मनमोहन का अर्थशास्त्र आया काम-अडवानी का नहीं भाया नाम
वह भी 16 तारीख थी जिस दिन छत्तीसगढ़ में मतदान हुआ था और आज भी 16 तारीख है जब लोकसभा चुनाव के नतीजे सामने आए हैं। जब 16 अप्रैल को छत्तीसगढ़ में 11 लोससभा सीटों के लिए मतदान हुआ था उस समय हमने रायपुर लोकसभा सीट के लिए मतदान करने वालों से बात की थी, उस बातचीत के दौरान ही एक महिला मतदाता ने जो बातें कहीं थीं, वहीं बात आज नतीजों के बाद सच होती नजर आ रही है। उस महिला मतदाता से आप कैसा प्रधानमंत्री चाहती हैं के सवाल पर उन्होंने तपाक से कहा था कि उनका तो ऐसा मानना है कि मनमोहन सिंह से अच्छा प्रधानमंत्री कोई हो ही नहीं सकता है। इसके पीछे का कारण भी उन्होंने बताया था कि आज विश्व जिस तरह से मंदी के दौर से गुजर रहा है उस दौर में भी मनमोहन सिंह अर्थशास्त्री होने के कारण देश को बचाए रखने में सफल हो रहे हैं। आगे भी देश को वे ही आगे ले जाने का काम कर सकते हैं। उनकी बातों को याद करके लगता है कि वास्तव में देश के पढ़े-लिखे तबके ने भी संभवत: इस बात को ध्यान में रखते हुए एक बार फिर से मनमोहन सिंह को सिंह इज किंग बनाने का फैसला किया है। इधर यह बात भी सामने आई है कि भाजपा को लालकृष्ण अडवानी को प्रधानमंत्री के रूप में सामने रखना भारी पड़ा है। अगर उनके स्थान पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में सामने रखा जाता तो शायद आज तस्वीर कुछ और होती।
लोकसभा के परिणामों ने साबित कर दिया है कि जनता पूरी तरह से कांग्रेस और उसकी गठबंधन की सरकार से संतुष्ट है और चाहती है कि एक बार फिर से देश की कमान मनमोहन सिंह के हाथों में ही रहे। जनता का ऐ
सा मानने के पीछे जो सबसे बड़ा कारण नजर आता है वह यह है कि जनता ऐसा मानती है कि मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री ही इस देश का विकास कर सकते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी भी संभवत: इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ थीं कि मनमोहन सिंह ही लोगों का मन मोह सकते हैं। ऐसे में उन्होंने सही समय पर सही पासा फेंकते हुए यह ऐलान किया था कि यूपीए फिर सत्ता में आती है तो मनमोहन ही प्रधानमंत्री होंगे। अगर वह पुत्र मोह में फंस जातीं तो आज यूपीए को फिर से सरकार बनाने का मौका मिलने वाला नहीं था। कांग्रेस की चाकरी करने वाले नेता श्रीमती गांधी को खुश करने के लिए जरूर समय-समय पर राहुल गांधी को प्रधान मंत्री बनाने की बात करते रहे, लेकिन कम से कम श्रीमती गांधी को यह बात अच्छी तरह से मालूम थी कि अगर उन्होंने कांग्रेस के चाकरों के चक्कर में पड़कर राहुल को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया होता तो आज यह दिन देखने को नहीं मिलता।श्रीमती सोनिया गांधी ने जिस तरह से रणनीति बनाकर फिर से कांग्रेस को सत्ता में लाने का काम किया है, उससे यह साफ हो जाता है कि उनको राजनीति की सबसे ज्यादा समझ है।
इसमें कोई दो मत नहीं है कि यूपीए सरकार में श्रीमती सोनिया गांधी की ही चलती रही है और आगे भी उनकी ही चलेगी। मनमोहन सिंह इस बात को कैसे भूल सकते हैं कि उनको प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला था उसके पीछे श्रीमती गांधी ही थीं, ऐसे में उनको तो उनकी बातें माननी ही हैं। क्या भाजपा में ऐसा होता तो भाजपा सुप्रीम की बात मानने से कोई प्रधानमंत्री इंकार कर देगा। विरोधियों का काम है विरोध करना, लेकिन फैसला करने का काम तो जनता का है। अब जनता ने जबकि यूपीए को सत्ता सौंपने का फैसला सुना दिया है तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि मनमोहन सिंह मजबूर प्रधानमंत्री है या मजबूत प्रधानमंत्री। मनमोहन चाहे मजबूत हो या मजबूर लेकिन यह तय है कि उनको उनके अर्थशास्त्र ने एक बार फिर से सिंह इज किंग बना दिया है।
और समझ हो भी क्यों नहीं, उनको राजनीति सीखने का मौका अपनी सास श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ अपने पति राजीव गांधी से मिला है। ऐसे में यह कैसे हो सकता है कि वह मात खा जाती, उन्होंने सही समय पर जनता की नब्ज पहचानी और बिलकुल सही रणनीति से काम लिया और अपने को सरकार में वापस लाने में सफल रहीं। अब यह अलग मुद्दा है कि मनमोहन मजबूर प्रधानमंत्री हैं या मजबूत प्रधानमंत्री। विरोधी पार्टियां लगातार उनको मजबूर प्रधानमंत्री कहती रही हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि यूपीए सरकार में श्रीमती सोनिया गांधी की ही चलती रही है और आगे भी उनकी ही चलेगी। मनमोहन सिंह इस बात को कैसे भूल सकते हैं कि उनको प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला था उसके पीछे श्रीमती गांधी ही थीं, ऐसे में उनको तो उनकी बातें माननी ही हैं। क्या भाजपा में ऐसा होता तो भाजपा सुप्रीम की बात मानने से कोई प्रधानमंत्री इंकार कर देगा। विरोधियों का काम है विरोध करना, लेकिन फैसला करने का काम तो जनता का है। अब जनता ने जबकि यूपीए को सत्ता सौंपने का फैसला सुना दिया है तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि मनमोहन सिंह मजबूर प्रधानमंत्री है या मजबूत प्रधानमंत्री। मनमोहन चाहे मजबूत हो या मजबूर लेकिन यह तय है कि उनको उनके अर्थशास्त्र ने एक बार फिर से सिंह इज किंग बना दिया है।अब भाजपा की बात करें तो भाजपा का जो हाल हुआ है उसके पीछे कहीं न कहीं लालकृष्ण अडवानी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रमोट करना रहा है। आम जनता की तो बात ही छोड़ दें भाजपा वाले खुद कहते रहे हैं कि अडवानी का नाम तय करना गलत फैसला रहा है और आज वास्तव में वह फैसला गलत साबित हो ही गया है। अगर भाजपा ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर दांव खेला होता तो एक बार भाजपा के सत्ता में आने के आसार हो सकते थे, लेकिन अब क्या हो सकता है अब तो भाजपा को पांच साल इंतजार करना पड़ेगा। इसी के साथ उसके लिए यह चिंतन-मनन का सवाल है कि उसको हार क्यों मिली। बड़े-बड़े दांवे करने वाली भाजपा अपना पिछला ही प्रदर्शन नहीं दोहरा सकी।






