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शनिवार, मई 29, 2010

मत करो टांग खिंचाई-होती है जग हंसाई


हम ब्लाग बिरादरी में पिछले एक साल से ज्यादा समय से देख रहे हैं कि यहां भी टांग खिंचाई हो रही है। ब्लाग जगत में टांग खिंचाई हो रही है  तो उसके पीछे कारण यही है कि लोग एक-दूजे को भाई जैसा नहीं मानते हैं। हमारा मानना है कि अगर भाई-चारे से रहा जाए तो न होगी टांग खिंचाई और न ही होगी जग हंसाई। यहां लोग आग लगाकर तमाशा देखने का काम करते हैं। ऐसे में एक परिवार की तरह रहने की जरूरत है। एकता में ही ताकत होती है यह बात बताने की जरूरत नहीं है।
हम भी जब से ब्लाग बिरादरी से जुड़े हैं तभी से देख रहे हैं कि यहां भी कम टांग खिंचाई नहीं होती है। हालांकि हम यह बात बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि हमारे लिखने से कुछ ज्यादा होने वाला नहीं है लेकिन फिर भी एक उम्मीद है कि अगर हमारे कुछ लिखने से कोई एक भी अपना भाई यह सोचता है कि वास्तव में यार टांग खिंचाई से क्या हासिल होता है तो यह हमारे लिए खुशी की बात होगी।
हम अगर कुछ लिख रहे हैं तो जरूरी नहीं है कि वह हर किसी को पसंद आए। क्योंकि सबकी अपनी-अपनी पसंद होती है। ऐसे में जबकि हमें किसी का लिखा पसंद नहीं आता है और पढऩे के बाद अगर बहुत ज्यादा खराब भी लगता है तो अपना विरोध दर्ज कराने के लिए हमें शालीन भाषा और शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। अगर हमारी भाषा में शालीनता होगी और शब्दों में कोई गलत बात नहीं होगी तो संभव है कि उन गलत लिखने वाले अपने भाई को कुछ समझ आ जाए और उन्हें अहसास हो जाए कि उन्होंने कुछ तो ऐसा लिखा है जिससे किसी के दिल को चोट लगी है। ऐसा अहसास अगर उन लिखने वाले को हो जाए तो मानकर चलिए कि आपके शब्दों ने जादू कर दिया है। इसके विपरीत अगर आप कड़े शब्दों में विरोध करते हैं तो हो सकता है उन शब्दों का असर उन लिखने वाले पर भी ठीक वैसा हो जैसा असर आप पर उनकी लिखी किसी बात से हुआ है।
हमारे कहने का मलतब यह है कि यहां पर लिखने की स्वतंत्रता सभी को है तो किसी के लिखने का किसी भी तरह से गलत विरोध क्यों करना। विरोध भी ऐसा कि जिससे लगे कि टांग खिंचाई हो रही है। अपना हिन्दी ब्लाग परिवार छोटा सा परिवार है, इस परिवार में प्यार और स्नेह से रहने की जरूरत है। अगर परिवार का कोई छोटा गलती करें तो उसे बड़े प्यार से समझा सकते हैं और कोई बड़ा गलती करें तो उसे छोटे भी ससम्मान समझा सकते हैं। इसके बाद भी अगर कोई नहीं समझता है तो उसे परिवार से बाहर मान लिया जाए, ठीक उसी तरह से जिस तरह से एक परिवार अपने कपूत को अपने से अलग मान लेता है।
अगर ऐसा हो जाए तो फिर क्यों कर होगी किसी की टांग खिंचाई और फिर कभी नहीं होगी अपने हिन्दी ब्लाग परिवार की जग हंसाई। तो आईए मित्रों आज एक संकल्प लें कि किसी की लिखी बात का विरोध हम शालीनता से करेंगे।
अगर आप हमारी बातों से सहमत हों तो अपने विचारों से जरूर अवगत करवाएं।

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शुक्रवार, अक्टूबर 09, 2009

राष्ट्रगान से करो खिलवाड़-कोई क्या लेगा बिगाड़

राष्ट्रगान के साथ छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में किए गए खिलवाड़ पर कहीं कोई चर्चा नहीं हो रही है। हर बात पर आंदोलन करने की बात करने वाले कथित नेताओं को जैसे सांप सुघ गया है। किसी को इस बात से कोई मतलब ही नहीं है कि राष्ट्रगान के साथ क्या हुआ है। होगा भी कैसे। अपना देश भारत वास्तव में महान है जहां पर देश के तिरंगे के अपमान के बाद कुछ नहीं होता है। रायपुर में राष्ट्रगान के साथ जैसा किया गया उसको लेकर जहां हमें दुख हैं, वहीं वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार गिरीश पंकज भी बहुत ज्यादा दुखी और खफा हैं। उन्होंने इस पर एक अच्छा व्यंग्य भी लिखा है। उनको इस बात की भी पीड़ा है कि अपना आज का मीडिया कैसा हो गया है जो राष्ट्रगान के साथ खिलावड़ के बाद भी मौन है। इस पर तो संपादकीय भी लिखी जानी चाहिए और इस मामले में दोषी अफसरों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। अगर आज ऐसा नहीं होता है तो आगे न जाने राष्ट्रगान के साथ क्या किया जाएगा।

हमने कल ही यह मुद्दा ब्लाग बिरादरी के सामने रखा था कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में होने वाले एक समारोह के लिए राष्ट्रगान की एक बार नहीं बल्कि चार-चार बार रिहर्सल करके इसका अपमान किया गया है। हमारे इस मुद्दे के बाद जो कुछ प्रक्रियाएं आईं उनमें इस बात को कुछ लोगों ने गलत नहीं माना गया कि राष्ट्रगान की रिहर्सल क्यों की गई। लेकिन इस बारे में हमारे साथ ही और कई लोगों का नजरिया यह है कि राष्ट्रगान की रिहर्सल और वह भी आजादी के 63 साल बाद यह तो सचमुच में राष्ट्रगान का अपमान और अफसरों के निक्कमेपन का सबूत है। इस मुद्दे पर बहुत ही जानदार व्यंग्य लिखने का काम वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार गिरीश पंकज ने किया है आप भी उसे देख सकते हैं राष्ट्रगान का रिहर्सल ? वाह, क्या आईडिया है.... इस व्यंग्य को जब हमारे लेख में गिरीश जी ने टिप्पणी के रूप में पोस्ट किया तो हमने उसको पढऩे के बाद उनको फोन किया। हम बता दें कि हम गिरीश जी को 25 साल पहले से तब से जानते हैं जब स्कूल में पढ़ते थे और रायपुर के दैनिक नवभारत में गिरीश जी काम करते थे। हमने उनको जब फोन किया तो उन्होंने बताया कि एक अखबार में चंद लाइनों की खबर के बाद ही मैंने इस पर व्यंग्य लिखने का मन बनाया था कि आपके ब्लाग में इस मुद्दे पर लिखा देखा और उसको पढऩे के बाद व्यंग्य तैयार किया है।

गिरीश जी ने कहा कि वास्तव में राजकुमार यह दुखद बात है कि आजादी के 63 साल बाद भी राष्ट्रगान के रिहर्सल की जरूरत पड़ी है और इस पर मीडिया मौन है। उन्होंने कहा कि अगर मैं आज किसी अखबार में होता तो जरूर इस पर त्वरित टिप्पणी लिखता और साथ ही संपादकीय भी लिखता। गिरीश जी का भी ऐसा मानना है राष्ट्रगान के साथ ऐसा मजाक देश में और पहले कहीं नहीं हुआ है।

उन्होंने भी इस बात पर दुख जताया कि कैसे लोग इस तरह की टिप्पणी करते हैं कि राष्ट्रगान की रिहर्सल करना गलत नहीं है। क्या 63 साल बाद भी हम इस लायक नहीं बन सके हैं कि राष्ट्रगान को ठीक से गा सके। जहां पर राष्ट्रगान की रिहर्सल करवाई गई थी वहां पर तो राष्ट्रगान का मामला ही नहीं था, वहां तो महज राष्ट्रगान की धुन बजनी थी और वह भी पुलिस बैंड द्वारा। पुलिस बैंड को राज्यपाल के आने और जाने के समय राष्ट्रगान की धुन बजाने का इतना ज्यादा अभ्यास है कि रिहर्सल का कोई ओचित्य ही नहीं था। इसी के साथ राज्यपाल और राष्ट्रपति के बारे में देश के सभी लोग यह बात जानते हैं कि जब उनका किसी भी कार्यक्रम में आना होता है तो उनके आने के साथ और जाने के समय राष्ट्रगान की धुन बजाई जाती है, ऐसे में लोग खुद ही खड़े हो जाते हैं। अगर रिहर्सल करनी ही थी तो इस बात की की जाती है कि लोग को यह समझाया जाता कि जैसे ही राज्यपाल आएंगे राष्ट्रगान की धुन बजेगी और आप लोग अपने स्थान पर खड़े हो जाईएगा। लेकिन नहीं, अफसर तो अपने मन की न करें तो वे अफसर कैसे। उनको इस बात से क्या कि राष्ट्रगान का अपमान हो या और कुछ। वे तो अपनी अफसरशाही चलाएंगे ही। ऐसे अफसरों को जरूर निलंबित कर देना चाहिए जिन्होंने राष्ट्रगान के साथ रिहर्सल जैसा भद्दा मजाक किया है। अगर आज ऐसा नहीं किया गया तो आगे जरूर राष्ट्रगान का इससे ज्यादा बुरा हाल हो सकता है।

