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सोमवार, अप्रैल 27, 2009

राजीव गांधी के हत्यारे की एक खबर से निपटे आठ पुलिस वाले

लिब्रेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम यानी लिट्टे का अध्याय अब समाप्ति की ओर वाला एक लेख हमें अभी कल ही एक अखबार में पढऩे को मिला। इसी के साथ लिट्टे को लेकर लगातार खबरें आ रही हैं कि अब उसका अंत निकट है। इस एक अच्छी खबर ने ही अचानक हमारे मानसपटल पर अपनी एक उस खबर की याद दिला दी जिस खबर के कारण आठ लापरवाह पुलिस वाले निलंबित किए गए थे। हुआ कुछ यूं था कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों में शामिल काने शिवरासन के रायपुर से गुजरने की खबर को रेलवे पुलिस वालों ने गंभीरता से लिया और इस खबर को हमने प्रमुखता से प्रकाशित किया जिसके कारण वो सारे आठ पुलिस वाले निलंबित कर दिए गए जो इस मामले को गंभीरता से न लेने के दोषी थे।

बात आज से करीब डेढ़ दशक से पहले की है। यह वह समय था जब देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की लिट्टे ग्रुप के सदस्यों ने हत्या कर दी थी। इस हत्या में शामिल एक आरोपी काना शिवरासन था। इस आरोपी के बारे में उस समय देश के हर राज्य के हर शहर की पुलिस को यह सूचना दी गई थी कि शिवरासन से मिलती-जुलती शक्ल के आदमी को गिरफ्तार किया जाए। शिवरासन के उस समय कम से कम एक दर्जन ऐसे कैरीकेचर जारी किए गए थे जिस शक्ल में वह हो सकता था। ऐसे में ही रायपुर जीआरपी को बिलासपुर से यह सूचना मिली थी कि अहमदाबाद एक्सप्रेस में शिवरासन से मिलती-जुलती शक्ल का एक आदमी देखा गया है उसकी जांच की जाए। उन दिनों हम रायपुर के समाचार पत्र दैनिक अमृत संदेश में सिटी रिपोर्टर के रूप में काम करते थे और रेलवे का बीट हमारे जिम्मे था। अपने रूटीन के मुताबिक जब शाम को रेलवे स्टेशन गए तो हमारे वहां पहुंचने से कुछ समय पहले ही अहमदाबाद एक्सप्रेस प्लेटफार्म से रवाना हुई थी।

हम स्टेशन के अंदर जैसे ही घुसे तो हमें जीआरपी के जवान मिले जिन्होंने हमें कहा , क्या भईया कुछ समय पहले आते तो देखते यहां से काना शिवरासन गया। हमने उनसे जब पूरा किस्सा पूछा तो उन्होंने बताया कि बिलासपुर से खबर आई थी कि अहमदाबाद में शिवरासन जैसा एक आदमी देखा गया है। हमने उनसे पूछा कि आप लोगों ने क्या किया तो उन्होंने बताया कि भाई साहब अब हम क्या करते, हम लोगों ने जब उस डिब्बे में देखा तो एक आदमी शिवरासन जैसा लग तो रहा था, पर हम लोगों की हिम्मत उससे कुछ पूछने की इसलिए नहीं हुई क्योंकि हमको मालूम था कि शिवरासन के पास ताबीज की शक्ल में साइनाइट है अगर वह खा लेता तो हमारा क्या होता। उनसे जब पूछा गया कि क्या इस मामले की खबर आलाअफसरों को दी गई तो उन्होंने बताया कि किसी को खबर नहीं की गई और एक एएसआई के साथ सात सिपाहियों ने डिब्बे में जाकर देखा था। उनकी इस बात पर हमें काफी गुस्सा आया कि देश के प्रधानमंत्री के हत्यारे का मामला है और उसको भी पुलिस वालों ने गंभीरता से नहीं लिया और किसी आला अफसर को सूचना देना भी जरूरी नहीं समझा।

बहरहाल वह खबर लेकर हम प्रेस आ गए और अपने सिटी चीफ को इस बात की जानकारी देते हुए खबर बना दी। खबर के लिए जब रेलवे पुलिस अधीक्षक से संपर्क किया गया तो उन्होंने इस तरह की किसी भी जानकारी से इंकार किया और बाद में जानकारी देने की बात कही। जब उनको मामले की गंभीरता को बताया गया तो उन्होंने कई घंटों बाद रात के 12 बजे के बाद इस बात की जानकारी दी कि बिलासपुर से ऐसी सूचना तो आई थी इस मामले में जीआरपी ने क्या किया है इसकी जानकारी कल देंगे। उनका पक्ष लेकर खबर प्रकाशित करने के लिए भेजी गई। यहां पर हमने एक काम यह किया कि यह खबर और किसी अखबार को न मिल सके इसके लिए हमने संपादक से आग्रह करके खबर को पहले संस्करण में न छापने को कहा। होता यह है कि दूसरे अखबार वाले हर अखबार का बस्तर का संस्करण मंगवा लेते हैं ताकि देख सकें कि कोई महत्वपूर्ण खबर छूटी तो नहीं है। उस दिन बस्तर संस्करण के बाद के संस्करणों में खबर लगने के कारण दूसरे अखबारों को इस खबर की भनक भी नहीं लगी। दूसरे दिन खबर के छपते ही हंगामा मच गया। राजीव गांधी के हत्यारे के रायपुर से गुजरने की खबर काफी बड़ी थी।

इस खबर के कारण जहां दूसरे अखबार के सिटी रिर्पोटरों की क्लास लगी, वहीं रेलवे एसपी को अंतत: उन सभी आठ पुलिस वालों को निलंबित करना पड़ा। इन सबके निलंबन की जानकारी भी रेलवे एसपी ने सिर्फ हमें दी। इस खबर के बाद भी दूसरे अखबार के सिटी रिर्पोटरों की खूब खींचाई हुई। आज भी जब हमारे कुछ जूनियर साथी रेलवे में रिपोर्टिंग करने जाते हैं तो पुराने पुलिस वाले जहां हमारे बारे में पूछते हैं, वहीं उनको पुलिस वाले ही बताते हैं कि कैसे एक खबर में आठ पुलिस वाले निलंबित हुए थे। हमारे जूनियर जब हमसे आकर उस खबर के बारे में पूछते हैं तो हम उनको बताते हैं। इसी के साथ हमें इस बात पर गर्व होता है कि हमारी एक खबर को आज भी लोग बरसो बाद याद करते हैं और जब जूनियरों को इस खबर के बारे में मालूम होता है तो वो जानने को उत्सुक हो जाते हैं कि आखिर वह खबर क्या थी। वैसे भी पत्रकारों के जीवन में काफी कम ऐसे अवसर आते हैं जब उनकी खबरों को बरसों याद किया जाता है। आज उस बात को इतने साल हो गए, लेकिन इसके बाद भी हमें उस खबर की एक-एक बात याद है। हम उस खबर को भूल भी कैसे सकते हैं यह खबर तो हमारे पत्रकारिता जीवन की यादगारों खबरों में से सबसे अहम खबर है। वास्तव में अगर लिट्टे का अंत हो जाता है तो इससे बड़ी खबर पूरे विश्व के लिए कोई और नहीं हो सकती है।

6 टिप्पणियाँ:

ajay सोम अप्रैल 27, 10:25:00 am 2009  

ऐसे लापरवाह पुलिस वालों का निलंबन तो जरूरी ही था। जो पुलिस वाले देश के प्रधानमंत्री के हत्याके की जानकारी को गंभीरता से नहीं लेते हैं वे देश की जनता के साथ क्या करेंगे? पुलिस वालों का आमजनों से मतलब रहता भी कहां है।

बेनामी,  सोम अप्रैल 27, 10:27:00 am 2009  

लिट्टे जैसे हर आतंकवाद संगठन का विश्व से सफाया होना चाहिए। अच्छी खबर के लिए बधाई।

rajesh patel सोम अप्रैल 27, 10:50:00 am 2009  

अच्छी रिपोर्टिंग के लिए आपको बधाई।

guru सोम अप्रैल 27, 11:05:00 am 2009  

पुलिस का यह कोई नया कारनामा नहीं है गुरु, यह तो उनका हमेशा का काम है

anu सोम अप्रैल 27, 07:53:00 pm 2009  

अच्छी खबर है आपको बधाई।

Vivek Rastogi सोम अप्रैल 27, 10:33:00 pm 2009  

पुलिसवाले कभी सुधर सकते हैं क्या, पता नहीं ये लोग आतंकवादियों का सामना कैसे करेंगे।

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