राजनीति के साथ हर विषय पर लेख पढने को मिलेंगे....

हिन्दु लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हिन्दु लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, नवंबर 21, 2009

हिन्दु बेटे के अंतिम दीदार के लिए कब्रिस्तान में खोला गया मुस्लिम मां का चेहरा

ब्लाग बिरादरी में इन दिनों हिन्दु और मुसलमानों को लेकर काफी कुछ लिखा जा रहा है। बहुत से लोग साम्प्रदायिकता का जहर फैलाने में लगे हैं। ऐसे में जबकि अनिल पुसदकर जी के ब्लाग में पंचर का किस्सा लिखा गया तो मुझे अचानक अपने एक बचपन के दोस्त शौकत अली के मां के इंतकाम का दिन याद आ गया। उनके इंतकाल में मैं काफी विलंब से पहुंचा था जिसकी वजह से कब्रिस्तान में मुझ हिन्दु बेटे लिए उस मुस्लिम मां का चेहरा सिर्फ मुझे दिखाने के लिए खोला गया था। यहां एक बात और बताना चाहूंगा कि इंसान का नसीब भी न जाने कैसा होता है जो उसको क्या-क्या रंग दिखाता है। एक तरफ मैं अपनी मां के अंतिम दर्शन नहीं कर पाया था तो दूसरी तरफ एक ऐसी मां के अंतिम दर्शन करने का मौका जरूर मिल गया जिसे हमने कभी मां से कम नहीं समझा।

अपने देश में हिन्दु और मुसलमानों के दोस्ती के कई किस्से हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि हिन्दु और मुसलमान में भी भाई से ज्यादा मोहब्बत हो सकती है। कम से कम हम तो इस बात को इसलिए मानते हैं कि हमारे एक मुस्लिम परिवार से अपने घर जैसे रिश्ते बचपन से रहे हैं। हम अपने इन मित्र शौकत अली की दोस्ती का बयान पहले भी कर चुके हैं। जब हम लोग भाटापारा में रहते थे तब हमारे इन मित्र के साथ उनके दो छोटे भाईयों साकिर अली और आसिफ अली से भी हमारी दोस्ती थी। हमारी दोस्ती ऐसी थी कि रोज एक समय का खाना एक-दूसरे के घर में ही खाते थे। जब हमारे इन मित्र का परिवार रायपुर आकर रहने लगा तो कुछ समय बाद हम भी रायपुर आ गए थे। आज हमें रायपुर में रहते दो दशक से ज्यादा समय हो गया है।

बात उन दिनों की है जब हमारे मित्र की मां का अचानक इंतकाल हो गया। हमें खबर मिली की उनकी अंतिम यात्रा सुबह को करीब 11 बजे निकाली जाएगी। ठीक उसी समय हमें प्रेस के काम से जाना था, सो हमें वहां पहुंचने में समय लगा तो हम सीधे कब्रिस्तान पहुंच गए। ऐसे में वहां पर अंतिम संस्कार से पहले पूछा गया कि क्या घर का कोई सदस्य अंतिम दीदार के लिए बचा हुआ है, तो सभी से सिर्फ मेरा नाम लिया कि राजू देर से आया है, इसलिए अंतिम दीदार के लिए चेहरा खोला जाए। मां का चेहरा खोला गया तो हमारी आंखों में आंसू भरे आए। एक तो इसलिए कि हमें अपनी मां के अंतिम दर्शन का मौका नहीं मिला था। जब हमारी मां का निधन हुआ था तब हम जगदलपुर गए थे रिपोर्टिंग करने के लिए। जब तक हम अपने घर भाटापारा पहुंचते मौसम खराब होने के कारण हमारी मां का अंतिम संस्कार किया जा चुका था, हमें आज भी इस बात का अफसोस है कि हम अपनी मां के अंतिम दर्शन नहीं कर पाए थे। ऐसे में अपने दोस्त की मां के अंतिम दर्शन करके हमारी आंखे भर आईं थीं।

दूसरी बात यह कि हमें उस समय यह सोच कर खुशी भी हुई कि चलो यार जिस बचपन के दोस्त को अपने भाई जैसा माना उनके परिवार ने भी मुझे इतना सम्मान दिया कि घर का सदस्य समझकर मां के अंतिम दीदार के लिए उनका चेहरा खोला गया। वरना यह कताई जरूरी नहीं था क्योंकि उनके परिवार के हर व्यक्ति ने शव यात्रा से पहले ही उनके अंतिम दर्शन कर लिए थे। लेकिन नहीं सब जानते थे कि हमारा उन घर से कैसा रिश्ता है और कभी उस घर ने हमें अपने बेटे से कम नहीं समझा। ऐसे में भला कैसे हमें उन मां के अंतिम दर्शन से महरूम रखा जाता जिस मां के साय में हमारे दोस्त के साथ हमारा भी बचपन से लेकर जवानी तक का सफर गुजरा था।

