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ललित शर्मा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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रविवार, फ़रवरी 27, 2011

अब लिखने का मन ही नहीं होता

दो-तीन पहले की बात है अचानक ललित शर्मा का फोन आया और उन्होंने पूछा आज-कल कहां हैं, नजर ही नहीं आ रहे हैं।
हमने कहा- हम तो यहीं हैं कहां जाएँगे।
उन्होंने कहा कि मैं ब्लाग की बात कर रहा हूं।
हमने कहा कि अब क्या बताएं मित्र ब्लाग जगत में इतने ’यादा गंदगी करने वाले आ गए हैं कि अब लिखने का मन ही नहीं होता है।
हम बता दें कि जब हमने ब्लाग जगत में कदम रखा था तो हम बहुत खुश थे, लेकिन धीरे-धीरे यह बात सामने आने लगी कि यहां पर अच्छा करने वालों की टांगे खींचने वाले और गंदगी फैलाने वाले ’यादा हंै। हमने ऐसे में जब किसी भी गुटबाजी से किनारा किया तो हमें ’यादा परेशान किया जाने लगा। ऐसे में हमने सोचा कि यार ये सब हम किसके लिए कर रहे हैं, ब्लाग लिख कर हमें कोई पद्मश्री या राष्ट्रपति पदक तो मिलना नहीं है कि हम लोगों की गंदी बातें सुनकर लिखते रहे। ऐसे में हमने सोच लिया कि यार जब मन होगा लिखेंगे, नहीं होगा तो नहीं लिखेंगे। क्यों कर हम किसी को कुछ भी कहने का मौका दें। वैसे भी ब्लाग निजी संपति होता है इसमें क्या लिखना है, यह ब्लाग स्वामी तय करता है न कि कोई गंदी मानसिकता वाला इंसान तय करेगा कि हमें क्या लिखना है।
बहरहाल पहले ब्लाग का जो जुनून था वह अब समाप्त हो गया है, हमारा लिखने का मन तो नहीं था, फिर सोचा कि यार अगर पूरी तरह से हम हार मान जाएंगे तो यह तो बुजदिली होगी, ऐसे में हम सोच रहे हैं कि जिस दिन लगेगा कि कुछ लिखना है तो जरूर लिखेंगे। हमने अपने ब्लाग में वैसे भी टिप्पणियों का रास्ता पूरी तरह से बंद कर दिया है, हम कभी भी टिप्पणियों के लिए नहीं लिखते हैं। अगर वास्तव में कोई हमारा मित्र अपने विचारों से हम अवगत करवाना चाहता है तो वह जरूर हमारे ब्लाग की सदस्यता लेकर अपने विचार हमें भेजा सकता है। वैसे हमारे बहुत मित्रों के पास हमारा मोबाइल नंबर भी हैं, वे कई बार बात भी करते रहते हैं।

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सोमवार, सितंबर 27, 2010

ललित शर्मा दिखे और गायब हो गए...

 

दो दिन पहले की बात है, हम प्रेस से रोज की मीटिंग के बाद करीब 12 बजे लौट रहे थे। अचानक सिविल लाइन के पास पीछे से आवाज आई, साँई..., हम समझ गए कि ये अपने ललित शर्मा जी हैं। हमें इस तरह से और कोई आवाज नहीं देता है। हमने पीछे मुड़कर देखा को हमारे पीछे ललिल शर्मा ही थे। उनसे काफी समय बाद मुलाकात हो रही थी, लेकिन यह मुलाकात, मुलाकात जैसी नहीं हुई, चलते-चलते हाल-चाल पूछा। शर्मा जी ने कहा था कि वे शाम तक रायपुर में हैं, लेकिन वे शाम को मिले बिना ही गायब हो गए, और हम उनको रस-मलाई खिलाने का वादा पूरा नहीं कर सके। 
शनिवार को जब ललित शर्मा मिले थे, तो उस समय हम भी एक जरूरी काम से जा रहे थे, उधर संभवत: शर्मा जी भी जल्दी में थे। चलते-चलते थोड़ी सी बातें हुईं, उनके ललित कला डाट इन पर कुछ बात हुई। हमने उनको यह भी बताया कि यार आज तबीयत कुछ ठीक नहीं है, इसलिए हम ब्लाग चौपालमें भी कुछ नहीं लिख सके हैं औैर राजतंत्र में भी कुछ नहीं लिखा है। शर्मा जी से हमने पूछा कब तक हैं रायपुर में।  उन्होंने कहा कि शाम तक हैं। हमने कहा चलिए फिर जब खाली होंगे तो मिलते हैं, लेकिन लगता है कि शर्मा जी को उस दिन फुर्सत ही नहीं ंमिली और वे हमसे बिना मिले ही वापस चले गए। हमने उस दिन सोचा था कि अब शर्मा जी मिल गए हैं तो हम उनको अपने वादे कि रस-मलाई खिला ही दें, लेकिन उन्होंने मौका ही नहीं दिया। बहरहाल अबकि शर्मा जी आएंगे तो उनको जरूर रस-मलाई खिला देंगे, ये वादा है।

