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मंगलवार, अक्टूबर 13, 2009

नंगे के साथ क्यों हो रहे हैं नंगे

ब्लाग जगत में पिछले कुछ दिनों से बहुत ही ज्यादा साम्प्रदायिकता का जहर घोलने का काम किया जा रहा है। ब्लाग बिरादरी को पूरी तरह से धर्म युद्ध का अखाड़ा बना दिया गया है। हर कोई बस अपने को सही और श्रेष्ठ साबित करने में लगा है। किसी के अपने को श्रेष्ठ मानने से कोई भला कैसे श्रेष्ठ हो सकता है। हमारा ऐेसा मानना है कि जिनको गंदगी करने की आदत है वे तो गंदगी करेंगे ही। अगर एक इंसान नंगा है और वो बाजार में कपड़े खोल कर खड़े हो जाता है, तो इसका यह मतलब कताई नहीं होता है कि हम भी कपड़े खोल कर नंगे हो जाएं। हमारा ब्लाग बिरादरी के मित्रों से आग्रह है कि हमें तो कम से कम हमाम में रहना चाहिए। अगर कोई हमाम से बाहर जाता है तो जाए, यह उसकी सोच है कि वह कपड़ों के बिना ज्यादा अच्छा लगेगा।

हमें काफी समय से लग रहा है कि अपना ब्लाग जगत एक गलत रास्ते पर चल पड़ा है, जहां देखो जिसे देखो धर्म के नाम पर जहर घोलने का काम किया जा रहा है। क्या जरूरत है कि किसी भी धर्म की बुराई करने की? हमें तो नहीं लगता है कि दुनिया में कोई मजहब बैर करने की बात सीखता है। इतना जरूर है कि धर्म के ठेकेदार जरूर अपने फायदे के लिए लोगों को आपस में लड़ाने का काम सदियों से करते रहे हैं। हमें लगता है कि ब्लाग बिरादरी में कुछ धर्म के ऐसे ही ठेकेदार आ गए हैं जो अपने स्वार्थ के लिए ब्लाग जगत को भी दूषित करने में लगे हैं। अब इससे पहले की यहां भी साम्प्रयादिकता का जहर पूरी धुल जाए हम लोगों को सचेत हो जाना चाहिए। अगर सचेत नहीं हुए तो वही हाल होगा जो अपने देश का हुआ था यानी हम लोग गुलाम बन जाएंगे एक ऐसी कौम के जिसका काम है लोगों को आपस में लड़ाना।

तो मित्रों हमें इस बात पर ध्यान देना बंद करना होगा कि कौन कितना गंदा लिख रहा है। हमें किसी ने एक बार एक बात बताई थी कि अगर कोई इंसान आप को गाली दे रहा है तो आप उसे कबूल ही न करें। जब आप उसकी गाली को कबूल ही नहीं करेंगे तो वह आपके आएगी ही नहीं। इसका मतलब है कि वह गाली उसी के पास रह जाएगी। अगर कोई किसी के धर्म के बारे में उल्टा-सीधा सोचता या फिर लिखता है तो किसी के लिखने मात्र से कोई धर्म कैसे खराब हो सकता है।

धर्म के नाम पर लोग सिर कटाने के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन जिनके सिर कटते हैं वे ऐसे लोग होते हैं जिनको ऐसा करने के लिए उकसाया जाता है, कभी भी धर्म के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वालों के सिर कटते देखे हैं क्या आपने? तो क्यों कर हम लोग ऐसे लोगों के हाथों की कठपुतली बनने का काम कर रहे हैं जिनका काम ही है इंसानों को बेवकूफ बनाकर कठपुतली की तरह नचाना।

ब्लाग जगत में हम लोग आए हैं तो अपने समाज, शहर, राज्य और देश के साथ इस सारी कायनात के लिए कुछ अच्छा करने के जज्बे के साथ अपना लेखन करें ताकि जब हम न रहे तो कम से कम हमारा नाम रहे। धर्म के नाम पर लिखकर लड़कर न तो कुछ हासिल होगा और न ही कोई हमें याद करेंगे। बाकी ज्यादा क्या लिखें, अपनी ब्लाग बिरादरी के लोग ज्ञानी और समझदार हैं। हमारे मन में एक बात आई सो हमने अपने ब्लाग बिरादरी से बांटने का काम किया है। आगे जिसकी जैसी इच्छा किसी को किसी की इच्छा के विपरीत तो चलाने का दम किसी में नहीं होता है। एक मित्र होने के नाते कोई भी हमारी तरह एक सलाह ही दे सकता है। अब उस सलाह को मानना न मानना तो सामने वाले पर निर्भर होता है।

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गुरुवार, सितंबर 03, 2009

भजनों से मिला ऐसा मान-पंडित बना गया मुस्लमान

कहते हैं संगत का बहुत असर होता है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि अच्छों की संगत में इंसान की जिंदगी संवर जाती है तो बुरों की संगत में इंसान की जिंदगी नरक बन जाती है। हमने तो भजन गाने वालों की संगत के रंग में रंग कर अपने एक मित्र को मुस्लमान से पंडित बनते देखा है। यहां पर हमारा पंडित का मतलब यह है कि उस युवक ने मंदिरों में भजन करने के कारण अपने साथियों की तरह ही मांसाहार से किनारा कर लिया और पूरी तरह से भजनों में रम गया। आज भी यह युवक शादी के बाद अपने वादे पर कायम है। यह वादा उन्होंने किसी और से नहीं बल्कि अपने आप से किया था। आज जबकि हर तरफ देश में साम्प्रदायिकता का जहर फैलाने का काम किया जा रहा है, ऐसे में हमें यह बात याद आ गई जिसका हम यहां उल्लेख कर रहे हैं। वैसे हम एक बात यह भी कहना चाहते हैं कि अक्सर हिन्दुओं को कमजोर समझने की गलती की जाती है, हिन्दु कमजोर नहीं बल्कि रहम दिल है। लेकिन इस रहम दिली का अगर गलत फायदा उठाया गया तो इसका अंजाम घातक भी हो सकता है।

एक मुस्लमान युवक के पंडित जैसे बनने की बात हमें अचानक याद नहीं आई है। यह बात हम इसलिए यहां बताना चाहते हैं कि हमें ब्लाग जगत में यही लगता है कि यहां पर भी हिन्दु और मुस्लिम का भेद है। कोई हिन्दुओं के देवताओं के साथ हो रहे खिलवाड़ के बारे में लिखता है तो कोई मुस्लमान उस पर आवंछित टिप्पणी कर देता है। जी हां ठीक समझे हम बात कर रहे हैं अनिल पुसदकर जी के लेख की। उनके एक लेख पर सलीम भाई ने जो टिप्पणी की उसके बाद पहली बार अनिल जी ने उनके जवाब में एक पोस्ट लिख दी। वैसे यह बात सब जानते हैं कि अनिल जी प्रति उतर नहीं देते हैं। अनिल जी ने प्रति उदर दिया ठीक किया, पर उनके लेख पर जिस तरह की टिप्पणियां आईं उससे कम से कम हमें तो यह कहीं से नहीं लगा कि वास्तव में आज अपने देश में हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई आपस में हैं भाई-भाई जैसी स्थिति का कुछ भी प्रतिशत बचा है। हमारा ऐसा मानना है कि अगर एक इंसान गलती कर रहा है और वह रोड़ में नंगा खड़े होकर नाच रहा है तो क्या हम भी नंगे हो जाए। फिर उसमें और हममें फर्क क्या रह जाएगा। जिनकी जैसा फितरत है वो तो वैसा ही करेंगे फिर हम क्यों उनकी तरह अपने कपड़े फाडऩे का काम कर रहे हैं।