ये एक सच्चाई है कि दिलों में प्यार हो तो कोई धर्म और मजहब की दीवार किसी को रोक नहीं सकती है। कोई भी धर्म और मजहब एक-दूसरे का मजाक उड़ाने का रास्ता नहीं बताते हंै फिर न जाने क्यों इन दिनों लोग धर्म के साथ खिलवाड़ करने का काम कर रहे हैं। इसका बंद होना जरूरी है। किसी के धर्म को छोटा दिखाने से कोई धर्म छोटा नहीं हो जाता है। जिस इंसान की मानसिकता छोटी होती है, वही ऐसी हरकतें करते हैं। ऐसी हरकतों पर विराम लगाते हुए आपस में भाई-चारे से रहना चाहिए। अपना देश ही विश्व में एक ऐसा देश है जहां पर हर जाति और धर्म के लोगों को समान रूप से रहने का और अपने धर्म को मानने का अधिकार है, फिर क्यों कर लोग दूसरे के धर्म में टांग अड़ाने का काम करते हैं। आप अपने धर्म का बखान करें आपको किसने रोका है, लेकिन यह बखान किसे दूसरे धर्म को नीचा दिखाते हुए करना सरासर गलत है।

Read more...

शुक्रवार, सितंबर 18, 2009

पाक में रहने वाला इंसान मुसलमान-इसलिए हिन्दुस्तान में रहने वाले हिन्दु

अपने जीके अवधिया जी ने एक अच्छा मुद्दा उठाया है कि किसी के यह कह देने से कि हां मैं हिन्दु हूं कोई हिन्दु नहीं हो जाता यह बात उन सलीम खान के लिए कही गई है जो अपने को हिन्दु कहते हैं। वास्तव में सोचने वाली बात है कि अगर सच में आप हिन्दुस्तान में रहते हुए अपने को हिन्दु मानते हैं तो फिर इस धर्म या संस्कृति की बातों का पालन करते हैं क्या? अगर भारत में रहने वाले हर जाति-समुदाय और धर्म के लोग हिन्दु हैं तो फिर सबके लिए लिए अलग-अलग कानून क्यों? किसके पास है इसका जवाब।

अवधिया जी के साथ पीसी गोदियल से यह सवाल उठाया है कि अगर कोई सलीम खान या कोई भी खान अपने को हिन्दु कहता है तो क्यों कर मुस्लिम एक्ट अलग से बनाया गया है। क्या अपने को हिन्दु कहने का दावा करने वाले ऐसे लोग अपने धर्म के लिए बनाए गए कानून का विरोध करने का दम रखते हैं और कह सकते हैं कि एक से ज्यादा पत्नी रखना गुनाह है। अगर ऐसा करने की हिम्मत नहीं है तो फिर क्यों किसी के धर्म के साथ खेलने की कोशिश की जा रही है। हिन्दु तो किसी के धर्म के साथ नहीं खेलते हैं।


हमें तो लगता है कि सलीम खान जैसे लोगों के दिमाग में पाकिस्तान का वह सब भरा हुआ है जिसमें पाकिस्तान में रहने वाले हर इंसान को मुसलमान होना पड़ता है। जो मुसलमान नहीं होता है उसका क्या हश्र होता है यह सब जानते हैं कि कैसे हिन्दुओं को अपने धर्म में शामिल करने के लिए उन पर जुल्म किए गए थे। अगर मुसलमान यह नहीं कहेंगे कि हिन्दुस्तान में रहने वाला हर कोई हिन्दु है तो उनकी यह बात कैसे जायज होगी कि पाकिस्तान में रहने वाला हर इंसान मुसलमान है। ये लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि हिन्दुओं में इतना दम नहीं है कि मुसलमानों को हिन्दु बनने मजबूर किया जा सके। वैसे भी कम से कम अपने हिन्दु धर्म में इस बात के लिए कोई स्थान नहीं है कि किसी को जबरिया अपना धर्म कबूल करवाया जाए। किसी भी धर्म में आस्था होने पर ही कोई किसी का धर्म कबूल करता है। आस्था न होने पर किसी पर कोई धर्म थोपा जाता है तो उस धर्म से इंसान प्यार नहीं नफरत ही करता है।

