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शुक्रवार, नवंबर 27, 2009

शेख समीर के वंदेमातरम् पर क्या विचार है?

हमारे एक मुसलमान मित्र हैं, शेख समीर। 26-11 को मुबंई हमले की याद में उन्होंने हमें जो एसएमएस भेजा उसका मजमून लिख रहे हैं। इस एसएएस की शुरुआत जहां उन्होंने वंदेमातरम् से की, वहीं अंत जय हिन्द, जय भारत के किया।

वंदेमातरम्

आंसू का कोई रंग नहीं
दर्द की कोई जात नहीं
क्या डराएंगे हमें ये आतंकवादी
जितना खुद कोई ईमान नहीं


इन लाइनों के नीचे लिखा गया है कि मुबंई में 26 नवंबर को हुई घटना में मारे गए आम जनों के साथ पुलिस वालों को सलाम है। अंत में लिखा है

जय हिन्द, जय भारत।

इस एसएमएस ने हमें एक बार फिर से उन मुसलमान मित्रों की याद दिला दी जो वंदेमातरम् को लेकर बिना वजह विवाद खड़ा कर रहे हैं। शेख समीर का यह एसएमएस भी एक जवाब है उन वंदेमातरम् विरोधियों को की चंद विवाद करने वालों को छोड़कर किसी मुसलमान को वंदेमातरम् या जय हिन्द बोलने और लिखने से भी परहेज नहीं है। हो सकता है किसी वंदेमातरम् विरोधी को यह बात झूठ लगे ऐसे लोग हमें अपना मोबाइल नंबर भेजे दें हम उनको वह एसएमएस भेज देंगे जो हमें हमारे मित्र ने भेजा है।

इस बारे में हमारी ब्लाग बिरादरी के मित्र क्या सोचते हैं, उनके विचार आमंत्रित हैं।

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शनिवार, नवंबर 21, 2009

हिन्दु बेटे के अंतिम दीदार के लिए कब्रिस्तान में खोला गया मुस्लिम मां का चेहरा

ब्लाग बिरादरी में इन दिनों हिन्दु और मुसलमानों को लेकर काफी कुछ लिखा जा रहा है। बहुत से लोग साम्प्रदायिकता का जहर फैलाने में लगे हैं। ऐसे में जबकि अनिल पुसदकर जी के ब्लाग में पंचर का किस्सा लिखा गया तो मुझे अचानक अपने एक बचपन के दोस्त शौकत अली के मां के इंतकाम का दिन याद आ गया। उनके इंतकाल में मैं काफी विलंब से पहुंचा था जिसकी वजह से कब्रिस्तान में मुझ हिन्दु बेटे लिए उस मुस्लिम मां का चेहरा सिर्फ मुझे दिखाने के लिए खोला गया था। यहां एक बात और बताना चाहूंगा कि इंसान का नसीब भी न जाने कैसा होता है जो उसको क्या-क्या रंग दिखाता है। एक तरफ मैं अपनी मां के अंतिम दर्शन नहीं कर पाया था तो दूसरी तरफ एक ऐसी मां के अंतिम दर्शन करने का मौका जरूर मिल गया जिसे हमने कभी मां से कम नहीं समझा।

अपने देश में हिन्दु और मुसलमानों के दोस्ती के कई किस्से हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि हिन्दु और मुसलमान में भी भाई से ज्यादा मोहब्बत हो सकती है। कम से कम हम तो इस बात को इसलिए मानते हैं कि हमारे एक मुस्लिम परिवार से अपने घर जैसे रिश्ते बचपन से रहे हैं। हम अपने इन मित्र शौकत अली की दोस्ती का बयान पहले भी कर चुके हैं। जब हम लोग भाटापारा में रहते थे तब हमारे इन मित्र के साथ उनके दो छोटे भाईयों साकिर अली और आसिफ अली से भी हमारी दोस्ती थी। हमारी दोस्ती ऐसी थी कि रोज एक समय का खाना एक-दूसरे के घर में ही खाते थे। जब हमारे इन मित्र का परिवार रायपुर आकर रहने लगा तो कुछ समय बाद हम भी रायपुर आ गए थे। आज हमें रायपुर में रहते दो दशक से ज्यादा समय हो गया है।

बात उन दिनों की है जब हमारे मित्र की मां का अचानक इंतकाल हो गया। हमें खबर मिली की उनकी अंतिम यात्रा सुबह को करीब 11 बजे निकाली जाएगी। ठीक उसी समय हमें प्रेस के काम से जाना था, सो हमें वहां पहुंचने में समय लगा तो हम सीधे कब्रिस्तान पहुंच गए। ऐसे में वहां पर अंतिम संस्कार से पहले पूछा गया कि क्या घर का कोई सदस्य अंतिम दीदार के लिए बचा हुआ है, तो सभी से सिर्फ मेरा नाम लिया कि राजू देर से आया है, इसलिए अंतिम दीदार के लिए चेहरा खोला जाए। मां का चेहरा खोला गया तो हमारी आंखों में आंसू भरे आए। एक तो इसलिए कि हमें अपनी मां के अंतिम दर्शन का मौका नहीं मिला था। जब हमारी मां का निधन हुआ था तब हम जगदलपुर गए थे रिपोर्टिंग करने के लिए। जब तक हम अपने घर भाटापारा पहुंचते मौसम खराब होने के कारण हमारी मां का अंतिम संस्कार किया जा चुका था, हमें आज भी इस बात का अफसोस है कि हम अपनी मां के अंतिम दर्शन नहीं कर पाए थे। ऐसे में अपने दोस्त की मां के अंतिम दर्शन करके हमारी आंखे भर आईं थीं।

दूसरी बात यह कि हमें उस समय यह सोच कर खुशी भी हुई कि चलो यार जिस बचपन के दोस्त को अपने भाई जैसा माना उनके परिवार ने भी मुझे इतना सम्मान दिया कि घर का सदस्य समझकर मां के अंतिम दीदार के लिए उनका चेहरा खोला गया। वरना यह कताई जरूरी नहीं था क्योंकि उनके परिवार के हर व्यक्ति ने शव यात्रा से पहले ही उनके अंतिम दर्शन कर लिए थे। लेकिन नहीं सब जानते थे कि हमारा उन घर से कैसा रिश्ता है और कभी उस घर ने हमें अपने बेटे से कम नहीं समझा। ऐसे में भला कैसे हमें उन मां के अंतिम दर्शन से महरूम रखा जाता जिस मां के साय में हमारे दोस्त के साथ हमारा भी बचपन से लेकर जवानी तक का सफर गुजरा था।

ये एक सच्चाई है कि दिलों में प्यार हो तो कोई धर्म और मजहब की दीवार किसी को रोक नहीं सकती है। कोई भी धर्म और मजहब एक-दूसरे का मजाक उड़ाने का रास्ता नहीं बताते हंै फिर न जाने क्यों इन दिनों लोग धर्म के साथ खिलवाड़ करने का काम कर रहे हैं। इसका बंद होना जरूरी है। किसी के धर्म को छोटा दिखाने से कोई धर्म छोटा नहीं हो जाता है। जिस इंसान की मानसिकता छोटी होती है, वही ऐसी हरकतें करते हैं। ऐसी हरकतों पर विराम लगाते हुए आपस में भाई-चारे से रहना चाहिए। अपना देश ही विश्व में एक ऐसा देश है जहां पर हर जाति और धर्म के लोगों को समान रूप से रहने का और अपने धर्म को मानने का अधिकार है, फिर क्यों कर लोग दूसरे के धर्म में टांग अड़ाने का काम करते हैं। आप अपने धर्म का बखान करें आपको किसने रोका है, लेकिन यह बखान किसे दूसरे धर्म को नीचा दिखाते हुए करना सरासर गलत है।

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मंगलवार, सितंबर 15, 2009

पाक में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार का जवाब है किसी के पास

कुछ समय पहले हमने एक ब्लाग में एक लेख पढ़ा था जिसमें लिखा गया था कि भारत-पाक के विभाजन का नुकसान तो मुसलमानों को उठाना पड़ा है। यह बात कम से कम हमारे गले तो उतरने वाली नहीं है। कारण यह कि हमने बचपन से यही सुना है कि पाकिस्तान में जितना अत्याचार हिन्दुओं पर किया गया वैसा अत्याचार कभी भारत में मुसलमानों पर नहीं हुआ है। अगर किसी मुसलमान पर हिन्दुओं ने अत्याचार किया है, तो कोई बताएं। हम यहां बताना चाहेंगे कि हमें हमारे पुर्वज बचपन से बताते रहे हैं कि पाकिस्तान में हिन्दुओं पर जो अत्याचार किए गए उसी के कारण उनको पाक से भारत आना पड़ा। हमें गर्व है हमारे पुर्वजों पर जिन्होंने हमें कभी मुसलमानों से नफरत करने की सीख नहीं दी।

हमने जिस दिन से एक ब्लाग में विभाजन का नुकसान मुसलमानों को उठाना पड़ा है, पढ़ा था, तभी से इस मुद्दे पर लिखना चाह रहे थे, पर समय नहीं मिल रहा था। आज सोचा कि चलों इस मुद्दे पर लिखने में विलंब करना ठीक नहीं है। हमें इस मुद्दे पर इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि पाकिस्तान में हमारे पुर्वजों पर भी अत्याचार हुए हैं जिसके बारे में हमने बचपन से सुना है। हमारे पुर्वज बताते थे कि किस तरह से पाकिस्तान में विभाजन के बाद हिन्दुओं पर अत्याचार किए गए और उनको मुस्लिम धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया। हमें जो जानकारी मिली थी उसके मुताबिक हिन्दुओं की बहू-बेटियों के साथ जोर-जबरदस्ती भी की गई। कई हिन्दुओं ने वहां समझौता कर लिया और पाक में रह गए और जिन लोगों ने समझौता नहीं किया वे अपनी सारी जमीन-जायजाद छोड़कर भारत आ गए और वो भी खाली हाथ। यहां पर आने के बाद नए सिरे से मेहनत करके अपना आशियाना बनाया। हमारे पुर्वज भी पाक छोड़कर भारत आए। हमारा जन्म तो भारत में ही हुआ है, पर जन्म से पाक में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार की बातें सुनते रहे हैं।

हम नहीं जानते हैं कि पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार में कितनी सच्चाई है, पर इतना जरूर है कि कोई भी परिवार अपने बच्चों को गलत जानकारी नहीं देता है। हमें इस बात पर गर्व है कि हमारे पुर्वजों ने यह तो जरूर बताया कि किस तरह से हिन्दु परिवारों पर मुसलमानों ने कहर बरपाया था, पर यह कभी नहीं कहा कि इसके बदले में हमें भी उनके साथ ऐसा करना चाहिए। शायद यह अपने हिन्दु धर्म की अच्छाई है जो अत्याचार करने वालों पर भी प्यार लुटाने की बात की जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो भारत में मुसलमानों पर भी ऐसे ही अत्याचार होते। हमें नहीं लगता है कि कभी किसी मुसलमान पर हिन्दु बनने के लिए किसी ने अत्याचार किए होंगे। भारत में ऐसे कई उदाहरण हैं जब मुसलमान देश के सर्वोच्च पदों पर रहे हैं। अपने देश के राष्ट्रपति के पद भी एक मुसलमान अब्दुल कलाम रहे हैं। फिर हम जानना चाहते हैं उन जनाब से कि कैसे विभाजन का नुकसान मुसलमानों को हुआ है। क्या किसी ने मुसलमानों को भारत छोडऩे के लिए मजबूर किया है। मुसलमानों के पास भी अपने देश में वो सारे अधिकार हैं जो एक नागरिक के होने चाहिए। फिर कैसे कहां जाता है कि विभाजन का नुकसान मुसलमानों को हुआ है।

हम पूछते हैं कि क्या किसी के पास इस बात का जवाब है कि क्यों कर हिन्दुओं के साथ पाक में अत्याचार किया गया था? क्यों उनको अपना धर्म छोडऩे के लिए मजबूर किया गया था? क्यों हिन्दुओं की बहू-बेटियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ किया गया था? क्या पाक में रहने वाले हर नागरिक का मुसलमान होना जरूरी है? है किसी के पास इस बातों का जवाब तो जरूर दें।

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