। संभवत: इस मेल में हमने अपने ब्लाग की प्रविष्ठियों के फिर से न जुडऩे का उल्लेख किया है, इसलिए ध्यान नहीं दिया गया है। भले हमारे ब्लाग की प्रविष्ठियों के मामले में ध्यान न दिया जाए, लेकिन ब्लागों में पाठक संख्या क्यों शून्य है, इस पर तो ध्यान दिया जाना चाहिए। जितनी भी नई-पुरानी पोस्ट है सबमें टिप्पणियों की संख्या दिख रही है, लेकिन पाठक संख्या गायब है।



हमने जो मेल भेजा है, उसका भी मजमून पेश है-


महोदय


हमारे ब्लाग राजतंत्र की पोस्टों की चर्चा दूसरे ब्लागों में लगातार होने के बाद भी उसकी प्रविष्ठियों को हवाले के साथ जोड़ा नहीं जा रहा है। यह सिलसिला हमारे साथ काफी लंबे समय से चल रहा है। एक बार हमने पहले मेल से सूचना दी थी, तब आपकी तरफ से मेल आया था कि अपने ब्लाग का पता और उस चिट्ठे का लिंक दें, हमने दिया था, पर फिर भी हमारी प्रविष्ठियों को नहीं जोड़ा गया। इधर नवंबर माह में दो दिनों में हमारी चार प्रविष्ठियों नहीं जुड़ीं। इसके पहले भी इसी माह में दो और प्रविष्ठियों को नहीं जोड़ा गया। हो सकता है और भी प्रविष्ठियां हों जिस पर हमारी नजरें न पड़ी हों। ऐसे में हमें मजबूरन एक पोस्ट लिखनी पड़ी। इस पोस्ट के बाद कई मित्रों ने कहा कि हो सकता है तकनीकी समस्या हो।



हम नहीं जानते हैं कि यह कोई तकनीकी समस्या है या फिर और कुछ कारण लेकिन हमारे साथ ही ऐसा लगातार क्यों हो रहा है। अभी दो दिसंबर को ब्लाग चर्चा मुन्ना भाई की.. में हमारी एक पोस्ट बिग-बी असली पा की कुछ तो मदद कर दीजिए वो मुन्नी भाभी कू मिलने वास्ते इदर आयला था पण की चर्चा हुई लेकिन इसको भी हमारी प्रविष्ठियों में नहीं जोड़ा गया। अब इसे हम क्या समझे। कृपया बताने का कष्ट करें कि ऐसा क्यों हो रहा है। वैसे हमें भी लगता है कुछ न कुछ तकनीकी समस्या है। चिट्ठा जगत में हमारी जो भी पोस्ट आज दिखाई पड़ रही हैं, उन सभी में पाठक संख्या 0 है। यह तो तकनीकी समस्या ही लगती है। कई बार जितनी टिप्पणियां रहती हैं उससे ज्यादा संख्या दिखती है। कृपया ध्यान दें।

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शनिवार, दिसंबर 05, 2009

अजय झा जी से हो गई चर्चा - हुआ महज 3.60 पैसे ही खर्चा

अजय झा जी के ब्लाग बिरादरी से अलविदा करने के किस्से के बाद हम भी लगातार उनसे फोन पर सपंर्क करने की कोशिश कर रहे थे। अचानक कल रात को बीएस पाबला के ब्लाग में नजरें पड़ीं तो मालूम हुआ कि झा जी के ब्लाग बिरादरी को छोडऩे का वास्तविक झोल क्या है। हमने तब सोचा यार चलो एक बार फिर से झा जी के मोबाइल पर कोशिश करके देखते हैं। कोशिश की फोन नहीं लगा। हमने पाबला जी से पूछा तो उन्होंने बताया कि झा जी तो आन लाइन है। लेकिन हमें चेटिंग का न तो कोई शौक है और न ही ये हमारी समझ में आती है। ऐसे में हमने फिर से उनका फोन खटखटा दिया। इस बार फोन उठाया गया और उधर से संभवत: भाभी जी की आवाज आई कि झा जी किसी काम से नीचे गए हैं। आधें घंटे में आ जाएंगे। हमने 20 मिनट बाद ही फिर से फोन खटखटा दिया। इस बार झा जी आवाज हमारे कानों में टकराई।

फिर शुरू हुआ बातों का सिलसिला। ये हमारा झा जी से पहला वार्तालाप था। उनसे ब्लाग बिरादरी में उनके नाम से फैली गलतफहमी से शुरू हुई बातें उनके छत्तीसगढ़ आने की बातों से लेकर उनके हमें दिल्ली आने के आमंत्रण के साथ कोई 6 मिनट के समय में काफी बातें हो गईं। उन्होंने हमें दिल्ली आने कहा तो हमने उनको बताया कि हम करीब 23 साल पहले 1986 में और फिर इसके दो साल बाद 1988 में भी दिल्ली सायकल से गए थे। हमने दो बार उत्तर भारत की सायकल यात्रा की है, इसके बाद दिल्ली जाने का मौका नहीं लगा है। हमने उनको बताया कि अपनी सायकल यात्रा के संस्मरण हम ब्लाग में लिखना चाहते हैं, पर समय नहीं मिल पाता है, ऐसे में झा जी ने तपाक से कहा कि राज भाई आप नहीं लिख पा रहे हैं तो हमें कहें हम लिख देगे। उनका पहली बार में इतना अपनापन देखकर ही हमें समझ में आ गया कि क्यों कर ब्लाग बिरादरी उनके ब्लाग जगत को अलविदा कहने से व्याकुल हो गई थीं।

अंत में हम वह बात तो बताना भूले ही रहे हैं जो बात हमने हेडिंग में लिखी है। यानी झा जी से हुई चर्चा में हमें मात्र 3 रुपए 60 पैसे लगे। हमने उनसे महज 6 मिनट बातें कीं और इन 6 मिनट में काफी बातें हो गईं। उनसे लगातार बातें करने का वादा करके हम प्रेस के काम में जुट गए। मन तो और बातें करने का था, पर प्रेस के काम के कारण संभव नहीं था। लेकिन झा जी से बातें करना अच्छा लगा। वास्तव में अपनी ब्लाग बिरादरी के मित्रों से संवाद करना कितना सुखद हो सकता है इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। हम तो चाहते हैं सभी ब्लागर मित्रों को समय निकालकर एक-दूसरे से बातें करते रहना इससे प्यार और स्नेह बढ़ता है।

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पोस्ट का नाबाद तिहरा शतक



हमारे ब्लाग राजतंत्र में पोस्ट का नाबाद तिहरा शतक पूरा हो चुका है। इसी के साथ अब हमारे ब्लाग राजतंत्र और खेलगढ़ को मिलाकर 850 पोस्ट हो चुकी है। ये पोस्ट महज 10 माह में पूरी हुई है। इसी के साथ हमको इन दोनों ब्लागों में करीब 29 हजार पाठक मिले हैं और करीब 3000 हजार टिप्पणियों से हमारे ब्लागर मित्रों और पाठकों ने अपना स्नेह बरसाया है।

आज से करीब 10 माह पहले फरवरी में हमने ब्लाग जगत में खेलगढ़ के माध्यम से कदम रखा था। इसके बाद हमने एक और ब्लाग राजतंत्र बनाया। आज हमें इस बात की खुशी है कि हम इन दो ब्लागों के माध्यम से समाज और देश के लिए कुछ कर पा रहे हैं। हम राजतंत्र की बात करें तो यह एक ऐेसा ब्लाग है जिसे काफी कम समय में ही ब्लाग बिरादरी और पाठकों का बहुत ज्यादा प्यार और स्नेह मिला है। इस ब्लाग की जिंदगी 9 माह की है और इतने कम समय में हमने इस ब्लाग पर 300 से ज्यादा पोस्ट लिखी है जिसे 24 हजार से ज्यादा पाठकों ने पढ़ा है। इसी के साथ इस ब्लाग का वरीयता में इस समय 50 वां स्थान है। इस ब्लाग की पोस्टों पर करीब 3000 टिप्पणियां मिली हैं। इस ब्लाग का 22 से ज्यादा चिट्ठों में उल्लेख हो चुका है और 100 से ज्यादा पोस्टों की चर्चा हो चुकी है। इसी के साथ हमारे इस ब्लाग की कई पोस्टों को कई समाचार पत्रों ने प्रकाशित किया है।

अब खेलगढ़ की बात करें तो हमने 10 माह में सबसे ज्यादा 547 पोस्ट खेलगढ़ में ही लिखी है। इन पोस्टों पर हमें करीब 150 टिप्पणियां मिली हैं, और इस ब्लाग को चार हजार चार सौ से भी ज्यादा पाठक मिले हैं। इसी के साथ इसका वरीयता क्रम भी 230 है। खेलगढ़ को भले कम पाठक मिले हैं, पर हमें इस बात का कोई अफसोस नहीं है। हमें इस बात की खुशी है कि अपने राज्य के खेलों को एक नई दिशा देने का जो काम हम कर रहे
हैं
वह धीरे-धीरे ही सही पर सफल हो रहा है।

हमारे दोनों ब्लागों को मिलाकर 850 पोस्ट हो गई हैं। अब हमारे कदम 1000 वीं पोस्ट की तरफ हैं। बहुत जल्द यह आंकड़ा भी हम प्राप्त कर लेंगे।


हम जब ब्लाग जगत में आए थे, तब हमें मालूम नहीं था कि हमें यहां पर इतना ज्यादा प्यार मिलेगा कि हमें लिखने के लिए अपनी दिनचर्या को भी बदलना पड़ेगा। हम बताना चाहते हैं कि प्रेस के काम के बाद हमें रात को एक बजे के बाद ही सोना नसीब होता है। ऐसे में पहले हम सुबह 9 बजे के बाद ही उठते थे, लेकिन जब से ब्लाग लिखने लगे हैं हमें 6 से 7 बजे के बीच उठाया पड़ता है क्योंकि सुबह 10.30 बजे प्रेस जाना पड़ता है मीटिंग में। इसके बाद प्रारंभ हो जाती है, रोज की खबरों के लिए मशक्कत।

हम उन सभी ब्लागर मित्रों के साथ पाठकों और उन मित्रों के तहे दिल से आभारी हैं जो हमारे ब्लाग पर अपनी नजरें इनायत करते हैं और अपने प्यार के रूप में टिप्पणियों की बरसात करते हैं। हम आशा करते हैं कि हमें ब्लाग बिरादरी के साथ पाठकों का इसी तरह से प्यार और स्नेह मिलता रहेगा। इसी उम्मीद के साथ विदा होते हैं कि कल फिर से नई पोस्ट के साथ हाजिर होंगे।

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शुक्रवार, दिसंबर 04, 2009

ब्लागिंग का जुनून फिल्मों के जुनून पर भारी

आज हम पर ब्लागिंग का ऐसा जुनून चढ़ा है कि हमें लगता है कि हमें जो बरसों पहले फिल्में देखने का जुनून था उस पर भी यह भारी पड़ रहा है। आज हालत यह है कि जब से ब्लाग जगत में कदम रखा है तब से फिल्में देखने का मौका ही नहीं मिल पा रहा है। वैसे ब्लाग बिरादरी से जुडऩे से पहले भी काफी कम मौके मिलते थे फिल्में देखने के, लेकिन टुकड़ों में ही सही फिल्में देखने का मोह छोड़ नहीं पाते थे। हमें याद है दो दशक के पहले का जमाना जब हम कॉलेज और उससे पहले स्कूल में पढ़ते थे तो अपने गृहनगर भाटापारा से रायपुर फिल्में देखने आते थे और फिल्में देखने का जुनून इतना था कि एक दिन में चार फिल्में देख लेते थे। नई फिल्म लगी तो पहले दिन पहला शो देखते ही थे फिर चाहे टिकट ब्लैक में क्यों न लेनी पड़ती थी। अगर एक दिन में चार फिल्में लगती थीं तो पहले ही दिन सभी फिल्में देख लेते थे।

वास्तव में कहते हैं कि किसी को किसी बात की लत लग जाए तो उसका छूटना मुश्किल होता है। यह बात है तो अच्छी लेकिन तब की स्थिति में जब आपको किसी अच्छी चीज की लत लग जाए जैसे की ब्लागिंग की लत। यह एक ऐसी लत है जिसको छोडऩा कम से कम हम तो नहीं चाहते हैं। वैसे हम बता दें कि हम वो है जो किसी भी लत को एक झटके में छोडऩे की क्षमता रखते हैं। हमने कभी किसी गलत लत से नाता जोड़ा भी नहीं है। हमें चाय पीने का भी कभी शौक नहीं रहा है। चाय पीना प्रारंभ किया तो लगा कि बहुत ज्यादा चाय हो रही है तो छोड़ दी चाय एक झटके में। चाय छोडऩे का हमें अफसोस भी नहीं। लेकिन चाय न पीने की कसम नहीं खाई है कभी-कभार पी लेते हैं।

बहरहाल हम बात कर रहे थे ब्लागिंग और फिल्मों की। हमने ब्लागिंग से फरवरी 2009 में नाता जोड़ा है और इस करीब 10 माह के सफर में हमने पाया है कि हम पर वास्तव में ब्लागिंग का ऐसा जुनून चढ़ा है जैसा कभी हमें फिल्में देखने का था। बात आज से करीब 25 साल पुरानी है जब स्कूल में पढ़ते थे और इसके बाद कॉलेज में आए। उन दिनों हम रायपुर जिले के भाटापारा में रहते थे। तब फिल्मों का काफी क्रेज था। यह वह जमाना था जब अपने छोटे से शहर में नई फिल्में काफी कम लगती थीं। ऐसे में हमारी मित्र मंडली रायपुर ही फिल्में देखने आती थी। जब भी नई फिल्म लगती थी हम लोग आ जाते थे रायपुर। हमें याद है जब रायपुर आते थे तो एक ही दिन में सुबह 12 बजे से लेकर 12 से 3, 3 से 6, 6 से 9 और 9 से 12 बजे रात तक यानी चार फिल्में देखकर ही रात को वापस जाते थे। कई बार तो चार की चार नई फिल्में देखने का मौका मिल जाता था, कई बार दो नई फिल्में तो दो पुरानी फिल्में देख लेते थे। कुल मिलाकर रायपुर आने का मलतब रहता था कि सुबह से लेकर रात तक फिल्में देखना है। हमें याद है जब भी परीक्षाओं का समय रहता था तो हम परीक्षा के पहले रात को फिल्म जरूर देखते थे और सुबह उठकर पढ़ते थे और परीक्षा देने जाते थे।

हमारे फिल्म देखने के इस दौर को पत्रकारिता की नौकरी में आने के बाद भी विराम नहीं लगा। लेकिन फिल्में देखना कम हो गया। इसके बाद आया वह समय भी जब काम के कारण फिल्में देखना बिलकुल कम हो गया। और अब तो करीब 10 साल से ज्यादा का समय हो गया सिनेमाहाल में फिल्म देखने जा ही नहीं पाते हैं। पहले सीडी लाकर टीवी पर फिल्में देख लेते थे। कम्प्यूटर लेने के बाद कम्प्यूटर में ही फिल्में रख लेते थे और मौका मिलते ही टूकड़ों में फिल्में देख लेते थे। लेकिन अब तो लगता है कि जैसा फिल्मों से नाता टूट ही गया है। कारण अपने को इस समय एक मात्र नशा ब्लागिंग का हो गया है।

अब जो भी समय मिलता है उसमें लिखने और ब्लाग पढऩे का काम करते हैं। हमे अफसोस इस बात का है कि इतना समय ही नहीं मिल पाता है कि ज्यादा ब्लाग पढ़ सके और कुछ टिप्पणी कर सके। अब जब समय ही नहीं मिलता है तो फिल्में कहां से देखेंगे। सोचते हैं कि फिर से टूकड़ों में फिल्में देखना प्रारंभ करें लेकिन जैसे ही कम्प्यूटर में किसी फिल्में को प्रारंभ करते हैं फिर सोचते हैं कि यार फिल्में तो फिर देख लेंगे पहले ब्लाग जगत में देखा जाए कि क्या है। खैर हमें इस बात का कोई अफसोस नहीं है कि ब्लागिंग के कारण हमारा फिल्में देखना छूट गया है। वैसे भी आज ऐसी फिल्में बनती कहां हैं जिसको देखने के लिए जुनून हो, पहले की फिल्मों को देखने के लिए लोग घंटों लाइन लगाते थे।

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गुरुवार, दिसंबर 03, 2009

हम तो चोर नंबर वन हैं

जीके अवधिया जी के ब्लाग में कल नजरें पड़ी तो देखा कि उन्होंने एक पोस्ट लिखी है
हां मैं चोर हूं.... दूसरों के मैटर चुराता हूं इस पोस्ट के अंत में उन्होंने पूछा कि क्या आप भी चोर हैं? उनका कहना है कि ऐसा कोई नहीं होगा जिसने जिंदगी में कुछ चुराया न होगा। अवधिया जी की यह बात बिलकुल ठीक है। जब कृष्ण भगवान माखन चुराकर खाते थे तो दुनिया में ऐसा कौन सा इंसान होगा जिसने कम से कम बचपन में अपनी पसंद की कोई चीज घर में चुराकर नहीं खाई होगी। जहां तक हमारा सवाल है तो हम अपने को दूसरों की खबरें और लेख चुराने में नंबर वन मानते हैं। हालांकि ऐसे कम मौके आए हैं जब हमको किसी का लेख नहीं बल्कि उसका विषय लेकर लिखना पड़ा है, लेकिन खबरों को चुराने की मजबूरी जरूर रही है। लेकिन इसे भी चोरी नहीं कहा जा सकता है। यह तो एक कला है चौर्यकला जिसमें हम हमेशा नंबर वन रहे हैं और रहेंगे।

हम अवधिया जी के साथ ब्लाग बिरादरी को बताना चाहते हैं कि चौर्यकला में तो हम शुरू से उस्ताद रहे हैं। हम बता दें कि अगर कोई लेख कहीं भी किसी भी विषय में छपा हो हम उस लेख का विषय लेकर तत्काल दूसरा लेख और कोई कविता है तो उस कविता का जवाब लिखने का काम बरसों से करते रहे हैं। मजाल है कि कोई पहचान जाए कि हमने उसके लेख से लेख बनाया है। इसी तरह से शाम के अखबारों से खबर लेकर बनाने का काम बरसों से किया है। खबरों से तत्थों को लेकर खबर को अपने शब्दों में लिख दिया जाए तो कोई दावा नहीं कर सकता है कि खबर उसकी है। लेकिन आप अगर खबर को पूरी की पूरी जस का तस लिख दें तो कोई भी कह सकता है कि यह तो उसकी खबर है।

हमें याद है जब आज से 20 साल पहले रायपुर के समाचार पत्र अमृत-संदेश में काम करते थे तो कई बार ऐसा मौका आता था कि हम सिटी में अकेले रिपोर्टर होते थे। ऐसे समय में शाम के अखबारों का सहारा होता था। उस समय रायपुर से एक तरूण छत्तीसगढ़ और दूसरा अग्रदूत ही शाम के अखबार हुआ करते थे। तब हम इन अखबारों को मंगा कर उनमें छपी खबरों से खबरें बनाने का काम करते थे लेकिन कभी इन अखबारों के रिपोर्टर को इस बात का पता ही नहीं चला कि हम उनके अखबार देखकर खबरें बना लेते हैं। एक बार शाम के एक अखबार के एक रिपोर्टर ने हमसे कहा कि आपके अखबार में छपी एक खबर उनके अखबार से हूबहू ली गई है। हमने पूछा कब के अखबार की बात कर रहे हैं तो उन्होंने बताया कि आज के अखबार की। तब हमने संतोष की सांस ली क्योंकि जिस दिन की बात वे कर रहे थे एक तो उस दिन हम छूटी में थे, दूसरे हम इतना अच्छी तरह से जानते हैं कि अगर हम कोई खबर बनाएंगे तो कोई कह ही नहीं सकता है कि यह खबर उनके अखबार ले ली गई है। तब हमने अपने पत्रकार मित्र से कहा कि मित्र हम तो उस दिन आपके अखबार का सहारा लेते हैं जिस दिन अकेले होते हैं लेकिन क्या आपको इसके पहले कभी लगा कि हमारे अखबार में आपके अखबार की कोई खबर छपी है। उन्होंने कहा कि ऐसा तो कभी नहीं लगा।

हमने जो काम 20 साल पहले करते थे, वह अब भी कर लेते हैं। कोई दो साल पहले हम एक न्यूज एजेंसी हिन्दुस्तान समाचार में काम करते थे, वहां पर महज हम दो रिपोर्टर थे ऐसे में सभी जगह रिपोर्टिंग करने जाना संभव नहीं था ऐसे में शाम के अखबारों का ही सहारा होता था। वैसे शाम के अखबारों का सहारा सभी रिपोर्टर लेते हैं। और यह गलत भी नहीं है। लेकिन यहां पर इस बात की सावधानी जरूर होनी चाहिए कि आप खबरों को बनाते समय इस बात का जरूर ध्यान रखे कि आपकी खबर बिलकुल अलग होनी चाहिए। खबर या लेख बिलकुल इस तरह से चुराने की कला में माहिर होना जैसे कोई आंखों से सूरमा चुरा ले तो पता न चले। और हम आज तक ऐेसा ही काम करते रहे हैं।

हम बता दें कि दो दिन पहले ही हमने ललित शर्मा जी के ब्लाग में जांजगीर चांपा के असली पा के बारे में जानकार देखी। हम इस असली पा के बारे में दैनिक नवभारत में पहले ही खबर पढ़ चुके थे। शर्मा जी के ब्लाग में दी गई जानकारी छोटी लगी, ऐसे में हमने सोचा इस पर हम लिखेंगे। हमने दैनिक नवभारत की खबर से तत्थों को लेकर एक नई खबर एक नए एंगल से अपने शब्दों में बनाकर अपने ब्लाग में पेश की थी। इसे कहते हैं आंखों में से सूरमा चुराना।

हम अंत में अवधिया जी को धन्यवाद देना चाहते हैं कि उनकी वजह से जहां हमें भी अपने इस हूनर को सार्वजानिक करने का मौका मिला, वहीं पुरानी यादों में जाने का भी अवसर मिला। एक बात और अब यह बात भी साबित हो गई है कि कम से कम हम तो अवधिया जी के मौसेरे भाई हैं ही।

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बुधवार, दिसंबर 02, 2009

कामनवेल्थ सायकल पोलो छत्तीसगढ़ में


छत्तीसगढ़ इस बार कामनवेल्थ सायकल पोलो की मेजबानी करके एक नया इतिहास रचने जा रहा है। इस चैंपियनशिप की तैयारी में जुटे प्रदेश संघ के अशोक सिंह साफ शब्दों में कहते हैं कि छत्तीसगढ़ की मेजबानी खास होगी, जो एक नया अध्याय बनाने का काम करेगी। इस स्पर्धा में भारत सहित ८ देशों की टीमें भाग लेंगी। स्पर्धा का प्रारंभ १६ दिसंबर से होगा। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर का मैदान भी बना दिया गया है।

भारत में जब सायकल पोलो की कामनवेल्थ चैंपियनशिप का आयोजन करने की बात चली तो इस अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप के आयोजन में सबसे पहले रूचि दिखाने वाला छत्तीसगढ़ रहा। छत्तीसगढ़ ही ऐसा राज्य रहा है जिसके खाते में सायकल पोलो को ऊंचाई पर ले जाने का लगातार रिकॉर्ड रहा है। सबसे पहले यहां पर २००२ में संघ का गठन होने के बाद ही विश्व कप में खेलने जाने वाली भारतीय टीम का प्रशिक्षण शिविर भी लगा जो टीम फ्रांस में खेलने गई थी। इसके बाद से छत्तीसगढ़ का संघ लगातार ऐसे आयोजन कर रहा है जैसे आयोजन कोई नहीं कर सका है। फेडरेशन कप का जब भिलाई में आयोजन किया गया तो उस समय इसके साथ तीन राष्ट्रीय चैंपियनशिप का भी आयोजन किया गया था। फेडरेशन कप के सफल आयोजन के बाद जब सायकल पोलो को स्कूली खेलों में शामिल करवाने की बारी आई तो इसमें भी छत्तीसगढ़ की भूमिका अहम रही। इन खेलों का आयोजन करने का जिम्मा जब कोई नहीं उठा रहा था तो छत्तीसगढ़ ने इसकी मेजबानी ली। पहली चैंपियनशिप का जब आयोजन राजनांदगांव में किया गया तो इसमें महज चार टीमों ने भाग लिया। लेकिन जब दूसरा आयोजन २००७ में फिर से राजनांदगांव में किया गया तो इस बार इस चैंपियनशिप में मेजबान छत्तीसगढ़ के साथ उप्र, महाराष्ट्र, केरल, आन्ध्र प्रदेश, मप्र, चंडीगढ़, नवोदय विद्यालय, विद्या मंदिर की टीमें शामिल हुईं।

१९८६ में हुई भारत में शुरुआत

अशोक सिंह बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में एक समय हार्स पोलो का काफी नाम था, वैसे आज भी इस खेल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों में खेला जाता है, लेकिन अब इस खेल को टक्कर देने वाला एक खेल सायकल पोलो भी आ गया है। इस खेल की शुरुआत भारत में १९८६ से हुई है, लेकिन अब जाकर इस खेलों को कुछ आयाम मिल सका है। पहले इस खेल को खेलने वाले काफी कम राज्य थे लेकिन आज यह खेल देश के ज्यादातर राज्यों में खेला जा रहा है। जिन राज्यों में यह खेल खेला जाता है, उन राज्यों में आज छत्तीसगढ़ पहले नंबर पर आ गया है। छत्तीसगढ़ सिर्फ खेलों में ही नहीं बल्कि मेजबानी में भी नंबर वन है।

छत्तीसगढ़ मेजबान नंबर वन

यहां पर जब भी कोई राष्ट्रीय चैंपियनशिप हुई है उसकी सबने तारीफ की है। ऐसे में जब भिलाई में प्रदेश के सायकल पोलो संघ ने एक साथ एक नहीं बल्कि तीन राष्ट्रीय चैंपियनशिप का आयोजन करके सायकल पोलो में एक नया इतिहास रचा तो देश भर से आए सभी खिलाडिय़ों ने आयोजन की जमकर तारीफ की और सबने एक स्वर में माना कि वास्तव में छत्तीसगढ़ मेजबान नंबर वन है। अब छत्तीसगढ़ ही पहली कामनवेल्थ चैंपियनशिप का आयोजन करने वाला बन रहा है। इस चैंपियनशिप की तैयारी के लिए भिलाई में सारी तैयारियां अभी से कर ली गई हैं। यहां पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का मैदान भी बनकर तैयार है।

कामनवेल्थ में शामिल न होने से बनी अलग आयोजन की योजना

भारत में कामनवेल्थ सायकल पोलो के आयोजन की योजना कैसे बनी इसका खुलासा करते हुए अशोक सिंह बताते हैं कि भारत में २०१० में कामनवेल्थ खेलों का आयोजन होने जा रहा है। इन खेलों में काफी पहले से सायकल पोलो को शामिल करने की कवायद चल रही थी। इस बात की पूरी संभावना थी कि सायकल पोलो को कामनवेल्थ खेलों में शामिल कर लिया जाएगा। इस संभावना का एक सबसे बड़ा कारण यह था कि कामनवेल्थ में खेलने वाले सभी देश सायकल पोलो खेलते हैं। कामनवेल्थ खेलों में सायकल पोलो को स्थान भी मिल जाता, लेकिन चूंकि इन खेलों का कार्यक्रम काफी पहले से बन गया था ऐसे में इन खेलों में सायकल पोलो को शामिल करना संभव नहीं हो सका। ऐेस में विश्व सायकल पोलो फेडरेशन ने भारतीय सायकल पोलो फेडरेशन के साथ मिलकर यह योजना बनाई कि भारत में ही कामनवेल्थ खेलों से ठीक पहले सायकल पोलो की कामनवेल्थ चैंपियनशिप का आयोजन किया जाए।

भिलाई में बना अंतरराष्ट्रीय मैदान

कामनवेल्थ सायकल पोलो के लिए भिलाई में अंतरराष्ट्रीय स्तर का मैदान बनकर तैयार हो गया है। भिलाई होटल के पास यह मैदान भिलाई स्टील प्लांट की मदद से बनाया गया है। इसके बारे में प्रदेश संघ के अशोक सिंह बताते हैं कि यह मैदान राष्ट्रीय तकनीकी कमेटी के चेयरमैन पीबी कृष्णाराव के मार्गदर्शन में बना। मैदान १२० गुणा ८० मीटर का है। इस मैदान को ऐसा बनाया गया है जिसमें रात को भी मैच हो सकेंगे। इस मैदान में आठ देशों की टीमें भारत, मालदीप, मलेशिया पाकिस्तान, यूके, श्रीलंका, इंडोनेशिया और नेपाल के बीच मुकाबला होगा।

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मंगलवार, दिसंबर 01, 2009

बिग-बी असली पा की कुछ तो मदद कर दीजिए


अमिताभ बच्चन की फिल्म पा को लेकर जहां देश भर में उत्सुकता है, वहीं इस फिल्म में जिस किरदार में बिग-बी नजर आने वाले हैं, वैसा ही एक किरदार असली जिंदगी में छत्तीसगढ़ में है। इस असली किरदार को एक टीवी चैनल ने सपना भी दिखाया है कि वह उसकी बिग-बी से बात करवाएगा। अब यह बात अलग है कि बिग-बी से इस असली पा की बात हो पाती है या नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि बिग-बी की फिल्म पा की वजह से आज छत्तीसगढ़ के इस 11 साल के बालक कुलजीत बनर्जी को जरूर छत्तीसगढ़ में सब जानने लगे हैं। हमने सोचा कि इस असली पा के बारे में पूरे देश के साथ समूचे विश्व को भी अवगत करवाया जाए कि छत्तीसगढ़ में एक असली पा है। साथ ही यह भी बताया जाए कि यह असली पा इतना गरीब है कि इसको मदद की दरकार है। क्या अपने बिग-बी असली पा की कुछ मदद करेंगे। बिग-बी को असली पा की मदद करनी चाहिए।


