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शनिवार, अक्टूबर 17, 2009

राहुल बाबा नक्लसवाद को राज्य ने नहीं केन्द्र सरकार ने नासूर बनाया है

अपने राहुल बाबा यानी राहुल गांधी को अब नक्सलवाद की समस्या के लिए राज्य सरकारें ही दोषी नजर आ रही हैं। हम राहुल बाबा को बताना चाहते हैं कि आज कम से कम छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद नासूर बना है तो इसके लिए राज्य सरकार नहीं बल्कि केन्द्र सरकार ही दोषी है। केन्द्र सरकार ने इसको कभी गंभीरता से लिया ही नहीं। अगर बरसों पहले ही इस मामले की गंभीरता को समझा जाता तो आज हालात इतने खराब नहीं होते कि युद्ध जैसी स्थिति आती। अब तो नक्सलियों और सरकार के बीच गृह युद्ध की स्थिति बन गई है और इस युद्ध के बिना नक्सलवाद से निपटना आसान नहीं है।

राहुल गांधी ने दो दिनों पहले ही नक्सलवाद के लिए राज्य सरकारों को दोषी ठहराया है। हम यहां पर बताना चाहेंगे कि हमें कम से कम छत्तीसगढ़ की नक्सली समस्या के बारे में इतना मालूम है कि इस समस्या से केन्द्र सरकार को आज से नहीं बल्कि पिछले तीन दशकों से आगाह किया जाता रहा है, पर केन्द्र से इस पर कभी भी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। पुलिस के एक आला अधिकारी जो बस्तर में लंबे समय तक रहे हैं अगर उनकी बातें मानें तो उनका साफ कहना है कि बस्तर में पिछले तीस सालों में जितने भी पुलिस अधीक्षक रहे हैं उनका रिकॉर्ड निकाल कर देख लिया जाए तो यह बात साफ होती है कि बस्तर में जिस समय नक्सलियों ने पैर पसारने प्रारंभ किए थे, तभी से केन्द्र को इसकी रिपोर्ट लगातार भेजी जाती रही है, पर केन्द्र सरकार ने कभी इस मुद्दे पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा।

इधर राजनांदगांव जिले में हुई सबसे बड़ी नक्सली घटना के बाद जहां प्रदेश की नक्सली समस्या पर रमन सरकार गंभीर नजर आई , वहीं केन्द्र सरकार को भी अब लगने लगा है कि सच में यह समस्या गंभीर है। इसके पहले तक तो लगता है कि केन्द्र सरकार छत्तीसगढ़ की नक्सली समस्या को केवल छत्तीसगढ़ की समस्या मानकर ही चल रही थी। वैसे देखा जाए तो छत्तीसगढ़ को अलग हुए अभी एक दशक भी नहीं हुआ है, और छत्तीसगढ़ में नक्सली समस्या कम से कम तीन दशक पुरानी है। इन तीन दशकों में शायद ही ऐसा कोई साल और बस्तर का ऐसा कोई एसपी होगा जिसने इस समस्या के बारे में केन्द्र सरकार को अवगत नहीं कराया होगा। छत्तीसगढ़ से पहले मप्र के गृह विभाग और अब छत्तीसगढ़ के गृह विभाग ने लगातार केन्द्र के पास इस समस्या की रिपोर्ट भेजी है। बस्तर में लंबे समय तक पुलिस अधीक्षक रहने वाले एक एसपी का दावा है कि बस्तर में आज तक जितने भी एसपी रहे हैं, उनमें से ऐसा कोई नहीं होगा जिसने नक्सली समस्या के बारे में केन्द्र तक रिपोर्ट नहीं भिजवाई होगी। अगर तीन दशक पहले जब बस्तर में नक्सली पैर पसार रहे थे, उस समय केन्द्र सरकार ने इस दिशा में ध्यान दिया होता तो आज छत्तीसगढ़ में यह समस्या विकराल रूप में सामने नहीं आती। छत्तीसगढ़ अलग होने के बाद भी लगातार केन्द्र को इस बारे में बताया जाता रहा, पर केन्द्र सरकार तो राजनीति में उलझी रही और इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया। जब प्रदेश में जोगी सरकार आई तो केन्द्र में भाजपा गठबंधन की सरकार थी। और जब प्रदेश में भाजपा की सरकार है, तो आज जहां केन्द्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार है, वहीं इसके पहले भी कांग्रेस गठबंधन की सरकार थी। जब बस्तर में नक्सलियों ने बसेरा करना शुरू किया था, तब भी केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी। कुल मिलाकर देखा जाए तो केन्द्र की कांग्रेस सरकार ही नक्सली समस्या के लिए दोषी नजर आती है।

छत्तीसगढ़ में हालात ये हैं कि यहां के कांग्रेसी प्रदेश की भाजपा सरकार को इसके लिए दोषी मानने का कोई मौका नहीं गंवा रहे हैं। राजनांदगांव की घटना के बाद तो कांग्रेसियों ने प्रदेश में राष्ट्रपति शासन तक लगाने की मांग कर दी थी। और अब अपने राहुल बाबा भी वही राग अलाप रहे हैं कि नक्सलवाद के लिए राज्य सरकारें दोषी हैं। राहुल बाबा अपने केन्द्र की सरकार से यह सवाल क्यों नहीं करते हैं कि जब लगातार केन्द्र के पास इस समस्या की प्रारंभ से ही रिपोर्ट जाती रही है तो सरकार ने इस दिशा में ध्यान क्यों नहीं दिया? क्या विपक्ष में बैठने का मलतब यही होता है कि आप सत्ता में बैठी पार्टी पर चाहे जैसा भी हो दोष लगा दे।

हमारा यहां पर कताई भाजपा की सरकार का पक्ष लेने का मकसद नहीं है। लेकिन राजनीति से ऊपर उठकर कांग्रेस को सोचने की जरूरत है कि वास्तव में इस समस्या के लिए असली दोषी कौन है? अगर राहुल बाबा सहित कांग्रेसी इस समस्या से प्रदेश को मुक्त कराने की सच्ची भावना रखते हैं तो पहले केन्द्र सरकार से जरूर यह सवाल करें कि क्यों कर केन्द्र सरकार ने अब तक इस समस्या के समाधान का रास्ता नहीं निकाला है। माना कि प्रदेश में भाजपा की सरकार के आने के बाद नक्सली घटनाओं में बेतहासा इजाफा हुआ है, लेकिन यह भी सत्य है कि नक्सलियों को मार गिराने का काम भी पुलिस ने भाजपा शासन में ही बहुत किया है। यहां पर आंकड़े बताने की जरूरत नहीं है। अजीत जोगी के शासनकाल में कितने नक्सली मारे गए ये बात कांग्रेसी भी अच्छी तरह से जानते हैं। यदा-कदा दबी जुबान में ही सही यही कहा जाता रहा है कि जब प्रदेश में जोगी सरकार थी, तब उसका नक्सलियों से मौन समझौता था जिसके कारण जहां नक्सली घटनाएं कम हुईं, वहीं नक्सलियों का मारने का काम पुलिस ने नहीं किया।

कुल मिलाकर बात यह है कि एक तरफ कांग्रेसी नक्सली समस्या के लिए भाजपा को दोषी मान रहे हैं तो दूसरी तरफ भाजपाई कांग्रेस की केन्द्र सरकार को दोषी मान रहे हैं। भाजपा के दावे में इसलिए दम है क्योंकि केन्द्र के पास शुरू से नक्सली समस्या की रिपोर्ट भेजी जाती रही है और केन्द्र ने कुछ नहीं किया है। अब जबकि यह समस्या पूरी तरह से नासूर बन गई है तो यह वक्त एक-दूसरे पर आरोप लगाने का नहीं बल्कि इस समस्या को जड़ से समाप्त करने का है।

अंत में ब्लाग बिरादरी को दीप पर्व की प्यार भरी मीठी-मीठी बधाई

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शनिवार, अगस्त 22, 2009

राहुल गांधी की तो.....

अरे यार.. ये रास्ता भी बंद है, वो रास्ता भी बंद आखिर जाए तो जाए कहां से जाए। यार ये ऐसे नेता लोग आते ही क्यों है जिनके कारण रास्ते बंद करने पड़ते हैं। आखिर ये कौन नेता है? जिसके कारण रास्ते बंद कर दिए गए हैं। एक से बताया यार ये यह राहुल गांधी है। जैसे ही एक ने नाम लिया, दूसरे ने तपाक से कहा राहुल गांधी की तो.....।

ये नजारा छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में तब नजर आया जब सोनिया गांधी से लाडले राहुल बाबा का रायपुर आना हुआ। उनका आना हमेशा की तरह से आम जनों के लिए मुसीबत का सबब बना। सुबह के समय हम भी प्रेस की मिटिंग निपटा कर लौट रहे थे। हर तरफ रास्ता बंद। बड़े रास्ते क्या हर गली-कुचे के रास्तों को बंद कर दिया गया था और कदम-कदम पर पुलिस वाले तैनात थे। पुलिस वालों का व्यवहार हमेशा की तरह आम जनों से ऐसा था मानो आमजन ही वो आतंकवादी हैं जो राहुल बाबा को उड़ा देंगे। यहां पर एक बार फिर से कुछ दिनों पहले दिल्ली हाई कोर्ट का दिया गया फैसला याद आया कि अगर नेताओं को जान का इतना ही खतरा है तो वे बाहर ही क्यों निकलते हैं।

नेताओं के कारण जब आम जनों को परेशानी होती है तो परेशानी में इंसान क्या-क्या नहीं कहने लगता है। हम जिस रास्ते से भी गुजरे और जहां भी रास्ता बंद था, वहां पर ज्यादातर लोग राहुल बाबा को कोसते हुए और गाली देते दिखे। जिसके मन में जो आ रहा था वह अपनी भड़ास गालियां देकर निकाल रहा था। किसी ने गालियों में सभ्यता दिखने की जरूरत नहीं समझी और ऐसे मामले में सभ्यता दिखाने की जरूरत भी क्या है। वास्तव में ऐसे समय में अच्छे खासे इंसान का दिमाग खराब हो जाता है। अब ऐसे में इंसान ऐसे नेताओं को जो आम जनों को कीड़ों से ज्यादा नहीं समझे हैं उनको गालियां नहीं देंगे तो क्या उनकी आरती उतारेंगे। वैसे भी आम जनों को क्या लेना-देना राहुल गांधी के दौरे से। राहुल के आने न आने से किसकी सेहत पर फर्क पड़ता है। अरे आमजनों की बात ही छोड़ दें उनके आने से तो उनकी पार्टी के लोग भी खुश नहीं होते हैं। कारण पार्टी के कितने ऐसे लोग हैं जिनको उनसे मिलने का मौका मिलता है। जिनको उनके मिलने का मौका नहीं मिलता है, वे भी मन ही मन उनको कोसते हैं, कई लोग अपने गुस्से का इजहार सार्वजनिक भी कर देते हैं।

रास्ते में जहां आम जन राहुल बाबा को कोसते नजर आए, वहीं कई पुलिस वाले भी राहुल बाबा को गालियां देने से परहेज नहीं कर रहे थे। पुलिस वालों का ऐसा कहना था कि साले ये नेता आते हैं तो जनता के साथ हमारी भी मुसीबत हो जाती है। उनके आने-जाने के समय घंटों खड़े रहो मूर्ति की तरह रास्ते में। उपर से आम जनों की गालियां भी खाओ और उनसे विवाद भी करो।

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रविवार, मई 31, 2009

राहुल...राहुल...राहुल... उफ.. हद हो गई...

इस बात में कोई दो मत नहीं है कि दुनिया उगते सूरज को सलाम करती है, लेकिन इतना भी क्या सलाम करना कि सलाम ही बोझ लगने लगे। ऐसा ही कुछ अपने राहुल बाबा के मामले में हो रहा है। जब से लोकसभा में यूपीए की जीत का डंका बजा है। हर कोई पेले पड़ा है राहुल का नाम लेकर। हर चैनल से लेकर सारे अखबार, चाहे वह दैनिक हों साप्ताहिक, पाक्षिक या फिर मासिक हों। कोई भी ऐसा मीडिया तंत्र नहीं है जो राहुल के पीछे पागल न हो। अरे हो गया न बाबा अब क्या पांच तक राहुल ही राहुल रटते रहोगे। राहुल चालीस लिख देने से कोई कांग्रेस या फिर यूपीए अपनी जमीन-जायजात आपके नाम करने वाली नहीं है। अब इतना भी मत सड़ाओ की कान भी पक जाएं और आंखें भी थक जाएं पढ़ते-पढ़ते।

आज पूरा एक पखवाड़ा हो गया है लोकसभा चुनावों के नतीजों को आए हुए, लेकिन इस एक पखवाड़े में ऐसा कोई दिन खाली नहीं गया होगा जब मीडिया ने अपने राहुल बाबा यानी राहुल गांधी की महिमा का बखान न किया होगा। इसमें कोई दो मत नहीं है कि आज अगर केन्द्र में यूपीए की सरकार बनी है तो उसके पीछे बहुत बड़ा हाथ राहुल का रहा है। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जनता आज इतनी समझदार हो गई है कि उसको बेवकूफ बनाया ही नहीं जा सकता है। कहने का मतलब यह है कि अगर भाजपा गठबंधन के पास जनता को लुभाने वाले मुद्दे होते तो जरूर राहुल का जादू नहीं चलता। एक तो एनडीए ने लालकृष्ण अडवानी को प्रधानमंत्री के रूप में सामने पेश करके गलती की (ऐसा लोगों का मानना है)ऊपर से उसके पास कोई मुद्दा नहीं था। अब ऐसे में जनता के सामने एक ही विकल्प था कि वह फिर से यूपीए को ही मौका दे। और जनता ने ऐसा किया भी। वैसे इसमें भी कोई मत नहीं है कि यूपी में कांग्रेस को जो सफलता मिली है उसके पीछे राहुल और प्रियंका ही रहे हैं।

अगर राहुल बाबा आज मंत्री नहीं बने हैं तो उनको मालूम है कि मंत्री बनने से होना कुछ नहीं है। अब उन बेवकूफों को यह बात कौन समझाए जो राहुल को मंत्री बनवाने के पीछे पड़े हैं कि राहुल मंत्री बनकर मनमोहन के सामने खड़े होने से अच्छा मनमोहन को अपने सामने खड़ा रखना जानते हैं। जो सुपर प्रधानमंत्री का पावर रखता हो उसको क्या पड़ी है किसी छोटे से मंत्री का पद लेने की।

यूपी में फिर से गांधी परिवार के दिन लौटाने में राहुल का ही हाथ रहा है। यूपीए को मिली सफलता में राहुल के हाथ को कोई नकार भी नहीं रहा है और नकार भी सकता है। लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं है न की दिन-रात आप राहुल बाबा के राग को ही पेले पड़े हैं दर्शकों और पाठकों के सामने। एक तरफ अपने इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले हैं जो वैसे भी महान लोगों की श्रेणी में आते हैं। यहां हर चैनल वाला अपने कार्यक्रम को विशेष बताता है। लेकिन टीवी देखने वाला दर्शक तो जानता है कि वह कितना बड़ा झूठ बोल रहा है, क्योंकि जिस कार्यक्रम को वह विशेष बताता है वैसा ही कार्यक्रम उस चैनल से पहले कोई और चैनल दिखा चुका होता है। हर चैनल ने राहुल पर दिखाए कार्यक्रम को विशेष ही बताया है। अरे बाबा ये चैनल वाले कब समझेंगे कि ये पब्लिक है बाबू पब्लिक जो सब जानती है। अगर नहीं जानती तो आज केन्द्र में यूपीए की नहीं एनडीए की सरकार होती और प्रधानमंत्री होते लालकृष्ण अडवानी। और फिर अपने मीडिया वाले बंधु भी राग राहुल नहीं राग अडवानी गाते नजरे आते।

बहरहाल बात हो रही है राहुल बाबा की। राहुल बाबा को भुनाने का काम जहां एक तरफ इलेक्ट्रानिक मीडिया कर रहा है, वहीं प्रिंट मीडिया भी पीछे नहीं है। टीवी चैनलों के बाद दैनिक फिर साप्ताहिक और पाक्षिक अंत में मासिक, त्रैमासिक सबके सब पेले पड़े हैं राहुल की जय करने में। अरे बाबा कितनी जय करोगे हो गया न यार क्या पांच साल तक जनता के सामने यही परोसने का इरादा है कि राहुल त्याग की मूर्ति हैं, राहुल ने ये कियास राहुल ने वो किया। अगर राहुल बाबा आज मंत्री नहीं बने हैं तो उनको मालूम है कि मंत्री बनने से होना कुछ नहीं है। अब उन बेवकूफों को यह बात कौन समझाए जो राहुल को मंत्री बनवाने के पीछे पड़े हैं कि राहुल मंत्री बनकर मनमोहन के सामने खड़े होने से अच्छा मनमोहन को अपने सामने खड़ा रखना जानते हैं। जो सुपर प्रधानमंत्री का पावर रखता हो उसको क्या पड़ी है किसी छोटे से मंत्री का पद लेने की।

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