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गुरुवार, दिसंबर 03, 2009

हम तो चोर नंबर वन हैं

जीके अवधिया जी के ब्लाग में कल नजरें पड़ी तो देखा कि उन्होंने एक पोस्ट लिखी है
हां मैं चोर हूं.... दूसरों के मैटर चुराता हूं इस पोस्ट के अंत में उन्होंने पूछा कि क्या आप भी चोर हैं? उनका कहना है कि ऐसा कोई नहीं होगा जिसने जिंदगी में कुछ चुराया न होगा। अवधिया जी की यह बात बिलकुल ठीक है। जब कृष्ण भगवान माखन चुराकर खाते थे तो दुनिया में ऐसा कौन सा इंसान होगा जिसने कम से कम बचपन में अपनी पसंद की कोई चीज घर में चुराकर नहीं खाई होगी। जहां तक हमारा सवाल है तो हम अपने को दूसरों की खबरें और लेख चुराने में नंबर वन मानते हैं। हालांकि ऐसे कम मौके आए हैं जब हमको किसी का लेख नहीं बल्कि उसका विषय लेकर लिखना पड़ा है, लेकिन खबरों को चुराने की मजबूरी जरूर रही है। लेकिन इसे भी चोरी नहीं कहा जा सकता है। यह तो एक कला है चौर्यकला जिसमें हम हमेशा नंबर वन रहे हैं और रहेंगे।

हम अवधिया जी के साथ ब्लाग बिरादरी को बताना चाहते हैं कि चौर्यकला में तो हम शुरू से उस्ताद रहे हैं। हम बता दें कि अगर कोई लेख कहीं भी किसी भी विषय में छपा हो हम उस लेख का विषय लेकर तत्काल दूसरा लेख और कोई कविता है तो उस कविता का जवाब लिखने का काम बरसों से करते रहे हैं। मजाल है कि कोई पहचान जाए कि हमने उसके लेख से लेख बनाया है। इसी तरह से शाम के अखबारों से खबर लेकर बनाने का काम बरसों से किया है। खबरों से तत्थों को लेकर खबर को अपने शब्दों में लिख दिया जाए तो कोई दावा नहीं कर सकता है कि खबर उसकी है। लेकिन आप अगर खबर को पूरी की पूरी जस का तस लिख दें तो कोई भी कह सकता है कि यह तो उसकी खबर है।

हमें याद है जब आज से 20 साल पहले रायपुर के समाचार पत्र अमृत-संदेश में काम करते थे तो कई बार ऐसा मौका आता था कि हम सिटी में अकेले रिपोर्टर होते थे। ऐसे समय में शाम के अखबारों का सहारा होता था। उस समय रायपुर से एक तरूण छत्तीसगढ़ और दूसरा अग्रदूत ही शाम के अखबार हुआ करते थे। तब हम इन अखबारों को मंगा कर उनमें छपी खबरों से खबरें बनाने का काम करते थे लेकिन कभी इन अखबारों के रिपोर्टर को इस बात का पता ही नहीं चला कि हम उनके अखबार देखकर खबरें बना लेते हैं। एक बार शाम के एक अखबार के एक रिपोर्टर ने हमसे कहा कि आपके अखबार में छपी एक खबर उनके अखबार से हूबहू ली गई है। हमने पूछा कब के अखबार की बात कर रहे हैं तो उन्होंने बताया कि आज के अखबार की। तब हमने संतोष की सांस ली क्योंकि जिस दिन की बात वे कर रहे थे एक तो उस दिन हम छूटी में थे, दूसरे हम इतना अच्छी तरह से जानते हैं कि अगर हम कोई खबर बनाएंगे तो कोई कह ही नहीं सकता है कि यह खबर उनके अखबार ले ली गई है। तब हमने अपने पत्रकार मित्र से कहा कि मित्र हम तो उस दिन आपके अखबार का सहारा लेते हैं जिस दिन अकेले होते हैं लेकिन क्या आपको इसके पहले कभी लगा कि हमारे अखबार में आपके अखबार की कोई खबर छपी है। उन्होंने कहा कि ऐसा तो कभी नहीं लगा।

हमने जो काम 20 साल पहले करते थे, वह अब भी कर लेते हैं। कोई दो साल पहले हम एक न्यूज एजेंसी हिन्दुस्तान समाचार में काम करते थे, वहां पर महज हम दो रिपोर्टर थे ऐसे में सभी जगह रिपोर्टिंग करने जाना संभव नहीं था ऐसे में शाम के अखबारों का ही सहारा होता था। वैसे शाम के अखबारों का सहारा सभी रिपोर्टर लेते हैं। और यह गलत भी नहीं है। लेकिन यहां पर इस बात की सावधानी जरूर होनी चाहिए कि आप खबरों को बनाते समय इस बात का जरूर ध्यान रखे कि आपकी खबर बिलकुल अलग होनी चाहिए। खबर या लेख बिलकुल इस तरह से चुराने की कला में माहिर होना जैसे कोई आंखों से सूरमा चुरा ले तो पता न चले। और हम आज तक ऐेसा ही काम करते रहे हैं।

हम बता दें कि दो दिन पहले ही हमने ललित शर्मा जी के ब्लाग में जांजगीर चांपा के असली पा के बारे में जानकार देखी। हम इस असली पा के बारे में दैनिक नवभारत में पहले ही खबर पढ़ चुके थे। शर्मा जी के ब्लाग में दी गई जानकारी छोटी लगी, ऐसे में हमने सोचा इस पर हम लिखेंगे। हमने दैनिक नवभारत की खबर से तत्थों को लेकर एक नई खबर एक नए एंगल से अपने शब्दों में बनाकर अपने ब्लाग में पेश की थी। इसे कहते हैं आंखों में से सूरमा चुराना।

हम अंत में अवधिया जी को धन्यवाद देना चाहते हैं कि उनकी वजह से जहां हमें भी अपने इस हूनर को सार्वजानिक करने का मौका मिला, वहीं पुरानी यादों में जाने का भी अवसर मिला। एक बात और अब यह बात भी साबित हो गई है कि कम से कम हम तो अवधिया जी के मौसेरे भाई हैं ही।

19 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari गुरु दिस॰ 03, 06:45:00 am 2009  

सब ही कन्फेशन बॉक्स में खड़े नजर आयेंगे यहाँ. :)

M VERMA गुरु दिस॰ 03, 06:49:00 am 2009  

सुरमा चुराने वालो का आँखो का खयाल रखना चाहिये.

करण समस्तीपुरी गुरु दिस॰ 03, 07:00:00 am 2009  

बहुत खूब व्यंग्य कर रंग बहुत गहरा चढ़ा है, जनाब !

करण समस्तीपुरी गुरु दिस॰ 03, 07:00:00 am 2009  

बहुत खूब व्यंग्य कर रंग बहुत गहरा चढ़ा है, जनाब !

करण समस्तीपुरी गुरु दिस॰ 03, 07:00:00 am 2009  

बहुत खूब व्यंग्य कर रंग बहुत गहरा चढ़ा है, जनाब !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक गुरु दिस॰ 03, 07:12:00 am 2009  

हम चोर नही हैं!
केवल पिष्टपेषण करते हैं!

RAJNISH PARIHAR गुरु दिस॰ 03, 07:52:00 am 2009  

बहुत ही अच्छी प्रस्तुती.....

sourabha,  गुरु दिस॰ 03, 08:33:00 am 2009  

खुद को चोर बोलने के लिए हिम्मत मांगता है बंधु आपकी हिम्मत को बंदन करते हैं

ganesh गुरु दिस॰ 03, 08:39:00 am 2009  

हर कोई माखन चोर की तरह बचपन में चोरी करता है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, बचपन के गुर जवानी में भी काम आते हैं।

guru गुरु दिस॰ 03, 09:00:00 am 2009  

आप तो लिखाड़ नंबर वन हैं गुरु

ललित शर्मा गुरु दिस॰ 03, 09:29:00 am 2009  

हमे तो आपके कौशल का आज पता चला, लेकिन यार चलते-चलते हमे भी लपेटे मे ले लिए, सोचा होगा एक दो भले- हा हा हा

महफूज़ अली गुरु दिस॰ 03, 09:45:00 am 2009  

बहुत खूब ...........बहुत ही अच्छी प्रस्तुती....

जी.के. अवधिया गुरु दिस॰ 03, 02:42:00 pm 2009  

चलो कम से कम आपने स्वीकार किया कि आप मेरे मौसेरे भाई हैं। छोटे भाई होने के नाते हमारा स्नेह हमेशा आप के साथ है।

वैसे चोरी करना अपराध नहीं है, अपराध है चोरी का पकड़ा जाना!

atul kumar,  गुरु दिस॰ 03, 06:48:00 pm 2009  

आप तो लिखाड़ नंबर वन हैं

suman,  गुरु दिस॰ 03, 06:53:00 pm 2009  

चोर-चोर का शोर मचा कर करें लोग बदनाम कौन यहां पर चोर नही है सबका है यही काम

majhar khan,  गुरु दिस॰ 03, 06:53:00 pm 2009  

अरे काहे खुद को चोर कह रहे हैं मित्र, लेखक कभी चोर नहीं होता

बी एस पाबला गुरु दिस॰ 03, 08:18:00 pm 2009  

अवधिया जी ठीक कह रहे 'चोरी करना अपराध नहीं है, अपराध है चोरी का पकड़ा जाना' :-)

बी एस पाबला

काशिफ़ आरिफ़ गुरु दिस॰ 03, 09:33:00 pm 2009  

अरे बाप रे यहां तो चोरों की पुरी जमात मौजुद है........

santosh,  शुक्र दिस॰ 04, 12:25:00 am 2009  

अवधिया जी ठीक कह रहे 'चोरी करना अपराध नहीं है, अपराध है चोरी का पकड़ा जाना'

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