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रविवार, अप्रैल 05, 2009

सभ्यता में रहने की सलाह पर बवाल क्यों?

अपना देश एक सुसंस्कृत देश है इस देश में अगर कहीं कुछ गलत होता है तो उस गलत का विरोध करना हर देशवासी का कर्तव्य बनता है। अब यह बात अलग है कि ऐसा करने का साहस बहुत कम लोग दिखा पाते हैं। अपने सभ्य भारतीय समाज को दूषित करने की साजिश को विदेशी लंबे समय से कर रहे हैं। आधुनिकता के नाम पर भारतीयों को एक ऐसे फैशन की तरफ मोडऩे का काम किया गया है जो फैशन भारतीय है ही नहीं। ठीक समझा आपने हमारा इशारा कपड़ों की तरफ ही है। अगर कोई इंसान कपड़ों के नाम पर चिथड़े पहन ले और उसे आधुनिक कहे और उपर से यह भी कहे कि ऐसे कपड़े पहनना तो उसका अधिकार है और उसे ऐसा करने से कोई नहीं रोक सकता है तो उसकी बात जायज है। भले उसको ऐसा करने से कोई नहीं रोक सकता लेकिन क्या कोई अपने विचार भी व्यक्त नहीं कर सकता। जिस तरह से किसी को कुछ भी पहनने का अधिकार है, उसी तरह से सबको अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है। अब यह बात अलग है कि उन विचारों को कौन किस रूप में लेता है। अगर हम नारी के पहनावे की बात करते हैं और उसको कोई दो साल की बच्ची के और सात साल की स्कूली बच्ची के साथ हुए कृत्य के साथ जोडऩे का काम करता है तो यह उनकी सोच है, हमने तो यह नहीं कहा कि उन बच्चियों के कपड़े भड़काऊ थे। इस बात से कोई कैसे इंकार कर सकता है कि आज आधुनिकता के नाम पर भारतीय संस्कृति से परे होकर ऐसे कपड़े पहने जाने लगे हैं जिन कपड़ों को पहनना सभ्यता नहीं कहा जा सकता है। भारतीय सभ्यता के साथ कोई खिलवाड़ करता है तो कम से कम हमें तो तकलीफ होती है। फिर भले इसके लिए कोई हमें कुंठित मानसिकता वाला कहें या फिर 18वीं सदी का कहे, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। ये बात हम भी जानते हैं कि हमारे कपड़ों के बारे में लिखने से कोई क्रांति आने वाली नहीं है। लेकिन एक शुरुआत करने में क्या बुराई है। हो सकता है हमारी यह बात किसी को बुरी लगी हो कि सड़क पर जा रही उस कम कपड़े पहनने वाली लड़की को वो लड़के ऐसे देख रहे थे मानो कच्चा चबा जाएंगे, तो इसमें गलत क्या है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ऐसी लड़कियों के कारण ही अत्याचार का शिकार दूसरी लड़कियां हो जाती हैं। जिनकी मानसिकता विकृत रहती है और उनके सामने अगर कोई लड़की शरीर दिखाऊ कपड़ों में आ जाए तो भले उस समय वे उस लड़की का कुछ न कर पाएं लेकिन उनके दिलो-दिमाग में जरूर वहीं दृश्य चलते रहते हैं और ऐसे में जब कोई असहाय लड़की उनके पंजे में फंस जाती है तो उसका शिकार हो जाता। अब इसे आप क्या कहेंगे। क्या इसके लिए बदन दिखाऊ कपड़े पहनने वाली लड़की दोषी नहीं है? यहां पर फिर कोई तर्क दे सकता है कि किसी को अपनी पसंद के अनुसार कपड़े पहनने से कोई कैसे रोक सकता है। यहां पर कोई किसी को रोकने नहीं जा रहा है। हमने तो भारतीय संस्कृति के हिसाब से कपड़े पहनने की ही बात कही है और इस बात को गलत अंदाज में पेश करके उस पर बवाल मचाया जा रहा है। हमने उन लड़कों की कोई वकालत नहीं कि है जो लड़के ऐसी लड़कियों