राजनीति के साथ हर विषय पर लेख पढने को मिलेंगे....

अच्छे मालिक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अच्छे मालिक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, मई 05, 2009

अपना ही धंधा-मत करो गंदा

सुबह-सुबह मोबाइल की घंटी बजी... हमने जैसे ही मोबाइल उठाया उधर से प्यार भरी गालियों की बौछार शुरू हो गई। अबे गधे, नालायक, बेवकूफ और न जाने क्या-क्या। इन गालियों के साथ कहा गया कि तू कब सुधरेगा बे, तेरे को समझ में नहीं आता है क्या कि एक तेरे सच्चाई लिखने से कुछ होना जाना नहीं है। क्या पड़ी है तुझे ही राजा हरिशचन्द्र बनने की और वो एक ऐसी कौम के लिए जो खुद कौन सा दुध की धुली है। कम से कम तुमको अपने उस पेशे से तो खिलवाड़ करके उसको गंदा नहीं करना चाहिए जिसमें तुम भी काम करते हो।

ये सारी बातें हमसे हमारे एक मित्र जो कि हमारे बड़े भाई की तरह हैं, उन्होंने उस संदर्भ में कही जो पोस्ट हमने दो दिन पहले प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर लिखी थी। उन्होंने बताया कि आज ही वे बाहर से लौटे हैं और आते ही तेरा ब्लाग देखा तो मुझसे रहा नहीं गया और तुम्हें फोन लगा लिया। हमारे ये मित्र ऐसे हैं जिनकी बातों का हम चाहकर भी बुरा नहीं मान सकते हैं। कारण यह है कि हम उनका बहुत सम्मान करते हैं। बहरहाल उन्होंने हमें प्यार भरी गालियों के साथ बहुत सी नसीहतें भी दे डालीं कि क्या जरूरत है अखबार मालिकों को खराब कहने की जबकि तू भी जानता है कि तुम्हारी कौम यानी कि पत्रकार भी कैसे हैं। क्या आज के पत्रकार अपना काम पूरी ईमानदारी से करते हैं? तुम अगर ईमानदार हो तो इसका यह मतलब तो नहीं है कि सारे ही ईमानदार हैं? ऐसा ही अखबार मालिकों के साथ है क्या सारे अखबार मालिक ऐसे हैं जैसा कि तूने लिखा है? मैंने उनसे प्रतिवाद किया कि मैंने तो ऐसा कुछ नहीं लिखा है कि सारे मालिक ऐसे हैं। वैसे भी हम भी यह बात जानते हैं कि इस दुनिया में अच्छे और खराब लोग हैं उसी तरह से अखबारों में भी कुछ अच्छे मालिक हैं, लेकिन इसके बाद भी चूंकि वे पेशेवर हैं और उनको अखबार निकालना है तो उनको भी समझौता करना पड़ता है। हमारी इस बात पर उन्होंने कहा कि क्या तुम अपनी पत्रिका के लिए पेशेवर नहीं हो? क्या तुमने कभी समझौता नहीं किया है? हमने तपाक से जवाब दिया कि आप भी जानते हैं कि हम किसी ऐसी शर्त पर विज्ञापन लेने का काम नहीं करते हैं जिसमें हमें कहा जाए कि हमको सरकार या फिर किसी भी एक्स-वाई-जेड के खिलाफ कुछ नहीं लिखना है। आप जानते हैं भाई साहब ऐसे में हम पत्रिका निकालना बंद करना पसंद करेंगे।

ये तो रहीं हमारे एक परम मित्र और हमारे आदणीय भाई साहब की बातें जो हमें अपनी उस पोस्ट - कलम हो गई मालिकों की गुलाम-पत्रकार नहीं कर सकते मर्जी से काम - के संदर्भ में सुननी पड़ीं। वैसे इस पोस्ट को लेकर हमें हमारे संपादक ने भी कहा था कि जैसा हमने लिखा है वैसा हर अखबार मालिक नहीं होता है। संभवत: उनकी बातों में दम है, क्योंकि उनके पास हमसे ज्यादा अनुभव है। लेकिन हमने तो अपने वे विचार रखे थे जो हमने अपने पत्रकारिता जीवन में महसूस किए और झेले हैं। हो सकता है हमारे उन विचारों से हर कोई सहमत न हो और हमारे वे विचार छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के संदर्भ में ज्यादा ठीक बैठते हों। लेकिन हमको नहीं लगता है कि यहां से जुदा दूसरे राज्यों की पत्रकारिता हो सकती है। हमें तो फिर भी ऐसा लगता है कि दूसरे राज्यों की तुलना में अपने राज्य की पत्रकारिता काफी अच्छी है। यहां के पत्रकार और अखबार मालिक भी ठीक हैं। हमने जो लिखा है उसके पीछे सच्चाई है, लेकिन हम यह मानते हैं कि वास्तव में हर अखबार के मालिक ऐसे नहीं होते हैं। लेकिन क्या चंद अखबार मालिकों के सही होने से चौथा स्तंभ बचा रहेगा यह एक यक्ष प्रश्न है।

इधर हमारे एक ब्लाग बिरादरी के एक मित्र ने अपने ब्लाग में पत्रकारों के बारे में लिखा है कि पत्रकार आज खेमों में बंटे हुए हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि आज वास्तव में पत्रकार राजनैतिक पार्टियों में एक तो अपनी रूचि और दूसरे अपने फायदे के कारण बंटे हुए हैं। इस ब्लागर मित्र ने अपने ब्लाग में एक बड़ी सच्चाई यह भी लिखी है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया। यह एक कड़वी सच्चाई है कि वास्तव में सच्चाई लिखने वाले चाहे वे पत्रकार हों या फिर अखबार मालिक उनका हश्र अच्छा नहीं होता है। पत्रकारों को नौकरी से बाहर कर दिया जाता है तो अखबार मालिकों को सत्ता में बैठी सरकारें विज्ञापनों से वंचित कर देती हैं। लेकिन इसका यह मलतब तो कदापि नहीं है कि सच्चाई का दामन छोड़ दिया जाए।

हम अपने उन मित्र और परम आदरणीय भाई साहब की उस बात से इंकार नहीं करते हैं कि कम से कम हमें अपने उस पेशे को गंदा करने का काम नहीं करना चाहिए जिससे हम जुड़े हैं। लेकिन सोचने वाली बात यह कि हमारे पेशे के बारे में हमसे ज्यादा अच्छा कौन जानता है। फिर अगर हमारे पेशे की कोई दूसरा बुराई करेगा तो क्या हमको गुस्सा नहीं आएगा, भले हम अपने पेशे की सच्चाई जानते हों लेकिन जब हमें कोई दूसरा सच का आईना दिखाने की कोशिश करता है तो बुरा तो लगता है न। ऐसे में भलाई इसी में है कि खुद ही सच का आईना देखने का काम किया जाए और दूसरो को भी दिखाया जाए ताकि इस अपने कौम की कुछ तो लाज बची रहे और कोई यह न कहें कि देखों पत्रकार बिरादरी को कैसे दूसरे लोग लताड़ रहे हैं।

Read more...

सोमवार, मई 04, 2009

वोट नहीं नोट

दक्षिण अफ्रीका में अपनी आईपीएल टीम को छोड़कर किंग खान यानी शाहरुख खान जब भारत लौटे थे तो उन्होंने इसके पीछे का कारण मतदान यानी वोट को बताया था कि वे मतदान करना चाहते हैं इसलिए लौटे हैं। लेकिन हकीकत का पर्दाफाश तो इसके बाद हुआ कि जवाब वास्तव में वोट देने की मोहब्बत में नहीं बल्कि नोट कमाने की चाह में भारत लौटे थे।

दरअसल किंग खान को एक निजी समारोह में अपने डांस के जलवे दिखाने के लिए तीन करोड़ रुपए का ऑफर था। भला किंग खान इतने बड़े ऑफर को कैसे ठुकरा सकते थे। सो खान साहब वापस लौटे। अब जबकि उनको लौटना था तो उन्होंने इसके लिए बहाना बनाया कि उनको वोट देना है। अगर खान मियां यह कहते हुए लौटते की उनको एक डांस के लिए जाना है शायद यह सवाल खड़ा होता कि खान मियां को अपने डांस और फिल्मों से इतना ही ज्यादा लगाव है तो वे आखिर आईपीएल से क्यों जुड़े। मान गए किंग खान बहाने बनाना तो कोई आप से सीखे। अब यह आपको तय करना है कि वास्तव में किंग खान को वोट से मतलब है या फिर नोट से ।


आपके विचार आमंत्रित हैं।

Read more...

रविवार, मई 03, 2009

कलम हो गई मालिकों की गुलाम-पत्रकार नहीं कर सकते मर्जी से काम

प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर विशेष:

आज प्रेस स्वतंत्रता दिवस है। यहां पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में प्रेस स्वतंत्र है? क्या वास्तव में प्रेस में काम करने वाले पत्रकारों की कलम ऐसा कुछ लिखने के लिए स्वतंत्र है जिससे समाज और देश का भला हो? इसके जवाब में यही बातें सामने आती हैं कि न तो आज प्रेस स्वतंत्र है और न ही पत्रकार की कलम। हकीकत यह है कि प्रेस जहां सरकार के हाथों में नाचने वाली कठपुतली हो गई है, वहीं पत्रकार की कलम मालिकों की गुलाम हो गई है। आज जहां कोई प्रेस यह दावा नहीं कर सकती है कि वह पूरी तरह से स्वतंत्र है और उसके अखबार में वही छपता है जो उसके पत्रकार लिखते हैं। आज कोई पत्रकार भी यह दावा नहीं कर सकता है कि वह जिस हकीकत को लिखते हैं उसको छापने का हक उनके पास है। अगर हकीकत यही है तो फिर काहे का प्रेस स्वतंत्रता दिवस।
आज प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर हम वो सब लिखने का साहस कर रहे हैं जो हम लिखना तो बरसों से चाह रहे थे, पर जानते थे कि हमारे लिखे को कोई छापने वाला नहीं है। लेकिन आज हमारे मन में बरसों से भरी आग को सबके सामने रखने के लिए हमारे पास एक ब्लाग है जिसमें लिखने के लिए हमें कम से कम किसी अखबार के मालिक या फिर मालिक के चहेते संपादक की मंजूरी की जरूरत नहीं है। हम पत्रकारिता से करीब 25 सालों से जुड़े हैं। 20 साल तो प्रेस में नौकरी करते हो गए हैं। इसके पहले के पांच साल ग्रामीण संवाददाता के रूप में काम किया। हमने जब लिखने के लिए कलम उठाई थी तब हम यही सोचकर पत्रकारिता में आए थे कि हम समाज और देश के लिए जो लिखेंगे वो छपेगा तो अपने समाज और देश का कुछ तो भला होगा। लेकिन हम तब नहीं जानते थे कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं कि तरह पत्रकारिता का काम भी वैसा ही है। हम जब काम करने लगे तो हमें धीरे-धीरे अहसास होने लगा कि पत्रकार नाम का जो प्राणी होता है वो दुनिया के लिए तो सबका संकटमोचक होता है, पर हकीकत में ऐसा है नहीं।

आप एक पत्रकार हैं तो आपसे आपका समाज और आपके नाते-रिश्तेदार और सभी परिचित यह उम्मीद करते हैं कि उनके साथ अगर कहीं कोई अन्याय या फिर किसी तरह की भी ज्यादती हो रही है तो आपकी कलम उसके खिलाफ जहर उगले और आप उनको न्याय दिलाने का काम करें। लेकिन क्या कोई पत्रकार ऐसा कर पाता है? यह सवाल किसी भी पत्रकार से पूछा जाए तो उसका जवाब देने में वह सोचने लगेगा। क्योंकि हकीकत यह है कि कोई भी पत्रकार ऐसा कुछ भी लिखने की हिम्मत नहीं कर सकता है जो उसके अखबार मालिक को पसंद न हो। पसंद न हो का मतलब क्या है उसको भी समझना होगा। आज अखबार पूरी तरह से पेशेवर हो गए हैं। अखबारों में वही खबरें प्रकाशित की जाती हैं जिससे अखबार मालिकों को फायदा नजर आता है। समाज के सरोकार से जुड़ी काफी कम खबरों को ही अखबारों में स्थान मिल पाता है। यह होती है मालिकों की पसंद। अगर कोई पत्रकार एक असहाय अबला के लिए कुछ लिखना चाहता है, या फिर किसी गरीब परिवार की दास्तान लिखना चाहता है तो उसको ऐसा लिखने नहीं दिया जाता है। इन सब बातों को छोड़ भी दिया जाए तो एक पत्रकार खुद के साथ हो रहे अन्याय के बारे में भी अगर लिखना चाहे तो उसे लिखने नहीं दिया जाता है।

ऐसा हमारे साथ भी कई बार हो चुका है। हमारा वैसे खेल पत्रकारिता से ज्यादा नाता रहा है। ऐसे में हमने अपने राज्य के साथ देश के खेल और खिलाडिय़ों के साथ होने वाले अन्याय के लिए आवाज उठाने के मकसद से ही अपनी एक खेल पत्रिका खेलगढ़ का प्रकाशन प्रारंभ किया है। हमारी इस पत्रिका में हम वही छापते हैं जिसके बारे में हमें लगता है कि इससे खेल और खिलाडिय़ों का भला होगा। हमारी इस पत्रिका पर हमारा ही अधिकार है ऐसे में हम अपनी मर्जी से अपनी कलम का उपयोग तो कर सकते हैं। सबसे पहले हमने ही महिला खिलाडिय़ों के साथ होने वाले यौन शोषण का मामला उठाने का काम किया है। ऐसे और कई मुद्दे हैं जो हमने उठाए हैं।

