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रविवार, फ़रवरी 27, 2011

अब लिखने का मन ही नहीं होता

दो-तीन पहले की बात है अचानक ललित शर्मा का फोन आया और उन्होंने पूछा आज-कल कहां हैं, नजर ही नहीं आ रहे हैं।
हमने कहा- हम तो यहीं हैं कहां जाएँगे।
उन्होंने कहा कि मैं ब्लाग की बात कर रहा हूं।
हमने कहा कि अब क्या बताएं मित्र ब्लाग जगत में इतने ’यादा गंदगी करने वाले आ गए हैं कि अब लिखने का मन ही नहीं होता है।
हम बता दें कि जब हमने ब्लाग जगत में कदम रखा था तो हम बहुत खुश थे, लेकिन धीरे-धीरे यह बात सामने आने लगी कि यहां पर अच्छा करने वालों की टांगे खींचने वाले और गंदगी फैलाने वाले ’यादा हंै। हमने ऐसे में जब किसी भी गुटबाजी से किनारा किया तो हमें ’यादा परेशान किया जाने लगा। ऐसे में हमने सोचा कि यार ये सब हम किसके लिए कर रहे हैं, ब्लाग लिख कर हमें कोई पद्मश्री या राष्ट्रपति पदक तो मिलना नहीं है कि हम लोगों की गंदी बातें सुनकर लिखते रहे। ऐसे में हमने सोच लिया कि यार जब मन होगा लिखेंगे, नहीं होगा तो नहीं लिखेंगे। क्यों कर हम किसी को कुछ भी कहने का मौका दें। वैसे भी ब्लाग निजी संपति होता है इसमें क्या लिखना है, यह ब्लाग स्वामी तय करता है न कि कोई गंदी मानसिकता वाला इंसान तय करेगा कि हमें क्या लिखना है।
बहरहाल पहले ब्लाग का जो जुनून था वह अब समाप्त हो गया है, हमारा लिखने का मन तो नहीं था, फिर सोचा कि यार अगर पूरी तरह से हम हार मान जाएंगे तो यह तो बुजदिली होगी, ऐसे में हम सोच रहे हैं कि जिस दिन लगेगा कि कुछ लिखना है तो जरूर लिखेंगे। हमने अपने ब्लाग में वैसे भी टिप्पणियों का रास्ता पूरी तरह से बंद कर दिया है, हम कभी भी टिप्पणियों के लिए नहीं लिखते हैं। अगर वास्तव में कोई हमारा मित्र अपने विचारों से हम अवगत करवाना चाहता है तो वह जरूर हमारे ब्लाग की सदस्यता लेकर अपने विचार हमें भेजा सकता है। वैसे हमारे बहुत मित्रों के पास हमारा मोबाइल नंबर भी हैं, वे कई बार बात भी करते रहते हैं।

शनिवार, फ़रवरी 26, 2011

तुरतुरिया के जंगलों में साहसिक खेलों का रोमांच

घने जंगल में तीन सौ फीट की खाई के ऊपर पहाड़ी में एक छोर से दूसरे छोर में करीब पांच सौ फीट लंबी दो रस्सीयां लटकी हुई हैं। इन रस्सीयों पर लटक कर एक छोर से दूसरे छोर में जाने का काम लाइन लगाकर जांबाज लड़के और लड़कियां कर रहे हैं। इस रोमांचित करने वाले साहसिक खेल में सभी को रोमांच का अनुभव हो रहा है। किसी को अगर डर लगता है तो प्रशिक्षण देने वाले मुखिया जयंत डेफी उनको साहस दिलाते हुए कहते हैं कि बस थोड़ी की हिम्मत करो और देखो फिर डर के आगे तो जीत ही जीत है। उनकी बातें सुनने के बाद जब कोई पहाड़ी में रस्सी के सहारे छलांग लगा देता है तो उसको जो रोमांच का अनुभव होता है उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है। रस्सी के कुछ साहसिक खेलों के साथ यहां पहाड़ी में चढ़ाई करने वाले ट्रेकिंग का भी आयोजन किया गया। इस आयोजन में प्रदेश के करीब 150 लड़के और लड़कियों ने भाग लिया और पाया कि वास्तव में साहसिक खेलों का अपना अलग ही रोमांच है।
राजधानी से करीब 120 किलो मीेटर दूर बारनवापारा के घने जंगलों से लगा हुआ तुरतुरिया है। यही पर खेल एवं युवा कल्याण विभाग ने 16 से 20 फरवरी तक साहसिक खेलों का एक विशेष प्रशिक्षण शिविर लगाया था। इस शिविर के लिए जहां हर जिले से करीब 10 युवाओं का चयन किया गया था, वहीं इनको प्रशिक्षण देने के लिए पुणे के जयंत डेफी को बुलाया गया था। वे अपने पूरे दल जिसमें संजय श्रीवास्तव, नीलचंद निकम, रवीन्द्र सिंह रावत, सोहरु धुमाल, अजय मोहिते और दत्ता भोईर शामिल हैं के साथ आए थे। इन्होंने प्रदेश के युवाओं को कमांडो ट्रेनिंग, मंकी वाकिंग, वैली क्रासिंग, रोप वे क्रासिंग के  साथ ट्रेकिंग का प्रशिक्षण दिया। इनमें सबसे ज्यादा रोमांचित करने वाला खेल सभी युवाओं को रोप वे  क्रासिंग का लगा। इसी खेल में खाई के करीब 300 फीट ऊपर करीब 500 फीट लंबी रस्सी बांधी गई थी। इसी रस्सी में सबको एक छोर से छोर तक जाना था। इस रस्सी पर लटकर जाने वालों को एक ऐसे बेल्ट से बांधा जाता था जिससे लगता है कि आप एक कुर्सी पर बैठे है। नए लोगों की सुरक्षा के लिए एक अतिरिक्त रस्सी भी बांधी जाती है। यहां पर रस्सी बांधने के लिए टीम को करीब पांच घंटे मेहनत करनी पड़ी थी।
हवा में लटकने का सपना साकार हुआ
नारायणपुर की संतोषी बघेल ने कहा कि उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि मैं भी हवा में लटक सकती हूं। टीवी पर डिस्कवरी चैनल में देखते थे कि कैसे विदेशी ऐसी खाई और नदियों के ऊपर से रस्सी के सहारे उसको पार करने का काम करते हैं और हवा में लटक जाते हैं। मेरा भी सपना था कि कभी ऐसा मौका मिले और अब वह मौका भी मिल गया। एक सवाल के जवाब में वह कहती हैं कि अगर खेल विभाग हम सभी युवाओं को आगे राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे आयोजन में भेजने का काम करता है तो हम सब वहां जरूर जाना चाहेंगे।
धमतरी के लक्ष्मीनारायण ने कहा कि हम यहां आने से पहले भयभीत थे कि आखिर हम क्या करेंगे लेकिन यहां पर जैसे रोमांच का अनुभव मिला है उससे लगता है कि अगर हम लोग डर जाते तो इससे वंचित हो जाते हैं। वे कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में साहसिक खेलों की अपार संभावना है इसको यहां बढ़ाने का काम करना चाहिए। वे कहते हैं कि ऐसा आयोजन बस्तर में होना चाहिए और वहां पर ऐेरो एडवेंचर को भी शामिल करना चाहिए जिसमें पैराग्लाइडिंग जैसा खेल भी शामिल हो।
हेमिता साहू ने कहा कि हम लड़कियां भी यहां पर लड़कों के साथ हर साहसिक खेल में शामिल हो रही हैं। हमको भी सब सीखने का मौका मिल रहा है। हमने कंमाडो ट्रेनिंग, मंकी वाकिंग, रॉक सभी में हिस्सा लिया है।
जशपुर की अनिता भगत ने बताया कि 400 फीट की वैली क्रासिंग रोमांचित करनी वाली है। इसके बारे में उन्होंने बताया कि जब पहाड़ी पर खाई के उपर रस्सी बंधी रहती है तो उसे क्रास करने के लिए हाथों के सहारे आगे बढ़ना पड़ता है। यह ज्यादा रोमांचकारी है। पहली बार आई रजनी वर्मा ने कहा कि उनको यहां आकर नया अनुभव मिला है और अब वह ऐसे आयोजन में बार-बार शामिल होना चाहेगी। यहां पर पांच दिनों में हमें जो अनुभव मिला है उसके बारे में हम अपनी साथियों को भी बताएंगी और अगली बार उनको भी लेकर आएंगी। कवर्धा की इंदू नेताम ने बताया कि इसके पहले वह भौरमदेव में पिछले साल हुए साहसिक खेलों में शामिल हो चुकी हैं, लेकिन वहां से ज्यादा रोमांच यहां मिला है। वहां पर न तो इतना घना जंगल है और न ही इतनी बड़ी पहाडियां हैं।
मिशन जयहिंद
साहसिक खेलों का प्रशिक्षण देने पुणे से आए भारतीय सेना में बरसों काम कर चुके जयंत डेफी का कहना है कि उनका एक ही मिशन है कि देश के युवा पश्चिम संस्कृति त्याग कर गुड मार्निंग के स्थान पर जय हिंद बोले। वे बताते हैं कि उन्होंने जिस भी राज्यों में साहसिक खेलों का प्रशिक्षण दिया है वहां वे युवा अब गुड मार्निंग के स्थान पर जय हिंद ही बोलते हैं। तुरतुरिया के प्रशिक्षण शिविर में भी सभी युवाओं को जय हिंद बोलने की शपथ दिलाई गई। वे कहते हैं   कि हम भारतीय ही अपने देश के बारे में नहीं साचेंगे तो कौन सोचेगा। मेरा मकसद युवाओं में देश प्रेम की भावना पैदा करना है। जिनके दिल में देश प्रेम की भावना होती है, वे चाहे खेल हो या और कोई भी क्षेत्र सभी में वे सफल होते हैं। उन्होंने पूछने पर कहा कि  जब भी छत्तीसगढ़ बुलाया जाएगा मैं जरूर आऊंगा। यहां के लोग बहुत अच्छे हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने यहां के बारे में काफी कुछ सुना था, यही वजह रही है कि मेरी टीम यहां पर बहुत कम पारिश्रमिक में आई है।

गुरुवार, फ़रवरी 17, 2011

वास्तव में कुत्ते की दुम है यह यलो

हमने बड़े-बड़े बेशर्म और घटिया इंसान देखें हैं लेकिन यलो जैसा वाहियात इंसान नहीं देखा। राजतंत्र में आने का तो अब दम नहीं है इसलिए बिना वजह ब्लाग चौपाल में अपने कुत्ते की दुम हिलाने आ जाते हैं। हमारी बहुत चिंता है तो क्यों नहीं अपने नकाब से बाहर आते हैं। हम लिखे न लिखें तुम्हारी सेहत को क्या फर्क पड़ रहा है। क्या गंदगी करने के लिए और कोई जगह नहीं मिल रही है। हमें लग रहा है कि हमें अब ब्लाग चौपाल में भी टिप्पणी का रास्ता बंद करना पड़ेगा ताकि यलो जैसी कुत्ते की दुम को गंदगी करने का मौका न मिल सके। चलो खुश हुए न कुत्ते की दुम की हम आ गए हैं लिखने के लिए। मजबूरी में हमें इतने खराब शब्दों का प्रयोग करना पड़ा है, लेकिन क्या करें कहते हैं न कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते, तो हम भी क्या करें। 

सोमवार, फ़रवरी 14, 2011

भटक जाते हैं कदम-जब साथ न दे हमदम

भटक जाते हैं कदम

जब साथ न दे हमदम

फिर तो रहते हैं

जिंदगी में गम ही गम

गम मिटाने लोग पीते हैं रम

लेकिन गम को मिटाने कहां होता है

रम में भी इतना दम

इसलिए कहते हैं हम

कभी भी प्यार न करो

अपने हमदम से कम

ऐसा न हो कि प्यार कम होने से

निकल जाएं आपके हमदम का दम

जब वादा कि है तो

साथ निभाओ उम्र भर सनम

जन्म-जन्म न सही

ठीक कर लो अपना यही जनम

































रविवार, फ़रवरी 13, 2011

मिस्टर यलो इतने ही सच्चे हो तो अब क्यों नहीं आते

हमारे एक परम आदरणीय और हमें जान से ज्यादा चाहने वाले एक मित्र हैं यलो। इनको हमसे इतनी मोहब्बत है कि ये हमारे हर लेख को पढ़ते हैं और उस पर कुछ न कुछ करामात जरूर करते हैं। ये मित्र अपने को सच्चा मित्र बताते हैं। अब हमने सोचा कि जब ये इतने ही सच्चे हैं और अपनी हकीकत बताने से भी कतरा रहे हैं तो हमने सोचा कि अगर ये वास्तव में सच्चे होंगे तो ब्लाग की सदस्यता लेकर जरूर आएंगे। ऐसे में जब हमने टिप्पणी के लिए सदस्यता लेना अनिवार्य कर दिया तो ये जनाब दुम दबाकर भाग लिए। वैसे ब्लाग तो पढऩे जरूर आते हैं। जब ब्लाग में टिप्पणी का सीधा रास्ता बंद है तो ये हमारे एक चर्चा वाले ब्लाग में पिछले दरवाजे से आने का काम करते हैं।
ब्लाग जगत में पीले, नीले, कालों के कारण ही कई अच्छे लिखने वालों का ब्लाग जगत से मोह भंग हो गया है। सच कहे तो हमारा भी अब मोह भंग हो गया है। हम ब्लाग जगत में आए हैं कुछ अच्छा करने के लिए न की ऐसे पीलों-नीलों की गंदी बातें सुनने के लिए। हम कहते हैं कि आपको अगर हमारा लिखा पसंद नहीं आता है तो आप अपने घर पर रहें क्यों कर हमारे ब्लाग में आते हैं, क्या हमने आपके घर जाकर निमंत्रण दिया है कि आईये और पढि़ए हमारा ब्लाग और करके जाईये गंदगी यहां पर। अपने को सच्चा बताने वाले मिस्टर यलो अगर दम है और आप इतने ही सच्चे हैं तो अब क्यों नहीं आ रहे हैं टिप्पणी करने के लिए। क्या अपनी पहचान सामने आने के डर से हवा निकल गई है। हम किसी भी तरह से असभ्य भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहते थे लेकिन बर्दाश्त करने की सीमा होती है। वैसे हमें यलो जैसे विकृत मानसिकता वाले लोगों की परवाह नहीं है। ये जनाब बार-बार लिखते हैं कि हम कुछ भी लिख कर टिप्पणी पाना चाहते हैं। टिप्पणी पाने का शौक रहता तो हम अपने टिप्पणी के रास्ते बंद नहीं करते। खैर ऐसे लोगों के ज्यादा मुंह लगना अच्छा नहीं होता है। हम इनके बारे में लिखना नहीं चाहते थे, लेकिन इन्होंने इतना मजबूर किया कि हमें लिखना पड़ा। इन्हीं विकृत मानसिकता वाले इंसान के कारण हमें चर्चा वाले ब्लाग में भी मॉडरेशन लगाना पड़ा है, वरना चर्चा जैसे ब्लाग में मॉडरेशन का क्या काम।

शुक्रवार, फ़रवरी 11, 2011

हजार-पांच सौ के नोट बंद करने से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा

एक दवाई दुकानदार का कहना है कि अगर हजार और पांच सौ के साथ साथ सौ रुपए के नोट भी बदं कर दिए जाने तो अपने देश में भ्रष्टाचार पर कुछ हद तक अंकुश लग सकता है। भ्रष्टाचार के साथ दो नंबर की काली कमाई में ही बड़े नोटों का उपयोग किया जाता है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि इन कामों में बड़े नोटों का उपयोग होता है, पर क्या महज नोट बंद कर देने से ही भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सकता है, यह सोचने वाली बात है। वैसे बड़े नोटों को बंद करवाने का दम है किसमें।
कल रात को हम एक मेडिकल स्टोर में दवाई लेने गए थे। हमने दवाई लेने के बाद जब दुकानदार को एक पांच सौ का नोट दिया, तो दुकानदार काफी देर तक उस नोट को परखता रहा कि वह असली है या नकली। ऐसे में हमने उनसे कहा कि सरकार अगर हजार और पांच सौ के नोटों को बंद कर दे तो परेशानी नहीं होगी। हमने तो महज आम जनों और दुकानदारों को नकली नोटों की वजह से होने वाली परेशानी को ध्यान में रखते हुए यह बात कही थी, पर उन दुकानदार महोदय ने कहा कि सर केवल आम जनों की ही परेशानी दूर नहीं होगी बल्कि भ्रष्टाचार के साथ दो नंबर के धंधों पर भी रोक लग जाएगी। उन दुकानदार महोदय ने कहा कि जिनता भी काला-पीला काम होता है सब बड़े नोटों से होता है। उन्होंने तो यह भी कहा कि सौ के नोट भी सरकार को बंद कर देने चाहिए।
सच में सोचने वाली बात है कि क्या वास्तव में इन बड़े नोटों को बंद कर देने से देश को भ्रष्टाचार से मुक्त किया जा सकता है। हमें तो लगता है कि जरूर ऐसा होने से कुछ हद तक को भ्रष्टाचार पर अंकुश लग ही सकता है। लेकिन सोचने वाली बात यह भी है कि जब सरकार में बैठे लोग ही पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं तो ऐसे में बड़े नोटों को बंद करने का फरमान कौन जारी कर सकता है। बहरहाल यह बात ठीक है कि बड़े नोट बंद कर लिए जाए तो नकली नोटों से भी जनता को मुक्ति मिल जाएगी, वरना नकली नोटों के चक्कर में गरीबों को भी काफी नुकसान हो जाता है। । 

मंगलवार, फ़रवरी 08, 2011

आ गई बंसत ऋतु की बहार

आ गई बंसत ऋतु की बहार
पड़ेगी अब रंगों की फुहार
आएगा मस्ती का एक त्यौहार
दिलों से बरसेगा होली के दिन प्यार
होली का तो सब करते हैं इंतजार
रंगों से खेलने सब रहते हैं बेकरार
क्या आपको है इस बात से इंकार
तो फिर कैसे जीते हैं आप यार
थोड़ा सा करके देखों तो प्यार
बदल जाएगा तुम्हारा भी संसार
तो चले खोजने कोई दिलदार
जो करे सके उम्र भर प्यार
गर मिल जाए कोई ऐसा दिलदार
तो न छोडऩा उम्र को उसको यार

सोमवार, फ़रवरी 07, 2011

बदलाव से ही होगा खेलों का विकास

केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय खेल विकास विधेयक के प्रस्ताव का प्रदेश के खेल संघों के ज्यादातर पदाधिकारियों ने स्वागत किया है। इनका एक स्वर में ऐसा मानना है कि इस विधेयक से खेलों का तेजी से विकास होगा। बरसों से खेल संघों के प्रमुख पदों पर काबिज रहने के कारण खेलों के विकास में बाधा आती है। लेकिन इसी के साथ ऐसा भी मानना है कि अगर खेल संघों के पदों पर खिलाड़ी काबिज रहते हैं तो उन खेलों का विकास तेजी से होता है, ऐसे संघों के लिए जरूरी परेशनी की बात हो सकती है।

केन्द्रीय मंत्री अजय मकान ने इस बात का खुलासा किया है कि केन्द्र सरकार बहुत जल्द राष्ट्रीय खेल विकास विधेयक लाने वाली है। इस विधेयक से खेल संघों पर बरसों से काबिज मठाधीशों ेको हटाने में मदद मिलेगी। यहां यह बताना लाजिमी होगा कि इसके पूर्व केन्द्रीय मंत्री एमएस गिल ने खेल महासंघों के पदों पर बरसों से काबिज पदाधिकारियों को हटाने के लिए एक फरमान जारी किया था, लेकिन इस फरमान का असर नहीं हुआ और महासंघों पर अब तक पुराने पदाधिकारी काबिज हैं। श्री गिल ने केन्द्रीय खेल मंत्रालय से जो फरमान जारी किया था उसके मुताबिक अध्यक्ष पद पर 12 साल और महासचिव पद पर 8 साल से ज्यादा कोई नहीं रह पाएगा। लेकिन इस फरमान का किसी ने पालन नहीं किया और महासंघों के मठाधीशों ने साफ कह दिया था हमें केन्द्र सरकार के खेल मंत्रालय के अनुदान की जरूरत नहीं है। यही वजह रही है कि अब सीधे विधेयक लाने का प्रस्ताव सामने आया है। इस विधेयक के बारे में अपने राज्य के खेल संघों से जुड़े लोग क्या सोचते हैं देखते हैं उनके विचार।

खेल संघों में खिलाड़ी हो

प्रदेश बैडमिंटन संघ के अध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी गुरुप्रीत सिंह भाटिया का कहना है कि खेल संघों में वैसे भी खिलाड़ियों को रहना चाहिए। राजनीति से जुड़े लोगों को इनके पदों पर बिठाना ठीक नहीं है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी डॉक्टर को खेती-बाडी का काम करने कहा जाएगा तो वह क्या करेगा। नेताओं के बस में खेल संघों को चलाना नहीं होता है। उन्होंने बताया कि उनके राज्य संघ में सभी पदों पर खिलाड़ी हैं।

खेल-खिलाड़ियों का फायदा होगा

हॉकी छत्तीसगढ़ के सचिव फिरोज अंसारी का कहना है कि केन्द्र सरकार का प्रस्ताव स्वागत योग्य है। इस विधेयक के पास होने के बाद निश्चित रूप से देश में खेल और खिलाड़ियों का भला होगा। वैसे हमारी हॉकी इंडिया ने तो सबसे पहले श्री गिल के निर्देशों का पालन करते हुए अपने महासंघ में बदलाव किकया था।

बदलाव जरूरी है

छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ से वरिष्ठ उपाध्यक्ष और छत्तीसगढ़ लॉन टेनिस संघ के महासचिव गुरुचरण सिंह होरा का कहना है कि बदलाव तो जरूरी है। लेकिन इसी के साथ एक देखने वाली बात यह भी है कि अगर किसी खेल संघ में बैठे लोग अपने खेलों के लिए अच्छा काम कर रहे हैं तो ऐसे संघों के लिए विधेयक में कुछ ऐसा जरूर होना चाहिए जिससे उनको हटने के लिए बाध्य न होना पड़ा। खेल संघों में खेलों को समर्पित व्यक्ति वैसे भी कम मिलते हैं, ऐसे में अच्छे लोगों को किनारे कर दिया जाएगा तो इससे खेलों का नुकसान भी हो सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि विधेयक में इस बात पर जरूर गौर करना चाहिए।

खेलों का होगा विकास

जंप रोप संघ के महासचिव अखिलेश दुबे का कहना है कि इस विधेयक के प्रस्ताव से यह बात तो तय है कि खेल संघों में नए लोग आएंगे। नए लोग आएंगे तो नए विचार भी लाएंगे। अब तक होता यह है कि लंबे समय तक पदों पर काबिज पदाधिकारी अपने विचार थापने का काम करते हैं, ऐसे में ख्रेलों का विकास नहीं हो पाता है। हमेशा से परिवर्तन नई क्रांति लाता है और अगर विधेयक पास हो जाता है तो खेलों में भी नई क्रांति का संचार होगा।



गुरुवार, फ़रवरी 03, 2011

पहला अंतरराष्ट्रीय ट्रेक रायपुर में बनेगा

कयाकिंग-कैनाइंग का पहला अंतरराष्ट्रीय ट्रेक नई राजधानी में बनाने का प्रस्ताव सरकार के सामने रखा गया है। इस प्रस्ताव पर मुख्य सचिव पी. जाय उम्मेन गंभीर भी हैं। यह ट्रेक देश का पहला ट्रेक होगा। इस ट्रेक के लिए छत्तीसगढ़ का चयन इसलिए किया गया है क्योंकि प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की खेलों में बहुत ज्यादा रुचि है।
ये बातें यहां पर चर्चा करते हुए भारतीय कयाकिंग-कैनाइंग संघ के महासचिव बलवीर सिंह कुशवाहा ने कहीं। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ को 37वें राष्ट्रीय खेलों की मेजबानी मिली है। ऐसे में राष्ट्रीय खेलों में शामिल हमारे खेल के लिए भी प्रदेश सरकार को ट्रेक बनाने की जरूरत पड़ेगी। उन्होंने बताया कि वे यहां पर प्रदेश कयाकिंग संघ के अध्यक्ष वैभव मिश्रा के बुलावे पर आए हैं। उन्होंने बताया कि सबसे पहले संघ के साथ बैठक करके यह तय किया गया कि रायपुर में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का ट्रेक बनाना है ताकि यहां के खिलाड़ियों को सुविधाएं मिल सके। ऐसे में सबसे पहले इसके लिए स्थान देखा गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर के ट्रेक के लिए सबसे उपयुक्त स्थान परसदा के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम के पास में स्थित एक झील है। इस झील में आसानी से अंतरराष्ट्रीय स्तर का ट्रेक बन सकता है। उन्होंने पूछने पर बताया कि यह झील करीब 2200 मीटर की है और लगभग इतनी ही लंबी झील की जरूरत पड़ती है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि इस ट्रेक को बनाने के बाद वहां पर एक अकादमी प्रारंभ की जाएगी।
श्री कुशवाहा ने बताया कि स्थान का निरीक्षण करने के बाद उन्होंने मुख्य सचिव पी. जॉय उम्मेन के साथ खेल संचालक जीपी सिंह से भी चर्चा की। इनके सामने एक प्रस्ताव रखा गया है। इस प्रस्ताव पर मुख्य सचिव के साथ खेल संचालक भी गंभीर हैं। उन्होंने बताया कि अगर इस प्रस्ताव को सरकार की मंजूरी मिल जाती है तो यहां बनाने वाला ट्रेक देश का पहला अंतरराष्ट्रीय ट्रेक होगा जो चाइना की तर्ज पर बनेगा। इसको बनाने का पूरा नक्शा हम तैयार करके देंगे ताकि किसी भी तरह की कोई तकनीकी समस्या न आए। वे कहते हैं कि इस ट्रेक के बनने से छत्तीसगढ़ में होने वाले राष्ट्रीय खेलों में भी बहुत मदद मिलेगी। उन्होंने बताया कि झारखंड में होने वाले राष्ट्रीय खेलों में ट्रेक की कमी के कारण परेशानी हो रही है, वहां पर जिस झील में कयाकिंग का आयोजन होना है, उसकी गहराई बहुत ज्यादा होने से परेशानी हो रही है। पूछने पर उन्होंने कहा कि कयाकिंग के लिए चार मीटर गहराई पर्याप्त होती है। श्री कुशवाहा ने कहा कि हमारे राष्ट्रीय संघ ने छत्तीसगढ़ का चयन पहले अंतरराष्ट्रीय ट्रेक के लिए इसलिए किया है क्योंकि हम लोगों के पास जानकारी है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह खेलों में बहुत रूचि लेते हैं और उनकी रूचि के कारण ही छत्तीसगढ़ ने राष्ट्रीय खेलों की मेजबानी ली है। 

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