का पीछा करते हैं। हम भी यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि ऐसी महिलाएं छेड़छाड़ और बलात्कार का शिकार ज्यादा होती हैं जो शालीन कपड़े पहनती हैं। इसके पीछे जहां ऐसा करने वालों की गंदी मानसिकता रहती है, वहीं कहीं न कहीं उन बदन दिखाऊ कपड़े पहनने वालों का भी हाथ रहता है जिनका बदन देखकर गंदी मानसिकता रखने वालों की मानसिकता भड़क जाती है। हमारे कहने का मतलब यह है कि यह बात सब जानते हैं कि गंदी मानसिकता रखने वालों की कमी नहीं है तो ऐसी मानसिकता रखने वालों की आग को भड़काने के लिए घी डालने का काम क्यों करना।
एक जनाब को लगता है कि हम नारी को कारों और गाय-भैसों की तरह मानते हैं। हमने तो ऐसा नहीं माना है। हमने तो नारी को हमेशा पूज्यनीय माना है, तभी तो हम चाहते हैं कि अपने सभ्य समाज में नारी सभ्यता के दायरे में रहे। नारी ही नहीं पुरुषों को भी सभ्यता के दायरे में रहना चाहिए। लेकिन कोई अगर सभ्यता के दायरे में नहीं रहना चाहता है और आधुनिकता के नाम पर गलत आचरण करता है तो फिर उसका कुछ नहीं किया जा सकता है। अगर कम कपड़ों को ही आधुनिकता मान लिया गया है और हमारी सलाह को गलत, तो हमें अपने को 18वीं सदी का समझने पर कोई एतराज नहीं है। एक जनाब फरमाते हैं कि रायपुर को तालिबानी की राजधानी प्रस्तावित कर दिया जाए। अगर लगता है कि रायपुर से कोई भारतीय सभ्यता और संस्कृति की बात करता है तो उसको तालिबानी राजधानी बनाने का प्रस्ताव रखना चाहिए तो ऐसी सोच को हम सलाम करते हैं। इन जनाब ने जानना चाहा है कि पीछा करने वाले लुच्चई किस संस्कृति के तहत उस कन्या का पीछा कर रहे थे तो हम बता दें कि आप भी जानते हैं कि वो लुच्चई एक गंदी मानसिकता के तहत ही उस कन्या का पीछा कर रहे थे, हमने ऐसे किसी लुच्चई का पक्ष नहीं लिया है, हमने तो तस्वीर का दूसरा पहलू उजागर किया था और संभावना जताई थी कि अगर उस कन्या ने शीलान परिधान पहना होता तो वे लुच्चई उसका पीछा नहीं करते। यहां पर कोई तर्क दे सकता है कि क्या शालीन परिधान पहनने वाली कन्याओं का कोई पीछा नहीं करता है, तो हम बता दें ऐसी कन्याओं का भी लुच्चई पीछा करते हैं, लेकिन तब उनके दिमाग में शायद वो सब नहीं चलता है जो बदन दिखाऊ कपड़ों वाली कन्या को देखकर चलने लगता है। हालांकि हम इसका दावा नहीं कर सकते हैं लेकिन ऐसा होना स्वाभाविक है।एक जनाब फरमाते हैं कि भारत में मुस्लिम संस्कृति के पहले काफी खुलापन था। ये जवाब किस जमाने की बात कर रहे हैं वही जाने। हमें तो नहीं लगता है कि कभी अपने देश में इतने बदन दिखाऊ कपड़े पहने जाते थे। आम जीवन की बात क्या करें फिल्मी दुनिया का ही इतिहास उठाकर देख लिया जाए तो मालूम होता है कि पुराने जमाने में नायिकाओं के हाथ-पैर भी नजर नहीं आते थे। जब किसी फिल्म में कोई नायिका नदी के किनारे बैठ कर अपने पैरों को पानी में डालती थी तो उनके पैरों को देखकर ही लोगों की आहें निकल जाती थीं, लेकिन आज फिल्मों में नायिकाएं क्या कर रही हैं बताने वाली बात नहीं है। बस विदेशी फिल्मों की तर्ज पर उनका टॉप लेस होना ही बचा है। वैसे जिस तरह से बदन दिखाने का काम आज की नायिकाएं कर रही हैं वो टॉप लेस होने से कम नहीं है। हमें अपने देश की नारियों को सभ्य कपड़े पहनने की सलाह देने से ही अगर कुंठित वर्ग का नेतृत्व करने वाला समझा जा रहा है तो हमें इससे कोई फर्क पडऩे वाला नहीं है। वैसे भी कहा जाता है कि सच्ची बात कहने वालों को लोग पागल समझते हैं। कम से कम हमें पागल तो नहीं समझा जा रहा है, हो सकता है किसी जनाब की नजर में हम पागल भी हों। वैसे हम एक बात बता दें कि यह बात हम भी जानते हैं कि हमें यह तय करने का अधिकार नहीं है कि महिलाएं क्या पहनें और क्या न पहनें। हमने ऐसा कोई अधिकार जताया भी नहीं है। लेकिन इतना अधिकार तो है कि हम इस बात का विरोध जता सकें कि ऐसा नहीं होना चाहिए। फिर हमने अपनी बात किसी पर थोपी नहीं है। और हमारी बात किसी हिटलर का कोई तुगलकी फरमान भी नहीं है जिस पर हाय-तौबा मचाई जाए, यह तो एक विचार है। अगर हमारी बातों से कोई सहमत नहीं है तो हम तो उन्हें सहमत होने के लिए बाध्य नहीं कर रहे हैं। अगर किसी को बीच बाजार में कपड़े उतारकर विचरण करने का शौक है तो हम भला कौन होते हैं ऐसे लोगों को रोकने वाले, यह तो उनका अधिकार है। हम तो उनको भी रोकने की हिमाकत नहीं कर रहे हैं जो पुरुष अपनी शर्ट के दो क्या सारे बटन खोकर चलते हैं और रास्ते में टांगों के बीच में खुजाते रहते हैं। ऐसे पुरुषों की मानसिकता क्या होती है यह बताने की जरूरत नहीं है। वैसे कोई भी इंसान नियमों के ऊपर नहीं होता है, नियम सब पर समान रूप से लागू होते हैं। पुरुष कोई आसमान से नहीं उतरे हैं। चाहे वह पुरुष हो या नारी हर किसी को सभ्यता के दायरे में रहना चाहिए। जो भी सभ्यता की लक्ष्मण रेखा पार करता है उसका हाल क्या होता है यह बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह सत्य है कि गलत काम का अंजाम कभी अच्छा नहीं होता है। अपने देश में रहने वाले हर पुरुष और स्त्री को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह एक ऐसे देश के वासी हैं जिस देश की संस्कृति को सारा विश्व मानता है। अब यह बात अलग है कि अपने देश के लोग अंग्रेजों की गुलामी से अब तक आजाद नहीं हो सकें हैं और उनका अनुसरण करने में ही अपनी शान समझते हैं। वास्तव में देखा जाए तो भारतीय संस्कृति को दूषित करने की साजिश आज से नहीं लंबे समय से विदेशी कर रहे हैं और इसमें उनका साथ देने का काम अपने को आधुनिक समझने वाले तथाकथित लोग कर रहे हैं, जो आधुनिकता के नाम पर न जाने क्या-क्या करते हैं। अपने को आधुनिक कहने वालों को कुछ सलाह देना ही लगता है बहुत बड़ा गुनाह है। लेकिन क्या करें हम तो आदमी हैं न और हम आदमी भी हिन्दुस्तानी हैं और हम हर हिन्दस्तानी से प्यार करते हैं और उसे अपना परिवार समझते हैं तभी तो उनको सलाह देने की गलती कर बैठते हैं, लेकिन अगर कोई यह समझता है कि हमें कुंठित और थका हुआ या और कुछ भी कह कर हमें अपनी सलाह देने से रोक सकता है तो यह गलत है क्योंकि हम तो वो हैं जो... बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं। अब जब हम सबसे प्यार करते हैं तो कैसे अपने प्यार करने वालों को गलत रास्ते पे जाते देख सकते हैं। बातें तो बहुत हैं, लेकिन फिलहाल इतना ही, बाकी बातें ब्रेक के बाद।

14 टिप्पणियाँ:

रचना रवि अप्रैल 05, 10:08:00 am 2009  

आप ने जो कहा हैं वो पहले भी बहुत लोगो ने कहा हैं और आगे भी कहते रहेगे । पुरूष को नंगा होने भी कभी उरेज नहीं हुआ और पुरूष को स्त्री को भी नंगा करने मे कभी उरेज नहीं हुआ सो इनको आप अपराधिक मान कर समाज से अलग मानते हैं और खुद ही आप कहते हैं ये लोग समाज का प्रतिनिधितव नहीं करते । आप के अंदर दोयम का भावः हैं स्त्री के लिये क्युकी आप के पूरी इस लेख मे या इस से पहले लेख मे या बासूती जी के यहाँ दिये गए आप के कमेन्ट मे आपने कही भी इस बात को नहीं माना हैं की स्त्री के पास एक दिमाग भी हैं और वो अपनी तरह जो अपने लिये सही हैं उसका फैसला कर सकती हैं ।

लेकिन आप जैसे लोगो के लिये बहुत खुशी की बात हैं की तालिबान हामी समयों तक पहुँच गया हैं और जल्दी ही आप की बहु बेटियों को सही करने के लिये आप के घरो तक भी आयेगा । उसदिन आप कितना लिख पायेगे इस विषय और क्या लिक पायेगे अभी से सोच कर रखे ।

राजकुमार ग्वालानी रवि अप्रैल 05, 10:29:00 am 2009  

रचना जी,
हमें यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि स्त्रियों के पास भी दिमाग नहीं बहुत ज्यादा दिमाग होता, हम ये कैसे भूल सकते हैं कि इस देश की राष्ट्रपति एक स्त्री हैं। लेकिन दिमाग का प्रयोग सही दिशा में किया जाए तभी ठीक रहता है, अगर कोई अपने को गलत रास्ते पर ले जा रहा है और उसे उस रास्ते में जाने से रोकना अपराध है, तो बात अलग है। स्त्रियों को अपने लिए सही-गलत का फैसला करने का भी पूरा अधिकार है। उनको रोक कौन रहा है ऐसा करने से। एक नेक सलाह से किसी को इतना बुरा क्यों लग रहा है, सलाह मानने के लिए कोई बाध्य नहीं होता है।

guru रवि अप्रैल 05, 11:00:00 am 2009  

राजकुमार भाई आप भी कहां लगे हैं, आपकी नेक सलाह को कोई मानने वाला नहीं है। आप सही कह रहे हैं लेकिन आपकी बातों को अगर महिलाएं मान जाएं तो फिर वो महिलाएं कैसे होंगी। महिलाओं से तो भगवान भी नहीं जीत सका है फिर आपकी बिसात ही क्या है। हमारी मानें तो छोड़ो इन कपड़ों-वपड़ों की बात को किसी को अगर कम कपड़े पहनने में ही आनंद मिलता है तो आप उनके आनंद में खलल क्यों डाल रहे हैं, जय हो कम कपड़ों की।

रचना रवि अप्रैल 05, 11:04:00 am 2009  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
बेनामी,  रवि अप्रैल 05, 11:05:00 am 2009  

भाई आज की नारी ऐसी नहीं है कि आप उनको सलाह दें, अपनी सलाह का पिटारा आप अपने पास ही रखें वरना कहीं आपके खिलाफ नारी मोर्चा न निकल जाए। इस देश में सही बात कहने वालों के खिलाफ ही मोर्चा निकलता है इस बात को आप जैसे पत्रकार को भूलना नहीं चाहिए।

रचना रवि अप्रैल 05, 11:06:00 am 2009  

स्त्री को सदियों से सलाह ही मिलती आ रही हैं । वही आप भी कर रहे हैं । जबकि सलाह की जरुरत उन पुरुषों को हैं जिनको किसी भी स्त्री को देख कर केवल और केवल एक शरीर ही दिखता हैं । स्त्री का शरीर उसकी मज़बूरी क्यों बनती हैं आप इस पर एक पोस्ट लिखे । क्यूँ पुरूष स्त्री को देवी तो मान सकता हैं पर मनुष्य नहीं और क्यूँ जब संविधान मे सबको अपनी पसंद के अनुसार जीने का अधिकार हैं तो बंदिशे स्त्री के लिये हो ।