बहरहाल हम उस मुद्दे पर लौटे जिसकी बात कर रहे हैं। हमारे एक पत्रकार मित्र ने अपने अखबार के लिए एक गरीब सब्जी वाली का साक्षात्कार लिया और उसको बनाकर संपादक के टेबल पर रखा तो इसके जवाब में उस पत्रकार को यह कहा गया कि इस सब्जी वाली का साक्षात्कार छापने से अखबार का क्या भला होगा। अगर साक्षात्कार छापना है तो किसी बड़े उद्योगपति के बच्चे का लेकर आओ जिसके छपने से कम से कम उस उद्योगपति का विज्ञापन तो मिलेगा। यह महज एक उदाहरण है। ऐसे अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं। वास्तव में देखा जाए तो आज अखबारों को चलाने का काम सरकारें कर रहीं हैं। सरकार के खिलाफ खबरें छाप कर आप अखबार निकाल ही नहीं सकते हैं। सरकार से जो विज्ञापन मिलते हैं उसी से अखबार का खर्च चलता है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि अगर सरकारी विज्ञापन न मिलें तो अखबार छपे ही नहीं। लेकिन इसका यह मतलब तो कदापि नहीं है न कि अखबार पूरी तरह से सरकार के गुलाम हों जाएं जैसा की आज हो गया है। किसी भी पत्रकार में इतना दम नहीं है कि वह किसी मंत्री के खिलाफ कुछ लिखने की हिम्मत करे। कुछ अखबारों में ऐसी खबरें अगर छपती हैं तो इसके पीछे का कारण भी सब जानते हैं कि उस अखबार को उस मंत्री ने उसके मन मुताबिक विज्ञापन नहीं दिया होगा। इधर खबर छपी नहीं कि उधर मंत्री जी पहुंच गए अखबार के मालिक के दरबार में सजदा करने के लिए। सजदा करने के साथ वहां पर दान पेटी में अपनी इच्छा के अनुसार नहीं बल्कि अखबार मालिक की इच्छा के अनुसार चढ़ावा भी चढ़ाना पड़ा।

एक वह समय था जब अखबारों को देश का चौथा स्तंभ कहा जाता था। वैसे कहा तो आज भी अखबार को चौथा स्तंभ जाता है, पर यह स्तंभ अब हिल चुका है और यह नेताओं, मंत्रियों और उद्योगपतियों के सहारे के बिना खड़े नहीं रह सकता है। अगर ये अपने हाथ खींच लें को चौथा स्तंभ इतना ज्यादा जर-जर हो चुका है कि उसको गिरने में एक पल का भी समय नहीं लगेगा। ऐसे में जबकि देश के इस चौथे स्तंभ के हाल से हर आम आदमी परिचित हो चुका है और आज सब यह जानते हैं कि अखबार कैसे चल रहे हैं तो फिर ऐसे में प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाने का कोई मतलब रह जाता है क्या? हमारी नजर में तो इसका कोई मतलब नहीं है। इस दिवस पर जो आयोजन होंगे उन आयोजनों में भी किसी वरिष्ठ पत्रकार को नहीं बल्कि किसी बड़े मंत्री या नेता को बुलाया जाएगा जो वही पुराना राग अलापेगे कि अखबार देश का चौथा स्तंभ है यह सरकार बना भी सकता है और सरकार गिरा भी सकता है। मगर क्या ऐसा आज के जमाने में होना संभव है कि एक अखबार सरकार बना दे। ऐसा करने का दम हमें तो किसी भी अखबार में नजर नहीं आता है। लिखने को तो और बहुत कुछ है। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर धाराप्रवाह लिखा जा सकता है, लेकिन ज्यादा लंबा लिखने से हमारी ब्लाग बिरादरी के भाई ही बोर हो जाते हैं। इसलिए फिलहाल इतना ही फिर आगे मौका मिला और ब्लाग बिरादरी के मित्रों ने चाहा तो जरूर और लिखा जाएगा। लिखने के लिए बहुत से किस्से हैं जिनको आगे जरूर लिखा जाएगा।

ब्लाग बिरादरी के मित्रों के विचार हम इस बारे में जरूर जानना चाहेगे। तो आप अपने विचारों से हमें जरूर अवगत कराएं। आपके विचारों का इंतजार रहेगा।

Read more...

शनिवार, मई 02, 2009

एक तरफ पानी की बेवजह बहती धार-दूसरी तरफ पानी के लिए लोग बेजार

अपने राज्य छत्तीसगढ़ में इस समय चारों तरफ पानी की मारामारी चल रही है। एक तरफ ऐसे लोग ज्यादा हैं जिनको पानी नसीब नहीं हो रहा है, तो दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जिनके पास पानी की कमी नहीं है, लेकिन इनको पानी की कदर नहीं है। जिनको पानी की कदर नहीं है, उन पर पानी के लिए तरसने वालों को काफी गुस्सा आता है। लेकिन उनकी यह मजबूरी है कि वे ऐसे लोगों का कुछ नहीं कर पाते हैं, लेकिन जो लोग ऐसे लोगों का कुछ कर सकते हैं वे कुछ करना नहीं चाहते हैं। ऐसे में ही बूंद-बूंद पानी को तरसने वालों का आक्रोश फूटता है तो वे अफसरों की बजाने के लिए पहुंच जाते हैं उनके दफ्तर में और तब होती है उनको चूडिय़ां भेट करने से लेकर ऐसे अफसरों के घरों के नल कनेक्शन काट देने की बात। लेकिन ये सिर्फ बातें ही होती है ऐसा कोई कर नहीं कप पाता है। काश ऐसा करने का साहस दिखाने का काम किया जाता तो जरूर अफसरों को मालूम होता कि पानी की असली कीमत क्या है।

छत्तीसगढ़ इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है। इस गर्मी में से तो लोग परेशान हैं ही, ऊपर से आलम यह है कि पानी के लिए भी लोगों को तरसना पड़ रहा है। जिनको पानी नसीब नहीं होता है उनकी बातें सुनने पर मालूम होता है कि उनके दिलो-दिमाग में कितना गुस्सा है। एक दिन पहले की बात है कबीरनगर में पानी की कमी को देखते हुए वहां की महिलाओं ने फैसला किया कि गृह निर्माण मंडल के दफ्तर में जाकर अफसरों को खरी-खरी सुनाने के साथ उनको चूडिय़ां भेंट की जाएं क्योंकि ऐसे अफसर उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे हैं जो पम्पों से पानी खींच रहे हैं और पानी की बर्बादी कर रहे हैं।

जब महिला मंडली का यह फैसला चल रहा था कि मंडल के दफ्तर में जाना है, तब वहां पर महिला मंडली की महिलाएं अपनी-अपनी समस्याएं भी बता रहीं थीं। एक महिला ने कहा कि हमारे घर के पास एक जनाब रहते हैं उनकी टंकी फूल होने के बाद भी उनको होश नहीं रहता है, जनाब आराम से उठते हैं तो पता चलता है कि पानी बेभाव के बह रहा है। एक और जनाब का भी यही हाल है। उनके कूलर में सीधे पाइप लगा हुआ है। जनाब सोते रहते हैं और पानी बाहर बहते रहते है। इस महिला का कहना था कि एक तरफ हम पति-पत्नी एक-एक बाल्टी पानी के झगड़ा करते रहते हैं और दूसरी तरफ लोग मजे से बिजली की खफत करके पानी की बर्बादी करते रहते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ अधिकारी कुछ करते भी नहीं है। ऐसी ही बातें हर दूसरी महिला बात रही थी।

बहरहाल जब यह महिला मंडली दूसरे दिन मंडल के दफ्तर में गई तो वहां पर अफसरों को खरी खोटी सुनाने में किसी ने कमी नहीं दी। कई महिलाओं ने एक स्वर में कहा कि सभी अफसरों के नल के कनेक्शन काट दो तब इनको समझ में आएगा की पानी की कदर कैसे होती है। अफसरों को चूडिय़ां भी भेंट की गईं। लेकिन इसका नतीजा कुछ नहीं निकला आज भी वहां की महिलाएं पानी के लिए तरह रही हैं और दूसरी तरफ निक्कमे और नाकार लोगों के घरों में पानी बह रहा है। निश्तित ही यह हाल एक अकेले रायपुर का नहीं बल्कि आज देश के हर शहर का है लेकिन इसका क्या किया जाए कि जिसके पास जो चीज है उसकी उसको कदर नहीं है और जिसको उसकी कदर है उसके पास वह चीज है ही नहीं।

Read more...

शुक्रवार, मई 01, 2009

50 हजार हर माह कमाई का देकर झांसा-बेरोजगारों को जा रहा है फांसा

इस मोबाइल 9691157860 नंबर पर लगातार काल करने के बाद अचानक काल लगती है और घंटी बजती है। उधर से मोबाइल उठाया जाता है और प्रारंभ होता है बातों का सिलसिला। सामने वाला पूछता है आप कौन बोल रहे हैं, इधर से मोबाइल लगाने वाला युवक अपना नाम बताता है और कहता है कि मैं आपके विज्ञापन के संदर्भ में बात करना चाहता हूँ । सामने वाला युवक की उम्र के साथ उसकी सारी जानकारी लेता है और फिर उसे कहता है कि आपको सबसे पहले हमारे एकाउंट में दो हजार रुपए जमा करके पंजीयन करवाना पड़ेगा, इसके बाद आपको काम मिल जाएगा। जब उन महानुभव से पूछा जाता है कि आखिर ऐसा कौन सा काम है जिसमें हमें 50 हजार रुपए महीने की कमाई होगी तो उधर से जवाब आता है कि आपको हाईप्रोफाइल महिलाओं की मसाज करनी होगी। एक विजिट का आपको पांच हजार रुपए मिलेगा।

ये बातें न तो किसी फिल्म की कहानी है और न ही किसी नाटक का हिस्सा है बल्कि ऐसा हकीकत में कई युवकों के साथ हो रहा है कि 50 हजार रुपए महीने का कमाने के चक्कर में कई युवक लुट रहे हैं। इस बात का खुलासा हमारे मित्र ने करते हुए बताया कि उन्होंने रायपुर के एक बड़े अखबार में एक विज्ञापन देखा कि एक काल करें और घर बैठे कमाएं 50 हजार रुपए मासिक। ऐसे में हमारे मित्र ने उस विज्ञापन की हकीकत जानने के लिए ही लगातार उस नंबर पर काल की। दिन-रात की मेहनत के बाद जहां यह मालूम हुआ कि जिस किसी भी बंदे का वह मोबाइल नंबर है वह अपने मोबाइल को सुबह 11 बजे से प्रारंभ करता है और कुछ ही घंटे इसे चालु रखता है। जब उसका मोबाइल चालु रहता है तब बड़ी मुश्किल से काल लगती है। काफी कोशिशों के बाद जब हमारे मित्र की काल लगी तब उन्होंने ही उस बंदे से जो वार्तालाप किया वही हमने शुरू में लिखा है।

हमारे मित्र ने बताया कि उनसे जब दो हजार रुपए खाते में जमा करने की बात की गई तो उन्होंने उस बंदे से कहा कि वह तो बहुत गरीब हैं और इतने पैसों का इतंजाम करना संभव नहीं होगा। हमारे मित्र ने उससे कहा कि एक विजिट दिलवा दीजिए और उससे ही आप अपने दो हजार रुपए ले लीजिए या फिर उस विजिट के सारे पैसे ही आप रख लेना। लेकिन वह बंदा तैयार नहीं हुआ। तब उससे कहा गया कि अगर मैं कहीं से दो हजार रुपए का इंजताम कर दूं तो मुझे काम कब से मिलेगा, तब उस बंदे ने कहा कि आपका पैसा जमा होते ही आपको एक-दो दिन में पहली विजिट पर भेजा जाएगा। जब उससे कहा गया कि मुझे तो मसाज के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है तो उधर से जवाब आया इससे कुछ नहीं होता है जब आपको पहली विजिट में भेजा जाएगा तो हमारा एक आदमी आपके साथ जाएगा जो आपको समझा देगा कि कैसे मसाज करनी है। जब उससे पूछा गया कि केवल मसाज का ही मामला है न, तो उसने कहा कि आगे और कुछ भी हो सकता है। अब आगे कुछ क्या का खुलासा करने की जरूरत नहीं है।

हमारे मित्र से इस मामले की जानकारी होने के साथ यह भी मालूम हुआ है कि इस एक विज्ञापन के चक्कर में पूरे छत्तीसगढ़ के न जाने कितने बेरोजगार युवक फंसे हैं। जानकार बता रहे हैं कि बेरोजगारों से दो हजार रुपए एचडीएफसी बैंक में जमा करवा लिए जाते हैं उसके बाद न तो वह बंदा फोन उठाता है और न ही बैंक से उस खाते नंबर के बारे में जानने पर कोई कुछ बताता है। यह तो एक छत्तीसगढ़ की और एक विज्ञापन की बात है न जाने ऐसा कितने राज्यों में विज्ञापन देकर ऐसी ठगी करने वाले लोग सक्रिय हैं जिनको देखने वाला कोई नहीं है और देश के बेरोजगार युवक लगातार ऐसे ठग गिरोह के शिकार हो रहे हैं। एक आशंका यह भी है कि हो सकता है कि वास्तव में ऐसे बंदे कुछ हाई प्रोफाइल महिलाओं के लिए मसाज के लिए युवकों का इंतजाम करने का भी काम कर रहे हों।

