राजनीति के साथ हर विषय पर लेख पढने को मिलेंगे....

बस्तर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बस्तर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, अप्रैल 23, 2010

भोले-भाले आदिवासी- बस्तर यात्रा -10

बस्तर यात्रा में जब हमने बारसूर से चित्रकूट के बीच 46 किलो मीटर की एक ऐसे रास्ते में यात्रा की जो कि पूरी तरह से नक्सल प्रभावित क्षेत्र है तो आधे रास्ते में हमारी मुलाकात एक मंदिर में एक आदिवासी पुजारी और उनके बच्चे से हुई। वे हम लोगों को उस रास्ते में देखकर बहुत खुश हुए क्योंकि उस रास्ते में प्राय: कोई जाना पसंद नहीं करता है। हम लोग जब मंदिर से सामने पहाड़ी पर बने हवान कुंड के पास जाकर ऊपर से फोटो ली तो पुजारी और उनका बेटा भी आ गया। ऐसे में हमने उनके साथ फोटो खींचवाने में विलंब नहीं किया। जब हम उनके साथ फोटो खींचवा रहे थे तो हमने उनके कंघे पर हाथ रखा तो पुजारी बाबा खुश हो गए और उन्होंने भी हम पकड़कर फोटो खींचवाया। उनका आत्मीयता और भोलापन देखकर हमें बहुत खुशी हुई। हमने उनके साथ वहां पर करीब आधे घंटे का वक्त बिताया और उनसे विदा लेकर अपनी मंजिल की तरफ चल पड़े। इसके पहले उन्होंने हम लोगों को प्रसाद दिया। और हमारी मंगलमय यात्रा के लिए दुआ भी की। संभवत: यह उनकी दुवाओं का ही असर था जो हमारी यात्रा उस नक्सल प्रभावित रास्ते में भी सुखद रही।

Read more...

सोमवार, अप्रैल 12, 2010

बस्तर के सौदर्य को करीब से देखकर आज ही लौटे हैं

काफी समय से घुमने जाने की इच्छा थी। सोचा कि चलो बस्तर की ही सैर कर ली जाए। बस्तर में ऐसा सौदर्य है जिसकी कल्पना करना सहज नहीं है। हमने जिस दिन वहां जाने का कार्यक्रम बनाया उसके ठीक एक दिन पहले नक्सली हमले में 76 जवान शहीद हो गए थे। हमारे कुछ मित्रों ने मना किया कि बस्तर न जाए। पर हमने अपना इरादा नहीं बदला और अपने मित्रों के साथ गए और पांच दिनों तक बस्तर के सौदर्य को करीब से देखा। वहां हमने क्या-क्या देखा इसके बारे में विस्तार से जरूर बताएँगे। हम तो उस रास्ते पर भी गए जिस रास्ते को नक्सलियों का गढ़ माना जाता है। अपनी बस्तर यात्रा में हमने इतनी तस्वीर खींचीं हैं कि हर तस्वीर देखने योग्य है। अब हमें यह तय करना है कि अपने ब्लागर मित्रों और पाठकों के लिए क्या-क्या पेश किया जाए। हमने वहां पर करीब 400 तस्वीरें लीं हैं और हर तस्वीर कुछ न कुछ बोलती है। हमने सोचा कि चलो पहले अपने मित्रों को बता दें कि हम बस्तर से वापस आ गए हैं। वैसे हमने वहां जाने की बात ब्लागर मित्रों को बताई नहीं थी। हमने अपने ब्लाग राजतंत्र में वहां जाने से पहले चार पोस्ट शेड्यूल कर दी थी ताकि कोई भी दिन खाली न रहे। बस आज का ही दिन खाली जा रहा था सो आते ही हमने सोचा कि चलो कुछ लिख दिया जाए। बाकी बातें कल करेंगे। फिलहाल लेते हैं विदा।

Read more...

सोमवार, जून 29, 2009

साहब गांव में नक्सली आएं हैं... तो हम क्या करें बे....

बस्तर के पुलिस कंट्रोल रूम का फोन बजता है... उधर के किसी थाने का एक अदना सा सिपाही जानकारी लेता है कि साहब एक गांव में नक्सली आएं हैं। कंट्रोल रूम में बैठा अधिकारी पलटकर जवाब देता है कि तो हम क्या करें बे। और फोन फटक देता है। ऐसा एक बार नहीं बार-बार हो रहा है और नक्सल प्रभावित थानों के सिपाहियों से अगर पूछा जाए तो उनका यही जवाब मिलेगा कि जब भी किसी नक्सली के बारे में पुलिस कंट्रोल रूम में सूचना देने के लिए फोन करते हैं और फोर्स भेजने की बात करते हैं तो फोन पटक दिया जाता है और कंट्रोल रूम से कोई मदद नहीं मिलती है। ऐसे में थानों को भी या तो चुप बैठना पड़ता है या फिर थाने वाले ज्यादा ईमानदारी दिखाते हुए उस गांव में जाने की गलती करते हैं तो मारे जाते हैं।

पूरे देश में इस समय सबसे ज्यादा नक्सली समस्या का सामना छत्तीसगढ़ के बस्तर को करना पड़ रहा है। यहां पर अगर यह समस्या है तो इसके पीछे कारण भी कई हैं। एक कारण यह है कि यहां के अधिकारियों में इस समस्या से निपटने की इच्छा शक्ति है ही नहीं। एक छोटा है उदाहरण है कि जब भी किसी नक्सल प्रभावित थाने से कंट्रोल रूम में फोन आता है तो कंट्रोल रूम में बैठने वाले अधिकारी उस फोन पर आई सूचना को गंभीरता से लेते ही नहीं है और उल्टे जिस थाने से फोन आता है उस फोन करने वाले बंदे को डांट दिया जाता है। कोई ज्यादा ईमानदारी दिखाने की कोशिश करता है तो उसको जवाब मिलता है कि ... अबे साले जा ना तेरे को मरने का शौक है तो, हमारे तो बीबी-बच्चे हैं, हमें नहीं खानी है नक्सलियों की गोलियां। अब जहां पर कंट्रोल रूम से ऐसे जवाब मिलेंगे तो छोटे से थाने का अमला क्या करेगा? जब किसी थाने को फोर्स की मदद ही नहीं मिलेगी तो वे क्या बिगाड़ लेगे नक्सलियों का? नक्सली यह बात अच्छी तरह से समझ गए हैं कि नक्सल क्षेत्र में काम करने वाली पूरी पुलिस फोर्स नपुंसक हो गई है और उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। ऐसे में उनके हौसले बढ़ते जा रहा है।


इसमें कोई दो मत नहीं है कि नक्सली क्षेत्र की पुलिस नपुंसक हो गई है। इसके पीछे का कारण देखा जाए तो वह यह है कि नक्सली क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों में इतना दम नहीं है कि अपनी पुलिस फोर्स का हौसला बढ़ा सके। हमारे एक मित्र हैं वे काफी समय तक बस्तर में एसपी रहे। उनके जमाने की बात करें तो उन्होंने अपनी फोर्स का हौसला इस तरह से बढ़ाया कि वे नक्सलियों से भिडऩे के लिए खुद चले जाते थे। यही नहीं उन्होंने गांव-गांव में इतना तगड़ा नेटवर्क बना रखा था कि कोई भी सूचना उन तक आ जाती थी। आज भी स्थिति यह है कि वे राजधानी में बैठे हैं लेकिन उनके पास सूचनाएं बस्तर में बैठे हुए अधिकारियों से ज्यादा आती हैं। इधर बस्तर में आज की स्थिति की बात करें तो, काफी लंबा समय हो गया है कि बस्तर की कमान संभालने वाला कोई एएपी नक्सलियों से भिडऩे जाता नहीं है। अब कप्तान खुद ही मांद में छुपकर बैठेगा तो फिर उनके खिलाड़ी कैसे अकेले जाकर जंग जीत सकते हैं। जब तक खिलाडिय़ों को गाईड नहीं किया जाता है कोई मैच जीता नहीं जा सकता है। यही हाल आज बस्तर का है। बस्तर को कोई ऐसा कप्तान ही नहीं मिल रहा है जो मैदान में आकर काम करे। बस कमरे में बैठकर निर्देश दिए जाते हैं कि ऐसा करो-वैसा करो। अब बेचारे टीआई और सिपाही ही मोर्चे पर जाते हैं और मारे जाते है। जब तक बस्तर के आला अधिकारियों में उन एसपी की तरह नक्सलियों को खत्म करने की रूचि नहीं होगी, नक्सल समस्या का कुछ नहीं किया जा सकता है। हर रोज यही होगा कि थानों से फोन आएंगे और कंट्रोल रूम वाले फोन पटक कर सो जाएंगे और उधर नक्सली गांवों अपना नंगा नाच करते रहेंगे।

Read more...

सोमवार, जून 01, 2009

सुबह पानी की बौछार-शाम को दूध की धार

ये दो अद्भूत नजारे हैं बस्तर के जलप्रपात चित्रकूट के। सुबह के समय इसको देखने पर पानी की बौछारों का नजारा होता है। जब इसी को शाम ढ़लने के बाद दुधिया रौशनी में देखते हैं तो ऐसा लगता है मानो दूध की धार बह रही हो। रात को यहां लाइट लगने के बाद अब पर्यटक रात का नजारा देखने आते हैं। हमने इन दोनों चित्रों को अपने कैमरे में तब कैद किया था, जब हम वहां पर जनवरी में गए थे।

Read more...
Related Posts with Thumbnails

ब्लाग चर्चा

मेरी ब्लॉग सूची

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP