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सोमवार, अगस्त 22, 2011

आस्था के नाम की मची है लूट

कई दिनों से लगातार एक टीवी चैनल के एक विज्ञापन पर नजरें पड़ती हैं। शिव शक्ति कवच। हर मर्ज की दवा है यह शिव शक्ति कवच। इस कवच को लेने वालों को दिखाया जाता है कि कैसे उनको इस कवच को धारण करने के बाद परेशानियों से मुक्ति मिली है। यह बात तो तय है कि अपने देश में सबसे आसान है तो धर्म और आस्था के नाम पर लूटना। आस्था के नाम पर अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग उल्लू बन जाते हैं।
अपने देश में भगवान पर आस्था रखने वाले अगर सबसे ज्यादा हैं कहा जाए तो गलत नहीं होगा। भगवान पर आस्था रखना गलत नहीं है लेकिन इस आस्था को इतना भी अपने ऊपर हावी होने नहीं देना चाहिए कि इसके नाम से आपको जो चाहे लूट ले। आज अगर अपने देश में सबसे ’यादा किसी नाम से लूट होती है तो वह है आस्था के नाम से। जिस भी टीवी चैनल में देखो लोगों की आस्था का फायदा उठाकर कुछ न कुछ बेचने का कारोबार किया जा रहा है। एक टीवी चैनल पर हमारी हमेशा नजरें पड़ती हैं। जब दोपहर को घर खाना खाने आते हैं, तो बच्चे टीवी देखते रहते हैं। ऐसे में कार्यक्रम के बीच में जरूर एक विज्ञापन शिव शक्ति कवच का देखने को मिल जाता है। इस विज्ञापन को देखकर साफ लगता है कि यह विज्ञापन लोगों को आस्था के नाम से एक तरह से ब्लैकमेल करके अपना कवच का बेचने का माध्यम है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि इस विज्ञापन के जरिए जरूर ऐसा कवच बेचने में कवच बनाने वालों को सफलता मिलती होगी तभी तो वे इतना महंगा विज्ञापन देते हैं।

अब यह कवच खरीदने वालों को कौन समझाएं कि कवच से अगर सुरक्षा हो जाती तो पूरे देश के लोग ऐसे कवच धारण कर लेते। इसमें भी शक नहीं है कि अपने देश में लोग अंध विश्वास में ऐसे जकड़े हैं कि उनको लगता है कि अगर कोई ताबीज या कवच या फिर और कोई टोटका अपने गले में लटका लेंगे तो उनकी परेशानी समाप्त हो जाएगी।

सोचने वाली बात यह है कि क्या पढ़े लिखे लोग यह नहीं जानते हैं कि जब-जब जो होना है वह तो हो के रहेगा। कहा जाता है कि सबसे बड़ी चीज होती है किस्मत, नसीब, तकदीर। कहते हैं कि जिसकी किस्मत में ब्रम्हा ने जो लिख दिया है, वह पत्थर की लकीर है। अगर वास्तव में ऐसा है तो फिर यह क्यों नहीं सोचा जाता है कि जो किस्मत में होगा वहीं होगा  फिर क्यों कोई ऐसा कवच और ताबीज धारण करता है। हमें लगता है कि कहीं न कहीं इंसान के मन में आस्था के साथ एक डर भी रहता है जिस डर का फायदा ऐसा कवच बेचने वाले लोग उठाते हैं। पता नहीं कब अपने देश के लोग अंधविश्वास से मुक्त होंगे और ऐसे कवच बेचने वालों का बहिष्कार करेंगे। हमे नहीं लगता है कि कभी ऐसा संभव होगा।


