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शनिवार, जुलाई 16, 2011

क्या मुंबई राज ठाकरे की बपौती है?

मुंबई ब्लास्ट के बाद जिस तरह से राज ठाकरे का बयान आया है, उसने एक बार फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या मुंबई राज ठाकरे की बपौती है? भारत लोकतांत्रिक देश है और देश का हर नागरिक पूरे देश में कहीं भी आने-जाने के लिए स्वतंत्र है। फिर राज ठाकरे कौन होते हैं यह फैसला करने वाले कि मुंबई में कौन आएगा और कौन नहीं आएगा। क्या राज ठाकरे भारतीय संविधान से बढ़कर हैं? राज ठाकरे मुंबई को इतना ही अपना मानते हैं कि उन्होंने आखिर किया क्या है अब तक मुंबई ब्लास्टों को लेकर।

लगता है राज ठाकरे को उप्र और बिहार वालों के सिवाए कुछ नजर नहीं आता है। मुंबई में होने वाली हर घटना के लिए वे बाहरी लोगों को ही दोषी ठहरा देते हैं। बाहरी लोग दोषी जरूर हैं, लेकिन वे बाहरी नहीं जिनकी तरफ राज ठाकरे इशारा करते हैं, बल्कि वे बाहरी जिनका एक बंदा कसाब है। क्या यह बात राज ठाकरे को सम­ा नहीं आती है कि आतंकवाद का जन्मदाता कौन है और भारत क्या पूरे विश्व में आतंकवाद का नंगा नाच कौन करवा रहा है। इतना सब जानने के बाद क्या राज ठाकरे सीधे-सीधे पाकिस्तान की तरफ ऊंगली उठाने से क्यों कर डरते हैं?

ठाकरे साहब यह मत भूलिए कि मुंबई जितनी आपकी है, उतनी ही देश के हर नागरिक की है। क्यों कर आप किसी को मुंबई आने से रोक सकते हैं। बाहर से आने वालों को रोकने की बजाए आप मुंबई की पुलिस को दोष दें कि वे ऐसे अपराधियों को खोज नहीं पाती है जो मुंबई में आकर अपराध करते हैं। अगर अपने देश की पुलिस और खुफिया तंत्र इतना ही मजबूत होता तो क्यों कर मुंबई या फिर देश में कहीं भी ऐसे हादसे होते। जरूरत बाहरी लोगों को मुंबई में आने से रोकने की नहीं बल्कि पुलिस और खुफिया तंत्र को मजबूत करने की है। यदि आप सरकार पर ऐसा करने का दबाव बनाएंगे तो जरूर जनता की नजरों में आपकी अहमियत होगी, लेकिन आप बिनावजह बाहरी लोगों पर संदेह करेंगे तो यह गलत है। क्या आप दावे के साथ कह सकते हैं कि मुंबई में रहने वाले अपराध नहीं करते हैं। जिनकी अपराध करने की प्रवृति होती है उनके लिए मुंबई क्या और दिल्ली क्या। अपराधी प्रवृति वालों को रोकना किसी के बस में नहीं होता है। यह वक्त तेरा-मेरा करने का नहीं बल्कि एक होकर आतंकवाद से निपटने का है। खाली बयानबाजी से कुछ नहीं होने वाला है।

बयानबाजी करनी ही है तो सरकार में बैठे उन भ्रष्ट नेताओं और अफसरों के खिलाफ करें जिनके कारण देश का आज यह हाल है। एक सोचने वाली बात यह कि मंत्रिमंडल के फेरबदल के साथ ही मुंबई में ब्लास्ट हो जाता है। क्या इसमें किसी नेता का हाथ नहीं हो सकता है? इस तरफ क्या किसी ने सोचा। अब ऐसा सोचने के लिए अपने ठाकरे साहब के पास समय कहां है, उनको तो बस मुंबई के बाहर से आने वाले ही अपराधी नजर आते हैं। देश के हर बड़े महानगर में लाखों लोग रोज बाहर से आते हैं, उनको कैसे रोका जा सकता है। अपने छत्तीसगढ़ की राजधानी में ही रोज हजारों लोग आते हैं, इनमें से कौन सज्जन और कौन अपराधी है कौन जानता है।

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गुरुवार, नवंबर 12, 2009

राज ठाकरे को हिन्दी से नफरत क्यों?

यह बात समझ से परे हैं कि अपनी ही राष्ट्रभाषा हिन्दी से राज ठाकरे को आखिर इतनी नफरत क्यों हैं। अपनी क्षेत्रीय भाषा से कोई दीवानगी की हद तक भले प्यार करे लेकिन इसका यह मतलब तो कदापि नहीं होता है कि आप इसके एवज में राष्ट्रभाषा का लगातार अपमान करें। अगर अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान करना नहीं जानते हैं तो फिर आपका अपनी क्षेत्रीय भाषा के प्रति प्यार किस काम का। राज ठाकरे का मराठी प्रेम तो उसी तरह से है जैसा पाकिस्तान का अपना देश प्रेम है। पाक को जिस तरह से भारतीय हमेशा दुश्मन लगते हैं, उसी तरह से राज ठाकरे तो भी हिन्दी हमेशा से दुश्मन ही लगी है। अगर ठाकरे ने ऐसा ही प्यार हिन्दी के प्रति दिखाया होता और अंग्रेजी से नफरत करते तो उनका मान पूरे देश में होता। अब भी समय है उनको अपना रास्ता बदलकर हिन्दी का विरोध करने की बजाए अंग्रेजी का विरोध करना चाहिए।

इन दिनों पूरे देश में राज ठाकरे के मनसे विधायकों द्वारा विधानसभा में किए गए कृत्य पर बवाल मचा हुआ है। यह सोचने वाली ही नहीं बल्कि एक गंभीर बात है कि राज ठाकरे की पार्टी ये क्या कर रही है। क्यों कर हिन्दी का इतना ज्यादा विरोध किया जा रहा है। जिस अंग्रेजी भाषा का विरोध होना चाहिए, उसका विरोध करने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा रहे हैं मनसे के लोग? हिन्दी तो अपनी राष्ट्रभाषा है फिर उससे आखिर इतनी नफरत क्यों? क्या महाराष्ट्र को एक तरह से राज ठाकरे ने पाकिस्तान बना दिया है कि यहां कोई हिन्दू कदम नहीं रख सकता है। अगर कोई कदम रखेगा तो उसका सर कलम कर दिया जाएगा। इतनी नफरत तो पाकिस्तान में भी हिन्दूओं के प्रति नहीं है जितनी नफरत मनसे में हिन्दी के प्रति नजर आती है। हिन्दी से नफरत करके आखिर क्या साबित करना चाहते हैं मनसे के लोग। क्या महाराष्ट्र को देश से अलग करने की साजिश की जा रही है? अगर नहीं तो फिर हिन्दी के प्रति यह रवैय्या क्यों है? इसका जवाब किसके पास है।

अपनी क्षेत्रीय भाषा से आप बेशक प्यार नहीं बल्कि दीवानगी की हद तक प्यार करें। लेकिन इसका यह मतलब कदापि नहीं होना चाहिए कि आप अपनी राष्ट्रभाषा का ही अपमान करते रहे। अगर आप राष्ट्रभाषा का अपमान कर रहे हैं तो फिर वंदेमातरम् का विरोध करने वालों और आप में क्या फर्क रह जाता है। फिर तो वंदेमातरम् का विरोध भी सही माना जाना चाहिए। जिस तरह से मनसे के लोगों को हिन्दी से कोई मतलब नहीं है वैसे ही मुस्लिम कौम के कुछ लोगों को वंदेमातरम् से मतलब नहीं है। ऐसे में तो एक दिन हर कोई देश की अस्मत से खिलवाड़ करने लगेगा और अपना-अपना राग अलापेगा कि उसे यह पसंद नहीं है। क्या देश की राष्ट्रभाषा, राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत अब लोगों की पसंद पर निर्भर रहेंगे? देश की अस्मत से खिलवाड़ करने वालों को बर्दाश्त करना जायज नहीं है।

अपने मनसे के लोग तो देश के संविधान और कानून से ऊपर हो गए हैं। एक तरफ राष्ट्रभाषा का अपमान करने के बाद उनके माथे पर शिकन नहीं है तो दूसरी तरफ खुले आम ऐलान किया जाता है कि अबू आजमी की सड़क पर पिटाई की जाएगी। क्या अपने देश का कानून इतना ज्यादा नपुंशक हो गया है कि खुले आम चुनौती देने वालों के खिलाफ भी कुछ नहीं किया जा सकता है। अगर यही हाल रहा तो देश में जो थोड़ा बहुत कानून बचा है, उसका भी अंत हो जाएगा और देश को अराजक होने से कोई नहीं बचा पाएगा।

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