लेखन का धंधा-मत करो गंदा
किसी को भी ज्यादा स्वंतत्रता मिल जाए तो उसका वह किस तरह से सदउपयोग करने की बजाए दुरुउपयोग करने लगता है इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमें ब्लाग जगत में नजर आता है। ब्लाग जगत को अपनी अभिव्यक्ति पेश करने के लिए प्रारंभ किया गया है, लेकिन न जाने यहां कैसे-कैसे लोग हैं जो अभिव्यक्ति के नाम पर न जाने क्या-क्या लिखते हैं। ब्लाग जगत में हमें कदम रखें अभी जुम्मा-जुम्मा चार दिन ही हुए हैं। लेकिन इन चार दिनों में ब्लाग जगत में बमुश्किल 10 प्रतिशत ब्लाग जो हमने पढ़े हैं उससे हमें ऐसा लगता है कि कई लोग ब्लाग का सही उपयोग नहीं कर रहे हैं। ब्लाग पर लोग न जाने क्या-क्या लिख देते हैं। एक पोस्ट अपने शुरुआती दौर में देखी थी जिस पोस्ट में रंड़ी शब्द का उपयोग लगातार किया गया था। किसी पोस्ट की आलोचना में भी हमारे लेखक भाई सीमाएं लांघते नजर आते हैं। पोस्ट लेखकों के तो नाम-पते तक फर्जी हैं। ऐसे में हमें लगता है कि ब्लाग जगत के लिए भी कोई न कोई कानून तो होना ही चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो कोई छद्म नाम का ब्लागर कभी किसी की मां-बहन एक करने से भी नहीं चूकेगा। वैसे चोरियां करना तो आम बात है ब्लाग जगत में। हो सकता है हमारी बातों से ज्यादातर लोग समहत न हों। लेकिन चूंकि हमें अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त करने की स्वतंत्रता है तो हम कम से कम सही अभिव्यक्ति तो व्यक्त करने से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
हम ब्लाग जगत में इसलिए आएं हैं क्योंकि हम समाज को कुछ अच्छा देने के साथ अपने लेखन की उस मृगतृष्णा को शांत करना चाहते हैं जो अखबार में काम करते हुए पूरी होने वाली नहीं है। वास्तव में आज अखबार में सही लिखने की कदर नहीं होती है। सही लिखने वालों को कोई छापना नहीं चाहता है। ब्लाग जगत में आने से हमारा मकसद तो पूरा होता नजर आ रहा है, लेकिन इसी के साथ एक बात जो हमें खटकती है, वह यह है कि ब्लाग जगत को कुछ लोग अपनी जागीर की तरह समझते हुए उसको गंदा करने में लगे हैं। वास्तव में देखा जाए तो लेखन वह कला है जो माता सरस्वती की देन है। यह कला हर किसी को नसीब नहीं होती है। जिस इंसान को यह कला नसीब होती है वह वास्तव में नसीब वाला होता है। फिर लेखन का एक मतलब यह भी होता है कि आपको अपने लेखन से समाज को एक सही रास्ता दिखाना है। ऐसे में जबकि समाज को सही राह दिखाने का काम करना चौथे स्तंभ यानी अखबारों का काम रहा है तो आज लगता है कि अखबार तो पूरी तरह से पेशेवर हो गए हैं और उनको समाज की कम और अपने विज्ञापनों की चिंता ज्यादा रहती है। ऐसे में किसी अखबार से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह समाज को सही दिशा दिखाने का काम करेगा। इसमें कोई दो मत नहीं है कि आज मीडिया पूरी तरह से अपनी राह भटक गया है और सिर्फ और सिर्फ पैसों के पीछे भाग रहा है। ऐसे समय में जब ब्लाग जगत का आगाज हुआ था तो एक उम्मीद जागी थी कि चलो कम से कम यहां पर तो लेखन पर किसी की लगाम नहीं है और सही लिखने वालों को एक मंच मिल जाएगा। मंच मिला है तो उसका काफी लोग सही उपयोग भी कर रहे हैं और काफी अच्छा लिखते हुए समाज को वह सब देने की कोशिश कर रहे हैं जो समाज को सही दिशा में ले जा सके। हमारे कई ब्लागर मित्र तो ऐसे हैं जो जान की परवाह किए बिना ही ऐसे-ऐसे लेख लिखने का साहस करते हैं जिसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। हमारे एक ब्लागर मित्र हैं सुरेश चिपलूनकर इन्होंने भारत की अघोषित प्रधानमंत्री श्रीमती सोनिया गांधी के बारे में लोगों तक ऐसी जानकारी पहुंचाई जो किसी अखबार से मिलने की उम्मीद नहीं की जा सकती। श्री चिपलूनकर ने तो मदर टेरेसा की भी पोल खोलने का काम किया है। ऐसे और भी कई ब्लागर साथी हो सकते हैं जिनके बारे में शायद हमें नए होने की वजह से मालूम नहीं है। वैसे हमारे साथ एक परेशानी यह है कि सुबह के 10 बजे से लेकर रात को कम से कम एक बजे तक अखबार का काम करना रहता है। इतना समय अखबार के लिए देने के बाद काफी कम समय मिलता है जिसमें हम ब्लाग देखते हैं और अपने ब्लाग के लिए कुछ अच्छा लिखने की कोशिश करते हैं।
एक तरफ तो अपने चिपलूनकर भाई है तो दूसरी तरफ अपने अतुल अग्रवाल जी जैसे मित्र हैं जो खुशवंत सिंह जैसे नामी लेखक के गलत लेखन पर उनको लताडऩे से नहीं चूकते हैं। अभी कल ही की बात है हमें विस्फोट डाट काम पर अग्रवाल जी की एक पोस्ट खुशवंत सिंह के लेख के उपर पढऩे को मिली। श्री अग्रवाल जी का विरोध अपनी जगह जायज ही नहीं बहुत ज्यादा जायज है, लेकिन उन्होंने खुशवंत सिंह के लिए जिस तरह के शब्दों का प्रयोग किया, वह एक पत्रकार की भाषा नहीं होनी चाहिए। यह बात तो सब जानते हैं कि खुशवंत सिंह कितना गंदा लिखते हैं, फिर उनके गंदे लेखन का एक हिस्सा हम क्यों बनें। श्री अग्रवाल जी को एक ब्लागर मित्र कोतुक जी ने भी सही सलाह दी है कि खुशवंत सिंह तो चर्चा में आने के लिए ऐसा लिख रहे हैं उनकी बातों को उठाकर आप उनका रास्ता आसान कर रहे हैं। यह सच बात है कि गंदा लिखने वालों पर सबको गुस्सा आता है लेकिन उस गुस्से को कलम का रूप देकर उस गंदे लेखन को और ज्यादा प्रचारित करने की बजाए ऐसा प्रयास करना चाहिए कि ऐसा गंदा लेखन समाज के सामने ही न आ सके। आज ब्लाग जगत को भी गंदा करने वालों को इस जगत से बाहर करने की जरूरत है। इसके लिए सही लेखन करने वालों को एक जुट होने की जरूरत है। इसी के साथ हमारा ऐसा मानना है कि अगर ऐसा हो पा रहा है तो इसके लिए कहीं न कहीं गुगल सर्च भी जिम्मेदार है। गुगल को हम जिम्मेदार इसलिए मान रहे हैं क्योंकि गुगल बिना किसी सही जानकारी के किसी को भी ब्लाग बनाने की इजाजत दे देता है। ऐसे में गंदा लेखन करने वाले छद्म नामों से ब्लाक बना लेते हैं और जब जिसको मर्जी आई गालियां दे दीं। हमने जब एक पोस्ट महिलाओं के कपड़ों पर लिखी थी तो हमारा मकसद किसी महिला की स्वतंत्रता पर हमला कदापि नहीं था। हमने तो एक साधारण बात लिखी थी, लेकिन इस बात का बिना वजह तूल देने का काम किया गया। हम तो ब्लाग जगत में नए हैं। लेकिन ब्लाग जगत में नए हैं तो इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि हम किसी का जवाब देना नहीं जानते हैं। पत्रकारिता में अपने जीवन के 23 साल खफा दिए हैं और इन सालों में बड़े-बड़े संपादकों के साथ काम करने का और उनसे काफी कुछ सीखने का मौका मिला है, ऐसे में ऐसी कोई बात नहीं है जिसका जवाब हमारे पास न हो। लेकिन हमने उस लेख के बाद चंद मित्रों की टिप्पणियों के जबाव के बाद आगे जवाब इसलिए नहीं दिया क्योंकि हमारे वरिष्ठ साथी पत्रकार भाई अनिल पुसदकर ने हमें सलाह दी थी कि हमें कपड़ों के पीछे भागने की बजाए अपने लेखन को छत्तीसगढ़ के भले के लिए प्रयोग करना चाहिए। हमने उनकी सलाह पर काम करना प्रारंभ किया है, लेकिन हमारी एक आदत यह है कि हमें गलत बात बर्दाश्त नहीं होती है, यही वजह है कि हम आज ब्लाग जगत की गंदगी पर लिखने की हिम्मत कर रहे हैं। हम यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि हमारी इस पोस्ट से काफी लोग नाखुश और नाराज होंगे। लेकिन उनकी नाराजगी न उठानी पड़े इसलिए हम अपनी कलम को बंद कर दें यह तो संभव नहीं है।
बहरहाल हमारा ऐसा मानना है कि गुगल को ब्लाग जगत के लिए कुछ तो नियम कायदे बनाने चाहिए ताकि जहां कोई छद्म नाम से ब्लाग न बना सके, वहीं किसी के ब्लाग के कोई सरे आम चोरी न करे सके, जैसा लगातार हो रहा है। जब एक मोबाइल नंबर लेने के लिए काफी खाना पूर्ति करनी पड़ती है तो फिर अपनी अभिव्यक्ति को लोगों तक पहुंचाने के लिए मिलने वाले एक मंच के लिए ऐसा कुछ क्यों नहीं किया जाता कि सही लोग सामने आएं और अपने सही नाम पते के साथ ब्लाग बनाएं। महिलाओं को अगर फोटो और पते में छूट दी जाती है तो कोई बात नहीं, लेकिन उनसे फोटो और सही पता लेकर गुगल अपने रिकॉर्ड में रख सकता है ताकि कोई किसी महिला के नाम से ब्लाग न बना लें। इसमें कोई दो मत नहीं है कि कई बंधुओं ने तो महिलाओं के नाम से भी ब्लाग बना रखे हैं। अभी तो हमें इस ब्लाग जगत में आए चंद दिन हुए हैं और हमें इतना कुछ लगने लगा है आगे हमें और पढऩे और समझने का मौका मिलेगा तो और जो बातें हमारे मानसपटल पर आएंगी उनको जरूर अपने ब्लाग जगत के साथियों के साथ बांटने का काम करेंगे। फिलहाल इतना ही। वैसे हमारी पोस्ट काफी लंबी हो गई है। लिखने को तो अब भी काफी कुछ बचा है ऐसा लगता है, लेकिन बाकी अगली बार।
ब्लाग जगत के सम्मानीय साथियों से आग्रह है कि वे अपने विचारों से जरूर अवगत कराएं। सभी तरह से विचारों का स्वागत है।