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सोमवार, जुलाई 25, 2011

आस्था के नाम की मची है लूट

कई दिनों से लगातार एक टीवी चैनल के एक विज्ञापन पर नजरें पड़ती हैं। शिव शक्ति कवच। हर मर्ज की दवा है यह शिव शक्ति कवच। इस कवच को लेने वालों को दिखाया जाता है कि कैसे उनको इस कवच को धारण करने के बाद परेशानियों से मुक्ति मिली है। यह बात तो तय है कि अपने देश में सबसे आसान है तो धर्म और आस्था के नाम पर लूटना। आस्था के नाम पर अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग उल्लू बन जाते हैं।
अपने देश में भगवान पर आस्था रखने वाले अगर सबसे ज्यादा हैं कहा जाए तो गलत नहीं होगा। भगवान पर आस्था रखना गलत नहीं है लेकिन इस आस्था को इतना भी अपने ऊपर हावी होने नहीं देना चाहिए कि इसके नाम से आपको जो चाहे लूट ले। आज अगर अपने देश में सबसे ’यादा किसी नाम से लूट होती है तो वह है आस्था के नाम से। जिस भी टीवी चैनल में देखो लोगों की आस्था का फायदा उठाकर कुछ न कुछ बेचने का कारोबार किया जा रहा है। एक टीवी चैनल पर हमारी हमेशा नजरें पड़ती हैं। जब दोपहर को घर खाना खाने आते हैं, तो बच्चे टीवी देखते रहते हैं। ऐसे में कार्यक्रम के बीच में जरूर एक विज्ञापन शिव शक्ति कवच का देखने को मिल जाता है। इस विज्ञापन को देखकर साफ लगता है कि यह विज्ञापन लोगों को आस्था के नाम से एक तरह से ब्लैकमेल करके अपना कवच का बेचने का माध्यम है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि इस विज्ञापन के जरिए जरूर ऐसा कवच बेचने में कवच बनाने वालों को सफलता मिलती होगी तभी तो वे इतना महंगा विज्ञापन देते हैं।

अब यह कवच खरीदने वालों को कौन समझाएं कि कवच से अगर सुरक्षा हो जाती तो पूरे देश के लोग ऐसे कवच धारण कर लेते। इसमें भी शक नहीं है कि अपने देश में लोग अंध विश्वास में ऐसे जकड़े हैं कि उनको लगता है कि अगर कोई ताबीज या कवच या फिर और कोई टोटका अपने गले में लटका लेंगे तो उनकी परेशानी समाप्त हो जाएगी।

सोचने वाली बात यह है कि क्या पढ़े लिखे लोग यह नहीं जानते हैं कि जब-जब जो होना है वह तो हो के रहेगा। कहा जाता है कि सबसे बड़ी चीज होती है किस्मत, नसीब, तकदीर। कहते हैं कि जिसकी किस्मत में ब्रम्हा ने जो लिख दिया है, वह पत्थर की लकीर है। अगर वास्तव में ऐसा है तो फिर यह क्यों नहीं सोचा जाता है कि जो किस्मत में होगा वहीं होगा  फिर क्यों कोई ऐसा कवच और ताबीज धारण करता है। हमें लगता है कि कहीं न कहीं इंसान के मन में आस्था के साथ एक डर भी रहता है जिस डर का फायदा ऐसा कवच बेचने वाले लोग उठाते हैं। पता नहीं कब अपने देश के लोग अंधविश्वास से मुक्त होंगे और ऐसे कवच बेचने वालों का बहिष्कार करेंगे। हमे नहीं लगता है कि कभी ऐसा संभव होगा।

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सोमवार, मार्च 22, 2010

आस्था के नाम की मची है लूट

कई दिनों से लगातार एक टीवी चैनल के एक विज्ञापन पर नजरें पड़ती हैं। शिव शक्ति कवच। हर मर्ज की दवा है यह शिव शक्ति कवच। इस कवच को लेने वालों को दिखाया जाता है कि कैसे उनको इस कवच को धारण करने के बाद परेशानियों से मुक्ति मिली है। यह बात तो तय है कि अपने देश में सबसे ज्यादा आसान है तो धर्म और आस्था के नाम पर लूटना। आस्था के नाम पर अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग उल्लू बन जाते हैं।

अपने देश में भगवान पर आस्था रखने वाले अगर सबसे ज्यादा हैं कहा जाए तो गलत नहीं होगा। भगवान पर आस्था रखना गलत नहीं है लेकिन इस आस्था को इतना भी अपने ऊपर हावी होने नहीं देना चाहिए कि इसके नाम से आपको जो चाहे लूट ले। आज अगर अपने देश में सबसे ज्यादा किसी नाम से लूट होती है तो वह है आस्था के नाम से। जिस भी टीवी चैनल में देखो लोगों की आस्था का फायदा उठाकर कुछ न कुछ बेचने का कारोबार किया जा रहा है। एक टीवी चैनल पर हमारी हमेशा नजरें पड़ती हैं। जब दोपहर को घर खाना खाने आते हैं, तो बच्चे टीवी देखते रहते हैं। ऐसे में कार्यक्रम के बीच में जरूर एक विज्ञापन शिव शक्ति कवच का देखने को मिल जाता है। इस विज्ञापन को देखकर साफ लगता है कि यह विज्ञापन लोगों को आस्था के नाम से एक तरह से ब्लैकमेल करके अपना कवच का बेचने का माध्यम है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि इस विज्ञापन के जरिए जरूर ऐसा कवच बेचने में कवच बनाने वालों को सफलता मिलती होगी तभी तो वे इतना महंगा विज्ञापन देते हैं।

अब यह कवच खरीदने वालों को कौन समझाएं कि कवच से अगर सुरक्षा हो जाती तो पूरे देश के लोग ऐसे कवच धारण कर लेते। इसमें भी शक नहीं है कि अपने देश में लोग अंध विश्वास में ऐसे जकड़े हैं कि उनको लगता है कि अगर कोई ताबीज या कवच या फिर और कोई टोटका अपने गले में लटका लेंगे तो उनकी परेशानी समाप्त हो जाएगी।
सोचने वाली बात यह है कि क्या पढ़े लिखे लोग यह नहीं जानते हैं कि जब-जब जो होना है वह तो हो के रहेगा। कहा जाता है कि सबसे बड़ी चीज होती है किस्मत, नसीब, तकदीर। कहते हैं कि जिसकी किस्मत में ब्रम्हा ने जो लिख दिया है, वह पत्थर की लकीर है। अगर वास्तव में ऐसा है तो फिर यह क्यों नहीं सोचा जाता है कि जो किस्मत में होगा वहीं होगा  फिर क्यों कोई ऐसा कवच और ताबीज धारण करता है। हमें लगता है कि कहीं न कहीं इंसान के मन में आस्था के साथ एक डर भी रहता है जिस डर का फायदा ऐसा कवच बेचने वाले लोग उठाते हैं। पता नहीं कब अपने देश के लोग अंधविश्वास से मुक्त होंगे और ऐसे कवच बेचने वालों का बहिष्कार करेंगे। हमे नहीं लगता है कि कभी ऐसा संभव होगा। 

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रविवार, सितंबर 20, 2009

बनारसी बाबू-नवरात्रि में रखते थे शराब पर काबू

नवरात्रि का प्रारंभ हो गया है। ऐसे समय में जबकि चारों तरफ देवी माता की धूम मची है, तब हमें बरसों पुराने अपने गांव के एक बनारसी बाबू की याद आ रही है। यह याद इसलिए आ रही है कि यही नवरात्रि का समय रहता था जब वह बनारसी बाबू शराब से दूर रहते थे, वरना वे शराब के बिना एक घंटे भी नहीं रह पाते थे। कहते हैं कि वास्तव में आस्था से ही रास्ता मिलता है। और यह बात हमने बनारसी बाबू में देखी थी जिनको आस्था के कारण ही शराब पर काबू पाने की शक्ति मिलती थी।

हमारा एक गांव है पलारी। रायपुर जिले के इस छोटे से गांव में हमारा बचपन बीता है। हमें आज भी याद है कि हमारी दुकान के सामने एक होटल था। इस होटल के मालिक बनारस के थे और एक बार उनके एक साले वहां आए और उन्होंने उनको वहां पर पान की दुकान खुलवाकर दे दी। बनारस से आने के कारण वे पूरे गांव में बनारसी बाबू के नाम से जाने -जाने लगे। उनमें सबसे बड़ी बुराई यह थी कि वे शराब खूब पीते थे। खूब क्या पीते थे यह कहा जाए कि वे शराब के बिना एक घंटे भी नहीं रह पाते थे। हमें याद है कि वे अल सुबह को करीब पांच बजे तालाब नहाने के लिए जाते तो रास्ते में शराब भट्टी जाते और वहां से शराब की आधी बोतल लेते और उसी से मुंह धोने के बाद बाकी की गटक जाते। यह उनकी रोज की दिनचर्या थी। नहा कर वापस आते समय वे साथ में एक बाटल लेकर आते और दुकान में हर घंटे में थोड़ी-थोड़ी पीते रहते थे।

बनारसी बाबू भले बेभाव की शराब पीते थे, लेकिन कभी उनको किसी ने न तो नशे में देखा और न ही वे किसी से अभ्रदता करते थे। यही वजह थी कि उनका शराब पीना किसी को बुरा नहीं लगता था। बनारसी बाबू की एक अच्छाई का पता तब चला जब गांव में नवरात्रि के समय दुर्गा रखी गई। ऐसे में उन्होंने भी इस कार्यक्रम में शामिल होने की मंशा जाहिर की तो सबको लगा कि यार इस पियक्कड़ को कैसे रखा जा सकता है। संभवत: वे सबके मन की बात जान गए थे, ऐसे में उन्होंने सबको विश्वास दिलाया कि वे वादा करते हैं कि ९ दिन बिलकुल नहीं पीएंगे और देवी माता की सेवा करेंगे। किसी को यकीन तो नहीं था, पर सबने सोचा कि चलो यार एक मौका देकर देखने में क्या है। जब उनको मौका दिया गया तो उन्होंने वाकई में ९ दिनों तक शराब को हाथ भी नहीं लगाया। वरना कहां अगर वे एक घंटे भी शराब नहीं पीते थे तो उनके हाथ-पैर कांपने लगते थे, लेकिन ९ दिनों तक उनमें ऐसी शक्ति रही कि उनको कुछ नहीं हुआ।

नवरात्रि के बाद वे फिर से बेभाव की पीने लगे। उनको यार-दोस्तों ने सलाह दी कि यार जब तुम ९ दिनों तक शराब से दूर रह सकते हो तो बाकी दिनों क्यों नहीं रह सकते हो। उन्होंने बताया कि बाकी दिनों उनका शराब से दूर रहना संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि वे देवी माता को बहुत मानते हैं जिसके कारण उनको इन दिनों में अद्भुत शक्ति मिल जाती है। उन्होंने बताया कि वे कई बार शराब छोडऩे की कोशिश कर चुके हैं, पर सफल नहीं हुए हैं। जहां बनारसी बाबू में एक अच्छी बात यह थी कि ेवे नवरात्रि के समय शराब को हाथ नहीं लगाते थे, वहीं अगर गांव में नवधा रामायण रखा जाता था तब भी वे शराब नहीं पीते थे। यहां भी उनकी एक अद्भुत क्षमता का पता चला था कि उनको पूरा का पूरा रामायण याद था और वे बिना पुस्तक लिए रामायण का पाठ करने बैठते थे। हमने बचपन में उनको कई सालों तक देखा और आज नवरात्रि में अचानक उनकी याद आई तो सोचा चलो इसको अपने ब्लाग बिरादरी के मित्रों के बीच बांटा जाए। आज हमें यह तो नहीं मालूम कि वे बनारसी बाबू कहां हैं। वे इस दुनिया में हैं भी या नहीं हम नहीं जानते, पर उनको हम कभी नहीं भूल सकते हैं।

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मंगलवार, जून 30, 2009

आस्था का सैलाब

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में संत आसाराम बापू के दो दिनों तक चले प्रवचन में आस्था का सैलाब देखने को मिला। बापू को सुनने के लिए हजारों की संख्या में उनके चाहने वाले पूरे राज्य के साथ दूसरे राज्यों के भी आए। मैदान में पैर रखने की भी जगह नहीं थी। बापू के सत्संग का लाभ लेने मुख्यमंत्री डॉ। रमन सिंह के साथ विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक, गृहमंत्री ननकीराम कंवर, संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू भी पहुंचे। उक्त जन प्रतिनिधियों ने बापू से आशीर्वाद लेने के बाद प्रदेश की सुख और समृद्धि के लिए काम करने का वचन भी दिया।



प्रवचन देते हुए बापू ने कहा कि सुख बाहर की चीज नहीं है, वर्तमान का अनादर कर भविष्य के सुख की लालसा करना संभव नहीं। आपका वर्तमान सच्चिदानंद परमात्मा का है। जो भूतकाल की बात करते हैं , वे ईश्वर का अनादर करते हैं । भविष्य में ये मिले, जहां-वहां जाऊंगा, यदि सोचते हैं तो यह भी परमात्मा का अनादर होता है। घर में आए महात्मा को छोड़कर बाहर से आए किसी अन्य का सम्मान करना भी अनादर है। भगवान के साथ संबंध रहेगा तो मनुष्य की जीवन धारा बदल जाएगी। शरीर मरता है आत्मा सनातन है। वर्तमान में कितना बड़ा भी दुख आ जाए उसे भगा सकते हैं यदि परमात्मा की स्मृति कर लें। ईश्वर के स्वभाव और चेतना का तिरस्कार करके वर्तमान का अनादर कर भविष्य के सुख की आशा करना फालतू मन की बदमाशी है। अभी का चेतन ज्ञान स्वरुप है, सनातन स्वरुप है, जो भूतकाल की बात करते हैं वे भी ईश्वर का अनादर करते हैं । सुख बाहर की चीज नहीं है जो अभागा जीवन सोच-सोच कर पक्षतावा करते हैं ऐसे लोग और उनकी सात पीढिय़ां दुख भोगती हैं। जो आपको अच्छा नहीं लगता वो दूसरो को कैसे अच्छा लगेगा, आप चाहते हैं कोई आपको न ठगे तो आप दूसरों को न ठगे ऐसे में अंतरआत्मा अपने गौरव में प्रकटेगा। भक्ति और साधना के कई तरीके होते हैं, गौरव भक्ति और भगवान का संबंध भक्ति। यदि भगवान को साक्षी मानकर भक्ति करते हैं तो राग, द्वेष, निंदा, ईष्र्या खत्म हो जाते हैं। शरीर के मरने से संबंध खत्म नहीं हो जाता, शरीर मरता है आत्मा सनातन है। वर्तमान का संबंध सच्चिदानंद परमात्मा से है जो वर्तमान में है और भविष्य में भी रहेगा। जिसका संबंध भगवान से हो गया उसे दवाओं के सहारे जीवन नहीं जीना पड़ेगा। जिसका जीवन जीवनदाता के साथ जुड़ा है तो वह स्वास्थ्य रहेगा ही। किताबों से ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती, पोथी पढ़-पढ़कर सफलता नहीं हासिल की जा सकती, यदि सत्संग के दिव्य वाणी ग्रहण कर लिया तो भगवान के प्रति प्रेम वैसे ही आ जाएगा। तब पान मसाला, सिगरेट और क्लबों में जीवन नष्ट नहीं करना पड़ेगा।



संत आसाराम बापू ने बताया कि दूसरों के हित की भावना से आत्म संतोष और आत्म तृप्ति होनी चाहिए, उन्होंने इस संबंध में द्रोपदी का प्रसंग भी सुनाया। संबंध में स्वीकार के लिए दोनों तरफ से सहमति की आवश्यकता होती है, अब यदि कोई यह सोचे कि उसे भगवान की सहमति चाहिए तो उन्हें यह जान लेना चाहिए कि भगवान पहले ही बोल चुके हैं और उनसे संबंध जोड़ चुके हैं कि सभी मेरे प्यारे हैं अब आपको तय करना है कि शाश्वत सत्य से संबंध रखना है या संसार के काल्पनिक माया से। उन्होंने कहा कि भविष्य में सुखी रहने की कल्पना कभी नहीं करेंगे, वर्तमान में कितना बड़ा भारी भी दुख आ जाए तो उसे भगा सकते हैं आप केवल इतना पक्का कर लें और आप उसे स्वीकार लें जो आपका परम मित्र है उसकी स्मृति मात्र से ही सारे दुख दूर हो जाएंगे। जीवन दाता से यदि जीवन धारा जुड़ी रहेगी तो ज्ञान का प्रकाश बढ़ेगा।


बापू ने गौरव भक्ति के संबंध में बताया कि हे प्रभु तेरी कैसी लीला है कि गाय और भैंस हरी घास खाकर सफेद दूध देती है, पानी से अंगुर की रस बनती है, अन्न खाने से रक्त-मांसपेशी मजबूत होती है यह गौरव भक्ति है। नित्य-नवीन रस प्रकट होगा, गौरव की स्मृति करके आप भगवान के गौरव से गौरन्वित हो सकते हैं। यदि गौरव भक्ति, भगवान का संबंध भक्ति होगी तो परमार्थ बढिय़ा होगा। भरोसा परमात्मा से करें संबंध परमात्मा से रखे, बहु-बेटे, मित्र, साथी, बेटी से यदि सुख मिलने का भरोसा रखते हैं तो खबरदार हो जाइये। बेटे-बेटियों को पढ़ाइये, लिखाईये ऐसे करके अपना कर्तव्य पूरा की जाए। भरोसा ईश्वर पर करें, वर्तमान ईश्वर स्वरुप आनंद पर करें, यदि स्विस बैंक में करोड़ों रुपये भी जमा हो तो भरोसा न करें। भारत जैसा सात्विक और अपनत्व वाला देश पूरे विश्व में कोई नहीं है। हजार वर्ष की तप से भी वह फल नहीं मिलता जो कि अपनत्व और परमात्मा से संबंध की स्वीकृति और विश्रांति से मिलता है।

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