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गुरुवार, अप्रैल 02, 2009

बयान से लगा झटका-पाक को वरूण खटका

वरूण गांधी के बयान से भारत में ही नहीं बल्कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में बवाल मच गया है। वरूण के बयान को तो भारत के लोग ही नहीं पचा पा रहे हैं ऐसे में यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वरूण के बयान पर पाक खामोश रहता। इस बात का अंदेशा तो पहले ही था कि पाक जरूर इस बयान पर कोई बखेड़ा खड़ा करेगा। और अब छोटा शकील के शाट शूटर रशीद मालाबारी के पकड़े जाने के बाद से यह बात साफ हो गई है कि पाक की खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर वरूण को ही साफ करने की साजिश की जा रही थी। निश्चित ही वरूण का बयान पाक को ज्यादा खटका है। पाक को इस बात का यकीन है कि वरूण जैसे नेता भारत के हिन्दुओं को एक ऐसे रास्ते पर ले जा सकते हैं जो रास्ता पाक के विरोध का होगा। और पाक ऐसे में वरूण को ही समाप्त करके भारत में हिन्दु -मुस्लिम दंगे करवाने के पक्ष में था ताकि वरूण जैसे नेता को हिन्दुओं को जगाने का समय ही नहीं मिल सके। पीलीभीत के लोकसभा प्रत्याशी वरूण गांधी ने जब से अपने लोकसभा क्षेत्र में एक बयान दिया है तब से उन पर जहां मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है, वहीं वरूण आज पूरे विश्व में चर्चा का विश्व बन गए हैं। वरूण के बयान पर कई तरह के सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं। बयान क्या उनके हिन्दु होने पर ही कई लोग सवाल खड़े करने लगे हैं। वास्तव में देखा जाए तो इस समय यह मुद्दा नहीं है कि वरूण हिन्दु हैं या नहीं। हमारी नजर में तो यह मुद्दा उठाना ही गलत है। वरूण के हिन्दु होने पर संदेह जताने वाले उस समय कहां गए थे जब इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के मरने के बाद उनके शवों को जलाया गया था। हिन्दु धर्म में ही शवों को जलाया जाता है। अगर गांधी परिवार के हिन्दु होने पर कोई संदेह था तो उस समय यह मुद्दा क्यों नहीं उठाया गया जब इंदिरा गांधी या फिर राजीव गांधी को मरने के बाद जलाया गया था, तब तो यह बात किसी ने नहीं कही कि उनको जलाना गलत है। अब जबकि इस परिवार का एक युवा हिन्दुओं के पक्ष में खड़े हुआ है तो उनके हिन्दु होने पर संदेह जताया जा रहा है। एक बार यह माना जा सकता है कि वरूण का बयान चुनाव को देखते हुए राजनीति का एक हिस्सा है, लेकिन यह कैसे कहा जा सकता है कि वरूण को ऐसा बयान देने का हक इसलिए नहीं है क्योंकि वे हिन्दु ही नहीं हैं। अगर मान भी लिया जाए कि वरूण हिन्दु नहीं हैं तो भी कम से कम हिन्दुओं को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि एक गैर हिन्दु उनके धर्म की तरफ उंगली उठाने वालों की उंगली काटने की बात कर रहा है। भले यह बयान चुनाव की राजनीति की चासनी में डुबा हुआ हो, लेकिन ऐसा बयान देना ही कम हिम्मत की बात नहीं है। अगर और किसी नेता में दम है तो उन्होंने कभी ऐसा बयान क्यों नहीं दिया। वरूण के बारे में एक संदेह यह भी जताया जा रहा है कि वरूण राहुल गांधी जितने लोकप्रिय नहीं हैं, ऐसे में उन्होंने एक ऐसे विवादास्पद बयान को चुना जिससे वे लोकप्रिय हो जाएं। ऐसा है भी तो इसमें गलत क्या है, अपने देश के ऐसे कौन से नेता हैं जो लोकप्रियता के लिए विवादास्पद बयान नहीं देते हैं। हमारी नजर में तो ये सारी बातें उस समय गौण हो जाती हैं जब कोई वरूण जैसा नेता हिन्दु धर्म की वकालत करता है। वरूण के बयान पर भले भारत के लोगों को भरोसा न हो, लेकिन इतना जरूर मानना पड़ेगा कि वरूण के बयान पर पाक को जरूर भरोसा है। पाक को यह बात अच्छी तरह से समझ में आ गई है कि वरूण जैसे युवा नेता भारत के हिन्दुओं में ऐसा जोश भर सकते हैं जो जोश पाक के लिए घातक हो सकता है। यही वजह रही है कि पाक ने वरूण जैसे नेता को रास्ते से हटाने के लिए ही अपनी खुफिया एजेंसी आईएसआई के माध्यम से दाउद इब्राहिम और छोटा शकील का सहारा लेकर वरूण ही हत्या की साजिश रचने का काम किया। अब यह बात अलग है कि भारत की खुफिया एजेंसी की सतर्कता के कारण इस साजिश का खुलासा हो गया कि छोटा शकील ने अपने शूटर रशीद मालाबारी को वरूण को मारने की सुपारी दी थी। वरूण को मारने का काम जिस तरह से आईएसआई के इशारे पर किया जाने वाला था उससे एक बार फिर से यह साफ हो गया है कि पाक कभी भी आतंकवाद का रास्ता छोडऩे वाला नहीं है। पाक में अभी इतनी बड़ी आतंकवादी घटना हुई है इसके बाद भी पाक चेता नहीं है। इसका मतलब साफ है कि पाक में जो कुछ घटा है उसके पीछे वास्तव में आतंकवादियों का हाथ कम और पाक का हाथ ज्यादा है। वरना पाक आतंकवाद को समाप्त करने की तरफ कदम बढाता न कि भारत के एक युवा नेता की हत्या की साजिश करके भारत से जंग के हालत पैदा करने का काम करता। यह बात तय है कि अगर पाक के इशारे पर वरूण गांधी की हत्या हो जाती है तो जहां भारत में हिन्दु-मुस्लिम दंगे हो जाते वहीं इन दंगों के बाद भारत-पाक में होने वाली जंग को रोकना मुश्किल हो जाता। पाक को अब भी बाज आ जाना चाहिए। पाक ने ऐसा नहीं किया तो आने वाला समय उसके लिए जरूर घातक होगा। अगर केन्द्र में भाजपा समर्थक सरकार काबिज हो गई तो फिर पाक के पास कोई रास्ता नहीं रहेगा। जब केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी उस समय भारत का रूख हमेशा पाक के प्रति कड़ा रहा है। एक बार फिर से यह सरकार आ गई तो पाक के लिए मुसीबतें बढ़ेंगी यह बात तय है। वैसे पाक भी नहीं चाहता है कि भारत में भाजपा के समर्थन वाली सरकाकर बने, इसके लिए वह अपने स्तर पर प्रयास में भी जुटा है।

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मंगलवार, मार्च 31, 2009

शिकार करने को आए-शिकार हो के चले

एक पुराना गाना है तुम्हारे प्यार में हम बेकरार हो के चले, शिकार करने को आए शिकार हो के चले। यह गाना बनाया गया था प्यार के लिए, लेकिन तब नहीं मालूम था कि यह गाना उस पाकिस्तान पर भी फिट बैठ सकता है जो पाकिस्तान पूरी दुनिया में आतंक का जहर घोलने का काम कर रहा है। पाकिस्तान पर यह गाना फिट बैठ रहा है तो इसमें एक बेसिक अंतर यह है कि पाक के मामले में यह गाना प्यार के लिए नहीं बल्कि नफरत के लिए फिट बैठ रहा है। पाक ने पूरी दुनिया में प्यार का नहीं बल्कि नफरत का पैगाम देने का काम किया है और नफरत फैलाने के लिए ऐसे-ऐसे सांपों को पैदा किया जिनके जहर से बचना मुश्किल हो। वास्तव में पाक के पाले जहरीले आतंकी सांप इतने ज्यादा खतरनाक हैं कि उनके जहर पुरी दुनिया में घुलने लगा है। पाक के ये अनाकोन्डा हर देश के मानवों को कच्चा निगलने का काम कर रहे हैं। जब तक पाक के सांप देश के बाहर अपना फन फैलाए शिकार कर रहे थे तब तक तो पाक में कम से कम उनके लिए जश्न का माहौल था जिन्होंने ऐसे सांपों को दुध पिलाने का काम किया था, लेकिन अब इन सांपों ने अपनी परवरिश करने वालों को ही शिकार बनाना शुरू कर दिया है। ऐसे समय में ही उस पुराने गाने की याद ताजा हो गई है कि शिकार करने को आए-शिकार हो के चले। वाह रे पाक की आईएसआई जिसने आतंकियों को बढ़ाने के लिए क्या नहीं किया। आईएसआई ने तो अमरीका को भी आतंक का खात्मा करने के नाम पर इस तरह से छला है कि पैसे उनसे लिए और आतंक का खात्मा करने की बजाए आतंक फैलाने वालों की जड़ों को मजबूत करने का काम किया। तब शायद पाक को नहीं मालूम था कि जिस आतंक की जड़ को वह दुनिया को तोडऩे के लिए पनाह दे रहा है वह जड़ उनकी जमीन को भी खोखला करने का काम सकती है। पाक को तो उसी समय यह बात समझ में आ जानी चाहिए थी जब पहली बार 18 अक्टूबर 2007 को बेनजीर भुट्टो के पाक वापस आने पर उन पर हमला किया गया था। लेकिन तब शायद ऐसा कुछ नहीं था और इस मामले में संभवत: जो हमला हुआ था उसके पीछे भी कहीं न कहीं आईएसआई की मौन सहमति थी। लेकिन जब 21 दिसंबर 2007 को पाक में एक मजिस्द पर हमला हुआ तब क्या था। लेकिन पाक नहीं चेता और इसका परिणाम यह हुआ कि वहां पर लगातार आतंकी हमले होते रहे। लेकिन ये हमले उतने बड़े नहीं थे, या फिर यह कहा जाए कि शायद ये हमले किसी साजिश का हिस्सा थे ताकि पाक को भी साफ समझा जाए। क्यों नहीं हो सकता कि पाक अपने को आतंकवादियों का मददगार साबित होने से बचाने के लिए ऐसा कर रहा हो। वैसे तो अब भी इस बात में संदेह है कि पाक में जो आतंकी हमले हो रहे हैं उसके पीछे की सच्चाई क्या है। क्या वास्तव में पाक में आतंकवादी हमले उसी तरह से हो रहे हैं जिस तरह से आतंकवादी भारत या फिर किसी दूसरे देश को निशाना कर करते हैं या फिर यह महज एक दिखावा है। लगता तो कुछ ऐसा ही है कि यह कहीं छलावा तो नहीं है, दुनिया को गुमराह करने का। पाकिस्तान के पुलिस ट्रेनिंग सेंटर पर हुए हमले को जब करीब सात घंटे में नाकाम कर दिया गया तो उसके बाद पाक गृह मंत्रालय के प्रभारी रहमान मलिक का यह बयान आया कि हमें तो आतंकवादियों को काबू में करने में महज सात घंटे लगे जबकि भारत को चार दिन लग गए थे। बजा फरमान आपने मलिक साहब भारत को चार दिन इसलिए लग गए थे क्योंकि एक तो वह यह नहीं जानता था कि आतंकवादी किस तरह की गतिविधियों को अंजाम देते हैं, दूसरे इस बात का इल्म भी नहीं था कि आंतकियों के पास कैसे हथियार हो सकते हैं। अब रही बात आपकी तो क्या पता आपके टे्रनिंग सेंटर में हुआ हमला एक ड्रामा हो जिसके बारे में पहले से सब जानते हों कि किस तरह से हालत पर काबू पाया जा सकता है। अगर यह ड्रामा नहीं भी था तो कम से कम पाक को तो इस बात का अच्छी तरह से पता है कि आतंकवदियों की कितनी औकत है। और उस औकत के हिसाब से आपके जवानों ने मोर्चा संभाला और उसमें सफल हो गए। अगर दुश्मन की ताकत का अंदाज रहे तो आधी जंग ऐसी ही जीत ली जाती है। जैसा की आपको उन आतंकियों की ताकत का तो कम से कम अंदाज था और आपने जंग जीत ली। अब रही बात भारत की तो कम से कम भारत ऐसा देश है जहां के जवान एक भारतीय की जान की कीमत जानते हैं और एक भारतीय की जान की कीमत पर एक आतंकी को बख्शा भी जा सकता है। लेकिन क्या पाक किसी भी एक जान की कीमत को समझता है। अगर पाक को एक भी जान की कीमत मालूम होती तो उसने कभी भी पूरी दुनिया में आतंक का जहर घोलने का काम नहीं किया होता। पाक से ऐसा किया है तो अब कम से कम वह दिन आ गया है जब जैसी करनी वैसी भरनी वाली कहावत पूरी होने वाली है। अगर वास्तव में आतंकी पाक को निशाना बनाने लगे हैं तो होना तो यह चाहिए कि इससे अच्छी खबर विश्व के लिए नहीं हो सकती। लेकिन ऐसा नहीं है विश्व का कोई भी देश कभी नहीं चाहता है कि आतंकी किसी भी देश के लोगों को मारने का काम करें। पाक पर हुए आतंकी हमले से भारत सहित जिन देशों पर भी पाक के इशारे पर आतंकी हमले हुए हैं, उन देशों की सरकार के साथ हर नागरिक दुखी है। क्योंकि ये लोग जानते है कि आतंकी हमले में मरने वालों के परिजनों पर क्या गुजरती है। वैसे भी नफरत से किसी को क्या हासिल हुआ है जो आज हासिल होगा। अब कम से कम पाक को सबक लेते हुए आतंकवादों को जड़ से समाप्त करने की पहल करनी ही चाहिए, अब भी ऐसा नहीं किया गया तो फिर पाक भी हो जाएगा साफ और आतंकी संगठन बन बैठेंगे सबके बाप।

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