हमारा ऐसा मानना है कि वास्तव में हमारा हिन्दु धर्म ऐसा है जो सबको प्यार देने का काम करता है। एक नहीं हजारों उदाहरण मिल जाएंगे इसके लिए। कभी हिन्दुओं के मंदिर में किसी को जाने से नहीं रोका जाता है। लेकिन क्या कभी कोई हिन्दु किसी मस्जिद में जा सकता है? हिन्दुओं के सारे तीर्थ सभी धर्मों को मानने वालों के लिए खुले हैं, पर क्या कोई हिन्दु हज करने जा सकता है? उनको तो वहां फटकने भी नहीं दिया जाएगा। अगर कोई मुस्लिम युवक किसी मंदिर में बैठकर भजन गाता है तो उसको कोई नहीं रोकता है, उस युवक को हिन्दु गले लगाने का काम करते हैं।

हमें याद है हमारे एक बचपन के मित्र हैं शौकत अली उनका छोटा भाई शाकिर अली भी हमारा मित्र है। हमने इस युवक को देखा कि कैसे वह संगत में बदला और पूरी तरह से पंडित जैसा बन गया। बात हमारे गृहनगर भाटापारा की है। वहां पर जो लोग शाकिर के घर आते थे, उनमें से कई लोग ऐसे थे जो रोज शाम को एक मंदिर में बैठकर भजन गाते थे। एक दिन शाकिर भी उनके साथ चला गया, इसके बाद उनका मन वहां ऐसा रम की वह रोज वहां जाने लगा। यही नहीं उन्होंने तो अपने दोस्तों की संगत में मांसाहार भी छोड़ दिया। इसके लिए उसे किसी ने बाध्य नहीं किया था, लेकिन उन्होंने सच्चे मन से ऐेसा किया। वह रोज मंदिर में भजन करने के साथ भगवान का टिका लगाकर निकलता था। हम पहले भी बता चुके हैं कि शाकिर का बड़ा भाई जो कि हमारा मित्र है वह भी रोज हमारे साथ मंदिर जाता था और माता का टिका लगाकर हमारे साथ घुमता था। हमने कभी शौकत ने मांसाहार छोडऩे नहीं कहा। वह कभी भजन करने नहीं गया, पर उनका भाई जाता था। आज से करीब दो दशक पहले शाकिर ने जो मांसाहार से नाता तोड़ा है, उसने फिर शादी के बाद भी उससे नाता नहीं जोड़ा। आज भी उनके घर में जब बिरयानी बनती है तो उनके लिए अलग से खाना बनाया जाता है। शाकिर से उनके परिजनों के साथ ससुराल वालों ने भी मांसाहार के लिए कई बार कहा, पर उन्होंने फिर कभी मांसाहार नहीं किया है।

आखिर ये क्या है? यह उनके मन की भावना ही तो है जिसने उनको भगवान में ऐसा रमाया कि वह पंडित की तरह हो गया। भाटापारा छोडऩे के बाद रायपुर में फिर उनको ऐसा कोई साथ नहीं मिला। वह आज भी जब हमसे मिलता है तो पुराने दिनों को याद करता है और कहता है राजु सच में भाटापारा में मंदिर में भजन करने में जो सुख मिलता था वैसा सुख और कहीं नहीं है। यह एक उदाहरण है जो बताता है कि हिन्दु धर्म क्या है।

हमारा धर्म कभी किसी पर थोपा नहीं गया है। मैं भी अनिल जी की एक बात को दोहराना चाहता हूं कि हिन्दु इतना भी कमजोर नहीं कि उनके मंदिरों में कोई गाय के बछड़े का मांस फेंक कर चला जाए तो वह चुप बैठा रहे। अब यह बात अलग है कि अपने राज्य का मीडिया इतना अच्छा है कि वह यह जानता है कि कौन सी खबर को कैसे प्रकाशित करना है। अगर रायपुर के एक मंदिर में फेंके गए गाय के बछड़े के मांस की फोटो छाप दी जाती तो जरूर साम्प्रयादिकता का जहर फैल सकता था, पर ऐसा नहीं किया गया। अखबार वाले जरूर समझदार हैं, इसी के साथ हिन्दु धर्म के मानने वाले भी समझदार हैं जो बिना सोचे समझे किसी पर आरोप नहीं लगते हैं। लेकिन इतना तय है कि अगर ऐसी हरकत करते किसी को देख लिए जाएगा तो उसका हश्र क्या किया जाएगा यह बताने वाली बात नहीं है।

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