हिन्दु धर्म को लेकर भी तरह-तरह की बातें की जाती हैं। अब इसको लोग धर्म मानने को तैयार नहीं है। बचपन से लेकर आज तक हम तो यही सुनते और पढ़ते आए हैं कि हिन्दु धर्म है। अब इसको कोई संस्कृति कह रहा है तो कोई कुछ और। आखिर किसी के पास ऐसा कोई साक्ष्य है कि अंतत: हिन्दु धर्म है या संस्कृति, तो उसका खुलासा करना चाहिए। वैसे भी पूरे विश्व में यही कहा जाता है कि चार धर्म हिन्दु, मस्लिम, सिख और ईसाई हैं। अगर हिन्दु धर्म नहीं है तो फिर बाकी भी धर्म नहीं संस्कृति ही हुए। किसी के पास कोई जवाब हो तो जरूर बताए कि आखिर माजरा क्या है ताकि हमारे ज्ञान में भी कुछ इजाफा हो सके। अंत में अवधिया जी को एक अच्छा मुद्दा सामने रखने के लिए बधाई और धन्यवाद।

Read more...

मंगलवार, सितंबर 15, 2009

पाक में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार का जवाब है किसी के पास

कुछ समय पहले हमने एक ब्लाग में एक लेख पढ़ा था जिसमें लिखा गया था कि भारत-पाक के विभाजन का नुकसान तो मुसलमानों को उठाना पड़ा है। यह बात कम से कम हमारे गले तो उतरने वाली नहीं है। कारण यह कि हमने बचपन से यही सुना है कि पाकिस्तान में जितना अत्याचार हिन्दुओं पर किया गया वैसा अत्याचार कभी भारत में मुसलमानों पर नहीं हुआ है। अगर किसी मुसलमान पर हिन्दुओं ने अत्याचार किया है, तो कोई बताएं। हम यहां बताना चाहेंगे कि हमें हमारे पुर्वज बचपन से बताते रहे हैं कि पाकिस्तान में हिन्दुओं पर जो अत्याचार किए गए उसी के कारण उनको पाक से भारत आना पड़ा। हमें गर्व है हमारे पुर्वजों पर जिन्होंने हमें कभी मुसलमानों से नफरत करने की सीख नहीं दी।

हमने जिस दिन से एक ब्लाग में विभाजन का नुकसान मुसलमानों को उठाना पड़ा है, पढ़ा था, तभी से इस मुद्दे पर लिखना चाह रहे थे, पर समय नहीं मिल रहा था। आज सोचा कि चलों इस मुद्दे पर लिखने में विलंब करना ठीक नहीं है। हमें इस मुद्दे पर इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि पाकिस्तान में हमारे पुर्वजों पर भी अत्याचार हुए हैं जिसके बारे में हमने बचपन से सुना है। हमारे पुर्वज बताते थे कि किस तरह से पाकिस्तान में विभाजन के बाद हिन्दुओं पर अत्याचार किए गए और उनको मुस्लिम धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया। हमें जो जानकारी मिली थी उसके मुताबिक हिन्दुओं की बहू-बेटियों के साथ जोर-जबरदस्ती भी की गई। कई हिन्दुओं ने वहां समझौता कर लिया और पाक में रह गए और जिन लोगों ने समझौता नहीं किया वे अपनी सारी जमीन-जायजाद छोड़कर भारत आ गए और वो भी खाली हाथ। यहां पर आने के बाद नए सिरे से मेहनत करके अपना आशियाना बनाया। हमारे पुर्वज भी पाक छोड़कर भारत आए। हमारा जन्म तो भारत में ही हुआ है, पर जन्म से पाक में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार की बातें सुनते रहे हैं।