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रविवार, सितंबर 19, 2010

ब्लागर मित्र अशोक बजाज से हुई मुलाकात

दो दिन पहले की बात है, हम प्रेस में बैठे काम कर रहे थे, तभी अचानक अशोक बजाज का प्रेस आना हुआ। उन्होंने हमसे मिलते ही पूछा और क्या हाल-चाल है आपके ब्लाग का। हमने बताया ठीक है। उन्होंने अपने ब्लाग के बारे में पूछा कि हमारा ब्लाग कैसे चल रहा है। हमने कहा आप तो एक अच्छे काम में लगे हैं तो वो कैसे अच्छा नहीं होगा। हम बता दें कि श्री बजाज जी छत्तीसगढ़ को हरा-भरा करने के विशेष अभियान में लगे हैं। इस अभियान को जन-जन तक पहुंचाने के लिए वे अपने ब्लाग में हरियर अभियान की बातें भी लिखते हैं।
अशोक बजाज को हम काफी पहले से जानते हैं, लेकिन हमें यह मालूम नहीं था कि वे भी ब्लाग लिखते हैं। लेकिन इधर उनको हमने एक ब्लागर के रूप में भी जाना है। वैसे वे अच्छे नेता हैं। वे जिला पंचायत के अध्यक्ष रहे हैं। उनसे हमारा सरोकार एक नेता की वजह से ज्यादा रहा। एक बात और यह कि श्री बजाज पुराने रेडियो श्रोता रहे हैं और हम भी कभी रेडियो श्रोता हुआ करते थे। बहरहाल हमें कई बार यह खबर मिली थी कि श्री बजाज जी हमसे बात करना चाहते हैं। रायपुर में पिछले माह हुए रेडियो श्रोता सम्मेलन में भी हमें बुलाया गया था, पर हम नहीं जा पाए। श्री बजाज जी से बात करने का समय ही नहीं मिल रहा था, ऐसे में अचानक जब वे प्रेस आए तो सौभाग्यवश उनसे मुलाकात हो गई। अब मुलाकात हुई तो बात भी हुई। बात ज्यादा नहीं हुई क्योंकि एक तो प्रेस में काम का समय था, फिर बजाज जी को भी कहीं और जाना था। बस अपने-अपने ब्लागों पर ही थोड़ी सी चर्चा हो पाई। बजाज जी ने जहां हमें यह बताया कि वे ब्लाग के लिए रात को समय दे पाते हैं, वहीं हमने उनको बताया हमारे पास सुबह का समय ही रहता है जिसमें एक घंटे का समय ब्लाग के लिए निकालते हैं। श्री बजाज जी ने हमसे यह भी पूछा कि ललित शर्मा को बधाई दी या नहीं क्योंकि उसी दिन श्री शर्मा जी की एक वेबसाइड का मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने लोकार्पण किया था। हमने बताया कि संजीव तिवारी के ब्लाग में उनको बधाई दी है, इसी के साथ बजाज जी के ब्लाग में हमने दूसरे दिन भी उनको बधाई दी। वैसे तो बजाज जी से हमारा हमेशा मिलना होता रहा है, पर एक ब्लागर के रूप में उनसे यह पहली मुलाकात थी, वैसे अब मुलाकातों का सिलसिला चलता रहेगा और संभवत: अब जब भी मुलाकात होगी तो ब्लाग जगत पर चर्चा जरूर होगी।

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सोमवार, मई 17, 2010

हम भी बन गए चर्चाकार- ललित शर्मा का चमत्कार

हमें ब्लाग 4 वार्ता में पिछले एक सप्ताह से लगातार चर्चा कर रहे हैं। चर्चा करने में हमें भी मजा आने लगा है। हमें चर्चाकार बनाने का सारा श्रेय भाई ललित शर्मा को जाता है। उनकी प्रेरणा से ही हम चर्चा करने लगे हैं। आज हमें लगता है कि हम अकेले भी सब कर सकते हैं।
जब ललित शर्मा ने ब्लाग जगत को एक चर्चा मंच देने के लिए ब्लाग 4 वार्ता का आगाज किया था और हमें भी एक दिन चर्चा करने के लिए इसमें आमंत्रित किया था, तब हमें लगता था कि यार चर्चा करना तो बड़ा कठिन काम है इसको हम अपने व्यस्त समय में कैसे कर पाएंगे। हमने जब अपने मन की बात शर्मा जी को बताई थी तो उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में कहा था कि साई इसमें परेशान होने की जरूरत नहीं है, मेरे पास एक ऐसा चत्मकारिक फार्मूला है जिससे चर्चा करने में न सिर्फ आपको आसानी होगी, बल्कि मजा भी आएगा। उन्होंने जब रायपुर आकर हमें इस फार्मूले से अवगत करवाया था, तो हम भी दंग रह गए थे। आज उसी फार्मूले के दम पर हम लगातार चर्चा करने में सफल हो रहे हैं।
इधर जब हमने ब्लाग 4 वार्ता को खाली जाते देखा था तो हमें अच्छा नहीं लगा था कि शर्मा जी का तैयार किया एक ब्लाग पौधा मुरझा रहा है, ऐसे में हमने उनसे कह दिया था कि जिस दिन कोई चर्चा करने वाला न हो हमें बता दिया करे। ऐसे में शर्मा जी ने कहा कि जिस दिन भी लगे कोई चर्चा ड्राफ्ट में नहीं है आप बेशक चर्चा कर दिया करें। ऐेसे में हम हमने पिछले सप्ताह एक दिन का छोड़कर छह दिन चर्चा की। एक दिन गिरीश बिलौरे जी ने चर्चा की थी। आज भी हमें इस पोस्ट के बाद चर्चा को अंजाम देना है। यहां पर हमें एक बात याद आ रही है कि जब छत्तीसगढ़ से चिट्ठा चर्चा प्रारंभ करने की बात पिछले साल हुई थी तो हमारे एक वरिष्ठ ब्लागर मित्र ने एक तरह से उलहाना दिया था कि यहां के ब्लागर इतने परिपक्व नहीं हंै कि चिट्ठा चर्चा को अच्छी तरह से अंजाम दे सके। यह बात किसी को बुरी लगी हो या न लगी हो लेकिन हमें जरूर लगी थी। उसी दिन हमने भी सोचा था कि यार हम भी जरूर इस चिट्ठा चर्चा वाली बला को देखेंगे कि आखिर ये है क्या। हमें आज इस बात की खुशी है कि आज हम भी चर्चाकार बन गए हैं और हम आज यह कहने में सक्षम हैं कि हम अकेले ही एक चर्चा मंच चला सकते हैं। वैसे ऐसा ही दम अपने ललित शर्मा में है और उन्होंने यह दम दिखाया भी है और हम चर्चा करना सिखाया भी है।
हमारे ब्लागर मित्र जरूर बताएं कि हम चर्चा करने में कितने सफल हो रहे हैं। आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

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मंगलवार, मार्च 16, 2010

अब हम भी करेंगे चर्चा-ललित शर्मा से सीखा संभालना मोर्चा

हमें अब तक तो यही लगता था कि वास्तव में चिट्ठा चर्चा करना बहुत ही कठिन और मुश्किल काम है, लेकिन जिनके पास ललित शर्मा जैसा गुरू हो उनके लिए यह कोई मुश्किल काम नहीं है। ललित जी ने हमें ऐसा गुरू मंत्र दिया है कि अब हम भी चर्चा करने के लिए तैयार हो गए हैं। हम अब ब्लाग 4 वार्ता में नियमित चर्चा करने का प्रयास करेंगे। हम वादा तो नहीं कर सकते हैं, पर प्रयास जरूर करेंगे।




हमने चिट्ठा चर्चा के गुर सीखने के लिए ललित शर्मा के पास अभनपुर जाने का फैसला किया था। हमने बुधवार को अपने अवकाश के दिन उनके पास जाने का कार्यक्रम भी बना लिया था, लेकिन अचानक ललित जी ने रविवार की शाम को बताया कि वे कल यानी सोमवार को रायपुर आ रहे हैं। हमने उनको तत्काल अपने घर आने का न्यौता दे दिया, जिसे उन्होंने मंजूर कर लिया। बात तय हुई कि वे ठीक 12 बजे आ जाएंगे। हमारी पीठ में दर्द के कारण हमने कल प्रेस की मीटिंग में न जाने का फैसला किया था। हमें बस डॉक्टर के पास जाना था। हमने शर्मा जी से कह दिया कि वे 12 बजे आ जाएं। ललित जी पहले भी हमारे घर आ चुके थे, ऐसे में उनको घर तक पहुंचने में कोई परेशानी नहीं होनी थी। शर्मा जी वादे के मुताबिक 12 बजे पहुंच गए और उन्होंने फोन किया कि हम कहां हैं, हमने उनसे कहा कि आप घर पहुंचे हम भी रास्ते में हैं, आ रहे हैं। हमारे घर पहुंचने से पहले शर्मा जी घर पहुंच गए थे।

हम घर पहुंचे तो शर्मा जी वहां विराजमान थे। इसके बाद हम लोग कम्प्युटर से चिपक गए। इस बीच बहुत सी बातों के बीच उन्होंने हमें चिट्ठा चर्चा का गुरू मंत्र बता दिया। अब हम भी तैयार हो गए हैं चिट्ठा चर्चा करने के लिए। शर्मा जी ने हमें जो मंत्र बताया है उससे चर्चा करने में आसानी होगी। हो सकता है शुरुआत में कुछ गलतियां हों, लेकिन हमारा ऐसा प्रयास रहेगा कि हम कोई गलती न करें। लेकिन हम भी इंसान हैं और गलतियां इंसानों से होती ही हैं। बहरहाल हमें इस बात का गर्व है हमें ललित शर्मा जैसे मित्र और गुरू मिले हैं। उनके आर्शीवाद से हम भी अब हर बुधवार को चिट्टा चर्चा करने का प्रयास करेंगे। इसमें हम कितने सफल होते हैं यह तो वक्त बताएगा। लेकिन हम एक बात यहां पर जरूर कहना चाहेंगे कि जब छत्तीसगढ़ से चिट्ठा चर्चा करने की बात सामने आई थी तो अपने ही कुछ मित्रों ने इस पर सवालिया निशान लगाने का प्रयास किया था कि हम लोग ऐसा नहीं कर पाएंगे। हालांकि उनको अकेले ललित शर्मा जी ने ही करारा जवाब दे दिया है, अब हम भी उनके साथ हैं। वैसे शर्मा जी के साथ हम ही नहीं पूरी ब्लाग बिरादरी है, अब यह बात अलग है कि अपने ही लोग अपने घर की प्रतिभा को नहीं पहचानते हैं। कहा जाता है न कि घर की मुर्गी दाल बराबर। तो जिन्होंने भी घर की मुर्गी को दाल बराबर समझने की भूल की है, उनको हम बता दें कि यहां पर कम से कम घर की मुर्गी दाल बराबर नहीं बल्कि घर की मुर्गी शेर बराबर है।

बहरहाल हमारा मकसद कोई विवाद खड़ा करना नहीं बल्कि यह जताना है कि हम छत्तीसगढ़ के ब्लागरों को कम आंकने की कोई गलती न करे, खासकर अपने बीच के ही ब्लागर मित्र।

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सोमवार, मार्च 01, 2010

योगेन्द्र जी आए छत्तीसगढ़ पर छाए



हरियाणा के एक कवि हैं योगेन्द्र मौदगिल जी। हम उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते हैं, पर अचानक उनसे कल मुलाकात हुई और एक छोटी सी मुलाकात के बाद हमें मालूम हुआ कि वे एक अच्छे कवि ही नहीं बल्कि एक जिंदादिल इंसान भी हैं। उनकी कविताओं का रस छत्तीसगढ़ के वासियों को पीने का मौका मिला, और सभी उनकी कविता के रंगों में ऐसे डूबे कि पूछिए ही मत। हम तो बस इतना कह सकते हैं कि योगेन्द्र जी आए और छत्तीसगढ़ पर छाए।

कल सुबह की बात है अचानक भाई ललित शर्मा जी का फोन आया। हाल-चाल पूछने के बाद उन्होंने बताया कि हरियाणा के कवि भाई योगेन्द्र मौदगिल आए हैं। योगेन्द्र जी का ब्लाग भी है। ललित जी ने कहा कि वे रायपुर आ रहे हैं उनको समता से वापस जाना है। योगेन्द्र जी को स्टेशन तक छोडऩे की जिम्मेदारी ललित जी ने हमें दे दी। हमने उनसे कहा कि योगेन्द्र जी को अभनपुर से एक बजे भेजे ताकि तब तक हमारा काम भी समाप्त हो जाएगा। इसी बाच हमने भाई अनिल पुसदकर जी को भी बता दिया कि योगेन्द्र जी आए हैं। सुनकर वे भी प्रसन्न हुए और उन्होंने भी वही बात कही जो हम चाहते थे। कल प्रेस क्लब में होली मिलन का कार्यक्रम था। हर साल वहां पर होली में चलती है हंसी की गोली। सो हमने पहले ही सोचा था कि योगेन्द्र जी को भी इस कार्यक्रम में ले जाकर हंसी की गोली चलाने का पूरा मौका दिया जाएगा।

करीब एक बजे हम प्रेस से निकल कर प्रेस क्लब पहुंच गए। करीब डेढ़ बजे अनिल जी ने पूछा कि योगेन्द्र जी कहां हैं। हमने कहा अभी पता करते हैं। ललित जी से उनका नंबर लेकर उनका मोबाइल खटखटाया तो मालूम हुआ कि वे रायपुर आ गए हैं और बूढ़ापारा के पास हैं। हम फौरन उनको लेने चले गए। उनको लेकर प्रेस क्लब आए। तब तक महफिल सज चुकी थी।

अनिल भाई ने योगेन्द्र जी को सीधे मंच पर आमंत्रित किया और सबसे पहले उनको ही कुछ सुनाने के लिए माइक थमाया गया। उन्होंने अपनी चंद कविताओं से रंग जमा दिया। इसके बाद महफिल चलती रही और योगेन्द्र जी को समझ में आ गया कि इस महफिल में क्या सुनाना है, दूसरे दौर में उन्होंने भी होली के सुरूर वाली चंद लाइनें सुनाईं और खूब तालियां पाईं।

प्रेस क्लब की महफिल समाप्त होने के बाद योगेन्द्र जी को अनिल भाई की गाड़ी में हम लोग स्टेशन छोड़कर आए। योगेन्द्र जी के साथ ज्यादा समय तो बिताने का मौका नहीं मिला, लेकिन जितना भी समय मिला उसमें यह जरूर मालूम हुआ कि वे वास्तव में जिंदादिल इंसान हैं। वैसे भी कविता लिखने और बोलने का काम जिंदा दिल इंसान ही कर सकते हैं। हमें सिर्फ इस बात का अफसोस है कि समय कम होने के कारण हमने कभी उनका ब्लाग नहीं देखा है। लेकिन अपने अनिल भाई जरूर उनका ब्लाग देखते हैं और उन्होंने इस बारे में योगेन्द्र जी से चर्चा भी की। हमें यह भी मालूम हुआ कि भाई योगेन्द्र जी भिलाई में एक कवि सम्मेलन में आए थे और वहां पर अपनी कविताओं से सभी को भाए थे। कल एक और चूक यह हो गई कि हम योगेन्द्र जी की कोई तस्वीर नहीं ले सके. ऐसे में जब हमने यह पोस्ट लिखी तो भाई ललित शर्मा से उनकी एक तस्वीर मांगी तो उन्होंने भेज दी जो पेश है।

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शनिवार, फ़रवरी 06, 2010

पंकज मिश्रा ने फोन पर हो गई बात, पर अफसोस ललित शर्मा ने नहीं हो सकी मुलाकात

हमारे लिए कल का दिन बहुत अच्छा रहा। कल हमने पहली बार पंकज मिश्रा से फोन पर बात की। कल ही हमारे एक और अजीज मित्र ललित शर्मा से मुलाकात होने वाली थी, पर अफसोस की उनसे इसलिए मुलाकात नहीं हो सकी, क्योंकि जिस समय वे हमारी प्रेस पहुंचे थे, हम एक कार्यक्रम में थे।

कल सुबह को जब हम कम्प्यूटर पर बैठे तो हमें भी यह मालूम नहीं था कि हमारे कम्प्यूटर के चालू होते ही हम भी आन लाइन हो जाते हैं। ऐसे में जबकि हम काम कर रहे थे, अचानक नजर पड़ी कि अपने पंकज मिश्रा जी ने हमें चैटिंग में नमस्कार किया। हमने उनको जवाब दिया, फिर बातों का सिलसिला चला। इस बीच हमने उनका मोबाइल नंबर जानने के लिए जब उनसे मोबाइल नंबर पूछते हुए अपना मोबाइल नंबर उनको दिया तो पता चला कि वे आफ लाइन हो गए हैं। ऐसे में हमें लगा कि उन तक हमारा मोबाइल नंबर नहीं पहुंच सका है। वैसे पंकज जी से हमें बात करने की इच्छा उसी समय से थी जबसे उन्होंने हमारा ई-मेल मांगा था। इसके बाद हमने चैटिंग में उनका नाम जोड़ दिया था जिसकी बदौलत कल उनसे चैटिंग में चर्चा हो सकी।

चैटिंग में चर्चा होने के बाद जब प्रेस में मीटिंग के लिए घर से निकले तो रास्ते में हमारे मोबाइल की घंटी बजी। देखा तो नंबर किसी दूसरी दुनिया का ही लगा। हमें एक बार लगा कि शायद यह नंबर अपने समीर लाल जी का है। कारण यह है कि हमने अपने कल की पोस्ट में टिप्पणी लिखी थी कि समीर लाल जी, पाबला जी ने तो नाश्ते का राज खोल दिया। वैसे नाश्ता तो गुप्त एजेंडे में शामिल था। पाबला जी पर यह राज खोलने के लिए एक नाश्ते की पार्टी का जुर्माना हो गया है, अब जब भी भिलाई जाना होगा, नाश्ता का बिल उनको देना पड़ेगा। इस बार तो साथ में ललित शर्मा भी जाएंगे यानी पाबला जी का खर्च ज्यादा होगा।

इस टिप्पणी की वजह से हमें लगा कि शायद समीर भाई को हमसे बात करने की सूझी है और उन्होंने मोबाइल खटखटाया है। हमने मोबाइल उठाया तो उधर से आवाज ही नहीं आई। हम फिर से अपनी बाइक चालू करके चल दिए प्रेस की तरफ। (हम अपनी बाइक एक किनारे खड़ी करके ही बात करते हैं) लेकिन फिर से मोबाइल की घंटी बज उठी। हमें प्रेस की मीटिंग के लिए विलंब हो रहा था, फिर भी हम उस अंजान नंबर के प्राणी से बात करने का मोह त्याग नहीं सके और अपनी बाइक को सड़क के किनारे रोककर मोबाइल उठा लिया।

उधर से जो आवाज आई उसकी कल्पना हमने नहीं की थी। उधर अपने पंकज मिश्रा जी थे। उन्होंने बताया कि उनको चैटिंग में हमारा भेजा गया मोबाइल नंबर मिल गया था। हमें बहुत खुशी हुई कि चलो पंकज जी से आज बात करने का मौका मिल गया। हमने पंकज जी से बातों का सिलसिला प्रारंभ किया और उनको हमने बताया कि हम प्रेस जा रहे हैं 10.30 बजे रोज मीटिंग होती है। हमने पंकज जी को बताया कि रायपुर में एक राष्ट्रीय ब्लागर मीट की तैयारी चल रही है। उन्होंने वादा किया कि वे भी जरूर आएंगे। हमने पंकज जी से क्षमा मांगते हुए बाद में बात करने का वादा किया क्योंकि हमें प्रेस की मीटिंग के लिए विलंब हो रहा था।

पंकज जी से मोबाइल पर बातों के सिलसिले के बाद कल ही ललित शर्मा जी का दोपहर में फोन आया कि वे रायपुर में हैं और शाम को प्रेस आएंगे, हमने उनसे कहा कि शाम को 5 बजे के बाद आए, पर शायद उन्होंने हमारी बात सुनने से पहले ही फोन कट कर दिया, इसका नतीजा यह रहा कि जनाब करीब 4.30 बजे ही प्रेस पहुंच गए। उस समय हम एक कार्यक्रम में थे। ललित जी ने फोन किया तो हमने बताया कि हम तो 5.30 बजे तक प्रेस पहुंच पाएंगे। उन्होंने बताया कि वे प्रेस के पास हैं। उन्होंने हमसे पूछा कि क्या प्रेस में राजकुमार सोनी जी मिलेंगे। हमने उनको बताया कि वे भी 5 बजे के बाद आएंगे। ऐसे में ललित जी ने कहा कि वे वापस अभनपुर जा रहे हैं फिर आएंगे तो मुलाकात होगी।

जहां हमें कल पंकज जी से मोबाइल पर बात करने की अपार खुशी है, वहीं ललित जी से मुलाकात न होने का अफसोस है। वैसे हम लोग मिलते रहते हैं, पर वे रायपुर आए और हमारी मुलाकात नहीं हो सकी इसका हमें मलाल है। जब हम इस पोस्ट को लिखने के लिए रात को बैठे तो ललित जी आन लाइन आ गए। उनसे पोस्ट लिखते-लिखते कुछ चर्चा हो गई। हमने उनको बताया कि एक पोस्ट लिख रहे हैं जिसमें उनका भी नाम है। हमने उनसे कहा कि कल पोस्ट में पढ़े कि उनके नाम का उल्लेख क्यों है।


चलते-चलते एक बात बता दें कि आज का दिन हमारी जिंदगी का एक अहम दिन है। यह अहम दिन क्या है? इसका खुलासा अपने बीएस पाबला जी अपने ब्लाग में शाम को करेंगे, तब तक का इंतजार करें।

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बुधवार, दिसंबर 09, 2009

कोकास जी का कम्प्यूटर भी चढ़ ही गया था टंकी पर



शरद कोकास जी के कम्प्यूटर में अचानक ललित शर्मा जी के एक वारयस का हमला हो गया और उनके कम्प्यूटर की वाट लगते-लगते बच गई। हम लोगों के साथ अगर उस समय बीएस पाबला जी नहीं होते तो शायद कोकास जी के कम्प्यूटर की वाट लग जाती और हमारे साथ ललित शर्मा को भी खानी पड़ती डाट। हमें तो डाट खानी पड़ती लेकिन हमारे पाबला जी का क्या होता, उनके सिर तो एक और तोहमत लग जाती कि उनके कारण कोकास जी का कम्प्यूटर भी टंकी पर चढ़ गया।

दरअसल जब भिलाई की ब्लागर मीट के समय हम सब लोग शरद कोकास जी के यहां बैठे थे तो जैसे ही बातों का सिलसिला प्रारंभ हुआ तो एक तरफ जहां पाबला जी का कैमरा चमकने लगा, वहीं दूसरी तरफ हमारे कैमरे ने भी अपना कमाल दिखाना प्रारंभ कर दिया। फिर ऐसे में भला संजीव तिवारी का कैमरा कैसे चुप रह सकता था, उन्होंने भी दे दनादन फोटो लेने प्रारंभ कर दिए। फोटोग्राफी के बाद कोई शाम को करीब चार बजे जब सबके पेट में चुहों ने अपना ताड़ंव नृत्य प्रारंभ किया तो सबको खाने की याद आई। वैसे इसके पहले श्रीमती शरद कोकास ने जरूर लगातार हम सबके पेट का ख्याल रखा था और बातों के दौर के बीच में सभी का मुंह चल ही रहा था। लेकिन खाना खाने तो जाना ही था, क्योंकि किसी की जेब तो हल्की करनी ही थी। ऐसे में जबकि सबको होटल जाना था तो विचार किया गया कि इससे पहले सभी के कैमरों के फोटो कोकास जी के कम्प्यूटर में डाले जाएं और जिनके पास पैन ड्राइव है उसमें रख लिए जाएं ताकि फिर किसी को शिकायत न रहे कि हमें तो फोटो नहीं मिली। ऐसे में कोकास जी के कम्प्यटूर में सभी कैमरों के फोटो कम्प्यूटर में डालने का काम हमने किया। सभी फोटो जब एक स्थान पर एकत्रित हो गए तो सबसे पहले हमने संजीव तिवारी जी के पैन ड्राइव में फोटो डाले। इसके बाद नंबर आया हमारे पैन ड्राइव का। जब पाबला जी के पैन ड्राइव का नंबर आया तो उन्होंने कहा कि इस पैन ड्राइव को तो हम ही कम्प्यूटर में लगाएंगे। बाद में कारण मालूम हुआ कि उनका पैन ड्राइव भी कम खतरनाक नहीं है, बड़े झटके मारता है।

बहरहाल पाबला जी ने भी अपने पैन ड्राइव में फोटो ले लिए। इसके बाद अंतिम पैन ड्राइव अपने ललित शर्मा जी था उनका पैन ड्राइव जैसे ही कम्प्यूटर में लगाया, तत्काल एक वायरस से कोकास जी के कम्प्यूटर पर ठीक उसी तरह से हमला कर दिया मानो कोकास जी का कम्प्यूटर भारत हो और शर्मा जी का पैन ड्राइव पाकिस्तान का कोई आतंकवादी। फिर क्या था। कम्प्यूटर से वायरस हटाने की मशक्कत प्रारंभ हुई। सभी अपना-अपना तर्क दे रहे थे। उधर कोकास जी के माथे की सिकन बढ़ते जा रही थी, जरूर वे सोच रहे होंगे यार अगर मेरे कम्प्यूटर की वाट लग गई तो अपनी ब्लागिंग का क्या होगा? कहीं कुछ दिन नहीं लिख पाए तो लोग यह न समझने लगे कि हम भी तो टंकी पर नहीं चढ़ गए हैं। उन्होंने तत्काल अपने कम्प्यूटर के डॉक्टर मित्र को फोन लगाकर पूछा कि क्या किया जाए। एक तरफ कोकास जी बात कर रहे थे, दूसरी तरफ अपने पाबला जी कम्प्यूटर को ठीक करने का प्रयास कर रहे थे। इस बीच हमें मजाक सुझा और हमने पाबला जी से कहा पाबला जी कोकास जी का कम्प्यूटर अगर ठीक नहीं हुआ तो सोच लीजिए लोग क्या कहेंगे?

यहां हम बता दें कि जब पाबला जी नई दिल्ली में अजय कुमार झा से मिलकर आए थे और अचानक झा जी के ब्लागिंग से विदा होने की खबर उड़ी थी तो कहा जा रहा था कि और ठहराए अपने घर पर ब्लागर को। हमने पाबला जी से कहा कि अजय झा के घर आप गए थे तो कहा कि झा जी टंकी पर चढ़ गए हैं और अब एक ब्लागर मीट कोकास जी के घर पर हुई तो उनका कम्प्यूटर भी कहीं टंकी पर न चढ़ जाए। पाबला जी को बात समझ आ गई और उन्होंने अपनी सारी ताकत कम्प्यूटर को ठीक करने में लगा दी और उसे ठीक करके ही दम लिया। हम लोग जब तक वहां थे कम्प्यूटर ठीक था, उसके बाद उसका क्या हुआ, यह हमें मालूम नहीं है। अब यह को कोकास जी ही बता सकते हैं कि उनके कम्प्यूटर का क्या हाल है। उसकी बीमारी का अंत हुआ है या नहीं या फिर उसकी वाट लग गई है।

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