क्या अपने देश के मीडिया का खून भी सुख चुका है जो ऐसे मामले में कुछ नहीं कर रहा है। हर छोटी-छोटी बात पर संपादकीय लिखने वाला प्रिंट मीडिया और हर छोटी बात को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने वाला इलेक्ट्रानिक मीडिया आखिर इस मामले में मौन क्यों है। इसी के साथ उन नेताओं को क्या सांप सुघ गया है जो हर छोटी-बड़ी बात पर आंदोलन करने की बात करते हैं, कैसे सब राष्ट्रगान का अपमान बर्दाश्त कर सकते हैं। चलिए जिनकी जैसी मानसिकता लेकिन हमें यह बात गलत लगी इसलिए हमने इसको कम से कम अपने ब्लाग में लिखने की हिम्मत तो दिखाई हमें इसी बात का संतोष है। वास्तव में अगर आज ब्लाग नहीं होता तो हमें भी अपना मन मारकर रहना पड़ता क्योंकि अखबार की नौकरी अपनी मर्जी से नहीं चलती है और खबरें भी वहां मर्जी से नहीं बनाई जा सकती है।

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गुरुवार, अक्टूबर 01, 2009

ब्लागवाणी में सही जानकारी देने वालों का ही पंजीयन हो

ब्लागवाणी का वापस प्रारंभ होना सुखद है, लेकिन इसी के साथ अब यह बात भी सामने आई है इस वाणी की आवाज को और ज्यादा बुंलद करने का काम ब्लागवाणी के संचालक करने का मन बना चुके हैं और वे चाहते हैं कि इसको अच्छा बनाने के लिए सुझाव दिए जाए। हमारे मन में तभी से एक बात है जबसे हम ब्लाग बिरादरी में शामिल हुए हैं। आज अगर ब्लागवाणी बंद हुई थी तो इसके पीछे भी एक छद्म नाम रहा है। ऐसे में हमारा ऐसा मानना है कि ब्लागवाणी में पंजीयन करने के लिए यह व्यवस्था हो कि आप जब तक अपने बारे में सही जानकारी नहीं देंगे तब तक आपका पंजीयन नहीं होगा। जब मोबाइल का एक नंबर लेने के लिए आईडी प्रुफ दिया जा सकता है तो एक ब्लाग के लिए ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता है, जब आप सही लिखने वाले हैं। ऐसा करने से ब्लाग बिरादरी में बहुत सी बदमाशियों पर अंकुश भी लग जाएगा।

हम जानते हैं कि हमारे इस सुझाव पर उन लोगों को जरूर आपति हो सकती है जिनके लिए छद्म नाम से लिखना मजबूरी है। ऐसे ब्लागरों में खासकर महिलाओं को। तो इसके लिए एक रास्ता यह है कि कम से कम ब्लागवाणी या फिर जो भी एग्रीगेटर हैं उनको तो आप सही जानकारी दें और उनसे यह अनुरोध किया जाए कि वे आपका पंजीयन उसी नाम से करें जिस नाम से आप पंजीयन चाहते हैं। ऐसे में होगा यह कि कोई छद्म नाम का फायदा उठाते हुए न किसी के खिलाफ कुछ गलत लिख सकेगा और न ही कोई गलत टिप्पणी कर सकेगा। ऐसा करने पर पंजीयन करनी वाली संस्था को यह अधिकार हो कि वह ऐसे छद्म नाम वाले व्यक्ति का नाम उजागर कर दे। यह बात हम केवल एग्रीगेटर के लिए नहीं बल्कि गूगल के लिए पहले कह चुके हैं कि कोई भी ब्लाग बनाने से पहले उसकी सही जानकारी का लेना अनिवार्य किया जाए।

आज लफड़े हो रहे हैं तो इसके गर्भ में छद्म नाम ही हैं। सही नाम वाले ब्लागर ऐसा नहीं करते हैं यह तो नहीं कहा जा सकता है, पर जिन ब्लागरों को कम से कम अपने मान-अपमान से वास्ता है, वे ऐसा कोई रास्ता नहीं अपनाते हैं। अब जिनको गदंगी करने की आदत है उनके लिए सही नाम क्या और छद्म नाम क्या। लेकिन इतना जरूर है कि अगर मोबाइल नंबर लेने की तर्ज पर ही ब्लाग बनाने और एग्रीगेटर में पंजीयन कराने के लिए आईडी प्रुफ जैसी बात लागू कर दी जो तो काफी हद तक बदमाशियों पर अंकुश लग सकता है। इस दिशा में खासकर गूगल को गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। आज हिन्दी ब्लाग शैशव अवस्था में है आगे जब इसका दायरा और बढ़ेगा तो इस बढ़े हुए दायरे के साथ बदमाशियां भी बढ़ेंगी, तब इन पर अंकुश लगाना संभव नहीं हो सकेगा। आज ही अगर इस दिशा में ध्यान नहीं दिया गया तो न जाने आगे क्या होगा।

हम यहां एक बात और कहना चाहेंगे कि ब्लागवाणी के लिए मासिक शुल्क जैसी व्यवस्था इसलिए उचित नहीं होगी क्योंकि हर कोई यह शुल्क वहन करने में सक्षम नहीं होगा। ऐसे में यह कोई रास्ता नहीं है। अब इंटरनेट के लिए शुल्क देना तो मजबूरी है। वैसे भी लेखकों को लेख छपवाने के लिए पैसे देने की परंपरा कहीं नहीं रही है लेखों के प्रकाशन पर मीडिया ही लेखकों को प्रारंभ से पैसे देता रहा है। अगर एग्रीगेटर भी पहले इस परंपरा को प्रारंभ करें और लेखकों को अच्छे लेखों के लिए पैसे देने लगे तो फिर लेखकों से कोई शुल्क लिया जाए तो बात अलग है, तब शायद किसी को आपति नहीं होगी। अगर किसी एक लेख के बदले कुछ मिलेगा तो उसको कुछ देने में क्या आपति हो सकती है।

ब्लाग बिरादरी के मित्र इस बारे में क्या सोचते हैं, आपके विचार सविनय आमंत्रित हैं।

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रविवार, अगस्त 16, 2009

पाठक हों बेसूमार-टिप्पणियों पर ध्यान ही मत दो यार

अपनी ब्लाग बिरादरी में टिप्पणियों को लेकर जंग जैसी स्थिति रहती है। कुछ दिनों में कोई न कोई ऐसा कुछ कर देता है कि ब्लाग बिरादरी जंग का मैदान लगने लगती है। न जाने क्यों लोग टिप्पणियों के पीछे लगे रहते हैं। अब
संगीता पुरी की एक टिप्पणी को लेकर बवाल मचा कर रखा गया है। हमारा तो ऐसा मानना है कि आप अच्छा लिखें और ये भूल जाएं कि आपको कितनी टिप्पणियां मिलेंगी। अच्छे लिखने वालों को इस बात से मतलब होना चाहिए कि आपके लिखे को कितने लोगों पढ़ रहे हैं। अगर कोई बिना पढ़े ही कोई टिप्पणी कर देता है तो क्या मतलब ऐसी टिप्पणी का। लेकिन कोई आपके विचार पढ़कर भी टिप्पणी नहीं करता है तो वह ज्यादा महत्वपूर्ण है। न जाने क्यों ब्लाग बिरादरी में छोटे-बड़े का भेद डालकर रखा गया है। आपको तो यह मानकर चलना चाहिए कि अगर कोई ब्लागर अपने को बहुत ज्यादा महान समझता है और उसको किसी नए ब्लागर के ब्लाग में टिप्पणी देना या आना पसंद नहीं है, तो न आए ऐसे ब्लागर। अगर आपके लेखन में दम होगा तो जरूर सारे ब्लागर एक दिन आपके ब्लाग में आएंगे। अपने लेखन में दम लाएं।


हमने कुछ समय पहले एक लेख लिखा था कि 100 काम चलाऊं टिप्पणियों पर एक अच्छी टिप्पणी भारी होती है। हमें लगता है कि उस पोस्ट की बातों को एक बार फिर से सबके सामने रखने की जरूरत है। देखें हमारी उसी पोस्ट की कुछ महत्वपूर्ण बातें फिर से प्रस्तुत हैं।

न जाने क्यों कर ब्लाग बिरादरी में यह मानसिकता घर कर गई है कि टिप्पणी देने से ही टिप्णणी मिलती है। हमें भी कुछ ऐसा लगता है कि लोग इस मानसिकता के शिकार हो गए हैं। अगर इसमें वास्तव में सच्चाई है तो यह जरूरी है कि इस मानसिकता से उबरना ही होगा। वरना एक दिन ऐसा आएगा कि अच्छा लिखने वाले संभवत: इस हीनभावना से ग्रस्त होकर लिखना बंद कर देंगे कि उनको कोई टिप्पणी देने वाला नहीं है। अगर हम अपनी बात करें तो हमें कभी भी काम चलाऊ टिप्पणी देना पसंद नहीं आता है। हम अपने पत्रकारिता के काम में इतने ज्यादा व्यस्त रहते हैं कि काम के कारण हम ज्यादा लेखों को पढ़ भी नहीं पाते हैं। अब यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम ज्यादा लेख पढ़ नहीं पाते हैं। अगर हम भी सिर्फ इसलिए बिना लेखों को पढ़े टिप्पणी करने लगें कि हमें टिप्पणियां नहीं मिलेंगी तो हो सकता है कि हम उस लेख की मूल भावना को समझे बिना कोई टिप्पणी कर दें जिससे लेख लिखने वाले लेखक की भावना आहत हो जाए।

हमारे एक और ब्लाग खेलगढ़ में नहीं के बराबर टिप्पणियों आती हैं। इसका कारण भी शायद यही है कि हम ज्यादा टिप्पणियां नहीं कर पाते हैं। हमको जब कोई लेख अच्छा लगता है तो जरूर समय निकाल कर गंभीरता से उसको पढऩे के बाद टिप्पणी करते हैं। हम इस बात से बचने की कोशिश करते हैं कि यह लिखा जाए कि आपका लेख बहुत अच्छा है, आभार.. आपने अच्छा मुद्दा उठाया है.. आदि। ऐसी टिप्पणियों से लेखक का कितना मनोबल बढ़ता है, हम नहीं बता सकते हैं। लेकिन हमारा ऐसा मानना है कि ऐसी टिप्पणियां किसी लेखक के लिए कोई मायने नहीं रखती हैं। यह बात ठीक उसी तरह से है जिस तरह से एक कलाकार को एक सच्चा कद्रदान मिल जाए तो वह एक कद्रदान बहुत होता है। यहां पर हम एक फिल्म शराबी के साथ एक और जीता जागता उदाहरण देना चाहेंगे। शराबी में अमिताभ जब जयाप्रदा के डांस पर उनको दाद देते हैं तो उस दाद में उनके हाथों से खून निकल जाता है। इस दाद को कलाकार के रूप में जयाप्रदा सबसे बड़ी दाद मानती है। उनका कहना रहता है कि इस दाद में उनको हजारों तालियां की गूंज से ज्यादा गूंज सुनाई दी। यह तो थी फिल्म की बात अब आपको बताते हैं कि एक सच्ची घटना।

बात आज से करीब 20 साल पुरानी है। तब हम लोगों से अपने गृहनगर भाटापारा में संगीत का एक कार्यक्रम आयोजित किया था। इस कार्यक्रम में खैरागढ़ संगीत विवि के एक वायलिन वादक भी आए थे। रात को करीब एक बजे कार्यक्रम समाप्त होने के बाद हम चंद मित्रों के आग्रह उस उन वायलिन बजाने वाले कलाकार से हम लोगों के साथ महफिल सजाई और हम लोगों ने जिन भी गानों की फरमाइश की, उन गानों को उन्होंने सुनाने का काम किया। हम चार मित्र थे, जो बड़ी गंभीरता से उनके संगीत को सुन रहे थे। उनके संगीत में हम लोग इस कदर खो गए थे कि कब सुबह के पांच बज गए मालूम ही नहीं हुआ। समय का किसी को पता ही नहीं चला। उस दिन उन वायलिन वादक ने हम लोगों से कहा था कि हर कलाकार इस तरह से कद्र करने वालों का भूखा होता है। उन्होंने साफ कहा कि मुझे भारी महफिल से ज्यादा मजा आप चार लोगों के साथ बैठकर आया।

ये दो उदाहरण इस बात को साबित करते हैं कि हर कलाकार और लेखक अपनी कला और लेख की सच्ची तारीफ का भूखा होता है। हमें किसी की लिखी बात पसंद आती है, तभी हम वहां पर टिपप्णी करते हैं। ऐसे में यह मानसिकता पालना गलत है कि टिप्पणी दो और टिप्पणी लो। ऐसा करने का सीधा सा मतलब यह है कि आप टिप्पणी के भूखे हैं। वैसे टिप्पणी की भूख गलत नहीं है, लेकिन जब आप टिप्पणी के बदले टिप्पणी की भूख शांत करने की मानसिकता में रहते हैं तो यह गलत है। जरूरी नहीं है कि जिसके लेख में हमने टिप्पणी की है, उनको हमारा लेख पसंद आए ही, ऐसे में वह टिप्पणी नहीं करेगा, तो क्या इसका मतलब यह है कि हम अगली बार उनके अच्छे लेख पर टिप्पणी ही न करें। अगर हम ऐसा करते हैं तो यह न सिर्फ उन अच्छे लिखने वालों के साथ अन्याय है बल्कि हम अपने जमीर से भी गिरते हैं। भले आज का जमाना एक हाथ दे एक हाथ ले जैसा हो गया है, लेकिन इस भावना को बदलने की जरूरत है और यह भावना बदलनी ही चाहिए। हमें तो लगता है कि वास्तव में आज ब्लाग बिरादरी में यही प्रचलन हो गया कि टिप्पणी दे और टिप्पणी लें, वरना कई अच्छे लेख लिखने वालों के टिप्पणी बक्से खाली नहीं होते। हमें नहीं मालूम लोगों की मानसिकता में बदलाव आएगा या नहीं लेकिन हम ऐसा सोचते हैं कि मानसिकता का बदलना जरूरी है। वरना एक दिन वह आएगा जब अच्छे लिखने वालों का टोटा पड़ जाएगा। अब इससे पहले की अच्छे लेखर ब्लाग बिरादरी से किनारा कर लें उनको बचाने की मुहिम पर काम करना जरूरी है।

एक तरफ इस तरह के बदलाव की जरूरत है तो दूसरी तरफ इस बात की भी जरूरत है कि हम एक-दूसरे की बिना वजह की आलोचना करने से भी बचें। उस ब्लागर से फला ब्लाग में फला टिप्पणी की है, वह गलत है। अरे भई ये उनकी मानसिकता है कि वह क्या टिप्पणी कर रहा है आप क्यों सर खफा रहे हैं। अगर किसी को कामचलाऊं टिप्पणियां चिपकाने में आनंद आता है तो आप उनको उस आनंद से क्यों वंचित कर रहे हैं। यह उनका अपना विवेक है। आप ऐसी टिप्पणियों पर ध्यान ही न दें। अगर आप ध्यान देंगे तो यह आपकी गलती है। हमारा ऐेसा मानना है कि हर ब्लागर को इस बात पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए कि उनके लिखे को कितने ज्यादा लोगों ने पढ़ा। सबसे अहम बात यह है कि आपके लिखे को कितने लोग पढ़ रहे हैं। अगर पढऩे के बाद कोई जरूरी समझता है और उसके पास समय रहता है तो वह टिप्पणी कर देता है। अगर कोई कामचलाऊं टिप्पणी के रूप में यह लिख दें की आपने काफी अच्छा लिखा है तो क्या आप इतने से संतुष्ट हो जाएंगे। ऐसी टिप्पणियां कभी भी अच्छा लिखने वालों को संतुष्ट नहीं कर सकती है। फिर क्यों ऐसी टिप्पणियों की तरफ ध्यान देना।

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गुरुवार, जून 25, 2009

ब्लाग बिरादरी तो जानती है गांधी जी की मां का नाम

महात्मा गांधी जिनको पूरा देश राष्ट्रपिता के नाम से जानता है। उनको जन्म देने वाली जननी के नाम से अपने देश के लोगों का अनजान रहना वाकई में दुखद है। हमने ब्लाग बिरादरी से एक प्रश्न किया था कि महात्मा गांधी की मां का नाम क्या है ? ब्लाग बिरादरी के काफी मित्रों ने जरूर इसका जवाब दिया। पर जवाब देने वालों की संख्या कम रही। लेकिन यह बात कम से कम इसलिए संतोषप्रद है कि जब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कॉलेज के प्रोफेसरों के साथ अन्य विभागों के अधिकारियों से यही सवाल किया गया था तो कोई जवाब देने वाला नहीं था। एक प्रोफेसर ने काफी संकोच के साथ जवाब दिया था।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि अपने देश का जनरल नॉलेज उद्योग काफी बुरी स्थिति में है। यही वजह है कि लोग यह भी नहीं जानते हैं कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मां का नाम क्या है। हमने ब्लाग बिरादरी के सामने यह प्रश्न रखा था और हमें इस बात की खुशी है कि ब्लाग बिरादरी के काफी मित्र गांधी जी की मां के नाम से अनजान नहीं हैं। वरना आज की युवा और पुरानी पीढ़ी में बहुत कम लोग पुतलीबाई का नाम जानते हैं। अक्सर यही होता है कि जब किसी से महात्मा गाँधी की मां का नाम पूछा जाता है तो लोग बेबाकी से कस्तूरबा गांधी कह देते हैं। ऐसे लोगों की अक्ल पर तरस आता है।

हमारे इसी सवाल को चिट्ठा चर्चा में शामिल करने का आज काम किया गया है वहां पर काफी विस्तार से इस मुद्दे पर चर्चा कर की गई हैं। देखें चिट्ठा चर्चा में यह चर्चा।

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शनिवार, मई 16, 2009

आंखों में पड़ी लाइट-गाडिय़ों की हो गई फाइट

रात के समय कम से कम अपने देश में ऐसी कोई सड़क नहीं होगी जिस सड़क पर आप दुपहिए या फिर चारपहिए वाहन पर जा रहे हों और आपको सामने से आ रहे किसी दूसरे वाहन की लाइट सीधे आंखों में न पड़े। आंखों में लाइट पड़ते ही जब आंखें चुधिया जाती हैं तो उसके बाद आंधों के सामने छाता है अंधेरा और सामने से आ रही दूसरी गाड़ी से हो जाती है आपकी या फिर किसी की भी गाड़ी की फाइड। यह किस्सा हर शहर का है हमें ऐसा लगता है। कम से कम अपने छत्तीसगढ़ में तो रात को हर सड़क पर यही नजारा रहता है। कोई यह कह ही नहीं सकता है कि वह रात को जा रहा था तो उसको सामने वाले वाहन की लाइट से परेशानी नहीं हुई। अगर वाहनों की लाइट से परेशानियों हो रही हैं, दुर्घटनाएँ हो रही हैं तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि कोई भी वाहनधारक अपनी लाइट में नियमानुसार काली पट्टी लगाना ही नहीं चाहता है। खासकर लाखों की कारों के मालिक तो काली पट्टी को मखमल में टाट का पैबंद ही मानते हैं। उनके ऐसा मानने का नतीजा यह हो रहा है कि रोज दुर्घटनाओं में इजाफा होते जा रहा है। हमारे देश का ट्रेफिक अमला ऐसे वाहनों पर कार्रवाई करता नजर ही नहीं आता है। इस ट्रेफिक अमले को तो वसूली से ही फुर्सत नहीं है तो कार्रवाई क्या खाक करेगा।


हम जब भी रात में दुपहिया या फिर चारपहिया वाहन चलाते हैं तो हमें उस समय बहुत गुस्सा आता है जब सामने से आ रहे वाहन की लाइट सीधे हमारी आंखों में पड़ती है। हमें नहीं लगता है कि यह परेशानी किसी और को नहीं होती होगी। हमारा ऐसा मानना है कि ऐसी ही परेशानी से हर वाहन चालक दो-चार होता है। लेकिन इसके बाद भी कोई इस समस्या से मुक्ति पाने के रास्ते पर जाना नहीं चाहता है। आज के आधुनिक जमाने में ऐसी -ऐसी कारें आ रही हैं जिनमें न जाने क्या-क्या हाई पॉवर की लाइटें लगी रहती हैं। इन लाइटों में इतनी तेजी रहती है कि सीधे सामने वाले की आंखों पर तेज असर होता है। अगर सामने वाला सावधान न हुआ तो यह मान कर चलें कि दुर्घटना होनी ही है। हमारा ऐसा मानना कि रात के समय जितनी भी दुर्घटनाएँ होती हैं उसके लिए सबसे ज्यादा दोषी ऐसी ही तेज रौशनी वाले वाहन हैं। ऐसे वाहनों के मालिक कभी अपने वाहनों में लाइट में काली पट्टी लगाने का काम नहीं करते हैं।

हमको अपने राज्य में ऐसे वाहन नजर ही नहीं आते हैं जिनकी लाइट में काली पट्टी लगी हो। हमारे ट्रेफिक अफसरों को तो वसूली करने से फुर्सत नहीं रहती है ऐसे में उनसे यह उम्मीद की ही नहीं जा सकती है कि वे इस दिशा में कुछ करेंगे। अगर ट्रेफिक थानों से आंकड़े मांगे जाएं तो ये आंकड़े कभी नहीं मिलेंगे कि कितने वाहनों पर लाइट में काली पट्टी न होने पर जुर्माना किया गया। जब कभी साल में एक बार ट्रेफिक सप्ताह मनाया जाता है तो समझाईश के नाम पर जरूर वाहनों में काली पट्टी लगाने की खानापूर्ति करने के लिए कुछ वाहनों को रोक कर काली पट्टी लगा दी जाती है। लेकिन इसके बाद इन वाहनों से काली पट्टी गायब हो जाती है।

हमको अपने राज्य में ऐसे वाहन नजर ही नहीं आते हैं जिनकी लाइट में काली पट्टी लगी हो। हमारे ट्रेफिक अफसरों को तो वसूली करने से फुर्सत नहीं रहती है ऐसे में उनसे यह उम्मीद की ही नहीं जा सकती है कि वे इस दिशा में कुछ करेंगे। अगर ट्रेफिक थानों से आंकड़े मांगे जाएं तो ये आंकड़े कभी नहीं मिलेंगे कि कितने वाहनों पर लाइट में काली पट्टी न होने पर जुर्माना किया गया। जब कभी साल में एक बार ट्रेफिक सप्ताह मनाया जाता है तो समझाईश के नाम पर जरूर वाहनों में काली पट्टी लगाने की खानापूर्ति करने के लिए कुछ वाहनों को रोक कर काली पट्टी लगा दी जाती है। लेकिन इसके बाद इन वाहनों से काली पट्टी गायब हो जाती है। एक तो भाई लोग अपने वाहनों में काली पट्टी लगाने से परहेज करते हैं ऊपर से सितम यह कि बड़े वाहन वाले अपर-डीपर भी देना जरूरी नहीं समझते हैं। सामने वाला भले ऐसा करते रहे उनकी बला से, उन्होंने यह बात ठान रखी है कि उनको अपर-डीपर देना ही नहीं है। संभवत: ऐसे वाहनों को सामने वाले वाहनों की लाइट से शायद फर्क नहीं पड़ता है तभी तो वे इतने ज्यादा लापरवाह हो गए है कि किसी की जान की कीमत भी नहीं समझते हैं। अगर ये वाहन चालक दूसरों के जान की कीमत समझते तो वाहनों में नियमानुसार काली पट्टी लगाने का काम करते। हमें तो लगता है कि इसके लिए जन जागरण की जरूरत है। ट्रेफिक पुलिस वाले तो आज तक कुछ कर नहीं पाए हैं। और न ही कभी कुछ कर सकते हैं।
दोस्तों हमने तो अपने राज्य के हालात को देखते हुए यह पोस्ट लिखी है, हमें नहीं लगता है कि दूसरे राज्यों में ऐसा नहीं होता होगा। ब्लाग बिरादरी से आग्रह है कि वे भी अपने राज्यों और शहरों के बारे में बताएं कि उनके यहां वाहनों की लाइट में काली पट्टी रहती है या नहीं। आप लोगों की जानकारियों का इंतजार रहेगा।

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