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मंगलवार, दिसंबर 22, 2009

लखपति ही लड़ सकते हैं पार्षद चुनाव

अगर आप वास्तव में ईमानदार हैं और समाज की सेवा करना चाहते हैं। इसके लिए आपने पहले कदम पर अपने वार्ड की समस्याओं से आम जनों को मुक्ति दिलाने का मन बनाया है और आप वार्ड के पार्षद का ही चुनाव लडऩा चाहते हैं, तो सबसे पहले यह तय कर लें कि आपकी अंटी में लाखों रुपए हैं या नहीं। पार्षद चुनाव लडऩा किसी आम आदमी के बस की बात नहीं है। भले आपके मन में जनसेवा करने की सच्ची लगन है, लेकिन आपके पास दमड़ी नहीं है तो भूल जाइये कि आप चुनाव लड़ सकते हैं। अगर आप चुनाव लडऩे के लिए मैदान में आ भी गए तो यह तय है कि आपको मीडिया के गिद्ध इस बुरी तरह से नोंचने के लिए पहुंच जाएंगे कि आप यह सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि यार मैंने किस मनहूस घड़ी में चुनाव लडऩे का मन बनाया था।

अपने राज्य में नगरीय चुनाव हो रहे हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के 70 वार्डों में भी चुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस पार्टी के साथ कई निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में हैं। जो भी प्रत्याशी मैदान में हैं, वे इस बात को लेकर बहुत ज्यादा परेशान हंै कि क्यों कर वे चुनाव लड़ रहे हैं। चुनाव लडऩे वालों में से शायद ही कोई ऐसा होगा जो जनसेवा की भावना से चुनाव मैदान में होगा। हर कोई वार्ड पार्षद का चुनाव जीतकर अपना भला करने की मानसिकता से ही चुनाव मैदान में है। अब उसका भला तो तब होगा जब वह मैदान मार लेगा। लेकिन इनके मैदान मारने से पहले अपने मीडिया वाले जरूर अपना मैदान मारने को तैयार रहते हैं। रायपुर से इतने ज्यादा अखबार निकलते हैं कि अगर कोई प्रत्याशी हर अखबार को थोड़ा-थोड़ा सा ही नजराना देने के बारे में सोचे तो बजट एक लाख से ज्यादा हो जाएगा। लेकिन किसी के अपने मुताबिक सोचने से भी कुछ नहीं होना है। बड़े अखबारों के पार्षद चुनाव के लिए पैकेज सुनकर ही आदमी को चक्कर आने लगता है।

रायपुर के कुछ बड़े अखबारों का पैकेज एक पार्षद के लिए 50 हजार से कम नहीं था। जब बड़े अखबारों का पैकेज इतना है तो फिर भला छोटे अखबार कैसे कम हो सकते हैं। छोटे से छोटा अखबार वाला हर पार्षद प्रतिनिधि के पास पहुंच गया अपना पैकेज लेने। किसी का भी पैकेज 10 हजार से कम नहीं दिख रहा था। ऐसे में अगर कोई पार्षद 10 छोटे अखबारों को ही अपना भाग्यविधाता बनाने का मन बनाता है तो उसकी अंटी में प्रिंट मीडिया के लिए ही कम से एक एक लाख होने चाहिए। इलेक्ट्रानिक मीडिया का पैकेज इससे अलग है। इलेक्ट्रानिक मीडिया का हाल भी वैसा ही है। यहां भी चैनलों की बाढ़ है। चैनल वाले भला अखबार वालों से कम पैकेज में कैसे मान सकते है, उनका पैकेज तो और ज्यादा रहता है। कुल मिलाकर आज पार्षद का चुनाव भी आम आदमी लडऩे के बारे में नहीं सोच सकता है।

3 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari मंगल दिस॰ 22, 05:05:00 am 2009  

खासे मंहगे हो गये ये शहरी चुनाव भी!!

ललित शर्मा मंगल दिस॰ 22, 07:14:00 am 2009  

अखबार वाले भी ने्ता की पोल एव "छपास रोग" से ग्रसित होने की कमजोरी जान कर उसका भरपुर लाभ उठाते हैं, जय हो

ललित शर्मा मंगल दिस॰ 22, 07:15:00 am 2009  

लूटतंत्र मे सबकी अपनी-अपनी हिस्सेदारी है।

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