सभ्यता में रहने की सलाह पर बवाल क्यों?
अपना देश एक सुसंस्कृत देश है इस देश में अगर कहीं कुछ गलत होता है तो उस गलत का विरोध करना हर देशवासी का कर्तव्य बनता है। अब यह बात अलग है कि ऐसा करने का साहस बहुत कम लोग दिखा पाते हैं। अपने सभ्य भारतीय समाज को दूषित करने की साजिश को विदेशी लंबे समय से कर रहे हैं। आधुनिकता के नाम पर भारतीयों को एक ऐसे फैशन की तरफ मोडऩे का काम किया गया है जो फैशन भारतीय है ही नहीं। ठीक समझा आपने हमारा इशारा कपड़ों की तरफ ही है। अगर कोई इंसान कपड़ों के नाम पर चिथड़े पहन ले और उसे आधुनिक कहे और उपर से यह भी कहे कि ऐसे कपड़े पहनना तो उसका अधिकार है और उसे ऐसा करने से कोई नहीं रोक सकता है तो उसकी बात जायज है। भले उसको ऐसा करने से कोई नहीं रोक सकता लेकिन क्या कोई अपने विचार भी व्यक्त नहीं कर सकता। जिस तरह से किसी को कुछ भी पहनने का अधिकार है, उसी तरह से सबको अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है। अब यह बात अलग है कि उन विचारों को कौन किस रूप में लेता है। अगर हम नारी के पहनावे की बात करते हैं और उसको कोई दो साल की बच्ची के और सात साल की स्कूली बच्ची के साथ हुए कृत्य के साथ जोडऩे का काम करता है तो यह उनकी सोच है, हमने तो यह नहीं कहा कि उन बच्चियों के कपड़े भड़काऊ थे। इस बात से कोई कैसे इंकार कर सकता है कि आज आधुनिकता के नाम पर भारतीय संस्कृति से परे होकर ऐसे कपड़े पहने जाने लगे हैं जिन कपड़ों को पहनना सभ्यता नहीं कहा जा सकता है। भारतीय सभ्यता के साथ कोई खिलवाड़ करता है तो कम से कम हमें तो तकलीफ होती है। फिर भले इसके लिए कोई हमें कुंठित मानसिकता वाला कहें या फिर 18वीं सदी का कहे, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। ये बात हम भी जानते हैं कि हमारे कपड़ों के बारे में लिखने से कोई क्रांति आने वाली नहीं है। लेकिन एक शुरुआत करने में क्या बुराई है। हो सकता है हमारी यह बात किसी को बुरी लगी हो कि सड़क पर जा रही उस कम कपड़े पहनने वाली लड़की को वो लड़के ऐसे देख रहे थे मानो कच्चा चबा जाएंगे, तो इसमें गलत क्या है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ऐसी लड़कियों के कारण ही अत्याचार का शिकार दूसरी लड़कियां हो जाती हैं। जिनकी मानसिकता विकृत रहती है और उनके सामने अगर कोई लड़की शरीर दिखाऊ कपड़ों में आ जाए तो भले उस समय वे उस लड़की का कुछ न कर पाएं लेकिन उनके दिलो-दिमाग में जरूर वहीं दृश्य चलते रहते हैं और ऐसे में जब कोई असहाय लड़की उनके पंजे में फंस जाती है तो उसका शिकार हो जाता। अब इसे आप क्या कहेंगे। क्या इसके लिए बदन दिखाऊ कपड़े पहनने वाली लड़की दोषी नहीं है? यहां पर फिर कोई तर्क दे सकता है कि किसी को अपनी पसंद के अनुसार कपड़े पहनने से कोई कैसे रोक सकता है। यहां पर कोई किसी को रोकने नहीं जा रहा है। हमने तो भारतीय संस्कृति के हिसाब से कपड़े पहनने की ही बात कही है और इस बात को गलत अंदाज में पेश करके उस पर बवाल मचाया जा रहा है। हमने उन लड़कों की कोई वकालत नहीं कि है जो लड़के ऐसी लड़कियों का पीछा करते हैं। हम भी यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि ऐसी महिलाएं छेड़छाड़ और बलात्कार का शिकार ज्यादा होती हैं जो शालीन कपड़े पहनती हैं। इसके पीछे जहां ऐसा करने वालों की गंदी मानसिकता रहती है, वहीं कहीं न कहीं उन बदन दिखाऊ कपड़े पहनने वालों का भी हाथ रहता है जिनका बदन देखकर गंदी मानसिकता रखने वालों की मानसिकता भड़क जाती है। हमारे कहने का मतलब यह है कि यह बात सब जानते हैं कि गंदी मानसिकता रखने वालों की कमी नहीं है तो ऐसी मानसिकता रखने वालों की आग को भड़काने के लिए घी डालने का काम क्यों करना।
एक जनाब को लगता है कि हम नारी को कारों और गाय-भैसों की तरह मानते हैं। हमने तो ऐसा नहीं माना है। हमने तो नारी को हमेशा पूज्यनीय माना है, तभी तो हम चाहते हैं कि अपने सभ्य समाज में नारी सभ्यता के दायरे में रहे। नारी ही नहीं पुरुषों को भी सभ्यता के दायरे में रहना चाहिए। लेकिन कोई अगर सभ्यता के दायरे में नहीं रहना चाहता है और आधुनिकता के नाम पर गलत आचरण करता है तो फिर उसका कुछ नहीं किया जा सकता है। अगर कम कपड़ों को ही आधुनिकता मान लिया गया है और हमारी सलाह को गलत, तो हमें अपने को 18वीं सदी का समझने पर कोई एतराज नहीं है। एक जनाब फरमाते हैं कि रायपुर को तालिबानी की राजधानी प्रस्तावित कर दिया जाए। अगर लगता है कि रायपुर से कोई भारतीय सभ्यता और संस्कृति की बात करता है तो उसको तालिबानी राजधानी बनाने का प्रस्ताव रखना चाहिए तो ऐसी सोच को हम सलाम करते हैं। इन जनाब ने जानना चाहा है कि पीछा करने वाले लुच्चई किस संस्कृति के तहत उस कन्या का पीछा कर रहे थे तो हम बता दें कि आप भी जानते हैं कि वो लुच्चई एक गंदी मानसिकता के तहत ही उस कन्या का पीछा कर रहे थे, हमने ऐसे किसी लुच्चई का पक्ष नहीं लिया है, हमने तो तस्वीर का दूसरा पहलू उजागर किया था और संभावना जताई थी कि अगर उस कन्या ने शीलान परिधान पहना होता तो वे लुच्चई उसका पीछा नहीं करते। यहां पर कोई तर्क दे सकता है कि क्या शालीन परिधान पहनने वाली कन्याओं का कोई पीछा नहीं करता है, तो हम बता दें ऐसी कन्याओं का भी लुच्चई पीछा करते हैं, लेकिन तब उनके दिमाग में शायद वो सब नहीं चलता है जो बदन दिखाऊ कपड़ों वाली कन्या को देखकर चलने लगता है। हालांकि हम इसका दावा नहीं कर सकते हैं लेकिन ऐसा होना स्वाभाविक है।एक जनाब फरमाते हैं कि भारत में मुस्लिम संस्कृति के पहले काफी खुलापन था। ये जवाब किस जमाने की बात कर रहे हैं वही जाने। हमें तो नहीं लगता है कि कभी अपने देश में इतने बदन दिखाऊ कपड़े पहने जाते थे। आम जीवन की बात क्या करें फिल्मी दुनिया का ही इतिहास उठाकर देख लिया जाए तो मालूम होता है कि पुराने जमाने में नायिकाओं के हाथ-पैर भी नजर नहीं आते थे। जब किसी फिल्म में कोई नायिका नदी के किनारे बैठ कर अपने पैरों को पानी में डालती थी तो उनके पैरों को देखकर ही लोगों की आहें निकल जाती थीं, लेकिन आज फिल्मों में नायिकाएं क्या कर रही हैं बताने वाली बात नहीं है। बस विदेशी फिल्मों की तर्ज पर उनका टॉप लेस होना ही बचा है। वैसे जिस तरह से बदन दिखाने का काम आज की नायिकाएं कर रही हैं वो टॉप लेस होने से कम नहीं है। हमें अपने देश की नारियों को सभ्य कपड़े पहनने की सलाह देने से ही अगर कुंठित वर्ग का नेतृत्व करने वाला समझा जा रहा है तो हमें इससे कोई फर्क पडऩे वाला नहीं है। वैसे भी कहा जाता है कि सच्ची बात कहने वालों को लोग पागल समझते हैं। कम से कम हमें पागल तो नहीं समझा जा रहा है, हो सकता है किसी जनाब की नजर में हम पागल भी हों। वैसे हम एक बात बता दें कि यह बात हम भी जानते हैं कि हमें यह तय करने का अधिकार नहीं है कि महिलाएं क्या पहनें और क्या न पहनें। हमने ऐसा कोई अधिकार जताया भी नहीं है। लेकिन इतना अधिकार तो है कि हम इस बात का विरोध जता सकें कि ऐसा नहीं होना चाहिए। फिर हमने अपनी बात किसी पर थोपी नहीं है। और हमारी बात किसी हिटलर का कोई तुगलकी फरमान भी नहीं है जिस पर हाय-तौबा मचाई जाए, यह तो एक विचार है। अगर हमारी बातों से कोई सहमत नहीं है तो हम तो उन्हें सहमत होने के लिए बाध्य नहीं कर रहे हैं। अगर किसी को बीच बाजार में कपड़े उतारकर विचरण करने का शौक है तो हम भला कौन होते हैं ऐसे लोगों को रोकने वाले, यह तो उनका अधिकार है। हम तो उनको भी रोकने की हिमाकत नहीं कर रहे हैं जो पुरुष अपनी शर्ट के दो क्या सारे बटन खोकर चलते हैं और रास्ते में टांगों के बीच में खुजाते रहते हैं। ऐसे पुरुषों की मानसिकता क्या होती है यह बताने की जरूरत नहीं है। वैसे कोई भी इंसान नियमों के ऊपर नहीं होता है, नियम सब पर समान रूप से लागू होते हैं। पुरुष कोई आसमान से नहीं उतरे हैं। चाहे वह पुरुष हो या नारी हर किसी को सभ्यता के दायरे में रहना चाहिए। जो भी सभ्यता की लक्ष्मण रेखा पार करता है उसका हाल क्या होता है यह बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह सत्य है कि गलत काम का अंजाम कभी अच्छा नहीं होता है। अपने देश में रहने वाले हर पुरुष और स्त्री को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह एक ऐसे देश के वासी हैं जिस देश की संस्कृति को सारा विश्व मानता है। अब यह बात अलग है कि अपने देश के लोग अंग्रेजों की गुलामी से अब तक आजाद नहीं हो सकें हैं और उनका अनुसरण करने में ही अपनी शान समझते हैं। वास्तव में देखा जाए तो भारतीय संस्कृति को दूषित करने की साजिश आज से नहीं लंबे समय से विदेशी कर रहे हैं और इसमें उनका साथ देने का काम अपने को आधुनिक समझने वाले तथाकथित लोग कर रहे हैं, जो आधुनिकता के नाम पर न जाने क्या-क्या करते हैं। अपने को आधुनिक कहने वालों को कुछ सलाह देना ही लगता है बहुत बड़ा गुनाह है। लेकिन क्या करें हम तो आदमी हैं न और हम आदमी भी हिन्दुस्तानी हैं और हम हर हिन्दस्तानी से प्यार करते हैं और उसे अपना परिवार समझते हैं तभी तो उनको सलाह देने की गलती कर बैठते हैं, लेकिन अगर कोई यह समझता है कि हमें कुंठित और थका हुआ या और कुछ भी कह कर हमें अपनी सलाह देने से रोक सकता है तो यह गलत है क्योंकि हम तो वो हैं जो... बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं। अब जब हम सबसे प्यार करते हैं तो कैसे अपने प्यार करने वालों को गलत रास्ते पे जाते देख सकते हैं। बातें तो बहुत हैं, लेकिन फिलहाल इतना ही, बाकी बातें ब्रेक के बाद।