बिग-बी की फिल्म पा के बारे में शुरुआत में चर्चा चली थी तो कई लोगों को यह बात समझ ही नहीं आई थी कि यार आखिर ये बिग-बी कैसा रोल कर रहे हैं। लेकिन अब जबकि उनकी फिल्म को लेकर हर तरफ चर्चा है तो अचानक मीडिया ने छत्तीसगढ़ में एक असली पा खोज निकाला है। इस पा के बारे में बताया जा रहा है कि ये जांजगीर-चांपा जिले के पामगढ़ के ग्राम भिलौनी के एक गरीब में परिवार में पैदा हुए हैं। 11 साल का कुलजीत बनर्जी एक बहन बिंदिया के साथ जुड़वा पैदा हुआ था। उसकी बहन तो ठीक है, पर कुलजीत को भी वहीं बीमारी प्रोजोरिया है जिस बीमरी से ग्रस्त बिग-बी को पा में दिखाया गया है।

क्या है प्रोजोरिया बीमारी

कुलजीत का करीब 6 साल से पामगढ़ के डाक्टर डॉ। प्रदीप सिहारे इलाज कर रहे हैं। बकौल श्री सहारे प्रोजोरिया एक ऐसी बीमारी है जिसमें बच्चा बूढ़ा लगने लगता है। यही हाल कुलजीत का है। वह 11 साल का है, पर उसका वजन महज सात किलो है और उसके सिर पर बाल नहीं है और उसका सिर भी काफी बड़ा है। कुलजीत के दिमाग की नसों में कुछ दिनों पहले ही खून जम गया था तब डॉक्टर को लगा था कि उसे बचाया नहीं जा सकेगा, लेकिन एक सप्ताह के उपचार के बाद अंतत: कुलजीत को बचा लिया गया। डॉक्टर कहते हैं कि 80 लाख में से किसी एक को ऐसी बीमारी होती है जैसी कुलजीत को है। इस बीमारी के बारे में डॉक्टर बताते हैं कि यह बीमारी शरीर में जींस और कोशिकाओं में बदलाव की स्थिति के कारण होती है। एक चिकित्सा विज्ञानी लेस्ली गार्डन का बेटा भी इस बीमारी से ग्रस्त था लेकिन वे भी डॉक्टर होने के बाद कुछ नहीं कर सके थे। इस बीमारी के लक्षणों के बारे में कहा जाता है कि दो-तीन साल की उम्र में ही इसका पता चल जाता है। बीमारी के कारण सिर के बॉल उड़ जाते हैं, सिर का आकार बड़ा हो जाता है, शरीर का विकास रूक जाता है और चेहरे पर ठीक उसी तरह से झूरियां आ जाती हैं जैसे बूढ़ापे में आती हैं। अब तक कोई भी वैज्ञानिक इसका कारण नहीं जान सका है।


गरीब कुलजीत को मदद करने वाला कोई नहीं

कुलजीत एक गरीब परिवार का है और उसके इलाज के लिए जिले के नेताओं से लेकर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह तक मदद की गुहार लगाई गई है। यह अपने राज्य का दुर्भाग्य है कि इस गरीब परिवार की मदद करने वाला कोई नहीं है। अपना शासन और प्रशासन कितना निकम्मा है इसका इस बात से भी पता चलता है कि इस परिवार का अब तक गरीब रेखा का कार्ड भी नहीं बन सका है।

कुलजीत को बिग-बी से बात होने की आस

कुलजीत को बिग-बी से बात करवाने की बात एक टीवी चैनल ने की है। उनकी इस पहल से कुलजीत खुश है। संभवत: कुलजीत को बिग-बी से बात करने का मौका मिल जाए तो उसके जीवन में कुछ बदलाव आए। वैसे कुलजीत प्रोजोरिया जैसे बीमारी के बाद भी बहुत हंसुमख है और अपने जीवन से उसे कोई शिकायत नहीं है। कुलजीत इस समय दूसरी कक्षा में पढ़ता है और उसकी खुद एक डॉक्टर बनने की इच्छा है। हमारा ऐसा मानना है कि बिग-बी को जरूर असली पा से बात करनी चाहिए। अगर सच में बिग-बी तक यह बात जाएगी तो वे जरूर उनसे बात करना चाहेंगे ऐसा हमारा मानना है। लेकिन क्या सच में वो चैनल वाले बिग-बी से कुलजीत की बात करवा पाएंगे ये सोचने वाली है। ऐसा भी हो सकता है कि वे यह खेल केवल अपनी टीआरपी बढ़वाने के लिए खेल रहे हों। अगर वे सच में कुलजीत के साथ हैं तो जरूर साधुवाद के पात्र हैं, अन्यथा अगर यह कोई टीआरपी का खेल है तो ऐसे खेल को लानत है।

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सोमवार, नवंबर 30, 2009

ये हैं एक ऐसे इंसान जो हिन्दु के साथ हैं मुसलमान


अपने देश में आजादी के बाद से हिन्दु और मुसलमान को लेकर विवाद होता रहा है। हर कोई बस अपने धर्म को ही बेहतर बताने की कोशिश में बरसों से लगा है। ऐसे में अपने देश में ही ऐसी कर्इं मिसालें सामने आती रहतीं हैं जो सर्वधर्म सद्भाव के लिए एक मील का पत्थर होती हैं। ऐसी ही एक मिसाल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी देखने का मिलती है। ये मिसाल है एक ऐसे इंसान जीवन लाल साहू की जो पैदा तो हिन्दु धर्म में हुए हैं और हिन्दु हैं भी। लेकिन इनको जितना प्यार अपने हिन्दु धर्म से है उतना ही मुस्लिम धर्म ही नहीं बल्कि ईसाई और सिख धर्म से भी है। जीवन लाल जहां नवरात्रि में 9 दिनों तक उपवास रखते हैं, वहीं तीस दिनों का न सिर्फ रोजा रखते हैं बल्कि नमाज अदा करने के साथ-साथ ईद भी मनाते हैं। अभी बकरीद पड़ी तो वे अपने फिल्म सी शूटिंग छोड़कर बकरीद मनाने अपने घर रायपुर आए गए।


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जब 28 नवंबर को ईद का त्यौहार मनाया गया तो इस बार इस त्यौहार में एक बात यह सामने आई कि इस त्यौहार को मनाने वाले अपने शहर में एक ऐसे इंसान भी हैं जो हिन्दु हैं। वैसे तो जीवन लाल बरसों से ईद मनाते आ रहे हैं और तीस दिनों का रोजा भी रखते हैं, लेकिन इनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इस बार बकरीद पर जीवन लाल के बारे में मीडिया को जानकारी हुई तो इस बात का खुलासा सबके सामने हुआ कि कैसे एक इंसान सभी धर्मों को मानकर एक मिसाल पेश कर सकते हैं। यह सब तो अपने हिन्दुस्तान में ही संभव हो सकता है।

जीवन लाल साहू जो कि एक कलाकार भी हैं, वे खुद खुलासा करते हैं कि उनका परिवार प्रारंभ से ही मुस्लिमों के मोहल्ले मौदहापारा में रहता है। ऐसे में उनको मुस्लिम रीति रिवाजों ने बचपन में बी प्रभावित किया और उन्होंने फैसला किया कि वे इस धर्म को भी मानेंगे। इसके बाद जब वे पढ़ाई करने के लिए होलीक्रास स्कूल बैरनबाजार गए तो उन्होंने वहां चर्च भी जाना प्रारंभ कर दिया। यहां से उनके मन में ख्याल आया कि क्यों न अपने धर्म के साथ मुस्लिम, ईसाई और दूसरे धर्मों को भी माना जाए। बस फिर क्या था जब मन में हो विश्वास और पूरा हो विश्वास तो कैसे कोई कामयाब नहीं होगा। आज जीवन लाल सभी धर्मों को मानते हैं और उनके इस सर्वधर्म सद्भाव के कारण उनको मित्रों ने गोल्डन यानी सोने का नाम दे दिया है। सच में जीवन लाल आज के जमाने में जब लोग धर्म के नाम पर लडऩे का काम कर रहे हैं तो वे खरे सोने से कम नहीं हैं जो हर धर्म को अपने अंदर समाए हुए हैं।

जीवन लाल जहां नवरात्रि पर 9 दिनों का निर्जल उपवास रखते हैं वहीं रमजान में 30 दिनों तक रोजा भी रखते हैं और नमाज भी अदा करते हैं। बकरीद में उनके घर का माहौल ऐसा था कि कोई यह नहीं कह सकता था कि वह किसी हिन्दु के घर में आया है। हर तरफ मुस्लिम रीति रिवाज का नजारा था। खुद जीवन लाल का पहनावा ऐसा था कि अगर किसी को मालूम न हो कि यह इंसान हिन्दु हैं तो कोई भी यही समझता कि यह कोई मुस्लिम इंसान हैं। जीवन लाल ने बाइबिल के साथ गुरुनानक देव के साहित्यों का भी गहन अध्ययन किया है।

जीवन लाल एक कलाकार हैं और उन्होंने बकरीद मनाने के लिए अपनी फिल्म भांवर की शूटिंग छोड़ दी और त्यौहार मनाया। अब वे क्रिसमस की तैयारी कर रहे हैं। उनके घर में क्रिसमस भी किसी ईसाई परिवार के घर जैसे ही मनाई जाती है। फिल्मी सितारे जितेन्द्र को अपना आर्दश मानने वाले इस कलाकार की इच्छा नामी कलाकार बनने की है। जिनके दिल में हर धर्म के लिए प्यार हो उनकी इच्छा पूरी न हो यह तो हो नहीं सकता है। जरूर उनकी इच्छा को भगवान, अल्लाह, ईसा मसीह और गुरुनानक देव पूरी करने में मदद करेंगे। काश अपने देश में धर्म के नाम पर लडऩे वाले लोग ऐसे जीवन लाल के जीवन से सबक लें तो कहीं कोई लड़ाई ही न हो।

वंदेमातरम्, जय हिन्द, जय भारत, जय छत्तीसगढ़

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रविवार, नवंबर 29, 2009

हम अब भी उनका एतबार करते हैं...


तुम्हें हमसे नफरत सही, हम तुम्हें प्यार करते हैं

इस हंसी गुनाह को हम बार-बार करते हैं।।


तुम आओगी नहीं, जानकर भी हम तुम्हें बुलाते हैं

दिल के आईने में हम अब भी तेरा दीदार करते हैं।।


ए मेरी हमदम तुम्हें तो वफा के नाम से भी नफरत है

मगर एक हम हैं जो जफा से भी मोहब्बत करते हैं।।

गम लिए फिरते हैं सारे जमाने का दिल में

मगर फिर भी न हम किसी से शिकायत करते हैं।।

आ जाओ लौटकर दिल की दुनिया फिर से बसाने

हम तो तेरा अब भी इंतजार करते हैं।।


सब कहते हैं बेवफा उसे प्रिंस

मगर हम अब भी उनका एतबार करते हैं।।

नोट: यह कविता भी हमारी 20 साल पुरानी डायरी की है

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शनिवार, नवंबर 28, 2009

हुआ चांद का दीदार-आया ईद का त्यौहार

हुआ चांद का दीदार

आया ईद का त्यौहार

खिलाओ सेवइयां

बांटो सबको प्यार

न हो कहीं नफरत

प्यार से महके संसार


ब्लाग बिरादरी के साथ सभी मित्रों को ईद मुबारक

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शुक्रवार, नवंबर 27, 2009

चिट्ठा जगत की बेईमानी या मनमानी

चिट्ठा जगत के बारे में कहा जाता है यह एक स्वचलित चिट्ठा है। लेकिन अब इस बात को लेकर संदेह होने लगा है कि अगर यह वास्तव में स्वचलित है तो फिर इसको लेकर लगातार परेशानी क्यों हो रही है। स्वचलित में ऐसी कौन सी बड़ी खामी है कि एक चिट्ठे में एक दिन तो उनके चिट्ठे की चर्चा की प्रविष्ठि जुड़ जाती और दूसरे दिन गायब हो जाती है। इस बात को लेकर अब यह शक होने लगा है कि ये चिट्ठा जगत की बेईमानी है या फिर मनमानी। क्या कोई ऐसा है जो चाहता है कि किसी तेजी से आगे बढ़ते चिट्ठे पर लगाम लगाई जाए और उसकी रफ्तार को रोका जाए। हमें तो कुछ ऐसा ही लगता है क्योंकि हमारे साथ ऐसा लगातार हो रहा है।

हमने ब्लाग बिरादरी के मित्रों के कहने पर अपना ध्यान लिखने पर ही लगाया है, पर इसका क्या किया जाए कि जब हमारे साथ लगातार अन्याय हो रहा है तो फिर चुप कैसे बैठा जाए। कहने को तो चिट्ठा जगत को स्वचलित कहा जाता है अगर यह महज स्वचलित है तो फिर इसको लेकर लगातार परेशानी क्यों हो रही है। न जाने क्या खेल हो रहा है जो दूसरे चिट्ठा में हुई चर्चा की प्रविष्ठियां गायब हो जाती हैं या फिर कर दी जाती यह बात समझ नहीं आ रही है। हमारे साथ यह लगातार हो रहा है। एक ही दिन में हमारी तीन पोस्ट की चर्चाएं हुर्इं और ये सब की सब गायब। इसके अलावा और भी कई बार ऐसा हुआ है। हमारे ब्लाग राजतंत्र की 26 नवंबर को तीन अलग-अलग चिट्ठों पर चर्चाएं हुईं। ये तीनों चर्चाएं इस प्रकार है जिसके हम लिंक भी दे रहे हैं। पंकज मिश्र जी के ब्लाग पर रूपचंद शास्त्री जी ने हमारे लेख भारतीय हॉकी में अभी जान है बाकी की चर्चा की। इसी दिन 26 नवंबर को ब्लाग चर्चा मुन्ना भाई में हमारे लेख काश एक बार वो फिर मिल जाती की चर्चा हुई फिर महेन्द्र मिश्र के समयचक्र में हमारे दो लेखों हिन्दु बेटे के अंतिम दीदार के लिए कब्रिस्तान में खोला गया मुस्लिम मां का चेहरा और वंदेमातरम् से मुसलमानों को परहेज नहीं की चर्चा हुई।

(चारों के लिंक ये हैं)

ये गुरु चेले ताऊ टिप्पणी खेचूं ताबीज बेच रेयेल है भाई
एक भीख मांगता बच्चा
पुरुष तो वही देखेगा जो दिखाया जाएगा
आम जनता क्या डंडे खाने के लिए है..

इन तीनों चर्चाओं को हमारे हवाले की प्रविष्ठियों में जोड़ा नहीं गया। इसके एक दिन पहले भी पंकज मिश्र जी के ब्लाग में रूपचंद शास्त्री जी ने हमारे एक लेख की चर्चा की थी (इसका लिंक हम इसलिए नहीं दे पा रहे हैं क्योंकि श्री मिश्र जी ब्लाग में 25 नवंबर की वह पोस्ट खुल नहीं रही है)। इसको भी हमारी प्रविष्ठियों में नहीं जोड़ा गया। इसके कुछ दिनों पहले यानी 10 नवंबर को चर्चा पान की दुकान में भी एक लेख आम जनता क्या डंडे खाने के लिए है.. में राजतंत्र का लिंक देने के बाद न तो इसका हवाला जुड़ा और न ही प्रविष्ठी। तब हमने समझा था कि इस साझा ब्लाग में हम भी लिखते हैं शायद इसलिए प्रविष्ठी और हवाला नहीं जोड़ा गया। लेकिन इस बारे में हमारे ब्लागर मित्र कहते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि ब्लाग आपका है, प्रविष्ठियां तो जुड़ती है। अगर ऐसा है तो फिर हमारे साथ ये क्या हो रहा है, हम नहीं जानते हैं। लेकिन इतना तय है कि जिस तरह से लगातार राजतंत्र के साथ किया गया है, उससे यह प्रतीत होता है कि चिट्ठा जगत में बैठे हुए या फिर उनसे जुड़े हुए मठाधीश किसी नए ब्लागर को इतनी तेजी से आगे बढऩे देना नहीं चाहते हैं। ऐसा हम इसलिए भी कह रहे हैं कि हमने अपने 9 माह के ब्लागर जीवन में कई दिग्गजों को भी चिट्ठा जगत पर संदेह जताते देखा है।

हमारा ऐसा मानना है कि किसी भी ब्लागर को आगे बढऩे से रोकना गलत है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि किसी चिट्ठा जगत का कोई ब्लागर मोहताज नहीं होता है, जब वह अच्छा लिखता है तो उसको पढऩे वाले आते ही हैं। लेकिन अन्याय बर्दाश्त करना कम से कम हमारी फितरत नहीं है। हमने इसके पहले भी चिट्ठा जगत के बारे में लिखा था, तब हमारे ब्लागर मित्रों ने लेखन पर ध्यान देने की सलाह दी थी, हम लेखन पर ही ध्यान दे रहे हैं लेकिन क्या अन्याय के खिलाफ आंखे बंद कर लेना गलत नहीं है। अन्याय के आगे झुकने का मतलब भी अपराध करना है और हम अपराधबोध से ग्रस्त होना नहीं चाहते हैं इसलिए हमारे साथ जो हुआ है उसको हमने ब्लाग बिरादरी के सामने रखा है। हो सकता है कि इस खुलासे के बाद चिट्ठा जगत से हमें और ज्यादा परेशानी हो, लेकिन इससे हमें कोई फर्क पडऩे वाला नहीं है। इस बात के डर से हम अन्याय के खिलाफ न लिखे यह संभव नहीं है। अगर आज हम नहीं लिखेंगे तो कल और किसी के साथ ऐसा अन्याय होगा। जिसके साथ भी अन्याय होता है उसको खुलकर सामने आना ही चाहिए।

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शेख समीर के वंदेमातरम् पर क्या विचार है?

हमारे एक मुसलमान मित्र हैं, शेख समीर। 26-11 को मुबंई हमले की याद में उन्होंने हमें जो एसएमएस भेजा उसका मजमून लिख रहे हैं। इस एसएएस की शुरुआत जहां उन्होंने वंदेमातरम् से की, वहीं अंत जय हिन्द, जय भारत के किया।

वंदेमातरम्

आंसू का कोई रंग नहीं
दर्द की कोई जात नहीं
क्या डराएंगे हमें ये आतंकवादी
जितना खुद कोई ईमान नहीं


इन लाइनों के नीचे लिखा गया है कि मुबंई में 26 नवंबर को हुई घटना में मारे गए आम जनों के साथ पुलिस वालों को सलाम है। अंत में लिखा है

जय हिन्द, जय भारत।

इस एसएमएस ने हमें एक बार फिर से उन मुसलमान मित्रों की याद दिला दी जो वंदेमातरम् को लेकर बिना वजह विवाद खड़ा कर रहे हैं। शेख समीर का यह एसएमएस भी एक जवाब है उन वंदेमातरम् विरोधियों को की चंद विवाद करने वालों को छोड़कर किसी मुसलमान को वंदेमातरम् या जय हिन्द बोलने और लिखने से भी परहेज नहीं है। हो सकता है किसी वंदेमातरम् विरोधी को यह बात झूठ लगे ऐसे लोग हमें अपना मोबाइल नंबर भेजे दें हम उनको वह एसएमएस भेज देंगे जो हमें हमारे मित्र ने भेजा है।

इस बारे में हमारी ब्लाग बिरादरी के मित्र क्या सोचते हैं, उनके विचार आमंत्रित हैं।

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गुरुवार, नवंबर 26, 2009

मम्मी मुझे इंडिया में ही रहना है यूएस नहीं जाना


एक चार की छोटी सी बच्ची को पहली बार यूएस से इंडिया आने का मौका मिला। यहां पर आकर वह अपने मम्मी-पापा के देश में ऐसे रमी की उसे अब इंडिया छोड़कर जाने का मन ही नहीं हो रहा है। वह अपनी मम्मी से कहती है कि मम्मी मुझे इंडिया में ही रहना है, यूएस नहीं जाता है। मम्मी पूछती है क्यों? तो छोटी सी यह गुडिय़ा कहती है कि वहां मुझे अच्छा नहीं लगता है। वहां मुझे क्यों प्यार भी नहीं करता है, यहां देखों न कितने भईया और बहनें हैं। सब कैसे प्यार से खेलते हैं।

यह किसी फिल्म या फिर नाटक के संवाद नहीं हैं बल्कि हमारे एक मित्र के भाई की चार साल की बेटी की बातचीत है जो उसने अभी यहां पर राजधानी रायपुर में एक दिन पहले की। हमारे मित्र के भाई यूएस में इंजीनियर हैं। उनकी पत्नी भी इंजीनियर हैं। वे पिछले पांच सालों से वहां पर रहे हैं। वहीं पर उनको एक पुत्री हुई। इस पुत्री का नाम आयुषी है। आयुषी को पहली बार भारत आने का मौका मिला है क्योंकि उसके चाचा की शादी थी। यहां पर आने के बाद उसको अपने दादा-दादी और नाना-नानी के घर में जिस तरह का प्यार मिला उसने उसको इतना ज्यादा प्रभावित किया है कि वह अब यूएस लौटना ही नहीं चाहती है। छोटी की यह परी जैसी लड़की अपनी मम्मी से कहती भी है कि मम्मी यूएस में तो कोई मुझे प्यार भी नहीं करता है और कोई खेलने वाला भी नहीं है लेकिन यहां पर कितने भाई और बहनें हैं। वह जिद करने लगती है कि मम्मी प्लीज हम लोग वापस नहीं जाएंगे।

यह एक छोटा सा किस्सा है जो यह बताता है कि वास्तव में अपने देश में लोग कितने प्यार और अपनेपन से रहते हैं। बेशक यूएस जैसे देशों में पैसों की कमी नहीं है, लेकिन वहां जाकर इंसान मशीन बन जाता है और प्यार के लिए तरस जाता है। प्यार की भूख तो हर इंसान को होती है फिर वह चाहे चार साल का बच्चा ही क्यों न हो। ऐसे में भला आयुषी कैसे गंवारा करेगी कि वह एक ऐसे देश में रहे जहां पर प्यार नाम की सय से वह महरूम है।

इसलिए कहते हैं

ईस्ट हो या वेस्ट इंडिया इज द बेस्ट

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बुधवार, नवंबर 25, 2009

भारतीय महिला हॉकी में अभी जान है बाकी

नीता डुमरे छत्तीसगढ़ की पहली अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी के साथ अंतरराष्ट्रीय निर्णायक भी हैं। बैंकाक में इसी माह खेले गए सीनियर एशिया कप में वह निर्णायक की भूमिका निभाकर लौटी हैं। वहां पर भारतीय टीम ने फाइनल में पहुंचकर विश्व कप में खेलने की भी पात्रता प्राप्त की है। यह इस बात का सबूत है कि महिला हॉकी में अभी बहुत जान बाकी है। दूसरी तरफ पुरुष हॉकी को विश्व कप में मेजबान होने के कारण खेलने की पात्रता मिल पाई है। अंतरराष्ट्रीय हॉकी के साथ छत्तीसगढ़ की हॉकी पर उनसे हुई बातचीत के अंश प्रस्तुत हैं।


० अंततराष्ट्रीय खिलाड़ी के बाद अंतरराष्ट्रीय निर्णायक की भूमिका में आना कैसा लगा?

०० हॉकी खेलना छोडऩे के बाद ही मेरी प्रारंभ से इच्छा थी कि मैं अंपायरिंग करूं। लेकिन इसके लिए छत्तीसगढ़ में ऐसी कोई सुविधा नहीं थी। ऐसे में मुङो भारतीय हॉकी संघ की महासचिव अमृत बोस ने सलाह दी कि मैं अंपारिंयग के स्थान पर निर्णायक बनने पर ध्यान दूं। उनकी सलाह पर मैंने पहली बार २००० में हैदराबाद में राष्ट्रीय स्पर्धा में निर्णायक की भूमिका निभाई। इसके बाद और कुछ राष्ट्रीय स्पर्धाओं में निर्णायक रही। इसके बाद हैदराबाद में जब २००३ में एशिया कप हुआ तो पहली बार अंतरराष्ट्रीय निर्णायक के रूप में मेरा भी चयन किया गया। इसके बाद से मैं लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्णायक बन रही हूं। इसी माह बैंकाक में खेले गए सीनियर एशिया कप में भी मैं निर्णायक थी। वहां से दो दिन पहले ही लौटी हूं। निर्णायक बनने के कारण अब तक मैं अपने खेल से भी जुड़ी हुई हूं।

० निर्णायकों को दिया जाने वाला छत्तीसगढ़ का हनुमान सिंह पुरस्कार प्राप्त करके कैसा लगा?

०० मेरा ऐसा मानना है कि मुझे यह पुरस्कार मिला है तो इससे अपने प्रदेश की खिलाडिय़ों को भी हॉकी में निर्णायक बनने की प्रेरणा मिलेगी। जब मैं १९८८ में भारतीय टीम में शामिल हुई थी तो उस समय मप्र था इसके बाद भी छत्तीसगढ़ की खिलाडिय़ों को एक रास्ता दिखा था कि वे भी भारतीय टीम में स्थान बना सकती हैं। बकौल नीता आज छत्तीसगढ़ की दो खिलाड़ी रश्मि तिर्की और निधि राष्ट्रीय स्तर पर अंपायरिंग कर रही हैं, इनको कभी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंपायरिंग का मौका मिल सकता है।


० भारतीय महिला हॉकी के भविष्य के बारे में क्या सोचती हैं?



०० बैंकाक में जिस तरह से भारतीय हॉकी टीम ने खेल दिखाया और फाइनल में पहुंचने के कारण विश्व कप में खेलने की पात्रता प्राप्त कर ली उससे लगता है कि महिला हॉकी का भविष्य कम से कम पुरुष हॉकी से ज्यादा अच्छा है। पुरुष हॉकी में भारत को मेजबान होने के कारण विश्व कप में खेलने के लिए पात्रता मिली है। कनाडा और इंग्लैंड से जीतकर खुश होने से कुछ नहीं मिलेगा। अपने देश में पुरुष हॉकी का ज्यादा महत्व है, ऐसे में इसको निखारने पर ध्यान देना चाहिए।

० छत्तीसगढ़ में हॉकी की क्या स्थिति है?

०० अपने राज्य में हॉकी के प्रतिभाशाली खिलाडिय़ों की कमी नहीं है। यहां पर जशपुर, सरगुजा, रायगढ़, राजजनांदगांव, बिलासपुर, रायपुर , दुर्ग से लेकर हर जिले में प्रतिभाशाली खिलाड़ी हैं। बस जरूरत है इसको सुविधाएं देने की।

० कैसी सुविधाओं होनी चाहिए?

०० सबसे पहले तो प्रदेश सरकार को राज्य में ज्यादा से ज्यादा एस्ट्रो टर्फ बनाने चाहिए। राज्य बनने के ९ साल बाद भी एक भी एस्ट्रो टर्फ नहीं लग पाया है। हमारी खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी एस्ट्रो टर्फ न होने के कारण मात खा जाती हैं। महिला टीम क्वार्टर फाइनल तक तो पहुंच जाती है, पर यहां पर उसके सामने एस्ट्रो टर्फ में खेलने वाली टीमें आ जाती हैं और हमारी टीमें मात खा जाती हैं।

० एस्ट्रो टर्फ के अलावा और किसी सुविधा की दरकार है?

०० हॉकी की अकादमी बहुत जरूरी है। अगर प्रदेश में हॉकी अकादमी होती तो दुर्ग की खिलाड़ी सबा अंजुम को बाहर जाकर खेलना नहीं पड़ता और उनके खेल का फायदा छत्तीसगढ़ को मिलता।

० आपके समय के खेल और आज के खेल में क्या अंतर है?

०० जब हम लोग खेलते थे तो सुविधाओं का बहुत ज्यादा अभाव था, आज सुविधाएं बहुत मिल रही हैं। हम लोग किट के लिए तरस जाते थे, आज खिलाडिय़ों को किट आसानी से मिल जाती है। रेलवे में होने के बाद भी हम लोगों को किट नहीं मिलती थी, कहा जाता था भारतीय टीम से खेल रही हैं तो किट भी वहां से मिलनी चाहिए।

० प्रदेश सरकार खेलों के लिए जो कर रही है उससे संतुष्ट हैं?

०० इसमें शक नहीं है कि छत्तीसगढ़ में खेल और खिलाडिय़ों के लिए सरकार बहुत कुछ कर रही है, लेकिन सबसे जरूरी है खिलाडिय़ों के लिए रोजगार उपलब्ध करवाना। सरकार ने उत्कृष्ट खिलाड़ी घोषित करने का काम तो किया है, पर इसके नियम ठीक नहीं है।

० कैसे नियम होने चाहिए?


०० नियम ऐसे हों जिससे सभी खेलों को फायदा हो। अभी जो नियम हैं, उससे पदक जीतने वाले कुछ ही खेलों को फायदा होगा। मप्र में लगातार तीन राष्ट्रीय स्पर्धाओं में खेलने वालों को उत्कृष्ट खिलाड़ी घोषित किया जाता था, ऐसा ही कुछ अपने राज्य में भी होना चाहिए।

० राजधानी में खेल सुविधाओं के बारे में क्या सोचती है?



०० यह अपने राज्य का दुर्भाग्य है कि राजधानी का वह स्पोट्र्स कॉम्पलेक्स छत्तीसगढ़ बनने के ९ साल बाद भी नहीं बन पाया है जिसके लिए हम लोगों ने २३ साल पहले १९८६ में जयस्तंभ चौक में भूख हड़ताल की थी। मैदान का अभाव खिलाड़ी दो दशक से ज्यादा समय से झेल रहे हैं। हम लोगों से काफी पहले ही सोच लिया था कि रायपुर के स्पोट्र्स कॉम्पलेक्स के मैदान में हमारे बच्चों को खेलने नसीब हो जाए तो बड़ी बात होगी। राजधानी में खेल मैदानों की सुविधाएं बढ़ानी चाहिए।

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