हम नहीं जानते हैं कि पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार में कितनी सच्चाई है, पर इतना जरूर है कि कोई भी परिवार अपने बच्चों को गलत जानकारी नहीं देता है। हमें इस बात पर गर्व है कि हमारे पुर्वजों ने यह तो जरूर बताया कि किस तरह से हिन्दु परिवारों पर मुसलमानों ने कहर बरपाया था, पर यह कभी नहीं कहा कि इसके बदले में हमें भी उनके साथ ऐसा करना चाहिए। शायद यह अपने हिन्दु धर्म की अच्छाई है जो अत्याचार करने वालों पर भी प्यार लुटाने की बात की जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो भारत में मुसलमानों पर भी ऐसे ही अत्याचार होते। हमें नहीं लगता है कि कभी किसी मुसलमान पर हिन्दु बनने के लिए किसी ने अत्याचार किए होंगे। भारत में ऐसे कई उदाहरण हैं जब मुसलमान देश के सर्वोच्च पदों पर रहे हैं। अपने देश के राष्ट्रपति के पद भी एक मुसलमान अब्दुल कलाम रहे हैं। फिर हम जानना चाहते हैं उन जनाब से कि कैसे विभाजन का नुकसान मुसलमानों को हुआ है। क्या किसी ने मुसलमानों को भारत छोडऩे के लिए मजबूर किया है। मुसलमानों के पास भी अपने देश में वो सारे अधिकार हैं जो एक नागरिक के होने चाहिए। फिर कैसे कहां जाता है कि विभाजन का नुकसान मुसलमानों को हुआ है।

हम पूछते हैं कि क्या किसी के पास इस बात का जवाब है कि क्यों कर हिन्दुओं के साथ पाक में अत्याचार किया गया था? क्यों उनको अपना धर्म छोडऩे के लिए मजबूर किया गया था? क्यों हिन्दुओं की बहू-बेटियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ किया गया था? क्या पाक में रहने वाले हर नागरिक का मुसलमान होना जरूरी है? है किसी के पास इस बातों का जवाब तो जरूर दें।

Read more...

गुरुवार, सितंबर 03, 2009

भजनों से मिला ऐसा मान-पंडित बना गया मुस्लमान

कहते हैं संगत का बहुत असर होता है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि अच्छों की संगत में इंसान की जिंदगी संवर जाती है तो बुरों की संगत में इंसान की जिंदगी नरक बन जाती है। हमने तो भजन गाने वालों की संगत के रंग में रंग कर अपने एक मित्र को मुस्लमान से पंडित बनते देखा है। यहां पर हमारा पंडित का मतलब यह है कि उस युवक ने मंदिरों में भजन करने के कारण अपने साथियों की तरह ही मांसाहार से किनारा कर लिया और पूरी तरह से भजनों में रम गया। आज भी यह युवक शादी के बाद अपने वादे पर कायम है। यह वादा उन्होंने किसी और से नहीं बल्कि अपने आप से किया था। आज जबकि हर तरफ देश में साम्प्रदायिकता का जहर फैलाने का काम किया जा रहा है, ऐसे में हमें यह बात याद आ गई जिसका हम यहां उल्लेख कर रहे हैं। वैसे हम एक बात यह भी कहना चाहते हैं कि अक्सर हिन्दुओं को कमजोर समझने की गलती की जाती है, हिन्दु कमजोर नहीं बल्कि रहम दिल है। लेकिन इस रहम दिली का अगर गलत फायदा उठाया गया तो इसका अंजाम घातक भी हो सकता है।

एक मुस्लमान युवक के पंडित जैसे बनने की बात हमें अचानक याद नहीं आई है। यह बात हम इसलिए यहां बताना चाहते हैं कि हमें ब्लाग जगत में यही लगता है कि यहां पर भी हिन्दु और मुस्लिम का भेद है। कोई हिन्दुओं के देवताओं के साथ हो रहे खिलवाड़ के बारे में लिखता है तो कोई मुस्लमान उस पर आवंछित टिप्पणी कर देता है। जी हां ठीक समझे हम बात कर रहे हैं अनिल पुसदकर जी के लेख की। उनके एक लेख पर सलीम भाई ने जो टिप्पणी की उसके बाद पहली बार अनिल जी ने उनके जवाब में एक पोस्ट लिख दी। वैसे यह बात सब जानते हैं कि अनिल जी प्रति उतर नहीं देते हैं। अनिल जी ने प्रति उदर दिया ठीक किया, पर उनके लेख पर जिस तरह की टिप्पणियां आईं उससे कम से कम हमें तो यह कहीं से नहीं लगा कि वास्तव में आज अपने देश में हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई आपस में हैं भाई-भाई जैसी स्थिति का कुछ भी प्रतिशत बचा है। हमारा ऐसा मानना है कि अगर एक इंसान गलती कर रहा है और वह रोड़ में नंगा खड़े होकर नाच रहा है तो क्या हम भी नंगे हो जाए। फिर उसमें और हममें फर्क क्या रह जाएगा। जिनकी जैसा फितरत है वो तो वैसा ही करेंगे फिर हम क्यों उनकी तरह अपने कपड़े फाडऩे का काम कर रहे हैं।

हमारा ऐसा मानना है कि वास्तव में हमारा हिन्दु धर्म ऐसा है जो सबको प्यार देने का काम करता है। एक नहीं हजारों उदाहरण मिल जाएंगे इसके लिए। कभी हिन्दुओं के मंदिर में किसी को जाने से नहीं रोका जाता है। लेकिन क्या कभी कोई हिन्दु किसी मस्जिद में जा सकता है? हिन्दुओं के सारे तीर्थ सभी धर्मों को मानने वालों के लिए खुले हैं, पर क्या कोई हिन्दु हज करने जा सकता है? उनको तो वहां फटकने भी नहीं दिया जाएगा। अगर कोई मुस्लिम युवक किसी मंदिर में बैठकर भजन गाता है तो उसको कोई नहीं रोकता है, उस युवक को हिन्दु गले लगाने का काम करते हैं।

हमें याद है हमारे एक बचपन के मित्र हैं शौकत अली उनका छोटा भाई शाकिर अली भी हमारा मित्र है। हमने इस युवक को देखा कि कैसे वह संगत में बदला और पूरी तरह से पंडित जैसा बन गया। बात हमारे गृहनगर भाटापारा की है। वहां पर जो लोग शाकिर के घर आते थे, उनमें से कई लोग ऐसे थे जो रोज शाम को एक मंदिर में बैठकर भजन गाते थे। एक दिन शाकिर भी उनके साथ चला गया, इसके बाद उनका मन वहां ऐसा रम की वह रोज वहां जाने लगा। यही नहीं उन्होंने तो अपने दोस्तों की संगत में मांसाहार भी छोड़ दिया। इसके लिए उसे किसी ने बाध्य नहीं किया था, लेकिन उन्होंने सच्चे मन से ऐेसा किया। वह रोज मंदिर में भजन करने के साथ भगवान का टिका लगाकर निकलता था। हम पहले भी बता चुके हैं कि शाकिर का बड़ा भाई जो कि हमारा मित्र है वह भी रोज हमारे साथ मंदिर जाता था और माता का टिका लगाकर हमारे साथ घुमता था। हमने कभी शौकत ने मांसाहार छोडऩे नहीं कहा। वह कभी भजन करने नहीं गया, पर उनका भाई जाता था। आज से करीब दो दशक पहले शाकिर ने जो मांसाहार से नाता तोड़ा है, उसने फिर शादी के बाद भी उससे नाता नहीं जोड़ा। आज भी उनके घर में जब बिरयानी बनती है तो उनके लिए अलग से खाना बनाया जाता है। शाकिर से उनके परिजनों के साथ ससुराल वालों ने भी मांसाहार के लिए कई बार कहा, पर उन्होंने फिर कभी मांसाहार नहीं किया है।

आखिर ये क्या है? यह उनके मन की भावना ही तो है जिसने उनको भगवान में ऐसा रमाया कि वह पंडित की तरह हो गया। भाटापारा छोडऩे के बाद रायपुर में फिर उनको ऐसा कोई साथ नहीं मिला। वह आज भी जब हमसे मिलता है तो पुराने दिनों को याद करता है और कहता है राजु सच में भाटापारा में मंदिर में भजन करने में जो सुख मिलता था वैसा सुख और कहीं नहीं है। यह एक उदाहरण है जो बताता है कि हिन्दु धर्म क्या है।

हमारा धर्म कभी किसी पर थोपा नहीं गया है। मैं भी अनिल जी की एक बात को दोहराना चाहता हूं कि हिन्दु इतना भी कमजोर नहीं कि उनके मंदिरों में कोई गाय के बछड़े का मांस फेंक कर चला जाए तो वह चुप बैठा रहे। अब यह बात अलग है कि अपने राज्य का मीडिया इतना अच्छा है कि वह यह जानता है कि कौन सी खबर को कैसे प्रकाशित करना है। अगर रायपुर के एक मंदिर में फेंके गए गाय के बछड़े के मांस की फोटो छाप दी जाती तो जरूर साम्प्रयादिकता का जहर फैल सकता था, पर ऐसा नहीं किया गया। अखबार वाले जरूर समझदार हैं, इसी के साथ हिन्दु धर्म के मानने वाले भी समझदार हैं जो बिना सोचे समझे किसी पर आरोप नहीं लगते हैं। लेकिन इतना तय है कि अगर ऐसी हरकत करते किसी को देख लिए जाएगा तो उसका हश्र क्या किया जाएगा यह बताने वाली बात नहीं है।

Read more...
Related Posts with Thumbnails

ब्लाग चर्चा

मेरी ब्लॉग सूची

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP