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रविवार, जुलाई 17, 2011

एसपीओ नक्सली बन गए तो क्या होगा?

छत्तीसगढ़ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हजारों एसपीओ की जान आफत में फंसी गई है। इन एसपीओ पर मौत का खतरा मंडरा रहा है कहा जाए तो गलत नहीं होगा। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ जहां केन्द्र सरकार अपील करने के पक्ष में है, वहीं कांग्रेस के बड़बोले महासचिव दिग्विजय सिंह इस पक्ष में नहीं हैं। दिग्गी राजा सहित सभी को यह सोचना चाहिए कि जो एसपीओ नक्सलियों के खिलाफ खड़े थे, वहीं अगर मौत के डर से नक्सली बन गए तो क्या होगा?
बस्तर के हजारों एसपीओ सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद सीधी तरह से मौत के दरवाजे पर पहुंच गए हैं कहा जाए तो गलत नहीं होगा। छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार को जरूर इनसे सहानुभूति है और सरकार एसपीओ को पुलिस में लेने की प्रक्रिया पर भी अमल कर रही है, लेकिन यहां सोचने वाली बात यह है कि क्या सरकार सभी एसपीओ को पुलिस में भर्ती कर पाएगी। ऐसा संभव नहीं लगता है। सरकार का प्रयास है तो सराहनीय, लेकिन जब तक सरकार का प्रयास सफल होगा, तब तक इन एसपीओ का क्या होगा? एसपीओ तो आज की तारीख में नक्सलियों के सबसे बड़े दुश्मन हैं। इनके हथियार मुक्त होने के बाद अब नक्सलियों के लिए इनको मौत के घाट उतारना आसान हो गया है। ऐसे में जबकि एसपीओ के सामने मौत खड़ी है तो अगर वे इस मौत के डर से नक्सली बनने तैयार हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा।
इतना तय है कि अगर एसपीओ नक्सली बन जाते हैं तो नक्सल समस्या और ज्यादा विकराल हो जाएगी। एसपीओ के पास भी पुलिस विभाग की बहुत सारी जानकारियां हैं। अगर ये जानकारियां नक्सलियों को मिल गईं तो पुलिस वालों के लिए भी खतरा बढ़ जाएगा। वैसे तो पहले से ही नक्सलियों के लोग पुलिस में शामिल हैं, ऊपर से एसपीओ उनके साथ हो गए तो यह आसानी से समझा जा सकता है कि पुलिस वालों का क्या होगा। बस्तर में अगर नक्सली पुलिस वालों की मार-काट मचा दें तो आश्चर्य नहीं होगा।
वास्तव में यह सोचने वाली बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला देने से पहले एक बार भी नहीं सोचा कि उसके फैसले से कितने गंभीर परिणाम हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट को कम से कम फैसला देने से पहले राज्य सरकार को मौका देना था कि वह एसपीओ के लिए कुछ व्यवस्था कर दे।

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रविवार, जून 14, 2009

हत्या को दो प्यार का नाम-बच जाएगा होने से काम तमाम

अपने देश की सबसे बड़ी न्यायिक अदालत सुप्रीम कोर्ट ऐसे-ऐसे फैसले सुना देती है जिन पर यकीन नहीं होता है कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट का हो सकता है। एक मामले में आए फैसले पर गौर करने से समझ में नहीं आता है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट इस फैसले से क्या साबित करना चाहता है। इस फैसले से तो लगता है अपराध कम होने की बजाए बढऩे लगेंगे। एक फैसले में सुप्रीम ने फैसला किया है कि प्यार के जुनून में की गई हत्या के लिए फांसी की सजा नहीं दी जा सकती है। इस फैसले के बाद अगर लोग हत्या को प्यार का नाम देने लगे या फिर अपनी प्रेमी या प्रेमिका की बेदर्दी से हत्या करने के मामले बढ़ जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा। वैसे भी अपने देश में प्यार के जुनून में हत्याएं कुछ ज्यादा ही होती हैं । ऐसे में ऐसे हत्यारों को जिनको वास्तव में फांसी की सजा मिलनी चाहिए उनको इस सजा से बचाने का काम सुप्रीम कोर्ट ने किया है।

भारतीय संविधान में हत्या को सबसे बड़ा अपराध माना जाता है। इसके लिए फांसी की सजा का भी प्रावधान है। पर कई बार अपने देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट के फैसले चौंकाने वाले होते हैं। अब पंजाब सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए इस फैसले पर नजर डालें तो मालूम होता है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्यायसंगत नहीं है। दो आरोपियों ने अपनी सामूहिक रखैल के साथ मिलकर उसके पति और बेटे के साथ चार लोगों की बड़ी बेदर्दी से हत्या कर दी। ऐसे में इन आरोपियों को पंजाब सरकार फांसी की सजा दिलवाना चाहती है। पंजाब सरकार की एक याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आरोपियों ने अपनी रखैल के बहकावे में आकर ऐसा अपराध किया है इसलिए उनको फांसी की सजा देना उपयुक्त नहीं है। अब सोचने वाली बात यह है कि क्या किसी के बहकावे में आकर अपराध करने से अपराध कम हो जाता है। हत्या तो हत्या है ऐसे में कैसे यह माना जाए कि वे आरोपी फांसी की सजा के हकदार नहीं है। माना कि अपने देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले से कोई इंकार नहीं कर सकता है, लेकिन यह एक बहस का मुद्दा तो जरूर है कि कैसे किसी को इस बात की छूट दी सकती है कि वह अपराध करें और महज इसलिए उसके अपराध को कम करके आंका जाए कि उसने यह अपराध किसी के बहकावे में आकर किया था।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद तो लगता है कि अपराध करने वालों के लिए एक नया ही रास्ता खुल जाएगा। हत्या जैसा अपराध करने वाले यह साबित करने की कोशिश करने लगेंगे कि उन्होंने यह अपराध किसी के बहकावे में आकर किया है। इस फैसले के बाद तो उन प्यार में अंधे जुनूनी लोगों की लाटरी ही लग जाएगी जो एकतरफा प्यार करते हैं और इस प्यार के जुनून में अक्सर हत्या जैसा अपराध कर बैठते हैं। इसी के साथ शक की आग में जलने वाले भी अब हत्या करने से पीछे नहीं हटेंगे। वैसे भी शक के कारण होने वाली हत्याओं का ग्राफ भी कम नहीं है। अब कोई शक में हत्या कर बैठे और कहा जाए कि उसने तो प्यार के जुनून में हत्या की है तो यह बात तो गलत ही होगी। प्यार करने वाले हत्या नहीं करते हैं। हत्या करने वाले कभी किसी को प्यार कर ही नहीं सकते हैं। हत्या तो हमेशा नफरत की परिणीति का परिणाम होता है। पहले कम से कम इस बात का डर तो रहता था कि हत्या करने के बाद संभवत: उनकी भी जान जा सकती है और उनको फांसी हो सकती है, पर फांसी की सजा से बचाने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तो लगता है प्यार में दीवाने लोगों को हत्या करने से डर नहीं लगेगा। ऐसा हुआ तो अपराध का ग्राफ कम होने की बजाए बढ़ जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो जरूर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर एक प्रश्नचिन्ह लग जाएगा।

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शुक्रवार, मई 22, 2009

चारो धाम घरवाली है...

" सासु तीरथ॥ससुरा तीरथ.. तीरथ साला-साली हैं, दुनिया के सब तीरथ झूठे चारो धाम घरवाली है..." लगता है अब इस गाने को सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है और सलाह दे डाली है कि घरवाली की बात मानो... नहीं तो भुगतो। इसमें कोई दो मत नहीं है दुनिया के बड़े-बड़े गुंड़े-मवाली भी अगर किसी से डरते हैं तो वो बीबी ही होती है। एक बार खबर आई थी अंडर वल्र्ड डॉन दाउद इब्राहीम भी अपनी बीबी को देखकर कांपते हैं। अब अगर सुप्रीम कोर्ट यह बात कह रहा है तो क्या गलत है। लगता है सुप्रीम कोर्ट में फैसला सुनाने वाले जज महोदय भी भुक्तभोगी रहे हैं तभी तो उन्होंने अपने फैसले में लिखा है कि हम सब इसके भुक्तभोगी हैं।


महिलाओं को कहने के लिए भले अबला नारी कहा जाता है, लेकिन जब संविधान की बात आती है तो नारी ही इसमें सबसे ज्यादा सबला नजर आतीं है। अब सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले के बाद भी यह बात साबित हो गई है कि भईया कुछ भी हो जाए किसी महिला खासकर अपनी पत्नी से तो पंगा लेना भी मत। अगर पंगा लिया तो वह महंगा ही पड़ेगा। कोर्ट का भी ऐसा मानना है कि घरवाली जो बोलती है उनको चुप-चाप मानने में ही भलाई है। अब उस बोलने बताने में गलत-सही की पहचान करने का अधिकार भी आपका नहीं है। अगर कुछ गलती निकालने की कोशिश की तो समझो आपकी शामत आ जाएगी। अब तक तो हमारे विचार से पुरुषों को लगता था कि अगर उनके साथ अन्याय होता है और उनको अपनी घरवाली से प्रताडऩा मिलती है तो कम से कम कोर्ट का दरवाजा तो खटखटा ही सकते हैं पर अब तो यह दरवाजा भी बंद ही हो गया समझो। ऐसे में अब आपके पास जब कोई रास्ता बचा ही नहीं है तो घरवाली को ही अपने काका राजेश खन्ना की तरह चारो धाम मानने में क्या बुराई है। वैसे काका ने एक फिल्म के गाने में पत्नी को चारो धाम बताया है। अब उन्होंने ऐसा बताया है तो उस गाने को लिखने वाले कवि महोदय ने भी कुछ सोचकर ही ऐसा गाना लिखा होगा। अब यह तो हम नहीं जानते हैं कि वे कवि महोदय भी अपने सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह भुक्तभोगी रहे हैं या नहीं, लेकिन उनके गाना लिखने से जरूर लगता है कि वे भी कहीं न कहीं तो चोट खाए हुए होंगे ही। वैसे भी कवियों को जब तक चोट नहीं लगता है वो कहां अच्छा लिख पाते हैं।

सवाल सिर्फ जज और कवि का नहीं है, यहां सवाल हर आदमी का है। अगर देखा जाए तो कम से कम भारत में तो आधे से ज्यादा आदमी घरवाली की बातें मानते हैं। बातें नहीं मानते हैं

यहां एक बात और यह है कि जहां तक हमारा मानना है कि जो इंसान कुछ गलत करता है वहीं अपनी पत्नी से खौफ खाता है, जो इंसान कुछ गलत नहीं करता है उसको खौफ खाने की जरूरत इसलिए नहीं होती है क्योंकि उनकी पत्नी भी इस बात को जानती है कि उनके पति अच्छे हैं तो फिर वो ऐसा कुछ करती ही नहीं हंै जिससे उनके पति को खौफ का सामना करना पड़े। कहने का मतलब यह है कि अगर आप में कोई ऐब नहीं है तो आपको न तो घरवाली से डरने की जरूरत है और न ही आपको घरवाली डराने का काम करेगी। ऐसे लोगों का परिवार ही तो हैप्पी फेमिली होता है।

तो उनसे खौफ तो जरूर खाते हैं। जिस इंसान के खौफ से पूरी दुनिया कांपती हो वो इंसान भी अगर अपनी घरवाली से खौफ खाने वाला हो तो फिर बाकी की बिसात ही क्या है। हम यहां पर बात करें रहे हैं अंडर वल्र्ड डॉन दाउद इब्राहीम की। उनके बारे में एक बार खुलासा हुआ था जब भी अपनी किसी महिला मित्र के साथ रहते थे और उनको उनके गुर्गे बताते थे कि भाभीजी आ रही हैं तो उनकी हालत पतली हो जाती थी। अगर हर आदमी के मन को सही तरीके से टटोल कर देखा जाए तो उसमें से यही बात सामने आएगी कि हर आदमी अपनी घरवाली से खौफ तो खाता है, अब यह बात अलग है कि कोई इसको स्वीकार कर लेता है कोई नहीं करता है। यहां एक बात और यह है कि जहां तक हमारा मानना है कि जो इंसान कुछ गलत करता है वहीं अपनी पत्नी से खौफ खाता है, जो इंसान कुछ गलत नहीं करता है उसको खौफ खाने की जरूरत इसलिए नहीं होती है क्योंकि उनकी पत्नी भी इस बात को जानती है कि उनके पति अच्छे हैं तो फिर वो ऐसा कुछ करती ही नहीं हैं जिससे उनके पति को खौफ का सामना करना पड़े। कहने का मतलब यह है कि अगर आप में कोई ऐब नहीं है तो आपको न तो घरवाली से डरने की जरूरत है और न ही आपको घरवाली डराने का काम करेगी। ऐसे लोगों का परिवार ही तो हैप्पी फेमिली होता है।

बहरहाल कुछ दिनों पहले की ही बात है हम लोग प्रेस क्लब में बैठे थे और चर्चा निकल पड़ी की कौन अपनी घरवाली से डरता है। हमारे एक मित्र ने बताया कि एक दिन वे अपने एक दोस्त को अपने कुछ दोस्तो के साथ लेने के लिए रात को 10 बजे गए थे तो उनकी पत्नी ने पूछा कि कब वापस आओगे। अब जनाब की हालत खराब थी कि दोस्तों के सामने क्या जवाब दें। उनको अपनी प्रतिष्ठा पर आंच आती नजर आ रही थी। ऐसे में जनाब ने यह फार्मूला निकाला कि कार में बैठते-बैठते अपनी पत्नी की तरफ देखे बिना ही बोले कल आऊंगा, कल। उनका ऐसा बोलना था कि उनके एक मित्र ने कहा कि अबे इधर नहीं भाभी की तरफ देखकर बोल न। ऐसे और कई उदाहरण हैं। एक मित्र ने बताया कि एक दोस्त थोड़ी सी पी लेते हैं तो फिर घर जाने से डरते हैं। जब तक उनकी उतर नहीं जाती है इधर-उधर भटकते रहते हैं। जब उनको लगता है कि अब उनके मुंह से महक नहीं आएगी तब पान-गुटखा खाकर घर पहुंचते हैं। लेकिन तब भी बात नहीं बनती है पत्नी तो पत्नी है ताड़ जाती हैं कि जनाब पीकर आए हैं। अगर कोई इंसान इस मुगालते में रहता है कि वह पीकर घर जाएगा या फिर कुछ गलत करेगा और उनकी घरवाली को मालूम नहीं होगा तो वह इंसान बेवकूफ है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि पत्नियों का सिक्ससेंस बहुत ज्यादा तगड़ा होता है और उनको अपनी पति की कारगुजारियों का सिक्ससेंस से भान हो जाता है तो जनाब इस बात को हमेशा ध्यान रखे और साथ ही सुप्रीम कोर्ट से उस फैसले को भी जिसमें पत्नी की हर बात को मानने की सलाह दी गई है। अगर आप ऐसा करते हैं तो फिर आपका जीवन सुखी रहेगा। अब आप घरवाली को चारो धाम मान ही लें इसमें भलाई है, वरना आपकी भी बज जाएगी बैंड....।

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