महानगरों में ऐसे किस्से सामने आते रहे हैं कि महिलाओं की मसाज करने के लिए कम उम्र के युवकों को हायर किया जाता है। महानगरों में कई ऐसे ब्यूटी पार्लर हैं जहां पर महिलाओं की मसाज करने का काम युवक करते हैं। और ऐसे भी ब्यूटी पार्लर हैं जहां पर पुरुषों के मसाज के लिए लड़कियों को रखा जाता है। कई ऐसे मसाज सेंटरों में छापे भी पड़े हैं और गिरफ्तारियां भी हुईं हैं, लेकिन इसके बाद भी ऐसे धंधे कभी बंद नहीं होते हैं। अगर ऐसा धंधा छत्तीसगढ़ में भी पनप रहा तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है लेकिन फिलहाल ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है जिससे ऐसा दावा किया जा सके, लेकिन एक आशंका जरूर है। वैसे इस मामले में ठगी का अंदेशा ज्यादा है। अब ऐसे लोगों की ठगी का शिकार होने वाले युवक इसकी शिकायत भी नहीं करते हैं एक तो महज दो हजार रुपए का मामला रहता है ऊपर से अगर कोई पुलिस के पास जाने की हिम्मत करता भी है तो पुलिस का पहला जवाब रहता है कि ऐसे किसी मोबाइल नंबर पर आपको फोन करने की जरूरत ही क्या थी। यह तो जनाब ऐसे मामले की बात है पुलिस तो उस समय भी ऐसा जवाब देती है जब कोई रांग नंबर से आपके घर में किसी महिला को लगातार परेशान कर रहा होता है, तब पुलिस किसी ऐसे बंदे को पकडऩे की बजाए कहती है कि आप अपने घर का सेल नंबर ही बदल लें। अब ऐसे में भला कौन पुलिस के पास जाना चाहेगा। यही वजह है कि ऐसे ठगी करने वालों के हौसले आज बुलंद हैं और बकायदा बड़े अखबारों में विज्ञापन देकर खुले आम लोगों को ठगने का काम किया जा रहा है।

हमारी जानकारी में यह मामला आया तो इसको हमने सार्वजनिक करने के लिए अपने ब्लाग को चुना है। हम चाहते हैं कि अपनी ब्लाग बिरादरी में अगर कोई मित्र ऐसे मामले के बारे में जानता है तो उसका भी खुलासा करे ताकि लोग सचेत हों और ठगी का शिकार होने से बच सकें।

(ऊपर दिया गया फोन नंबर फर्जी नहीं बल्कि सही है आप भी फोन लगाकर देखें तो मालूम होगा कि वह बंदा ऐसा कहता है या नहीं)

Read more...

गुरुवार, अप्रैल 30, 2009

माता के दरबार में जसगीत की धूम-जो भी आता है जाता है झूम

देवी माता और जसगीत का चोली-दामन का साथ है। लेकिन माता के किसी दरबार में यह नियमित रूप से चले ऐसा देखने को काफी कम मिलता है। खल्लारी में माता के दरबार में साल भर हर मौसम में जसगीत की धूम मचाने का काम आस-पास के ग्रामीण करते हैं।

जब हमें खल्लारी जाने का मौका मिला तो वहां एक बात यह देखने को मिली कि माता के मंदिर के पास परिसर में पांच महिलाओं की एक मंडली जसगीत गाने में लीन थी। महिलाएं जस गीत गा रही थीं और एक कलाकार मादर बजा रहा था। वास्तव में जसगीत की धुन ऐसी होती जो किसी भी संगीत प्रेमी को झूमने पर मजबूर कर दे। ऐसे में हमारा मन भी मचल उठा और हम वहां पर बैठ गए जसगीत का रसपान करने के लिए। भरी गर्मी का समय ऊपर से आलम यह था कि वहां पर बिजली भी बंद थी। लेकिन इसके बाद भी उस जसगीत गाने वाली मंडली में उत्साह कम नहीं था। हमने जहां उनकी कुछ तस्वीर लीं, वहीं उनका जसगीत भी रिकॉर्ड किया। जब जसगीत समाप्त हुआ तो हमने मंडली से जानना चाहा कि वह कहां की है। उन्होंने बताया कि वह पास के गांव कसीबाहरा की है।

इस मंडली ने ही बताया कि वह सुबह को 8 बजे तक यहां पदयात्रा करते हुए पहुंच जाती है और शाम को यहां से वापस अपने गांव जाती है। इस मंडली से ही मालूम हुआ कि आस-पास के 28 गांवों की मंडलियां यहां नियमित आती हैं और हर मौसम में यहां पर जसगीत की धुनी लगती ही है। इन्होंने बताया कि उनकी मंडली यहां पर पिछले पांच साल से आ रही है। माता के दरबार में जसगीत का सिलसिला बरसों से चल रहा है। जसगीत सुनने का जो आनंद आता है उसको शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है। अपने छत्तीसगढ़ के जसगीत की धूम का देश में नहीं बल्कि विदेशों में भी है। कहने को भले यह हिन्दुओं का है, क्योंकि जसगीत का नाता माता से है लेकिन जसगीत गा कर यहां की एक मुस्लिम गायिका शहनाज अख्तर काफी लोकप्रिय हो गई है। जब वह जसगीत गाती हैं तो पूरे तरह से इसमें डूब जाती है। उनके गाए जसगीत की धूम देश-विदेश में है। अगर आपको भी जसगीत का आनंद लेना हो और साथ ही खल्लारी में भीम पांव सहित प्रकृति के नजारों से दो-चार होना हो तो आपका भी यहां स्वागत है।

Read more...

बुधवार, अप्रैल 29, 2009

खल्लारी में हैं प्रकृति के अद्भूत नजारे- जो आंखों को लगते हैं प्यारे

छत्तीसगढ़ में खल्लारी माता के दरबार में ऐसे-ऐसे अद्भूत नजारे हैं जो वास्तव में आंखों को प्यारे लगते हैं। यहां आने के बाद जिस तरह की शांति का अहसास होता है, उस शांति की तलाश आज की भागमभाग वाली जिंदगी में सभी को रहती है। 355 मीटर की ऊंचाई पर 981 सीढिय़ों को लांघने के बाद जब आप ऊपर पहुंचते हैं तो वहां की छटा देखकर सारी थकान गायब हो जाती है।

हम काफी दिनों से किसी ऐसे प्राकृतिक स्थान पर सपरिवार जाना चाहते थे, जहां पहुंच कर शांति से चंद पल गुजार सकें। ऐसे में हमें खल्लारी माता के दरबार की याद आई। अपने पत्रकारिता जीवन में काफी कम वक्त निकलता है जिसमें अपने परिवार के साथ कहीं जा सकें। ऐसे में अचानक खल्लारी जाने का कार्यक्रम बना तो मेरी बिटिया स्वप्निल और बेटा सागर काफी दिनों से लगातार रटते रहे कि पापा खल्लारी कब जाएंगे। अंतत: कार्यक्रम बना और हम निकल पड़े खल्लारी के लिए। वहां जाने से पहले हमको भी मालूम नहीं था कि वहां ऐसे नजारे होंगे जिनको देख कर आंखों को काफी सकून पहुंचेगा। लेकिन वहां जाने पर मालूम हुआ कि वास्तव में पहाड़ों के ऊपर बैठी देवी के दरबार में कितनी शांति मिलती है।

भरी गर्मी में वहां एक बजे पहुंचे और इतनी गर्मी होने के बाद भी 981 सीढिय़ों को चढऩे का सबने साहस दिखाया। हमारे बच्चे तो काफी खुश थे। खासकर हमारा पांच साल का बेटा सागर तो काफी प्रसन्न था। वह तो हंसते-हसंते सभी सीढिय़ां चढ़ गया। सबसे पहले माता के दरबार में उसके ही नन्हें पांव पड़े। बहरहाल वहां जाने के बाद ऊपर से जब नीचे का नजारा देखा तो देखते ही रह गए। पहाड़ के चारों तरफ प्रकृति के ऐसे नजारे हैं जिनको शब्दों में बयान करना आसान नहीं है। ऊपर से जिस दिशा में नजरें जाती थीं लगता था कि प्रकृति अपनी गोद में सारे जहान का सौंदर्य लिए हुए है। एक ऐसा सौंदर्य जिसको हर कोई कैमरे में कैद करना चाहेगा। हमने भी जितना हो सका प्रकृति के उन नजारों को कैमरे में कैद करने का प्रयास किया।




माता के दरबार में जहां माता खल्लारी देवी के दर्शन होते हैं। यहां पर 14 वीं शताब्दी का दंतेश्वरी देवी का ऐतिहासिक मंदिर है। इसके अलावा वहां पर भीम पांव के साथ उनके चूल्हे और साथ ही डोंगा पत्थर है जिसमें राम और लक्ष्मण को दिखाया गया है। दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर, भैरव गुफा, सिंह गुफा, शीत बाबा, राम जानकी निषाद राज, जंवारा खोल, शिव गंगा भागीरथी के भी दर्शन होते हैं। जहां पर भीम पांव हैं वहां की छठा निराली है। यहां पर पहाड़ों के चारों तरफ का सौंदर्य निराला है। ऊपर ने नीचे देखने पर सड़क का भी अद्भूत नजारा नजर आता है। आस-पास जो तालाब हैं वे भी काफी सुंदर लगते हैं।

यह तो रही गर्मी की बात जानकारों को कहना है कि बारिश के समय में यहां की छठा और ज्यादा निराली रहती हैं। जब आसमान में इन्द्रधनुष दिखता है तो पहाड़ के चारों तरफ का नजारा वास्तव में देखने योग्य होता है। तब यहां आने वाले लोग अपने को धन्य समझते हैं। खल्लारी माता के दरबार को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है। आने वाले दर्शनार्थियों के लिए मंदिर के पहले एक गार्डन भी बनाया गया है। पानी आदि की समुचित व्यवस्था है। यहां पर साल में दो बार आने वाली नवरात्रि पर मेला लगता है जिसमें काफी दूर-दूर से लोग आते हैं माता के दरबार में। खल्लारी आने वालों को आस-पास में और भी कई दर्शनीय स्थालों पर जाने का मौका मिल सकता है।

Read more...

मंगलवार, अप्रैल 28, 2009

भीम के पांव देखने हैं तो खल्लारी आएं....

छत्तीसगढ़ में जो भी पर्यटन और धार्मिक स्थल हैं वहां पर रामायण और महाभारत की गाथा से जुड़ी कई चीजें हैं। महाभारत के महारथी और परम शक्तिशाली भीम का छत्तीसगढ़ से नाता रहा है। नाता तो सारे पांडवों का रहा है। राजधानी रायपुर से करीब 80 किलो मीटर की दूरी पर खल्लारी में माता खल्लारी देवी का मंदिर है। पहाड़ों पर बसे इस मंदिर के पास में ही भीम के पैरों के निशानों के साथ उनका चूल्हा भी है जहां पर वे खाना बनाते थे। वैसे यहां आने के बाद महज भीम के पांव के ही दर्शन नहीं होंगे, यहां देखने लायक काफी कुछ है। लेकिन फिलहाल हम चर्चा भीम पांव की करने वाले हैं।

महाभारत के जुड़े पांडवों के छत्तीसगढ़ के कई स्थानों पर आने के अवशेष हैं। वैसे भी बताया जाता है कि सिरपुर में ही देश का प्रमुख चौराहा था और किसी को भी उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम जाने के लिए इस चौराहे से गुजरना ही पड़ता था। ऐसे में जबकि पांडवों को भी अपना अज्ञातवाश काटना था तो उनका छत्तीसगढ़ के जंगलों में आना हुआ। मप्र के पंचमढ़ी में भी पांडवों का स्थान है। बहरहाल हम बातें करें पांच पांडवों में से एक शक्तिशाली भीम की। भीम के बारे में ऐसा कहा जाता है कि विशालकाय शरीर के भीम जब चलते थे तो धरती पर जब उनके पैर पड़ते थे तो लगता था कि धरती हिल रही है। इस बात का प्रमाण वास्तव में भीम के पैर देखने के बाद होता है और इन पैरों को जब 355 मीटर ऊंची पहाड़ी पर देखने से मालूम होता है कि वास्तव में भीम कितने शक्तिशाली रहे होंगे।

पहाड़ी में उनके पैरों के जो निशाने हैं वो एक तरह से पहाड़ के पत्थर में गड्ढ़ा है। जानकारों का ऐसा मानना कि जब भीम यहां आते होंगे तो उनके पैरों से पहाड़ों में भी गड्ढ़ा हो जाता था। जहां पर भीम के पैरों के निशाने हैं, वहीं पर एक और बहुत बड़ा गड्ढ़ा है जिसे उनका चूल्हा बताया जाता है। इस चूल्हें में ही वे खाना बनाते थे। खल्लारी मंदिर के पुजारी महेन्द्र पांडे बताते हैं कि खल्लारी के पास में ही उस लाक्ष्यागृह के अवशेष हैं जिसमें पांडवों को रखा गया था और बाद में इसमें आग लगा दी गई थी। लेकिन पांडव उस आग से बच गए थे क्योंकि विदुर ने उनको आग से बचने का उपाय कुछ इस तरह से बताया कि आग में ऐसा कौन सा जीव है जो बचने का रास्ता निकाल लेते हैं। इसका जवाब पांडवों ने दिया था कि चूहा। चूहा जिस तरह से सुरंग बनाकर अपनी जान बचा लेता है उसी तरह से पांडवों ने भी लाक्ष्यागृह के नीचे से सुरंग बनाकर अपनी जान बचाई थी।

खल्लारी आने पर भीम पांव और चूल्हे के साथ और भी प्रकृति के कई अद्भूत नजारे देखने को मिलते हैं। इन बाकी नजारों की बातें अब बाद में होंगी। फिलहाल इतना ही। खल्लारी तक पहुंचने के लिए पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर तक ट्रेन या फिर हवाई मार्ग से आना पड़ेगा। रायपुर से खल्लारी तक बस से या फिर ट्रेन से जाने का रास्ता है। ट्रेन के रास्ते से जाने पर भीमखोज में उतरना पड़ेगा। बस से सीधे खल्लारी पहुंचा जा सकता है।

Read more...

सोमवार, अप्रैल 27, 2009

राजीव गांधी के हत्यारे की एक खबर से निपटे आठ पुलिस वाले

लिब्रेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम यानी लिट्टे का अध्याय अब समाप्ति की ओर वाला एक लेख हमें अभी कल ही एक अखबार में पढऩे को मिला। इसी के साथ लिट्टे को लेकर लगातार खबरें आ रही हैं कि अब उसका अंत निकट है। इस एक अच्छी खबर ने ही अचानक हमारे मानसपटल पर अपनी एक उस खबर की याद दिला दी जिस खबर के कारण आठ लापरवाह पुलिस वाले निलंबित किए गए थे। हुआ कुछ यूं था कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों में शामिल काने शिवरासन के रायपुर से गुजरने की खबर को रेलवे पुलिस वालों ने गंभीरता से लिया और इस खबर को हमने प्रमुखता से प्रकाशित किया जिसके कारण वो सारे आठ पुलिस वाले निलंबित कर दिए गए जो इस मामले को गंभीरता से न लेने के दोषी थे।

बात आज से करीब डेढ़ दशक से पहले की है। यह वह समय था जब देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की लिट्टे ग्रुप के सदस्यों ने हत्या कर दी थी। इस हत्या में शामिल एक आरोपी काना शिवरासन था। इस आरोपी के बारे में उस समय देश के हर राज्य के हर शहर की पुलिस को यह सूचना दी गई थी कि शिवरासन से मिलती-जुलती शक्ल के आदमी को गिरफ्तार किया जाए। शिवरासन के उस समय कम से कम एक दर्जन ऐसे कैरीकेचर जारी किए गए थे जिस शक्ल में वह हो सकता था। ऐसे में ही रायपुर जीआरपी को बिलासपुर से यह सूचना मिली थी कि अहमदाबाद एक्सप्रेस में शिवरासन से मिलती-जुलती शक्ल का एक आदमी देखा गया है उसकी जांच की जाए। उन दिनों हम रायपुर के समाचार पत्र दैनिक अमृत संदेश में सिटी रिपोर्टर के रूप में काम करते थे और रेलवे का बीट हमारे जिम्मे था। अपने रूटीन के मुताबिक जब शाम को रेलवे स्टेशन गए तो हमारे वहां पहुंचने से कुछ समय पहले ही अहमदाबाद एक्सप्रेस प्लेटफार्म से रवाना हुई थी।

हम स्टेशन के अंदर जैसे ही घुसे तो हमें जीआरपी के जवान मिले जिन्होंने हमें कहा , क्या भईया कुछ समय पहले आते तो देखते यहां से काना शिवरासन गया। हमने उनसे जब पूरा किस्सा पूछा तो उन्होंने बताया कि बिलासपुर से खबर आई थी कि अहमदाबाद में शिवरासन जैसा एक आदमी देखा गया है। हमने उनसे पूछा कि आप लोगों ने क्या किया तो उन्होंने बताया कि भाई साहब अब हम क्या करते, हम लोगों ने जब उस डिब्बे में देखा तो एक आदमी शिवरासन जैसा लग तो रहा था, पर हम लोगों की हिम्मत उससे कुछ पूछने की इसलिए नहीं हुई क्योंकि हमको मालूम था कि शिवरासन के पास ताबीज की शक्ल में साइनाइट है अगर वह खा लेता तो हमारा क्या होता। उनसे जब पूछा गया कि क्या इस मामले की खबर आलाअफसरों को दी गई तो उन्होंने बताया कि किसी को खबर नहीं की गई और एक एएसआई के साथ सात सिपाहियों ने डिब्बे में जाकर देखा था। उनकी इस बात पर हमें काफी गुस्सा आया कि देश के प्रधानमंत्री के हत्यारे का मामला है और उसको भी पुलिस वालों ने गंभीरता से नहीं लिया और किसी आला अफसर को सूचना देना भी जरूरी नहीं समझा।

बहरहाल वह खबर लेकर हम प्रेस आ गए और अपने सिटी चीफ को इस बात की जानकारी देते हुए खबर बना दी। खबर के लिए जब रेलवे पुलिस अधीक्षक से संपर्क किया गया तो उन्होंने इस तरह की किसी भी जानकारी से इंकार किया और बाद में जानकारी देने की बात कही। जब उनको मामले की गंभीरता को बताया गया तो उन्होंने कई घंटों बाद रात के 12 बजे के बाद इस बात की जानकारी दी कि बिलासपुर से ऐसी सूचना तो आई थी इस मामले में जीआरपी ने क्या किया है इसकी जानकारी कल देंगे। उनका पक्ष लेकर खबर प्रकाशित करने के लिए भेजी गई। यहां पर हमने एक काम यह किया कि यह खबर और किसी अखबार को न मिल सके इसके लिए हमने संपादक से आग्रह करके खबर को पहले संस्करण में न छापने को कहा। होता यह है कि दूसरे अखबार वाले हर अखबार का बस्तर का संस्करण मंगवा लेते हैं ताकि देख सकें कि कोई महत्वपूर्ण खबर छूटी तो नहीं है। उस दिन बस्तर संस्करण के बाद के संस्करणों में खबर लगने के कारण दूसरे अखबारों को इस खबर की भनक भी नहीं लगी। दूसरे दिन खबर के छपते ही हंगामा मच गया। राजीव गांधी के हत्यारे के रायपुर से गुजरने की खबर काफी बड़ी थी।

इस खबर के कारण जहां दूसरे अखबार के सिटी रिर्पोटरों की क्लास लगी, वहीं रेलवे एसपी को अंतत: उन सभी आठ पुलिस वालों को निलंबित करना पड़ा। इन सबके निलंबन की जानकारी भी रेलवे एसपी ने सिर्फ हमें दी। इस खबर के बाद भी दूसरे अखबार के सिटी रिर्पोटरों की खूब खींचाई हुई। आज भी जब हमारे कुछ जूनियर साथी रेलवे में रिपोर्टिंग करने जाते हैं तो पुराने पुलिस वाले जहां हमारे बारे में पूछते हैं, वहीं उनको पुलिस वाले ही बताते हैं कि कैसे एक खबर में आठ पुलिस वाले निलंबित हुए थे। हमारे जूनियर जब हमसे आकर उस खबर के बारे में पूछते हैं तो हम उनको बताते हैं। इसी के साथ हमें इस बात पर गर्व होता है कि हमारी एक खबर को आज भी लोग बरसो बाद याद करते हैं और जब जूनियरों को इस खबर के बारे में मालूम होता है तो वो जानने को उत्सुक हो जाते हैं कि आखिर वह खबर क्या थी। वैसे भी पत्रकारों के जीवन में काफी कम ऐसे अवसर आते हैं जब उनकी खबरों को बरसों याद किया जाता है। आज उस बात को इतने साल हो गए, लेकिन इसके बाद भी हमें उस खबर की एक-एक बात याद है। हम उस खबर को भूल भी कैसे सकते हैं यह खबर तो हमारे पत्रकारिता जीवन की यादगारों खबरों में से सबसे अहम खबर है। वास्तव में अगर लिट्टे का अंत हो जाता है तो इससे बड़ी खबर पूरे विश्व के लिए कोई और नहीं हो सकती है।

Read more...

रविवार, अप्रैल 26, 2009

भगवान श्रीराम और बुद्ध का भी सिरपुर से रहा है नाता

छत्तीसगढ़ से पर्यटन और पुरातत्व स्थल सिरपुर में चल रही खुदाई में नए-नए राज खुल रहे हैं। अभी शाही स्नानगृह के राज की बात सामने आई है। सिरपुर के साथ एक बात यह भी है कि सिरपुर से भगवान श्रीराम और बुद्ध का भी गहरा नाता रहा है। भगवान श्रीराम जहां वनवास के समय यहां के होकर गए थे, वहीं बुद्ध भी यहां आए थे। यही नहीं एक समय में सिरपुर में ही देश का प्रमुख चौराहा हुआ करता था। इस चौरहे से होकर ही कोई भी देश में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम की तरफ जाता था। इस बात के प्रमाण खुदाई में मिले हैं।


पुरातत्व महत्व के सिरपुर में इन दिनों फिर से खुदाई का काम चल रहा है। इसी खुदाई में नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं उससे एक बार फिर से इस बात का पता चला है कि भगवान श्रीराम को जब 14 साल का वनवास मिला था तब उनको सिरपुर से होकर ही दक्षिण की तरफ जाना पड़ा था। श्रीराम के छत्तीसगढ़ के सिरपुर से होकर जाने के और कई प्रमाण पहले से भी छत्तीसगढ़ में मौजूद हैं। आरंग में अहिल्या का स्थान होने के साथ तुरतुरिया में बाल्मीकि का आश्रम है। इसी के साथ दंडकारण्य जाने का सबसे बेहतर रास्ता तो सिरपुर से होकर ही जाता था। श्रीराम ने शबरी से जो बैर खाए थे तो उनकी मुलाकात शबरी से सिरपुर के आस-पास के जंगलों में ही हुई थी।

शबरी जहां रहती थीं उस नगर को शबरीपुर कहा जाता था। शबरीपुर का उल्लेख अलेक्जेंडर कनिंघम की उस पुस्तक में भी मिलता है जो उन्होंने 1872 में लिखी थी। इस पुस्तक में शबरीपुर के साथ इस बात का भी उल्लेख है। पुरातत्व के जानकार बताते हैं कि सिरपुर में ही देश का प्रमुख चौराहा था। इस चौराहे से गुजरे बिना कोई भी दूसरी दिशा में जा ही नहीं सकता था। जहां किसी को दक्षिण की और जाना होता था तो उसको इलाहाबाद, सतना, अमरकंटक के बाद सिरपुर होकर ही दक्षिण की और जाना पड़ता था। श्रीराम भी दक्षिण जाने के लिए इस चौराहे से होकर गए थे। इस मार्ग का उपयोग उस समय ज्यादा इसलिए भी होता था क्योंकि यही एक ऐसा मार्ग था जिस मार्ग में नदियां कम पड़ती थी।

सिरपुर की खुदाई में जो स्तूप मिले हैं उन स्तूपों का सीधा संबंध भगवान बुद्ध से है। इन स्तूपों के संबंध में बताया जाता है कि ये स्तूप सांची के स्तूपों से अलग हैं और पत्थर के बने हैं। पत्थरों के स्तूपों के बारे में कहा जाता है कि ऐसे स्तूप तो बुद्ध ही बनाते थे। पुरातत्व विभाग के अधिकारी बताते हैं कि बौद्ध ग्रंथों में इस बात का उल्लेख है कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी में भगवान बुद्ध सिरपुर आए थे। यहां के स्तूप उस समय के हैं।

Read more...

शनिवार, अप्रैल 25, 2009

26 सौ साल पुराना शाही स्नानगृह मिला छत्तीसगढ़ में

छत्तीसगढ़ में सिरपुर एक ऐसा स्थान है जिसको मंदिरों की नगरी कहा जाता है। यहां पर कोई ऐसा घर नहीं होगा जहां एक मंदिर न हो। इसी के साथ सिरपुर का नाम आज देश-विदेश में पुरातात्विक संपदा के लिए भी जाना जाता है। यहां से लगातार पुरातात्विक संपदा मिल रही है। अब यहां पर एक 26 सौ साल पुराना शाही स्नानगृह मिला है जिसको पांडुवंशी काल का कहा जा रहा है। इस शाही स्नानगृह का उपयोग उस जमाने की रानियां किया करती थीं।
अपने छत्तीसगढ़ के सिरपुर में लगातार ऐसी-ऐसी पुरानी चीजें खुदाई में मिल रही हैं जिससे पुरातत्व विभाग के लोग भी आश्चर्य में हैं। सिरपुर आज पुरातात्विक संपदा के लिए लगातार लोकप्रिय हो रहा है। हाल के दिनों में काफी कुछ यहां मिला है। अब यहां पर एक दिन पहले ही एक शाही स्नानगृह मिलने की बात सामने आई है। इस शाही स्नानगृह के बारे में बताया जा रहा है कि पक्की ईटों से बने इस स्नानगृह में काफी नक्काशी की गई है। इस स्नानगृह तक पहुंचने के लिए तीन सीढिय़ां भी बनीं हुईं हैं। इन सीढिय़ों की लंबाई और चौड़ाई 80-80 सेंटीमीटर है। स्नानगृह में चारों तरफ पत्थर के स्तंभलगे हुए हैं। इन स्तंभों से ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इसके ऊपर छप्पर रहा होगा ताकि छाया हो सके।
इस स्नानगृह के बारे में ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि यह 26 सौ साल पुराने पांडुवंशी काल का है। इस काल में इसका उपयोग रानियां शाही स्नान करने के लिए करती थीं। वैसे भी शाही शासनकाल में रानियों के लिए हर शासक ने ऐसे स्नानगृह बनवाएँ हैं जिसका उल्लेख इतिहास में मिलता है। पुराने जमाने में राजा-महाराजाओं में शाही स्नान का अलग ही महत्व हुआ करता था। खुदाई में इस स्नानगृह के अलावा घरों के उपयोग में आने वाली वस्तुएं मिली हैं जो कि पत्थरों की बनीं हैं। इन वस्तुओं में आटा-दाल दलने की चक्की, सिलबट्टे, चटनी बनाने के लिए पत्थर के बने छोटे-छोटे खरल शामिल हैं। खुदाई में जो कमरे मिले हैं उन कमरों में दो ओखलियां लगीं हुईं हैं। शाही स्नानगृह के मिलने से पहले पांच कुंड मिल चुके हैं। इन कुंडों का उपयोग अनाज रखने के लिए किया जाता था। अब जो मिला है वह शाही स्नानगृह है।
सिरपुर जो कि वास्तव में राष्ट्रीय धरोहर है उसके साथ एक विडंबना यह है कि इस धरोहर की रक्षा नहीं हो पा रही है। सिरपुर में हजारों साल पुरानी मूर्तियों हैं जो ऐसे ही पड़ी हुई हैं। सिरपुर में सुरक्षा का कोई इंतजाम न होने के कारण जहां पुरातात्विक संपदा के नष्ट होने का खतरा है, वहीं मूर्तियों के चोरी होने का भी अंदेशा है। एक बार सरकार का ध्यान इस तरफ दिलाने के लिए एक पत्रकार ने वहां से एक मूर्ति उठा ली थी, यह बताने के लिए की सुरक्षा के अभाव में हजारों साल पुरानी कीमती मूर्तियों को कोई भी चुरा सकता है, लेकिन इसके बाद भी सरकार ने आज तक इस दिशा में ध्यान नहीं दिया है।
बहरहाल सिरपुर एक ऐसा स्थान है जहां जाने के बाद किसी को निराशा नहीं होती है खासकर उनको तो कभी नहीं होती है जिनकी रूचि पुरातात्विक संपदा में है। सिरपुर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के महज 70 किलो मीटर की दूरी पर है, वहां तक पहुंचने के लिए रायपुर के आगे बस मिल जाती है। रायपुर तक आने के लिए देश के हर छोटे-बड़े शहर से ट्रेन मिल जाती है। वैसे बड़े शहरों से हवाई यात्रा की भी सुविधा है। कोई भी यहां आकर पुरातात्विक संपदा को देख सकता है। सिरपुर में रहने के लिए पर्यटन विभाग ने मोटल भी बनवाया है। वहां लोकनिर्माण विभाग का विश्राम गृह भी है।

Read more...

शुक्रवार, अप्रैल 24, 2009

छत्तीसगढ़ की नारी-सब पर भारी

नारी को अबला कहे जाने के दिन अब लद चुके हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि आज की नारी हर वह काम करने लगी है जो पुरुष करते हैं। नारी किसी भी हालत में पुरुषों से काम नहीं है। अपने छत्तीसगढ़ में एक सुखद खबर यह है कि यहां की नारी अब काम के मामले में भी सब पर भारी पड़ रही है। एक शोध में यह बात सामने आई है कि निम्न स्तर पर जीवन यापन करने वाली महिलाएं अब काम में इतनी ज्यादा सक्रिय हो गई हैं कि जहां वह घर का 75 प्रतिशत खर्च उठाने का काम कर रहीं हैं, वहीं उनका प्रतिशत अब गिरकर 39 से महज 5 हो गया है। आने वाले दिनों में यह प्रतिशत शून्य होने के भी आसार नजर आ रहे हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की महिलाओं पर तो परिवार का दबाव भी काफी कम है। संस्कारधानी बिलासपुर में जरूर यह प्रतिशत ज्यादा है।
अपने देश में महिला सशक्तिकरण की जो बात लगातार की जा रही है, उस दिशा में और कोई राज्य आगे बढ़ा हो या न बढ़ा हो लेकिन अपना राज्य छत्तीसगढ़ इस दिशा में काफी आगे बढ़ गया है। आज छत्तीसगढ़ की महिलाएं हर क्षेत्र में नए आयाम स्थापित कर रही हैं। पं. रविशंकर विश्व विद्यालय की भूगोल की रीडर डॉ. सरला शर्मा ने एक शोध किया है। इस के परिणाम आश्चर्यजनक हैं। इस शोध में बताया गया है कि निम्न स्तर पर जीवन यापन करने वाली महिलाओं की जीवन शैली में नौकरी के कारण काफी बदलाव आया है। एक समय वह था जब निम्न वर्ग में महिलाओं को काम करने नहीं दिया जाता था, लेकिन अब समय की मांग को देखते हुए इस वर्ग ने भी अपने घर की महिलाओं को घर की चारदीवारी से बाहर जाने की इजाजत दी है। इसका नतीजा यह रहा है कि जहां निम्न वर्ग के लोगों के रहन-सहन में बदलाव आया है, वहीं महिलाओं ने घर को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का काम किया है। छत्तीसगढ़ में पूर्व में निम्न स्तर पर महिलाओं का प्रतिशत 39 था जो अब घटकर महज पांच प्रतिशत रह गया है। रायपुर की बात करें तो यहां का प्रतिशत 41 से घटकर 7 हुआ है। एक तरफ जहां निम्न वर्ग की महिलाओं का रूझान काम के प्रति बढ़ा है तो दूसरी तरफ उच्च वर्ग की महिलाएं अब काम करने की बजाए घर संभालने की दिशा में अग्रसर हो रही हैं। उच्च वर्ग में पहले 14 प्रतिशत महिलाएं ही घरों को संभालती थीं, लेकिन अब इसका प्रतिशत 48 हो गया है। यानी आज करीब आधी महिलाएं ही बाहर काम करने में रूचि रखती हैं।
जो महिलाएं बाहर काम करती हैं उन पर घर के काम का दवाब कम नहीं होता है। शोध में यह बात सामने आई है कि दबाव के मामले में रायपुर की महिलाएं किस्मत वाली हैं। उन पर घर के काम का दबाव महज 34 प्रतिशत है। इस मामले में बिलासपुर की महिलाएं बदकिस्मत हैं कि उनको बाहर का काम करने के बाद भी घर का ज्यादा से ज्यादा काम करना पड़ता है। बिलासपुर का प्रतिशत 66 हैं। एक तरफ जहां बिलासपुर की महिलाएं घर के काम के बोझ से भी दबी हुई हैं, वहीं उन पर ही घर का खर्च चलाने का जिम्मा ज्यादा है। शोध में यह बात सामने आई है कि बिलासपुर की 43 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं घर का 75 प्रतिशत खर्च उठाती हैं। रायपुर में यह प्रतिशत महज 13 प्रतिशत है। शोध में किए गए सर्वे में जहां प्रदेश के मुख्य जिलों राजधानी रायपुर के साथ बिलासपुर को शामिल किया गया, वहीं भिलाई और कोरबा जैसा उद्योग नगरी को भी शामिल किया गया। इन शहरों में शिक्षा, बैंक, प्रशासनिक क्षेत्र,ब्यूटी पार्लर, नर्सिंग होम, रेलवे अस्पताल के साथ निजी संस्थानों में काम करने वाली महिलाओं को शामिल किया गया था। सर्वे में आर्थिक आधार पर ही महिलाओं को उच्च, मध्यम और निम्न वर्ग में रखा गया था। कुल मिलाकर यह एक सुखद शोध है कि अपना छत्तीसगढ़ महिला सशक्तिकरण की तरफ तेजी से बढ़ रहा है।

Read more...

गुरुवार, अप्रैल 23, 2009

आईपीएल का खेल-भारत के बाहर फेल

इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल को आयोजक अपनी मनमर्जी के चलते भारत के बाहर द. अफ्रीका ले तो गए हैं, पर अफ्रीका में जिस तरह से लगातार बारिश के कारण मैच या तो रद्द हो रहे हैं, या फिर डकवर्थ लुईस नियम से मैचों का फैसला हो रहा है, उससे साफ लग रहा है कि आईपीएल के असली मजे तो पूरा तेल निकल गया है। वैसे भी आईपीएल का कार्यक्रम भारत के मौसम के हिसाब से बना था। आयोजकों को आईपीएल को भारत स बाहर करने का एक ही ऐसा फायदा मिला है, जो भारत में रहते नहीं मिल पाता। वह है जमकर चियर्स गर्ल्स का इस्तेमाल करते हुए अश्लीलता का नंगा नाच करने का। आईपीएल के बारे में क्रिकेटरों का नजरिया भले क्रिकेट के लिए सकारात्मक हो, लेकिन जहां तक आमजनों और खेल के पंडितों का सवाल है तो कोई भी यह मानने को तैयार नहीं है कि आईपीएल से क्रिकेट का कोई भला होने वाला है। आईपीएल से क्रिकेट का क्या होगा उसकी तस्वीर सामने आने लगी है। आईपीएल के कारण क्रिकेटर फ्रेंचाइजी मालिकों के हाथों की कठपुतली बनते जा रहे हैं।
आईपीएल का खेल इस समय द. अफ्रीका में चल रहा है और इस दूसरे संस्करण में मैचों का मजा जिस तरह से आना चाहिए, वह नहीं आ पा रहा है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि क्रिकेट का कोई भी मैच हो उसका पूरा मजा लेने का काम दर्शक तो करते ही हैं। ऐसे में आईपीएल का जादू इस समय पूरे विश्व के खेल प्रेमियों के सिर चढ़कर बोल रहा है। अब यह बात अलग है कि क्रिकेट प्रेमी जिस तरह का रोमांच इस दूसरे संस्करण में चाहते थे, वैसा उनको अब तक नहीं मिल पाया है। भारत में हुए पहले संस्करण को याद किया जाए तो इसका जलवा अलग ही था। वैसे भी यह बात सब जानते हैं कि भारत में ही क्रिकेट के चाहने वाले ज्यादा है। विदेशी खिलाड़ी भी यह मानते हैं कि उनको जितना मान-सम्मान भारत में मिलता उतना कहीं और नहीं मिलता है। चाहे कंगारू क्रिकेटरों की बात हो या फिर कैरेबियन क्रिकेटरों की हर देश का क्रिकेटर भारत की जमीन पर ही खेलना पसंद करता है। आईपीएल के दूसरे संस्करण में कोलकाता की टीम से खेलने वाले क्रिस गेल को इस बात का मलाल है कि आईपीएल का दूसरा संस्करण भारत में नहीं हो रहा है। लेकिन वे भी क्या कर सकते हैं उनको अपने फ्रेंचाइजी मालिक का आदेश मानना है। बकौल गेल उनके चाहने वाले भारत में ज्यादा हैं। यह एक गेल की ही बात नहीं है। आईपीएल में खेलने वाले हर विदेशी खिलाड़ी के साथ यह बात है। सब जानते हैं कि जब उनका बल्ला चलता है या फिर गेंदों से विकेट की गिल्लियां उखड़ती हैं तो किस तरह से भारतीय दर्शक उनकी तारीफ करते हैं। ऐसी तारीफ तो किस भी क्रिकेटर को और किसी देश में मिल ही नहीं सकती है। आईपीएल का आयोजन करने वाले शायद यह बात भूल गए थे कि भारत जैसा क्रिकेट का दीवान देश तो उनको विश्व के नक्शे में कहीं मिल ही नहीं सकता है। अगर आईपीएल के आयुक्त ललित मोदी ने थोड़ी सी समझदारी से काम लिया होता तो आईपीएल का खेल भारत के बाहर जाता ही नहीं और उसके फेल होने की बात ही नहीं होती। लेकिन श्री मोदी तो लगता है कि अपने आकाओं को खुश करने में लगे थे। श्री मोदी आईपीएल को द. अफ्रीका ले जाकर इतने ज्यादा खुश हैं कि वे यह भी भूल गए कि क्रिकेट और ओलंपिक में कितना अंतर होता है। उन्होंने तो ओलंपिक के आयोजकों को ही सलाह दे डाली कि आईपीएल से प्ररेणा लेनी चाहिए। कि कैसे कम समय में एक बड़ा आयोजन किया जा सकता है। मोदी साहब एक बार ओलंपिक का आयोयन करके देखिए फिर समझ में आएगा कि ओलंपिक क्या होता है। चंद देशों की टीमें वो भी एक खेल के लिए, उनकी व्यवस्था करना आसान होता है ओलंपिक में जितने देशों के खिलाड़ी कई खेलों के लिए आते हैं उतने के लिए व्यवस्था करने में तेल निकल जाता है।
बहरहाल हम बात करें आईपीएल की। आईपीएल में जिस तरह से लगातार बारिश के कारण मैचों का मजा किरकरा हो रहा है, उससे शुरुआती दौर में यह बात लगने लगी है कि आईपीएल का यह संस्करण सफल नहीं होने वाला है। वैसे तो यह बात तभी तय लग रही थी जब इसको भारत के बाहर किया जा रहा था। लंदन में इसका आयोजन इसलिए नहीं किया गया क्योंकि वहां पर इस समय बारिश का मौसम है। द. अफ्रीका में भी बारिश का समय है, लेकिन वहां बारिश से मैच कम बाधित होंगे ऐसा कहा गया था, लेकिन बारिश से मैच लगातार प्रभावित हो रहे हैं और खेल प्रेमी निराश हो रहे हैं। आईपीएल को देश के बाहर करने का एक ही फायदा आयोजकों को हुआ है कि वहां पर खुले आम अश्लीलता की छूट मिली हुई है। अफीका में इस बात के लिए कोई रोक नहीं है कि चियर्स गर्ल्स किस तरह के कपड़े पहनकर डांस करती हैं। वहां पर अगर बिना कपड़ों के भी चियर्स गर्ल्स डांस करने लगे तो कोई रोकने वाला नहीं है। भारत में पहले संस्करण में कोर्ट ने ही आयोजकों को फटकारा था और कोर्ट के आदेश के बाद ही चियर्स गर्ल्स को सभ्यता के दायरे में रखा गया था।

Read more...

बुधवार, अप्रैल 22, 2009

हम डायरेक्टर तुम कलाकार-नहीं कर सकते कोई प्रतिकार

इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल का खेल अब लगता है कि पूरी तरह से सिनेमा बन गया है। सिनेमा इसलिए क्योंकि इसके फ्रेंचाइजी मालिकों में शुमार फिल्मी जगत की शाहरुख खान जैसी हस्ती अपने को अब एक तरह से डायरेक्टर समझने लगे हैं, और वे सोचते हैं कि हम डायरेक्टर हैं और मैच में खेलने वाले खिलाड़ी कलाकार हैं जिनको उनके इशारे पर नाचना ही होगा। अगर ऐसा नहीं होता तो कभी भी खान की टीम के कप्तान सौरभ गांगुली को कप्तानी से हाथ धोना नहीं पड़ता। वैसे यह बात तो उसी दिन तो तय हो गई थी जिस दिन क्रिकेट में फिल्मी सितारों की घुसपैठ हुई थी कि क्रिकेट का हाल बुरा होने वाला है, अभी तो यह एक महज शुरुआत है, आगे आगे देखिए होता है क्या। इधर तो ऐसी गूंज भी सुनाई देने लगी है कि आईपीएल में भी मैच फिक्सिंग ने अपने पैर पसार लिए हैं और फ्रेंचाइजी मालिक अब अपने पैसों की भरपाई करने के लिए कभी भी खिलाडिय़ों के ऊपर हार-जीत के लिए दबाव बनाने का काम कर सकते हैं।
आईपीएल के पहले संस्करण में यह बात का खुलकर सामने आई कि क्रिकेट में फिल्मी सितारों की घुसपैठ के कारण क्रिकेट एक तरह से बर्बादी की तरफ जा रहा है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि आईपीएल की फ्रेंचाइजी खरीदने वाले फिल्मी सितारे अब अपनी मनमर्जी पर भी उतर आए हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण शाहरुख खान की टीम है। शाहरुख खान ने अंतत: अपने बंगाल टाइगर को ठिकाने लगा ही दिया और उनके हाथ से टीम की कमान छीन ही ली। सौरभ को यह खामियाजा इसलिए भुगतना पड़ा है क्योंकि उन्होंने टीम के मालिक शाहरुख खान और कोच जान बुकीनन की उस योजना पर सहमति नहीं जताई जिसमें टीम में कई कप्तान रखने की योजना थी। वैसे भी यह योजना है तो बकवास ही, इस योजना पर कैसे भला सौरभ गांगुली जैसे खिलाड़ी सहमत हो सकते हैं। दादा का फैसला सही था कि वे नहीं चाहते कि टीम में एक साथ कई कप्तान हों। ऐसे में उनको अपने मालिक यानी अपने डायरेक्टर के खिलाफ जाने का दंड तो मिलना ही था। ऐसे में भारत में तो उनके साथ कुछ नहीं किया गया लेकिन जैसे ही टीम द. अफ्रीका पहुंची दादा के हाथ से कप्तानी ले ली गई। हालांकि एक तरफ शाहरुख यह कहते रहे हैं कि कप्तान बदलने में गांगुली की भी सहमति है, लेकिन गांगुली ने साफ कहा कि हमेशा उनके साथ ही ऐसा क्यों होता है। इसका मतलब साफ है कि दादा कि कप्तान बदलने में कोई सहमति नहीं थी। यह तो महज एक शुरुआत है, आगे चलकर जरूर आईपीएल का हाल एक फिल्मी की तरह ही हो जाएगा जहां पर क्रिकेटरों की दाल नहीं गलेगी और हर टीम के मालिक जैसे चाहेंगे वैसा होगा। किसी भी क्रिकेटरों के पास अपने लिए कुछ नहीं बचेगा। इसमें भी कोई दो मत नहीं है कि आगे चलकर टीमों के फ्रेंचाइजी क्रिकेट के सट्टे में भी उलझ जाए और अपनी टीम के खिलाडिय़ों को जीत हार के भी निर्देश देने लगे। आईपीएल का सारा खेल तो पैसों पर टिका है। जब किसी टीम के मालिक को यह लगने लगेगा कि उन्होंने जो पैसा टीम पर लगाया है, वह निकलने वाला नहीं है तो कोई भी मालिक कुछ भी करने को तैयार हो जाएगा, ऐसे में आईपीएल के मैच भी फिक्स होने लगे तो आश्चर्य नहीं होगा। वैसे तो अब भी यह कहा जाता है कि इसकी शुरुआत आईपीएल में हो गई है और मैच फिक्सिंग ने आईपीएल में भी पैर पसार लिए हैं, लेकिन अधिकृत तौर पर इसका खुलासा नहीं हुआ है। वैसे देखा जाए तो क्रिकेट और मैच फिक्सिंग का तो चोली-दामन का साथ है। ऐसे में भला आईपीएल उससे कैसे बच सकता है। कुल मिलाकर आईपीएल में होना यही है कि जैसा फ्रेंचाइजी मालिक चाहेंगे क्रिकेटरों को वैसा ही करना पड़ेगा। हमें तो ऐसा लगता है कि आगे चलकर हमारे क्रिकेटर फ्रेंचाइजी मालिकों के हाथों की कठपुतली बन जाएंगे। अब इससे पहले की ऐसा दिन आए क्रिकेटरों को चेत जाना चाहिए। नहीं चेत को उनको कभी प्रतिकार करने का भी मौका नहीं मिलेगा। जब सौरभ गांगुली जैसे खिलाड़ी को बलि का बकरा बनाया जा सकता है तो बाकी खिलाडिय़ों की बिसात ही क्या है।

Read more...

मंगलवार, अप्रैल 21, 2009

लेखन का धंधा-मत करो गंदा

किसी को भी ज्यादा स्वंतत्रता मिल जाए तो उसका वह किस तरह से सदउपयोग करने की बजाए दुरुउपयोग करने लगता है इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमें ब्लाग जगत में नजर आता है। ब्लाग जगत को अपनी अभिव्यक्ति पेश करने के लिए प्रारंभ किया गया है, लेकिन न जाने यहां कैसे-कैसे लोग हैं जो अभिव्यक्ति के नाम पर न जाने क्या-क्या लिखते हैं। ब्लाग जगत में हमें कदम रखें अभी जुम्मा-जुम्मा चार दिन ही हुए हैं। लेकिन इन चार दिनों में ब्लाग जगत में बमुश्किल 10 प्रतिशत ब्लाग जो हमने पढ़े हैं उससे हमें ऐसा लगता है कि कई लोग ब्लाग का सही उपयोग नहीं कर रहे हैं। ब्लाग पर लोग न जाने क्या-क्या लिख देते हैं। एक पोस्ट अपने शुरुआती दौर में देखी थी जिस पोस्ट में रंड़ी शब्द का उपयोग लगातार किया गया था। किसी पोस्ट की आलोचना में भी हमारे लेखक भाई सीमाएं लांघते नजर आते हैं। पोस्ट लेखकों के तो नाम-पते तक फर्जी हैं। ऐसे में हमें लगता है कि ब्लाग जगत के लिए भी कोई न कोई कानून तो होना ही चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो कोई छद्म नाम का ब्लागर कभी किसी की मां-बहन एक करने से भी नहीं चूकेगा। वैसे चोरियां करना तो आम बात है ब्लाग जगत में। हो सकता है हमारी बातों से ज्यादातर लोग समहत न हों। लेकिन चूंकि हमें अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त करने की स्वतंत्रता है तो हम कम से कम सही अभिव्यक्ति तो व्यक्त करने से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
हम ब्लाग जगत में इसलिए आएं हैं क्योंकि हम समाज को कुछ अच्छा देने के साथ अपने लेखन की उस मृगतृष्णा को शांत करना चाहते हैं जो अखबार में काम करते हुए पूरी होने वाली नहीं है। वास्तव में आज अखबार में सही लिखने की कदर नहीं होती है। सही लिखने वालों को कोई छापना नहीं चाहता है। ब्लाग जगत में आने से हमारा मकसद तो पूरा होता नजर आ रहा है, लेकिन इसी के साथ एक बात जो हमें खटकती है, वह यह है कि ब्लाग जगत को कुछ लोग अपनी जागीर की तरह समझते हुए उसको गंदा करने में लगे हैं। वास्तव में देखा जाए तो लेखन वह कला है जो माता सरस्वती की देन है। यह कला हर किसी को नसीब नहीं होती है। जिस इंसान को यह कला नसीब होती है वह वास्तव में नसीब वाला होता है। फिर लेखन का एक मतलब यह भी होता है कि आपको अपने लेखन से समाज को एक सही रास्ता दिखाना है। ऐसे में जबकि समाज को सही राह दिखाने का काम करना चौथे स्तंभ यानी अखबारों का काम रहा है तो आज लगता है कि अखबार तो पूरी तरह से पेशेवर हो गए हैं और उनको समाज की कम और अपने विज्ञापनों की चिंता ज्यादा रहती है। ऐसे में किसी अखबार से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह समाज को सही दिशा दिखाने का काम करेगा। इसमें कोई दो मत नहीं है कि आज मीडिया पूरी तरह से अपनी राह भटक गया है और सिर्फ और सिर्फ पैसों के पीछे भाग रहा है। ऐसे समय में जब ब्लाग जगत का आगाज हुआ था तो एक उम्मीद जागी थी कि चलो कम से कम यहां पर तो लेखन पर किसी की लगाम नहीं है और सही लिखने वालों को एक मंच मिल जाएगा। मंच मिला है तो उसका काफी लोग सही उपयोग भी कर रहे हैं और काफी अच्छा लिखते हुए समाज को वह सब देने की कोशिश कर रहे हैं जो समाज को सही दिशा में ले जा सके। हमारे कई ब्लागर मित्र तो ऐसे हैं जो जान की परवाह किए बिना ही ऐसे-ऐसे लेख लिखने का साहस करते हैं जिसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। हमारे एक ब्लागर मित्र हैं सुरेश चिपलूनकर इन्होंने भारत की अघोषित प्रधानमंत्री श्रीमती सोनिया गांधी के बारे में लोगों तक ऐसी जानकारी पहुंचाई जो किसी अखबार से मिलने की उम्मीद नहीं की जा सकती। श्री चिपलूनकर ने तो मदर टेरेसा की भी पोल खोलने का काम किया है। ऐसे और भी कई ब्लागर साथी हो सकते हैं जिनके बारे में शायद हमें नए होने की वजह से मालूम नहीं है। वैसे हमारे साथ एक परेशानी यह है कि सुबह के 10 बजे से लेकर रात को कम से कम एक बजे तक अखबार का काम करना रहता है। इतना समय अखबार के लिए देने के बाद काफी कम समय मिलता है जिसमें हम ब्लाग देखते हैं और अपने ब्लाग के लिए कुछ अच्छा लिखने की कोशिश करते हैं।
एक तरफ तो अपने चिपलूनकर भाई है तो दूसरी तरफ अपने अतुल अग्रवाल जी जैसे मित्र हैं जो खुशवंत सिंह जैसे नामी लेखक के गलत लेखन पर उनको लताडऩे से नहीं चूकते हैं। अभी कल ही की बात है हमें विस्फोट डाट काम पर अग्रवाल जी की एक पोस्ट खुशवंत सिंह के लेख के उपर पढऩे को मिली। श्री अग्रवाल जी का विरोध अपनी जगह जायज ही नहीं बहुत ज्यादा जायज है, लेकिन उन्होंने खुशवंत सिंह के लिए जिस तरह के शब्दों का प्रयोग किया, वह एक पत्रकार की भाषा नहीं होनी चाहिए। यह बात तो सब जानते हैं कि खुशवंत सिंह कितना गंदा लिखते हैं, फिर उनके गंदे लेखन का एक हिस्सा हम क्यों बनें। श्री अग्रवाल जी को एक ब्लागर मित्र कोतुक जी ने भी सही सलाह दी है कि खुशवंत सिंह तो चर्चा में आने के लिए ऐसा लिख रहे हैं उनकी बातों को उठाकर आप उनका रास्ता आसान कर रहे हैं। यह सच बात है कि गंदा लिखने वालों पर सबको गुस्सा आता है लेकिन उस गुस्से को कलम का रूप देकर उस गंदे लेखन को और ज्यादा प्रचारित करने की बजाए ऐसा प्रयास करना चाहिए कि ऐसा गंदा लेखन समाज के सामने ही न आ सके। आज ब्लाग जगत को भी गंदा करने वालों को इस जगत से बाहर करने की जरूरत है। इसके लिए सही लेखन करने वालों को एक जुट होने की जरूरत है। इसी के साथ हमारा ऐसा मानना है कि अगर ऐसा हो पा रहा है तो इसके लिए कहीं न कहीं गुगल सर्च भी जिम्मेदार है। गुगल को हम जिम्मेदार इसलिए मान रहे हैं क्योंकि गुगल बिना किसी सही जानकारी के किसी को भी ब्लाग बनाने की इजाजत दे देता है। ऐसे में गंदा लेखन करने वाले छद्म नामों से ब्लाक बना लेते हैं और जब जिसको मर्जी आई गालियां दे दीं। हमने जब एक पोस्ट महिलाओं के कपड़ों पर लिखी थी तो हमारा मकसद किसी महिला की स्वतंत्रता पर हमला कदापि नहीं था। हमने तो एक साधारण बात लिखी थी, लेकिन इस बात का बिना वजह तूल देने का काम किया गया। हम तो ब्लाग जगत में नए हैं। लेकिन ब्लाग जगत में नए हैं तो इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि हम किसी का जवाब देना नहीं जानते हैं। पत्रकारिता में अपने जीवन के 23 साल खफा दिए हैं और इन सालों में बड़े-बड़े संपादकों के साथ काम करने का और उनसे काफी कुछ सीखने का मौका मिला है, ऐसे में ऐसी कोई बात नहीं है जिसका जवाब हमारे पास न हो। लेकिन हमने उस लेख के बाद चंद मित्रों की टिप्पणियों के जबाव के बाद आगे जवाब इसलिए नहीं दिया क्योंकि हमारे वरिष्ठ साथी पत्रकार भाई अनिल पुसदकर ने हमें सलाह दी थी कि हमें कपड़ों के पीछे भागने की बजाए अपने लेखन को छत्तीसगढ़ के भले के लिए प्रयोग करना चाहिए। हमने उनकी सलाह पर काम करना प्रारंभ किया है, लेकिन हमारी एक आदत यह है कि हमें गलत बात बर्दाश्त नहीं होती है, यही वजह है कि हम आज ब्लाग जगत की गंदगी पर लिखने की हिम्मत कर रहे हैं। हम यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि हमारी इस पोस्ट से काफी लोग नाखुश और नाराज होंगे। लेकिन उनकी नाराजगी न उठानी पड़े इसलिए हम अपनी कलम को बंद कर दें यह तो संभव नहीं है।
बहरहाल हमारा ऐसा मानना है कि गुगल को ब्लाग जगत के लिए कुछ तो नियम कायदे बनाने चाहिए ताकि जहां कोई छद्म नाम से ब्लाग न बना सके, वहीं किसी के ब्लाग के कोई सरे आम चोरी न करे सके, जैसा लगातार हो रहा है। जब एक मोबाइल नंबर लेने के लिए काफी खाना पूर्ति करनी पड़ती है तो फिर अपनी अभिव्यक्ति को लोगों तक पहुंचाने के लिए मिलने वाले एक मंच के लिए ऐसा कुछ क्यों नहीं किया जाता कि सही लोग सामने आएं और अपने सही नाम पते के साथ ब्लाग बनाएं। महिलाओं को अगर फोटो और पते में छूट दी जाती है तो कोई बात नहीं, लेकिन उनसे फोटो और सही पता लेकर गुगल अपने रिकॉर्ड में रख सकता है ताकि कोई किसी महिला के नाम से ब्लाग न बना लें। इसमें कोई दो मत नहीं है कि कई बंधुओं ने तो महिलाओं के नाम से भी ब्लाग बना रखे हैं। अभी तो हमें इस ब्लाग जगत में आए चंद दिन हुए हैं और हमें इतना कुछ लगने लगा है आगे हमें और पढऩे और समझने का मौका मिलेगा तो और जो बातें हमारे मानसपटल पर आएंगी उनको जरूर अपने ब्लाग जगत के साथियों के साथ बांटने का काम करेंगे। फिलहाल इतना ही। वैसे हमारी पोस्ट काफी लंबी हो गई है। लिखने को तो अब भी काफी कुछ बचा है ऐसा लगता है, लेकिन बाकी अगली बार।
ब्लाग जगत के सम्मानीय साथियों से आग्रह है कि वे अपने विचारों से जरूर अवगत कराएं। सभी तरह से विचारों का स्वागत है।

Read more...

रविवार, अप्रैल 19, 2009

क्रिकेट का सजा बाजार- सट्टे का होने लगा कारोबार

इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल के दूसरे संस्करण का बाजार दक्षिण अफ्रीका में सज गया है। उधर बाजर सजा है इधर सट्टे का कारोबार हो रहा है। सट्टा बाजार में इस समय चेन्नई की टीम विजेता के रूप में पहले नंबर पर चल रही है। इसका भाव ४.५० रुपए है। सबसे कम कीमत डेकन की है। इसका भाव ११ रुपए है। छत्तीसगढ़ में हर मैच पर इस समय करोड़ों का सट्टा लग रहा है। पहले मैच में ही सट्टा लगवाने वाले दो बुकी राजधानी में पकड़े गए हैं। आईपीएल के मैचों का आगाज अफ्रीका में हो चुका है। इसी के साथ सट्टा बाजार में टीमों के भाव भी खुल गए हैं। वैसे जैसे-जैसे मैचों के परिणाम सामने आएंगे, वैसे-वैसे टीमों के भाव में भी उतार-चढ़ाव आएगा। लेकिन शुरुआती दौर में सट्टा बाजार में जो भाव सामने आए हैं उनमें विजेता के रूप में चेन्नई की टीम को देखा जा रहा है। इस टीम के भाव इस समय ४.५० रुपए हैं। यानी इस टीम पर एक रुपए का दावा लगाने पर ४.५० रुपए मिलेंगे। दूसरे नंबर पर दिल्ली की टीम है जिसका भाव ४.७० रुपए है। तीसरे नंबर पर मुंबई की टीम का भाव ५.८५ रुपए, चौथे नंबर पर बेगलूर की टीम है जिसका भाव ७.२५ रुपए, पांचवें नंबर राजस्थान की टीम है जिसका भाव ८.०० रुपए, छठे नंबर पर पंजाब की टीम है जिसका भाव ८.२५ रुपए, सांतवें नंबर कोलकाता की टीम है जिसका भाव ८.५० रुपए और सबसे अंतिम याने आठवें नंबर डेकन की टीम है जिसका भाव ११ रुपए है। अगर यह टीम जीत जाती है तो इस टीम पर दाव लाने वाले को एक रुपए के एवज में ११ रुपए मिलेंगे। ये सारे भाव चैंपियनशिप प्रारंभ होने के पहले के हैं। अब जबकि चैंपियनशिप का आगाज हो चुका है मैचों के नतीजों के हिसाब से जहां विजेता टीमें बदलती रहेंगी, वहीं भाव भी कम ज्यादा होंगे। जानकारों की मानें तो आईपीएल के हर मैच पर प्रदेश में करोड़ों का सट्टा लगाया जा रहा है। राजधानी में जहां कई स्थानों के बुकी आकर काम कर रहे हैं, वहीं प्रदेश के कई बड़े बुकी पुलिस के डर से प्रदेश के बाहर जाकर भी अपना कारोबार कर रहे हैं।

Read more...

शनिवार, अप्रैल 18, 2009

जिन्हें समझा सम्मान के लायक-वही निकले नालायक

क्रिकेट का नशा ऐसा है जो पूरे विश्व के सर चढ़कर बोलता है। जहां एक तरफ लोगों में क्रिकेट का नशा है तो दूसरी तरफ क्रिकेटरों में पैसों का नशा है। क्रिकेट के मोहजाल में अपने देश के सर्वोच्च सम्मान भी फंसे नजर आते हैं। लेकिन पद्मश्री जैसे सम्मान की भी कद्र ये क्रिकेटर नहीं करते हैं। अगर वास्तव में इनको अपने देश के इन सम्मानों की कद्र होती तो कभी भी भारतीय टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी और हरभजन सिंह इस सम्मान को लेने के लिए अपने सारे काम छोड़कर आते, लेकिन नहीं ये तो उस दिन पैसे कमाने में लगे थे। ऐसे खिलाडिय़ों को तो कभी ऐसा सम्मान नहीं देना चाहिए और सम्मान का अपमान करने वाले इन क्रिकेटरों को सजा भी मिलनी चाहिए। वास्तव में देखा जाए तो पद्मश्री के हकदार तो अपने ओलंपियन विजेन्द्रर और सुशील कुमार थे, पर इनको सम्मान देने वालों ने इस लायक नहीं समझा और जिनको लायक समझा वे ही नालायक निकले और सम्मान की कद्र तक नहीं की।
अपने क्रिकेटर पैसों के पीछे कितने दीवाने हैं इसका एक और बड़ा उदाहरण सामने आ गया है। आज पूरे देश में इसी बात की चर्चा है कि आखिर भारतीय टीम के वे कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी जिनको सभी एक ऐसा कप्तान मानते हैं जो पूरी टीम को साथ लेकर चलते हैं, वे कैसे पद्मश्री सम्मान लेने नहीं आए और शूटिंग करते रहे। यही बात हरभजन सिंह के लिए भी कही जा रही है। वैसे हरभजन सिंह तो शुरू से ही पैसों के दीवाने रहे हैं। उनकी यह बात गले उतरने वाली नहीं है कि वे उस दिन पारिवारिक काम में व्यस्त थे। ऐसा भी क्या काम जो देश का सर्वाेच्च सम्मान लेने भी आदमी न जा सके। हरभजन एक बार पैसों के मोह में ही सिख होने के बाद रैप पर बॉल खोलकर उतरे थे जिसके कारण उनकी काफी आलोचना हुई थी। अब वे पद्मश्री सम्मान लेने न पहुंचने के कारण आलोचना के शिकार हो रहे हैं। हरभजन और धोनी की हरकत पर जहां पर एक तरफ खेल मंत्री गिल साहब खफा हैं, वहीं पूरे देश की खेल बिरादरी भी नाराज है। अब तो हर तरफ से एक ही आवाज आ रही है, ऐसे खिलाडिय़ों को सजा मिलनी चाहिए। हरभजन और धोनी के मामले में ओलंपियन विजेन्दर का कहना है कि मैं सम्मान का अपमान करने वालों के खिलाफ हूं। विजेन्दर का ऐसा मानना है कि पद्मश्री पुरस्कार के हकदार वे और उनके साथ ओलंपिक में पदक जीतने वाले सुशील कुमार भी थे, लेकिन हमको इस लायक नहीं समझा गया और जिनको लायक समझा गया उन्होंने सम्मान का कितना बड़ा अपमान किया यह सबने देखा है। वास्तव में भारत में जो पुरस्कार दिए जाते हैं उन पुरस्कारों में क्रिकेटरों पर ही ज्यादा ध्यान दिया जाता है, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए। क्रिकेटरों तो अपने को देश से बढ़कर समझने लगे हैं ऐसा करने वालों क्रिकेटरों को सजा मिलनी ही चाहिए। अब होना तो यह चाहिए कि धोनी और हरभजन सिंह को इस सम्मान से वंचित कर दिया जाए। लेकिन लगता नहीं है कि अपनी सरकार ऐसा साहस दिखा पाएगी।
इस बारे में हमारे ब्लाग जगत के साथी क्या सोचते हैं उनके विचार भी आमंत्रित हैं।

Read more...

गुरुवार, अप्रैल 16, 2009

मजबूर नहीं मजबूत प्रधानमंत्री चाहिए

अपने देश को आज मनमोहन सिंह जैसे एक मजबूर नहीं बल्कि मजबूत प्रधानमंत्री की जरूरत है। एक ऐसे प्रधानमंत्री जो किसी के हाथ की कठपुतली न होकर अपने विवेक से निर्णय लेने की क्षमता रखते हों। (मनमोहन सिंह को सब श्रीमती सोनिया गांधी के हाथ की कठपुतली मानते हैं) देश से आतंकवाद, महंगाई, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी को समाप्त करने के साथ ही स्विस बैंक में जो देश का पैसा रखा है उसको वापस लाने की हिम्मत जिनमें हों।
ये सारी बातें छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनाव में मतदाताओं से बातचीत में सामने आईं हैं। 16 अप्रैल को हुए मतदान में जब मतदाताओं से उनके विचार पूछे गए तो जो बातें सामने आईं, वो यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। रायपुर लोकसभा सीट के लिए मतदान करने जा रहे प्रदीप वर्मा ने कहा कि उनका ऐसा सोचना है कि देश को मजबूर नहीं मजबूत प्रधानमंत्री की जरूरत है। राधा सोहाने ने कहा कि ऐसा प्रधानमंत्री किस काम का जो दूसरे के हाथ की कठपुतली हो। प्रधानमंत्री को अपने विवेक से निर्णय करना चाहिए, हर निर्णय के लिए दूसरे का मुंह देखना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि देश से भ्रष्टाचार समाप्त करने की क्षमता जिनमें हो, ऐसे प्रधानमंत्री की जरूरत है। सविता तराटे ने कहा कि देश को सुशासन देने वाले और स्विस बैंक से देश के पैसे को वापस निकालने की ताकत रखने वाले प्रधानमंत्री की जरूरत है। युवाओं को रोजगार देने वाली सरकार ही केन्द्र में होनी चाहिए।
मतदान करके लौट रहीं बीई की छात्रा रूही चोपड़ा ने पूछने पर बताया कि वह इसलिए मतदान करने गईं क्योंकि उनको यह लगता है कि मतदान जरूरी है। उन्होंने कहा कि अब जहां तक प्रधानमंत्री का सवाल है तो देश को आतंकवाद से मुक्ति दिलाने वाले प्रधानमंत्री की जरूरत है। इसी के साथ गरीबों की मदद करने वाले और देश से भ्रष्टाचार समाप्त करने वाले राष्ट्र के नेता की जरूरत है। पहली बार मतदान करने वाली भारती आहूजा ने पूछने पर तपाक से कहा कि उनका ऐसा मानना है कि इस देश की प्रधानमंत्री तो कोई महिला ही होनी चाहिए। आईएस की तैयारी करने वाली इस छात्रा ने विश्वास से कहा कि वह एक लड़की हैं और उनका ऐसा मानना है कि एक दिन वह भी प्रधानमंत्री बन सकती हैं। भारती के पिता राजेश आहूजा और माता आशा आहूजा ने कहा कि उनका ऐसा मानना है कि केन्द्र में एक स्थाई सरकार होनी चाहिए। सेवक प्रेमचंदानी ने कहा कि जो सरकार अच्छा काम नहीं करती है उनको बदलने की जरूरत होती है और हमने तो इसी मानसिकता के साथ मतदान किया है। पहली बार मतदान करने वाली काशीरामनगर की अगसीया ध्रुव ने कहा कि महंगाई पर रोक लगाने और बेरोजगारों को काम देनी वाली सरकार की जरूरत है। सरिता ध्रुव ने कहा कि वोट लेने के बाद नेता जनता को भूल जाते हैं, जनता की परेशानियों को जानने के लिए उनको अपने क्षेत्र में भी आना चाहिए।
रवि डोडवानी ने कहा कि उनकी नजर में लालकृष्ण अडवानी प्रधानमंत्री होने चाहिए, इसी बात को ध्यान में रख कर मैंने अपना मत दिया है। श्री अडवानी को ही प्रधानमंत्री के लायक मानने वाले सुनील छतवानी ने कहा कि वे भी चाहते हैं कि श्री अडवानी ही प्रधानमंत्री बनें। अपने पति के साथ मतदान करने आईं कविता गुरुबक्षाणी ने कहा कि मतदान जरूरी है, इसका उपयोग सबको करना चाहिए, जो मतदान नहीं करते हैं उनको सजा मिलनी चाहिए। अधिवक्ता अमर गुरुबक्षाणी ने कहा कि उन्होंने संकल्प लिया था कि वे कम से कम 10 लोगों को मतदान करने के लिए प्रेरित करेंगे, इसमें वे सफल रहे और उन्होंने 10 से ज्यादा लोगों से मतदान करवाने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने पूछने पर कहा कि साफ छवि वाले को देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहिए, फिर वे चाहे किसी भी पार्टी के हों। प्रकाश जेठवानी ने कहा कि जो भी सांसद चुने जाते हैं उनको जनता के बीच आते रहना चाहिए। होता यह है कि सांसद ज्यादा से ज्यादा समय दिल्ली में बिताते हैं। अवंति विहार की अनिता तिवारी ने कहा कि देश की सुरक्षा के महत्व को समङाने के साथ महंगाई और आतंकवाद से निपटने की क्षमता रखने वाले प्रधानमंत्री होने चाहिए। अपने पति तमेश आहूजा के साथ मतदान करके लौट रहीं सुमन आहूजा ने कहा कि देश में एक बार फिर से भाजपा की सरकार बननी चाहिए। भाजपा की सरकार में देश में महंगाई पर अंकुश था, आज महंगाई बेलगाम हो गई है। उन्होंने बताया कि मेरी सहेलियों का भी ऐसा मानना है और हम सबने श्री अडवानी को प्रधानमंत्री बनाने के संकल्प के साथ मतदान किया है। श्रीराम नगर के युवक मोहनीश शिवनकर ने कहा कि जब वे मतदान करने गए थे तो उनके मन में यही था कि जैसा विकास छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने किया है, वैसा ही विकास देश का होना चाहिए। उनकी माता विजया शिवनकर ने प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह को ठीक मानते हुए कहा कि उनको फिर से प्रधानमंत्री बनना चाहिए। पहली बार मतदान करने वाली रूतिका शिवनकर ने पूछने पर तपाक से कहा कि हम युवा तो चाहते हैं कि देश के प्रधानमंत्री राहुल गांधी बनें।

Read more...

बुधवार, अप्रैल 15, 2009

जिन्हें हम बनाते हैं मंत्री-डंडे मारते हैं उन्हीं के संतरी

बा अदब, बा मुलाहिजा, होशियार फला-फला राज्य के सरकार श्री-श्री फला-फला मंत्री जी पधार रहे हैं, जल्द से जल्द सारे रास्ते खाली कर दिए जाएं, किसी ने भी रास्ते में आने की गुस्ताखी की तो उसके सिर पर मंत्री जी के संतरी के डंडे पड़ेंगे बेभाव पड़ सकते हैं।
आज अपने देश में इस तरह के वाक्ये आम हो गए हैं। अब भले यह बात अलग है कि ऐसी कोई मुनादी नहीं की जाती है कि फला-फला मंत्री आ रहे हैं लेकिन जब भी किसी रास्ते से किसी वीआईपी का काफिला गुजरता है तो उस रास्ते से गुजरने वालों का हश्र क्या होता है, यह बात सब जानते हैं। कहने को तो अपना देश एक लोकतांत्रिक देश है लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या वास्तव में हमारे देश में लोकतंत्र यानी जनता का राज है। कम से कम हमें तो ऐसा कदापि नहीं लगता है कि अपने देश में जनता का राज है। अरे भई अगर वास्तव में जनता का राज रहता है फिर जनता पर ही कदम-कदम पर डंडे क्यों चलते और वो भी ऐसे लोगों के डंडे जिनको डंडे चलाने के मुकाम तक पहुंचाने का काम जनता ही करती है। जिस जनता के पास पांच साल में एक दिन भिखारी बनकर वोट मांगने के लिए मंत्री और नेता जाते हैं उसी जनता को कुर्सी मिलने के बाद सब कीड़े-मकोड़ों से ज्यादा कुछ नहीं समझते हैं। आज अपने देश का ऐसा कोई शहर नहीं होगा जहां पर किसी वीआईपी के आने के बाद वहां की जनता को परेशानी नहीं होती है। आज जबकि पूरे देश में चुनावी बयार बह रही है और हर राज्य में वीआईपी की आमद बढ़ गई है तो ऐसे में सभी शहरों में आम जन का जीना भी मुश्किल हो गया है। एक तरफ जनाब वीवीआईपी का कारवां आ रहा है इसलिए सारे रास्ते बंद कर दिए गए हैं। अब जब कि सारे रास्ते बंद है तो किसी को स्कूल, दफ्तर, अस्पताल या कहीं भी जाना है तो उसके लिए कोई रास्ता तब तक नहीं है जब तक वीआईपी का काफिला नहीं गुजर जाता है। अगर किसी को समय पर कहीं जाने का भूत सवार है तो उनके भूत को उतारने के लिए जनता के पैसों से वेतन लेने वाली पुलिस बैठी है। किसी ने कहीं से निकलने की हिमाकत की नहीं की पड़ गए बेभाव के डंडे। आम जनों की मुश्किलें उस समय और बढ़ जाती हैं जब किसी भी शहर में कोई ऐसे वीवीआईपी आ जाते हैं जिनको जेड प्लस सुरक्षा मिली हुई हैं। इनके आने-जाने वाले इन सभी रास्तों को कम से कम 30 मिनट से एक घंटे पहले बंद कर दिया जाता है। इन रास्तों के बंद होने के बाद जो जाम लगता है उस जाम को आम होने में फिर पूरा दिन लग जाता है। शायद ही अपने देश का कोई ऐसा शहर होगा जहां के रहवासी यह दुआ न करते हों कि कभी उनके शहर में कोई ऐसा वीवीआईपी आए ही मत ताकि उनको परेशानियों का सामना करना पड़े। ऐसे वीवीआईपी के सामने तो मीडिया वाले भी पानी भरते हैं। अगर जेड़ प्लस सुरक्षा वाले वीवीआईपी आए हैं तो मीडिया वालों की भी शामत आ जाती है। लेकिन वे भी क्या कर पाते हैं अखबार के किसी कोने में एक छोटी सी खबर लग जाती है कि मीडिया वालों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा। लेकिन इस परेशानी से मुक्ति दिलाने की पहल किसी ने नहीं की। वैसे कोई पहल कर भी नहीं सकता है, किस में इतना दम है कि इन कुर्सी वालों के खिलाफ बोले। इन कुर्सी वालों के खिलाफ बोलने के लिए नहीं, करने के लिए एक दिन जरूर रहता है औैर वो दिन होता है मतदान का। लेकिन इस एक दिन की ताकत को भी अपने देश की जनता आज तक नहीं पहचान पाई है। काश हम इस बात को समझ पाते कि यह एक दिन हमारे लिए कितने महत्व का होता है तो इस देश की पूरी काया बदल जाती। लेकिन इसका क्या किया जाए कि इस एक दिन को भी बिकने से कोई रोक नहीं पाता है। कुर्सी के भूखे लोग इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि अपने देश की आधी से ज्यादा आबादी भूखी और नंगी है और ऐसी भूखी-नंगी जनता को खरीदना कौन सी बड़ी बात है। जिस मतदान को महादान और सबसे शक्तिशाली माना जाता है, वह महज एक चेपटी यानी शराब की छोटी सी बोतल में बिक जाता है। अपने देश का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं होगा जहां पर मतदान की रात को शराब, कपड़े, पैसे और न जाने क्या-क्या नहीं बांटे जाते हैं रात के अंधेरे में। रात के अंधेरे में यह सब बंटने के बाद सुबह को नेता जी की कुर्सी तय हो जाती है। और फिर बन जाती है उनकी सरकार जिनमें ऐसा सब करने का दम रहता है। भले आज सभी राजनैतिक पार्टियां ईमानदारी से चुनाव जीतने का दावा करती हैं, लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है यह बात सब जानते हैं। हम तो बस यही चाहते हैं कि इस देश की जनता को अपने मत के महत्व को समझना जरूरी है, अगर इसको नहीं समझा गया तो मंत्रियों के संतरियों से हम सब डंडे खाते रहेंगे। इस देश में जब तक वीआईपी और वीवीआईपी को सुरक्षा घेरे में रखे जाते रहेंगे आम जनता पर डंडे चलते रहेंगे। हमारे कहने का मकसद यह कदापि नहीं है कि किसी को सुरक्षा देना गलत है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर आम-जनों को परेशान करना तो बंद करना चाहिए। सोचने वाली बात यह है कि आखिर इतनी ज्यादा सुरक्षा की जरूरत भारतीय मंत्रियों और नेताओं को क्यों पड़ती है। क्या बाहर के मुल्कों के मंत्री और नेता आतंकी निशाने पर नहीं रहते हैं। सुरक्षा उनकी भी की जाती है, लेकिन भारत में जैसी सुरक्षा की जाती है उससे तो जनता को भगवान ही बचा सकते हैं। यह बात भी सत्य है कि जितनी पैसा पानी की तरह भारत में वीआईपी की सुरक्षा में बहाया जाता है, उतना और किसी देश में नहीं बहाया जाता। देखा जाए तो आम आदमी के खून-पसीने की कमाई को वीआईपी की सुरक्षा में ऐसे फूंका जाता है मानो पैसे न होकर रद्दी के टुकड़े हों।

Read more...

मंगलवार, अप्रैल 14, 2009

फिटनेस में नंबर वन है भारतीय हॉकी टीम

अजलान शाह कप पर १३ साल बाद कब्जा करने वाली भारतीय हॉकी टीम को एक माह तक फिजिकल ट्रेनिंग देने वाले एनआईएस कोच रायपुर के गजेन्द्र पांडे का कहना है कि टीम फिटनेस में नंबर वन है। टीम के सभी खिलाड़ी अनुशासन के मामले में भी सही है। इस टीम में लगातार जीतने की क्षमता है जिसको वह साबित कर रही है। भारतीय टीम के जीतने के बाद यहां पर चर्चा करते हुए श्री पांडे ने बताया कि वे जब भोपाल के साई सेंटर में थे तब वहीं पर दिसंबर २००८ से जनवरी २००९ तक भारतीय हॉकी टीम का प्रशिक्षण शिविर लगा था। इस टीम को फिजिकल ट्रेनिंग देने का जिम्मा साई के एक एथलेटिक्स कोच के साथ भारोत्तोलन के कोच गजेन्द्र पांडे को दिया गया था। श्री पांडे ने बताया कि यह उनके लिए एक सुखद अनुभव था कि उनके मार्गदर्शन में भारत की एक ऐसी टीम फिजिकल प्रशिक्षण ले रही थी जो युवा टीम है और जिस टीम के सभी खिलाडिय़ों में काफी दमखम है। उन्होंने बताया कि टे्रनिंग के समय ही यह बात समङा में आ गई थी कि सभी खिलाड़ी फिटनेस के मामले में बहुत मजबूत हैं। उन्होंने बताया कि टीम के खिलाड़ी जहां अनुशासन के मामले में ठीक थे, वहीं खेल के मामले भी आगे थे। बकौल श्री पांडे उन्होंने टीम का खेल देखा था और उनको इस बात का भरोसा था कि यह टीम जरूर कमाल करेगी। यहां पर यह बताना लाजिमी होगा कि श्री पांडे ने बहुत पहले इस बात का खुलासा किया था कि उन्होंने वर्तमान भारतीय हॉकी टीम को फिजिकल टे्रनिंग दी है, लेकिन इस बारे में वे कुछ भी बात करने को पहले तैयार नहीं थे। उन्होंने कहा कि जब तक टीम कोई कमाल नहीं करेगी वे कुछ नहीं बोलेंगे। अब जबकि टीम ने अजलान शाह कप जीतने का कमाल किया है तो श्री पांडे ने जहां बात की, वहीं उन्होंने हॉकी खिलाड़ी मुश्ताक अली प्रधान के पास रखवाई वह फोटो भी उपलब्ध करवाई जो फोटो उन्होंने भारतीय टीम ने अपने प्रशिक्षकों के साथ खींचवाई थी। श्री पांडे ने जहां भारत की टीम को फिजिकल टे्रनिंग देने का काम किया है, वहीं उन्होंने ओलंपियन कुंजरानी देवी को भी फिजिकल ट्रेनिंग दी है। इसके साथ ही उन्होंने देश के कई नामी खिलाडिय़ों को फिजिकल ट्रेनिंग दी है। उनके मागदर्शन में ही छत्तीसगढ़ के कई खिलाड़ी राष्ट्रीय के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारोत्तोलन में जीत प्राप्त कर रहे हैं।

Read more...
Related Posts with Thumbnails

ब्लाग चर्चा

मेरी ब्लॉग सूची

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP