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शुक्रवार, नवंबर 25, 2011

एक तमाचा तो नाकाफी है

एक थप्पड़ दिल्ली में ऐसा पड़ा कि अब इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई पड़ रही है। सुनाई पड़नी भी चाहिए। आखिर यह आम आदमी का थप्पड़ है, इसकी गूंज तो दूर तलक जानी ही चाहिए। कहते हैं कि जब आम आदमी तस्त्र होकर आप खोता है तो ऐसा ही होता है। आखिर कब तक आम जनों को ये नेता बेवकूफ बनाते रहेंगे और कीड़े-मकोड़े सम­ाते रहेंगे। अन्ना हजारे का बयान वाकई गौर करने लायक है कि क्या एक ही मारा। वास्तव में महंगाई को देखते हुए यह एक तमाचा तो नाकाफी लगता है।
इसमें कोई दो मत नहीं है कि आज देश का हर आमजन महंगाई की मार से इस तरह मर रहा है कि उनको कुछ सु­झता नहीं है। ऐसे में जबकि कुछ सम­झ नहीं आता है तो इंसान वही करता है जो उसे सही लगता है। और संभवत: उस आम आदमी हरविंदर सिंह ने भी वही किया जो उनको ठीक लगा। भले कानून के ज्ञाता लाख यह कहें कि कानून को हाथ में लेना ठीक नहीं है। लेकिन क्या कानून महज आम जनों के लिए बना है? क्या अपने देश के नेता और मंत्री कानून से बड़े हैं? क्यों कर आम जनों के खून पसीने की कमाई पर भ्रष्टाचार करके ये नेता मौज करते हैं। क्या भ्रष्टाचार करने वाले नेताओं के लिए कोई कानून नहीं है? हर नेता भ्रष्टाचार करके बच जाता है।
अब अपने देश के राजनेताओं को सम­झ लेना चाहिए कि आम आदमी जाग गया है, अब अगर ये नेता नहीं सुधरे तो हर दिन इनकों सड़कों पर पिटते रहने की नौबत आने वाली है। कौन कहता है कि महंगाई पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता है। हकीकत तो यह है कि सरकार की मानसकिता ही नहीं है देश में महंगाई कम करने की। एक छोटा सा उदाहरण यह है कि आज पेट्रोल की कीमत लगातार बढ़ाई जा रही है। कीमत बढ़ रही है, वह तो ठीक है, लेकिन सरकार क्यों कर इस पर लगने वाले टैक्स को समाप्त  करने का काम नहीं करती है। एक इसी काम से महंगाई पर अंकुश लग जाएगा। जब पेट्रोल-डीजल पर टैक्स ही नहीं होगा तो यह इतना सस्ता हो जाएगा जिसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता है। आज पेट्रोल और डीजल की कीमत का दोगुना टैक्स लगता है। टैक्स हटा दिया जाए तो महंगाई हो जाएगी न समाप्त।
पेट्रोल और डीजल की बढ़ी कीमतों की मांग ही आम जनों के खाने की वस्तुओं पर पड़ती है। माल भाड़ा बढ़ता है और महंगाई बेलगाम हो जाती है। जब महंगाई अपने देश में बेलगाम है तो एक आम इंसान बेलगाम होकर मंत्री का गाल लाल कर देता है तो क्या यह गलत है। एक आम आदमी के नजरिए से तो यह कताई गलत नहीं है।
थप्पड़ पर अन्ना हजारे के बयान पर विवाद खड़ा करने का भी प्रयास किया गया। उनका कहना गलत नहीं था, बस एक मारा। वास्तव में महंगाई की मार में जिस तरह से आम इंसान पिस रहा है, उस हिसाब से तो एक तमाचा नाकाफी है। 

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बुधवार, अगस्त 31, 2011

चमचों से मुक्ति दिलाने वाला अन्ना कौन

भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए तो अपने अन्ना हजारे ने अनशन करके एक रास्ता दिखा दिया है। अब यह बात अलग है कि देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल पाती है या नहीं। जितना अपने देश को खोखला करने का काम भ्रष्टाचार ने किया है, उतना ही चमचों ने भी किया है कहा जाए तो गलत नहीं होगा। आज का जमाना पूरी तरह से चमचों का है। बिना चमचागिरी के कोई काम नहीं होता है। चमचागिरी करने वाले आज पास हैं बाकी सब फेल हैं।
हम सोचते हैं कि क्या कभी वह दिन भी आएगा जब अपने देश को चमचों से मुक्ति दिलाने के लिए कोई अन्ना सामने आकर अनशन करेगा। लगता तो नहीं है कि ऐसा कभी हो सकता है, लेकिन सोचने में क्या जाता है। सोचने के लिए पैसे तो लगते नहीं हैं। कम से कम इसी बहाने चमचों की शान में हम भी कुछ कसीदें लिखने में सफल हो जाएंगे। इसमें कोई दो मत नहीं है कि जितना बड़ा योगदान इस देश को खोखला में नेताओं का है, उतना ही चमचों का भी है। आज राजनीति क्या ऐसा कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं है जहां पर चमचों की जमात न हो।   चमचों के बिना तो काम ही नहीं चलता है। आज हर नेता की तरह हर दफ्तर के बॉस चाहते हैं कि उनके ज्यादा से ज्यादा चमचें हों। चमचों के बिना तो बॉस लोगों का खाना हजम ही नहीं होता है। अब खाना हजम कैसे होगा, रोज झूठी तारीफ सुनने की आदत जो पड़ जाती है।
इतना तो तय है कि चमचागिरी करने वाले बॉस की झूठी तारीफ करके अपना काम तो कर लेते हैं। जिनको झूठी तारीफ करने में पीएचडी होती है, वे अपनी इसी तारीफ के दम पर दमदार पद भी हासिल कर लेते हैं। और जब चमचों के हाथ कुर्सी लग जाती है तो फिर देखो उनका रूतबा। ऐसे चमचों को लगता है कि उनसे बड़ा ज्ञानी कोई है ही नहीं। यहां पर एक कवाहत याद आती है कि बंदर के हाथ अस्तूरा लगेगा तो वह किसी को भी काट देगा।
ये अपने देश का दुर्भाग्य है कि आज लोग चमचा पसंद हो गए हैं। हर बॉस अपने चमचों की ही बात सुनते हैं, फिर उनके लिए भले उनको कितने ही अच्छे लोगों की कुर्बानी क्यों न देनी पड़े। अच्छे और समझदार लोगों को बॉस इसलिए पसंद नहीं करते हैं क्योंकि इनसे हमेशा उनको अपनी कुर्सी खतरे में नजर आती है। लेकिन जहां तक चमचों की बात है तो वे जानते हैं कि ये न तो समझदार होते हैं और न ही सच बोलने वाले। दिक्कत तो समझदारों और सच बोलने वालों से होती है।

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सोमवार, अगस्त 22, 2011

भ्रष्टाचार रोकना है तो प्रधानमंत्री का चुनाव भी प्रत्यक्ष हो

आज पूरा देश अन्ना हजारे के साथ भ्रष्टाचार रोको मुहिम पर काम कर रहा है। ऐसे में यह सोचने वाली बात है कि आखिर भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने के क्या अच्छे उपाय हो सकते हैं। ऐसे में हमारा ऐसा मानना है कि देश के प्रधानमंत्री से लेकर हर राज्य के मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री से लेकर राज्य के मंत्रियों के चुनाव प्रत्यक्ष होने चाहिए। जिस दिन देश में ऐसा होने लगेगा भ्रष्टाचार पर एक हद तक अंकुश लग जाएगा। समाप्त होने का दावा तो हम नहीं कर सकते हैं, लेकिन इतना तय है कि प्रत्यक्ष चुनाव होने से अच्छे लोग सामने आएंगे और चुने जाएंगे।
इसमें कोई दो मत नहीं है कि भारत में आजादी के बाद से ही देश की बागडोर जिन प्रधानमंत्री के हाथों में होती है, वे प्रधानमंत्री एक तरह से अपनी पार्टी के हाथों की कठपुतली होते हैं। अपने मनमोहन सिंह तो कुछ ज्यादा ही कठपुतली हैं। ऐसे में जबकि देश के सर्वोच्च पद पर बैठा इंसान दूसरों के इशारे पर चलने वाला होगा तो वह कैसे भ्रष्टाचार या फिर किसी मुद्दे पर कोई कठोर निर्णय ले पाएगा। इसके विपरीत अगर देश की जनता की पसंद का प्रधानमंत्री होगा, जिसे पूरे देश की जनता चुनेगी तो उनकी जनता के प्रति पूरी जवाबदेही होगी, ऐसे में वह जरूर कठोर फैसले लेने में पीछे नहीं हटेंगे।
इसमें संदेह नहीं है कि अगर देश में प्रधानमंत्री का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से होने लगेगा तो देश में अन्ना हजारे जैसे लोगों को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिलेगा। इसी के साथ राज्यों के मुख्यमंत्री और मंत्रियों के चुनाव भी प्रत्यक्ष रूप से होंगे तो उनकी भी जवाबदेही होगी। आज जिस प्रणाली विधानसभा और संसद चलती है उस प्रणाली को बदलने का समय आ गया है। कब तक आखिर हम लोग राजनैतिक पार्टियों के थोपे गए प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को ढोते रहेंगे। कोई अनपढ़, चोर, लूटेरा, डाकू, भ्रष्टाचारी, सकलकर्मी नेता ही नहीं मंत्री भी बन जाता है और उसके आदेशों को मानना जनता की मजबूरी हो जाती है।
कई बार ऐसा होता है कि जिनको शिक्षा मंत्री, कृषि मंत्री या और किसी भी विभाग का मंत्री बनाया जाता है, उसके बारे में उनको कोई जानकारी ही नहीं होती है, ऐसे में ऐसे मंत्रियों से किस तरह से उस विभाग और देश के विकास की उम्मीद की जा सकती है। क्यों नहीं चुनाव लड़ने के लिए भी शैक्षणिक योग्यता तय की जाती है। क्या महज उम्र सीमा ही पर्याप्त योग्यता है। कहने को तो कहा जाता है कि जिन पर आपराधिक प्रकरण हैं, वे चुनाव नहीं लड़ सकते हैं, लेकिन अपने देश में डाकू भी चुनाव लड़े ही नहीं बल्कि जीते भी हैं।
जब तक चुनाव लड़ने के नियमों में संशोधन नहीं किया जाएगा, तब तक इस देश से भ्रष्टाचार का समाप्त होना संभव नहीं लगता है। एक जनलोकपाल बिल ही देश से भ्रष्टाचार को समाप्त कर सकता है, कम से कम हमें तो संभव नहीं लगता है। और बहुत सी ऐसी बातें हैं जो होनी चाहिए, लेकिन एक बार में लिख पाना संभव नहीं है। आगे और लिखेंगे।

फिलहाल मित्रों से भी हम जानना चाहते हैं कि वे क्या सोचते हैं, अपने विचार जरूर बताएं।

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गुरुवार, अप्रैल 14, 2011

अब हजारे से नक्सली समस्या सुलझाने की आश

अन्ना हजारे देश के हीरो नंबर वन हो गए हैं। ऐसे में जबकि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जंग जीतने का काम किया है तो उनसे सबकी उम्मीदें बढ़ गई हैं। अब छत्तीसगढ़ के साथ देश की सबसे बड़ी नक्सल समस्या को सुलझाने में मदद की उम्मीद की जाने लगी है। बस्तर में आदिवासियों की एक सभा में कल स्वामी अग्निवेश ने ये संकेत दिए हैं कि वे नक्सली समस्या पर अन्ना से चर्चा करेंगे। वे एक रिपोर्ट तैयार करने के बाद उनसे इस मुद्दे पर बात करेंगे और संभव हुआ तो अन्ना हजारे को छत्तीसगढ़ भी लाया जाएगा।
अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस जंग का ऐलान किया था, उस जंग के पहले कदम पर उनको मिली जीत के बाद ऐसा समझा जाने लगा है कि अब देश की हर बड़ी समस्या के लिए अन्ना हजारे कुछ न कुछ तो कर सकते हैं। ऐसे में जबकि इस समय छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या अपने विकराल रूप में है तो इस समस्या के समाधान के लिए अन्ना हजारे की तरफ देखने का काम स्वामी अग्निवेश कर रहे हैं। वे भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाई गई अन्ना की मुहिम में उनके साथ थे। अग्निवेश लगातार बस्तर का दौर कर रहे हैं और चाहते हैं कि नक्सल समस्या का कोई न कोई समाधान निकले। उन्होंने अपने बस्तर प्रवास में 13 अप्रैल को बस्तर में ली गई सभा में जहां इस बात का उल्लेख किया कि वे नक्सली समस्या पर अन्ना हजारे से चर्चा करेंगे, वहीं उन्होंने सरकार और नक्सलियों के बीच समझौते की कड़ी बनने की भी बात कहीं। उन्होंने नक्सलियों से कहा कि शांति बहाली के लिए उनको 6 माह से एक साल तक हथियारों से अलग रहना होगा। अगर नक्सली ऐसा करते हैं तो अग्निवेश का कहना है कि सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है।
लगता तो नहीं है कि नक्सली अग्निवेश की बात मानकर हथियार छोड़ने का काम करेंगे। लेकिन इतना जरूर तय लगता है कि अन्ना जरूर अग्निवेश की बात मानकर छत्तीसगढ़ आ सकते हैं। अगर अन्ना के छत्तीसगढ़ आने से नक्सली समस्या का कोई भी हल निकलता है तो इससे बड़ी कोई बात हो नहीं सकती है। नक्सल समस्या से आज छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरा देश परेशान है। अब देखने वाली बात यही होगी कि क्या वास्तव में अन्ना नक्सली समस्या को भी गंभीरता से लेते हैं और इसके लिए कुछ करते हैं।

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शुक्रवार, अप्रैल 08, 2011

अन्ना हजारे के रूप में मिला एक और गांधी

चलो किसी ने तो सही एक बड़ा काम करने की हिम्मत दिखाई है। आज भारत में शायद ही कोई ऐसा होगा जो भ्रष्टाचार से परेशान और व्यथित नहीं होगा। लेकिन इसका क्या किया जाए कि लाख कोशिशों के बाद भी भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ ज्यादा कुछ नहीं हो सका है। लेकिन लगता है कि अब अपने देश को एक और गांधी मिल गए हैं जो देश से भ्रष्टाचार को समाप्त करने की बात ठान चुके हैं। अब हम सभी भारतीयों का यह फर्ज बनाता है कि हम उनका साथ देते हुए देश से भ्रष्टाचार को समाप्त करने की दिशा में काम करें और भारत को फिर से सोने की चिड़िया बनाने में मदद करें।
जी हां हम बात कर रहे हैं अपने 72 साल के जवान अन्ना हजारे जी की। हजारे जी को जवान कहना ज्यादा उपयुक्त होगा, क्योंकि जो काम आज अपने देश की युवा पीढ़ी नहीं कर सकी है, वह काम करने की हिम्मत 72 साल के इन जवान ने की है। वास्तव में हजारे जी की हिम्मत को आज पूरा देश सलाम कर रहा है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि अगर सरकार ने हजारे जी की बात नहीं मानी तो देश में एक ऐसा आंदोलन खड़ा हो जाएगा जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी। आज हजारे जी के साथ सभी जुड़ने लगे हैं। और अब वह दिन भी दूर नजर नहीं आ रहा है जब पूरा देश हजारे जी के साथ खड़ा होगा। और खड़ा भी क्यों न हो। आज देश में ऐसा कौन है जो भ्रष्टाचार से परेशान नहीं है। अपने देश में भ्रष्टाचार चरम पर है कहा जो तो गलत नहीं होगा। अपने देश में एक चपरासी से लेकर मंत्री क्या प्रधानमंत्री तक भ्रष्टाचार में लिप्त रहे हैं। याद करें हम प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। उस समय उनको सूटकेस राव भी कहा जाने लगा था। जिस देश के प्रधानमंत्री पर भी भ्रष्टाचार में शामिल होने का आरोप लगा हो उस देश के बारे में सोचा जा सकता है।
हम ज्यादा दूर न जाकर दिल्ली के कामनवेल्थ में हुए भ्रष्टाचार की बात करें तो इस मामले के बारे में हर कोई यही कहता है कि प्रधानमंत्री  कार्यालय को भरोसे में लिए बिना क्या सुरेश कलमाड़ी के अकेले के बस की बात थी कि वे ऐसा कुछ कर पाते। हमेशा से ऐसा ही होता है कि किसी न किसी को बलि का बकारा बनाया जाता है तो कलमाड़ी भी बलि के बकरे बन गए। इसी के साथ और कुछ बकरों की भी बलि ली गई। लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय पर आंच तक आने नहीं दी गई। अपने देश में जब बी किसी भ्रष्टाचार की बात होती है तो सब जानते हैं कि उस भ्रष्टाचार में एक संतरी से लेकर मंत्री तक का हिस्सा रहता है।
बहरहाल हम बात करें अपने हजारे जी की, वास्तव में उनकी हिम्मत की दाद देते हुए सभी को उनके समर्थन में आगे आना चाहिए। अगर अपने देश से भ्रष्टाचार दूर नहीं हुआ तो यह देश को पूरी तरह से खा जाएगा। वैसे भी भ्रष्टाचार देश को लगातार खा रहा है, लेकिन अपना देश अब तक संभवत: इसलिए बचा हुआ है क्योंकि अपने देश में पैसों की कमी नहीं है। अब यह बात अलग है कि पैसों की कमी का रोना रोते हुए ही देश को बर्बादी के रास्ते पर ले जाने का काम अपने देश के नेता और मंत्री कर रहे हैं। अपने देश को राजनेता ही खा गए हैं कहा जाए तो गलत नहीं होगा। राजनेता बस अपना घर भरने में लगे हैं। इसमें संदेह नहीं है कि देश का इतना ज्यादा पैसा विदेशों में है कि अगर वह काला धन अपने देश में वापस आ जाए तो भारत जैसा देश पूरी दुनिया में कोई और नहीं हो सकता है। काला धन वापस आने पर अपना देश वास्तव में फिर से सोने की चिड़िया बन सकता है। लगता है कि देश को सोने की चिड़िया बनाने की राह दिखाने का काम ही अपने हजारे जी कर रहे हैं। उनको समर्थन देकर हमें अपने देश को फिर से सोने की चिड़ियां बनाने में मदद करनी चाहिए। अपने राज्य की राजधानी रायपुर के साथ पूरे छत्तीसगढ़ में हजारे जी के समर्थन में लोग आगे आने लगे हैं।


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