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शुक्रवार, दिसंबर 04, 2009

ब्लागिंग का जुनून फिल्मों के जुनून पर भारी

आज हम पर ब्लागिंग का ऐसा जुनून चढ़ा है कि हमें लगता है कि हमें जो बरसों पहले फिल्में देखने का जुनून था उस पर भी यह भारी पड़ रहा है। आज हालत यह है कि जब से ब्लाग जगत में कदम रखा है तब से फिल्में देखने का मौका ही नहीं मिल पा रहा है। वैसे ब्लाग बिरादरी से जुडऩे से पहले भी काफी कम मौके मिलते थे फिल्में देखने के, लेकिन टुकड़ों में ही सही फिल्में देखने का मोह छोड़ नहीं पाते थे। हमें याद है दो दशक के पहले का जमाना जब हम कॉलेज और उससे पहले स्कूल में पढ़ते थे तो अपने गृहनगर भाटापारा से रायपुर फिल्में देखने आते थे और फिल्में देखने का जुनून इतना था कि एक दिन में चार फिल्में देख लेते थे। नई फिल्म लगी तो पहले दिन पहला शो देखते ही थे फिर चाहे टिकट ब्लैक में क्यों न लेनी पड़ती थी। अगर एक दिन में चार फिल्में लगती थीं तो पहले ही दिन सभी फिल्में देख लेते थे।

वास्तव में कहते हैं कि किसी को किसी बात की लत लग जाए तो उसका छूटना मुश्किल होता है। यह बात है तो अच्छी लेकिन तब की स्थिति में जब आपको किसी अच्छी चीज की लत लग जाए जैसे की ब्लागिंग की लत। यह एक ऐसी लत है जिसको छोडऩा कम से कम हम तो नहीं चाहते हैं। वैसे हम बता दें कि हम वो है जो किसी भी लत को एक झटके में छोडऩे की क्षमता रखते हैं। हमने कभी किसी गलत लत से नाता जोड़ा भी नहीं है। हमें चाय पीने का भी कभी शौक नहीं रहा है। चाय पीना प्रारंभ किया तो लगा कि बहुत ज्यादा चाय हो रही है तो छोड़ दी चाय एक झटके में। चाय छोडऩे का हमें अफसोस भी नहीं। लेकिन चाय न पीने की कसम नहीं खाई है कभी-कभार पी लेते हैं।

बहरहाल हम बात कर रहे थे ब्लागिंग और फिल्मों की। हमने ब्लागिंग से फरवरी 2009 में नाता जोड़ा है और इस करीब 10 माह के सफर में हमने पाया है कि हम पर वास्तव में ब्लागिंग का ऐसा जुनून चढ़ा है जैसा कभी हमें फिल्में देखने का था। बात आज से करीब 25 साल पुरानी है जब स्कूल में पढ़ते थे और इसके बाद कॉलेज में आए। उन दिनों हम रायपुर जिले के भाटापारा में रहते थे। तब फिल्मों का काफी क्रेज था। यह वह जमाना था जब अपने छोटे से शहर में नई फिल्में काफी कम लगती थीं। ऐसे में हमारी मित्र मंडली रायपुर ही फिल्में देखने आती थी। जब भी नई फिल्म लगती थी हम लोग आ जाते थे रायपुर। हमें याद है जब रायपुर आते थे तो एक ही दिन में सुबह 12 बजे से लेकर 12 से 3, 3 से 6, 6 से 9 और 9 से 12 बजे रात तक यानी चार फिल्में देखकर ही रात को वापस जाते थे। कई बार तो चार की चार नई फिल्में देखने का मौका मिल जाता था, कई बार दो नई फिल्में तो दो पुरानी फिल्में देख लेते थे। कुल मिलाकर रायपुर आने का मलतब रहता था कि सुबह से लेकर रात तक फिल्में देखना है। हमें याद है जब भी परीक्षाओं का समय रहता था तो हम परीक्षा के पहले रात को फिल्म जरूर देखते थे और सुबह उठकर पढ़ते थे और परीक्षा देने जाते थे।

हमारे फिल्म देखने के इस दौर को पत्रकारिता की नौकरी में आने के बाद भी विराम नहीं लगा। लेकिन फिल्में देखना कम हो गया। इसके बाद आया वह समय भी जब काम के कारण फिल्में देखना बिलकुल कम हो गया। और अब तो करीब 10 साल से ज्यादा का समय हो गया सिनेमाहाल में फिल्म देखने जा ही नहीं पाते हैं। पहले सीडी लाकर टीवी पर फिल्में देख लेते थे। कम्प्यूटर लेने के बाद कम्प्यूटर में ही फिल्में रख लेते थे और मौका मिलते ही टूकड़ों में फिल्में देख लेते थे। लेकिन अब तो लगता है कि जैसा फिल्मों से नाता टूट ही गया है। कारण अपने को इस समय एक मात्र नशा ब्लागिंग का हो गया है।

अब जो भी समय मिलता है उसमें लिखने और ब्लाग पढऩे का काम करते हैं। हमे अफसोस इस बात का है कि इतना समय ही नहीं मिल पाता है कि ज्यादा ब्लाग पढ़ सके और कुछ टिप्पणी कर सके। अब जब समय ही नहीं मिलता है तो फिल्में कहां से देखेंगे। सोचते हैं कि फिर से टूकड़ों में फिल्में देखना प्रारंभ करें लेकिन जैसे ही कम्प्यूटर में किसी फिल्में को प्रारंभ करते हैं फिर सोचते हैं कि यार फिल्में तो फिर देख लेंगे पहले ब्लाग जगत में देखा जाए कि क्या है। खैर हमें इस बात का कोई अफसोस नहीं है कि ब्लागिंग के कारण हमारा फिल्में देखना छूट गया है। वैसे भी आज ऐसी फिल्में बनती कहां हैं जिसको देखने के लिए जुनून हो, पहले की फिल्मों को देखने के लिए लोग घंटों लाइन लगाते थे।

8 टिप्पणियाँ:

Dr. Smt. ajit gupta शुक्र दिस॰ 04, 09:17:00 am 2009  

हर कार्य की एक उम्र होती है, इसलिए उसी के हिसाब से प्राथमिकताएं तय होती हैं। जो भी नया है उसी का नशा पहले चढ़ता है। लेकिन मैं आपको दाद देती हूँ कि आप एक दिन में चार फिल्‍में देख लेते थे। ऐसा लग रहा है जैसे आजकल बुफे सिस्‍टम का खाना हो। एक ही प्‍लेट में गुलाबजामुन भी और दहीबड़ा भी।

ललित शर्मा शुक्र दिस॰ 04, 09:30:00 am 2009  

सुबह 5 बजे से ही लगे हैं स्टुडेंट कन्शेसन वाली खिड्की पे आई कार्ड लेके, एक टिकिट तुम्हारे लिए भी लेना है क्या।.......किसकी? अरे यार! ब्लाग दर्शन की और किसकी।

Udan Tashtari शुक्र दिस॰ 04, 09:41:00 am 2009  

कभी तो समय निकाल कर, नशे मे ही सही, हमारे टॉकिज में भी आओ..हर हफ्ते दो फिल्म बदलते हैं. :) ललित जी स्कूटर में ही बैठकर चले आओ!! हा हा!

Udan Tashtari शुक्र दिस॰ 04, 09:41:00 am 2009  

कभी तो समय निकाल कर, नशे मे ही सही, हमारे टॉकिज में भी आओ..हर हफ्ते दो फिल्म बदलते हैं. :) ललित जी स्कूटर में ही बैठकर चले आओ!! हा हा!

RAJNISH PARIHAR शुक्र दिस॰ 04, 01:03:00 pm 2009  

आपकी लत तो चलो अच्छी है,बाकि पिक्चर न देखने के लिए वे खुद जिम्मेवार है...देखने वाली फिल्मे बन ही कहाँ रही है...सो ब्लोगिंग करो...

vinod,  शुक्र दिस॰ 04, 05:04:00 pm 2009  

आपकी लत तो चलो अच्छी है

विनोद कुमार पांडेय शुक्र दिस॰ 04, 08:32:00 pm 2009  

बिल्कुल सही जुनून कुछ ऐसा ही है इस शौक का..

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