समय की मांग को समझ कर पुरुषों की मानसिकता पर लिखे । पुरुषों को समझाये की अगर स्त्री को उन्हे नंगा देख कर कोई आपति नहीं हैं तो पुरूष को भी नहीं होनी चाहिये ।

भारतीये संस्कृति और सभ्यता का ठेका स्त्री के सर पर मत डाले । अपनी यानी पुरूष की ज़िम्मेदारी पर भी लिखे । स्त्री के कपड़ो मे नहीं पुरूष की मानसकिता मे दोष हैं

Suresh Chiplunkar रवि अप्रैल 05, 11:10:00 am 2009  

आईये राजकुमार जी आपका भी स्वागत है… थोड़ा पीछे जाकर गुलाबी चड्डी अभियान के दौरान मेरे और शास्त्री जी के चिठ्ठे भी पढ़ डालिये… आपको बहुत कुछ पता चलेगा…

राजकुमार ग्वालानी रवि अप्रैल 05, 11:18:00 am 2009  

रचना जी,
आपकी नेक सलाह के लिए शुक्रिया, आपको जरूर बहुत जल्द ही पुरुषों की मानसिकता पर लेख पढऩे को मिलेगा। आपकी इस बात से हम भी सहमत हंै कि ज्यादातर पुरुषों को केवल स्त्रियों का शरीर ही दिखता है, लेकिन होना यह चाहिए कि स्त्री का शरीर नहीं बल्कि उसके अंदर छुपी हुई खुबसूरती और उनके गुणों को देखना चाहिए। स्त्री का शरीर मजबूरी क्यों बनता है इस पर भी आपको जरूर पोस्ट पढऩे को मिलेगी।

बेनामी,  रवि अप्रैल 05, 11:48:00 am 2009  

suresh miya ki taarif karni hogee
yahaan raaj kumar ko bhadhava dae rahey haen
wahaan ghughuti ki taarif kar rahey haen
subhanaalah

Anil Pusadkar रवि अप्रैल 05, 12:52:00 pm 2009  

राजकुमार बेवजह के विवाद से बचो।बहुत कुछ है अपने छत्तीसगढ मे जिस पर लिखा जाना चाहिये मगर लिखा जाता नही है।तुम अपनी कलम की ताक़त का इस्तेमाल छत्तीसगढ की भलाई के लिए करोगे तो ज्यादा अच्छा रहेगा।कौन क्या पहन रहा है?किसे क्या पहना चाहिये या नही पहनना चाहिये ये पहनने वाले के विवेक पर छोड दो।तुम कंहा-कंहा लड़ते-झगड़ते रहोगे।अच्छा लिखो अभी तुम्हारी ज़रुरत है अपने प्रदेश को।समझे।

बेनामी,  रवि अप्रैल 05, 03:23:00 pm 2009  

लगता है आपको वास्तव में पागल का खिताब लेने का शौक चर्राया है, वरना आप महिलाओं से कभी पंगा नहीं लेते। आपने देखा नहीं कि आपके एक नेक सलाह वाले लेख के बदले महिलाओं का साथ देने वालों की लाइन लग गई है, आपकी भावनाओं को यहां समझने वाला कोई नहीं है। अनिल भाई ठीक कह रहे हैं आप जैसे कलम के धनी को अपने राज्य के हित के लिए अपनी ऊर्जा का उपयोग करना चाहिए, कहां लगे हैं आप महिलाओं के कपड़ों के पीछे.. जिसको जो पहनना है पहनने दीजिए इससे कौन सा आपकी सेहत पर फर्क पडऩे वाला है। वैसे भी महिलाएं वहीं करती हैं जो उनका मन करता है, कभी किसी की बात सुनना तो उनको पसंद ही नहीं आता

महेन रवि अप्रैल 05, 07:37:00 pm 2009  

प्रतिक्रिया करनी बंद करो मित्र क्योंकि आत्मरक्षा का एक भी शब्द अंततः आपको अपराधी सिद्ध करता है. अपने को सही ठहराने की कोशिश में तो आप हम सभी की सारी टिप्पणियों से सहमत हो गए.
इतिहास आपके लगने या मानाने से नहीं बनता बंधु वो तो तथ्यों पर आधारित होता है. कभी दक्षिण भारत के मंदिरों में मूर्तियाँ देखी हैं? कभी खजुराहो के मंदिरों के बारे में सुना है? देखियेगा... आपको पता चलेगा प्राचीन भारत में ड्रेस कोड क्या था. उदहारण और भी हैं, ज़रुरत पड़े तो बताना. अगर आप पहले ही पुरुष मानसिकता पर कुछ कह देते तो बात और थी... अब प्रतिक्रिया और बचाव में कुछ कहने का कोई अर्थ?
बाकी बातें छोड़ दो... मुझे ये बताइयेगा की ये वे विदेशी ताकतें हैं कौन जो हमारी संस्कृति के खिलाफ अभियान चला रही हैं? और किस रूप में चल रहा है यह अभियान? वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मीना कुमारी से लेकर नर्गिस तक कई हिरोइनों को थोडा ही सही अंग प्रदर्शन का मौका मिला है और अगर आप उससे भी पहले की बात कर रहे हों तो कहियेगा. उसके भी उदहारण पेश कर दूंगा. मनोविज्ञान पर आपकी पकड़ दुरुस्त है. क्या तर्क पेश किया है कि अंग दिखाऊ महिलाओं की वजह से अंग न दिखाने वाली महिलाओं पर बलात्कार होते हैं. इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे आप हमें भी बताइयेगा.

लवली कुमारी / Lovely kumari सोम अप्रैल 06, 11:53:00 am 2009  

आप पहले साफ करें सवाल भारतीय परम्परा का है की कपडों का.अगर कपडों का है तो प्रत्येक नागरिक को यह हक़ है की वह अपने अनुसार कपडे पहने..अश्लीलता के लिए कानून अलग से बने हुए हैं और अगर आपको आपति है तो आप कानून की शरण लें... पर आप किसी भी चीज से प्रेरित होकर कानून तोडेंगे (छेड़छाड़ और यौन हिंसा) तो आप अपने बचाव के लिए आदिम मानसिकता का तर्क इस्तेमाल नही कर सकते ..और अगर बात परम्परा की है तो मेरी यह कविता पढें.

अपशब्द सुनने को मैं तैयार हूँ
दुश्चरित्र कहो या कुल कलंकिनी
मुझे कष्ट की नहीं परवाह है
आहुति बनने का प्रण कर लिया है
तोड़ के पूर्वाग्रहों की बेडिया
मैंने विद्रोहिणी बनने का मन कर लिया है

मेरा दोष क्या था बताओ
मुझ अबला को अपशगुनी कहा गया
उजड़ा मेरा ही सुहाग
मुझे ही दोषी बना दिया गया
क्यों मुझे अपनी ही आत्मजा का
कन्यादान नही करने दिया गया

क्यों न दे पाई मुखाग्नि मैं अपने पिता को
क्या इसी तरह की परम्परा में पुत्र ने
उत्कृष्टता नही पाई
क्यों कोखजाई को
मैं विधवा अंतिम विदा नही दे पाई
किस गुनाह की दोषी थी मैं
जो मुझे नही देखने दी गई उसकी गोद भराई
क्या स्त्री होने का दंड है यह
विधुर को क्यों नही होती
इनसब में मनाही
क्यों जवाब न दिया किसी ने
जब - जब मैंने दी दुहाई

अब चिंगारी ने दबाव से जूझकर
ज्वाला का रूप ले लिया है
कष्ट दे दे कर तुमने मेरा ही
मन परिष्कृत कर दिया है
अगर यही तुम्हारा धर्म था
तो मैं अब विधर्मी हूँ
यही थी मर्यादा तो अब यह कलंकित होगी
मैं पीड़ा से खिलकर निखरी हूँ
अब यह परम्परा पीड़ित होगी

बी एस पाबला बुध अप्रैल 08, 06:41:00 am 2009  

हम भी आपको देते हैं
सिर्फ एक सलाह,

पंगा नहीं लेने का।

:-)

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