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मंगलवार, अप्रैल 28, 2009

भीम के पांव देखने हैं तो खल्लारी आएं....

छत्तीसगढ़ में जो भी पर्यटन और धार्मिक स्थल हैं वहां पर रामायण और महाभारत की गाथा से जुड़ी कई चीजें हैं। महाभारत के महारथी और परम शक्तिशाली भीम का छत्तीसगढ़ से नाता रहा है। नाता तो सारे पांडवों का रहा है। राजधानी रायपुर से करीब 80 किलो मीटर की दूरी पर खल्लारी में माता खल्लारी देवी का मंदिर है। पहाड़ों पर बसे इस मंदिर के पास में ही भीम के पैरों के निशानों के साथ उनका चूल्हा भी है जहां पर वे खाना बनाते थे। वैसे यहां आने के बाद महज भीम के पांव के ही दर्शन नहीं होंगे, यहां देखने लायक काफी कुछ है। लेकिन फिलहाल हम चर्चा भीम पांव की करने वाले हैं।

महाभारत के जुड़े पांडवों के छत्तीसगढ़ के कई स्थानों पर आने के अवशेष हैं। वैसे भी बताया जाता है कि सिरपुर में ही देश का प्रमुख चौराहा था और किसी को भी उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम जाने के लिए इस चौराहे से गुजरना ही पड़ता था। ऐसे में जबकि पांडवों को भी अपना अज्ञातवाश काटना था तो उनका छत्तीसगढ़ के जंगलों में आना हुआ। मप्र के पंचमढ़ी में भी पांडवों का स्थान है। बहरहाल हम बातें करें पांच पांडवों में से एक शक्तिशाली भीम की। भीम के बारे में ऐसा कहा जाता है कि विशालकाय शरीर के भीम जब चलते थे तो धरती पर जब उनके पैर पड़ते थे तो लगता था कि धरती हिल रही है। इस बात का प्रमाण वास्तव में भीम के पैर देखने के बाद होता है और इन पैरों को जब 355 मीटर ऊंची पहाड़ी पर देखने से मालूम होता है कि वास्तव में भीम कितने शक्तिशाली रहे होंगे।

पहाड़ी में उनके पैरों के जो निशाने हैं वो एक तरह से पहाड़ के पत्थर में गड्ढ़ा है। जानकारों का ऐसा मानना कि जब भीम यहां आते होंगे तो उनके पैरों से पहाड़ों में भी गड्ढ़ा हो जाता था। जहां पर भीम के पैरों के निशाने हैं, वहीं पर एक और बहुत बड़ा गड्ढ़ा है जिसे उनका चूल्हा बताया जाता है। इस चूल्हें में ही वे खाना बनाते थे। खल्लारी मंदिर के पुजारी महेन्द्र पांडे बताते हैं कि खल्लारी के पास में ही उस लाक्ष्यागृह के अवशेष हैं जिसमें पांडवों को रखा गया था और बाद में इसमें आग लगा दी गई थी। लेकिन पांडव उस आग से बच गए थे क्योंकि विदुर ने उनको आग से बचने का उपाय कुछ इस तरह से बताया कि आग में ऐसा कौन सा जीव है जो बचने का रास्ता निकाल लेते हैं। इसका जवाब पांडवों ने दिया था कि चूहा। चूहा जिस तरह से सुरंग बनाकर अपनी जान बचा लेता है उसी तरह से पांडवों ने भी लाक्ष्यागृह के नीचे से सुरंग बनाकर अपनी जान बचाई थी।

खल्लारी आने पर भीम पांव और चूल्हे के साथ और भी प्रकृति के कई अद्भूत नजारे देखने को मिलते हैं। इन बाकी नजारों की बातें अब बाद में होंगी। फिलहाल इतना ही। खल्लारी तक पहुंचने के लिए पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर तक ट्रेन या फिर हवाई मार्ग से आना पड़ेगा। रायपुर से खल्लारी तक बस से या फिर ट्रेन से जाने का रास्ता है। ट्रेन के रास्ते से जाने पर भीमखोज में उतरना पड़ेगा। बस से सीधे खल्लारी पहुंचा जा सकता है।

10 टिप्पणियाँ:

PN Subramanian मंगल अप्रैल 28, 09:37:00 am 2009  

बहुत मजा आया खल्लारी के बारे में जानकार.

ajay मंगल अप्रैल 28, 10:20:00 am 2009  

लगता है खल्लारी जाने की योजना अब बनानी ही पडेगी

anu मंगल अप्रैल 28, 10:43:00 am 2009  

प्रकृति के कई अद्भूत नजारों की जानकारी का इंतजार रहेगा

बेनामी,  मंगल अप्रैल 28, 10:45:00 am 2009  

लाक्ष्यागृह के अवशेष की भी तस्वीर देते तो अच्छा रहता

अल्पना वर्मा मंगल अप्रैल 28, 11:02:00 am 2009  

rochak jaankari..shayad chhattisgarh mein bahut kuchh hai dekhne ke liye..kripya wahan ki aur tasweeren post kareeeye.

राजकुमार ग्वालानी मंगल अप्रैल 28, 11:12:00 am 2009  

अल्पना जी
आपकी सलाह पर जरुर अमल होग, आपको छत्तीसगढ़ के नजारों से दो - चार होने का अवसर जल्द मिलेगा

मुनीश ( munish ) मंगल अप्रैल 28, 11:18:00 am 2009  

i have not seen any region in India which is not linked to Mahabharat . thnx for adding one more . i liked ur blog saahab!

महामंत्री - तस्लीम मंगल अप्रैल 28, 01:13:00 pm 2009  

ये तो आपने बहुत महत्व की बात बताई। शुक्रिया।
----------
TSALIIM.
-SBA-

Shikha Deepak मंगल अप्रैल 28, 09:35:00 pm 2009  

अद्भुत। मुझे इसके बारे में कुछ पता ही न था। अपनी यात्रा संबंधी सूची में इसको भी डाल लिया है।

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