आंखों में पड़ी लाइट-गाडिय़ों की हो गई फाइट
रात के समय कम से कम अपने देश में ऐसी कोई सड़क नहीं होगी जिस सड़क पर आप दुपहिए या फिर चारपहिए वाहन पर जा रहे हों और आपको सामने से आ रहे किसी दूसरे वाहन की लाइट सीधे आंखों में न पड़े। आंखों में लाइट पड़ते ही जब आंखें चुधिया जाती हैं तो उसके बाद आंधों के सामने छाता है अंधेरा और सामने से आ रही दूसरी गाड़ी से हो जाती है आपकी या फिर किसी की भी गाड़ी की फाइड। यह किस्सा हर शहर का है हमें ऐसा लगता है। कम से कम अपने छत्तीसगढ़ में तो रात को हर सड़क पर यही नजारा रहता है। कोई यह कह ही नहीं सकता है कि वह रात को जा रहा था तो उसको सामने वाले वाहन की लाइट से परेशानी नहीं हुई। अगर वाहनों की लाइट से परेशानियों हो रही हैं, दुर्घटनाएँ हो रही हैं तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि कोई भी वाहनधारक अपनी लाइट में नियमानुसार काली पट्टी लगाना ही नहीं चाहता है। खासकर लाखों की कारों के मालिक तो काली पट्टी को मखमल में टाट का पैबंद ही मानते हैं। उनके ऐसा मानने का नतीजा यह हो रहा है कि रोज दुर्घटनाओं में इजाफा होते जा रहा है। हमारे देश का ट्रेफिक अमला ऐसे वाहनों पर कार्रवाई करता नजर ही नहीं आता है। इस ट्रेफिक अमले को तो वसूली से ही फुर्सत नहीं है तो कार्रवाई क्या खाक करेगा।
हम जब भी रात में दुपहिया या फिर चारपहिया वाहन चलाते हैं तो हमें उस समय बहुत गुस्सा आता है जब सामने से आ रहे वाहन की लाइट सीधे हमारी आंखों में पड़ती है। हमें नहीं लगता है कि यह परेशानी किसी और को नहीं होती होगी। हमारा ऐसा मानना है कि ऐसी ही परेशानी से हर वाहन चालक दो-चार होता है। लेकिन इसके बाद भी कोई इस समस्या से मुक्ति पाने के रास्ते पर जाना नहीं चाहता है। आज के आधुनिक जमाने में ऐसी -ऐसी कारें आ रही हैं जिनमें न जाने क्या-क्या हाई पॉवर की लाइटें लगी रहती हैं। इन लाइटों में इतनी तेजी रहती है कि सीधे सामने वाले की आंखों पर तेज असर होता है। अगर सामने वाला सावधान न हुआ तो यह मान कर चलें कि दुर्घटना होनी ही है। हमारा ऐसा मानना कि रात के समय जितनी भी दुर्घटनाएँ होती हैं उसके लिए सबसे ज्यादा दोषी ऐसी ही तेज रौशनी वाले वाहन हैं। ऐसे वाहनों के मालिक कभी अपने वाहनों में लाइट में काली पट्टी लगाने का काम नहीं करते हैं।
हमको अपने राज्य में ऐसे वाहन नजर ही नहीं आते हैं जिनकी लाइट में काली पट्टी लगी हो। हमारे ट्रेफिक अफसरों को तो वसूली करने से फुर्सत नहीं रहती है ऐसे में उनसे यह उम्मीद की ही नहीं जा सकती है कि वे इस दिशा में कुछ करेंगे। अगर ट्रेफिक थानों से आंकड़े मांगे जाएं तो ये आंकड़े कभी नहीं मिलेंगे कि कितने वाहनों पर लाइट में काली पट्टी न होने पर जुर्माना किया गया। जब कभी साल में एक बार ट्रेफिक सप्ताह मनाया जाता है तो समझाईश के नाम पर जरूर वाहनों में काली पट्टी लगाने की खानापूर्ति करने के लिए कुछ वाहनों को रोक कर काली पट्टी लगा दी जाती है। लेकिन इसके बाद इन वाहनों से काली पट्टी गायब हो जाती है।
हमको अपने राज्य में ऐसे वाहन नजर ही नहीं आते हैं जिनकी लाइट में काली पट्टी लगी हो। हमारे ट्रेफिक अफसरों को तो वसूली करने से फुर्सत नहीं रहती है ऐसे में उनसे यह उम्मीद की ही नहीं जा सकती है कि वे इस दिशा में कुछ करेंगे। अगर ट्रेफिक थानों से आंकड़े मांगे जाएं तो ये आंकड़े कभी नहीं मिलेंगे कि कितने वाहनों पर लाइट में काली पट्टी न होने पर जुर्माना किया गया। जब कभी साल में एक बार ट्रेफिक सप्ताह मनाया जाता है तो समझाईश के नाम पर जरूर वाहनों में काली पट्टी लगाने की खानापूर्ति करने के लिए कुछ वाहनों को रोक कर काली पट्टी लगा दी जाती है। लेकिन इसके बाद इन वाहनों से काली पट्टी गायब हो जाती है। एक तो भाई लोग अपने वाहनों में काली पट्टी लगाने से परहेज करते हैं ऊपर से सितम यह कि बड़े वाहन वाले अपर-डीपर भी देना जरूरी नहीं समझते हैं। सामने वाला भले ऐसा करते रहे उनकी बला से, उन्होंने यह बात ठान रखी है कि उनको अपर-डीपर देना ही नहीं है। संभवत: ऐसे वाहनों को सामने वाले वाहनों की लाइट से शायद फर्क नहीं पड़ता है तभी तो वे इतने ज्यादा लापरवाह हो गए है कि किसी की जान की कीमत भी नहीं समझते हैं। अगर ये वाहन चालक दूसरों के जान की कीमत समझते तो वाहनों में नियमानुसार काली पट्टी लगाने का काम करते। हमें तो लगता है कि इसके लिए जन जागरण की जरूरत है। ट्रेफिक पुलिस वाले तो आज तक कुछ कर नहीं पाए हैं। और न ही कभी कुछ कर सकते हैं।दोस्तों हमने तो अपने राज्य के हालात को देखते हुए यह पोस्ट लिखी है, हमें नहीं लगता है कि दूसरे राज्यों में ऐसा नहीं होता होगा। ब्लाग बिरादरी से आग्रह है कि वे भी अपने राज्यों और शहरों के बारे में बताएं कि उनके यहां वाहनों की लाइट में काली पट्टी रहती है या नहीं। आप लोगों की जानकारियों का इंतजार रहेगा।






