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गुरुवार, नवंबर 17, 2011

सब्जी की बोआई में ही कमाई

छत्तीसगढ़ की जलवायु इतनी अच्छी है कि यहां पर हर किस्म की फसल लगाई जा सकती है। छत्तीसगढ़ को भले धान का कटोरा कहा जाता है, लेकिन धान की पैदावार से किसानों की कमाई नहीं होती है। ऐसे में प्रदेश के किसानों को संपन्न बनाने के लिए उनको अब सब्जी भाजी वाली उद्यानिकी खेती पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। सब्जियों की खेती से ही किसान पेशेवर हो पाएंगे। छत्तीसगढ़ की 50 प्रतिशत भूमि वैसे भी शुष्क खेती के लायक है।
राष्ट्रीय हार्टिकल्चर रिसर्च फाउंडेशन के पूर्व संचालक डॉ. यूबी पांडे ने कहा कि वे छत्तीसगढ़ के किसानों को सलाह देना चाहते हैं कि उनको धान की खेती के साथ अब उद्यानिकी की खेती की तरफ भी ध्यान देना चाहिए। यही खेती ऐसी है जिससे किसानों को कमाई हो सकती है। धान की खेती में किसान कमाई नहीं कर पाते हैं, बड़ी मुश्किल से आज उनके अपने खाने के लिए ही धान हो पाता है। श्री पांडे कहते हैं कि मैं छत्तीसगढ़ की जलवायु के बारे में जानता हूं। यहां हर किस्म की फसल आसानी से लगाई जा सकती है। वे कहते हैं कि क्यों कर नासिक का प्याज बंगलादेश जाता है। छत्तीसगढ़ के किसान चाहें तो यहां का प्याज विदेशों में जा सकता है। श्री पांडे कहते हैं कि प्रदेश के छोटे किसानों को तकनीकी रूप से मजबूत करके उनको उद्यानिकी की ज्यादा फसल लेने के लिए तैयार किया जा सकता है। वे बताते हैं कि देश में 2009 में 1290 लाख टन सब्जियों का उत्पादन हुआ था। पिछले साल यह उत्पादन 1350 लाख टन तक पहुंचा है। लेकिन इसके बाद भी उत्पादन में अभी और इजाफा जरूरी है। वे कहते हैं कि छत्तीसगढ़ की जलवायु को देखते हुए यहां प्याज का रिसर्च सेंटर होना चाहिए।
कौन सी फसल कहां लगाएं
प्रदेश की जलवायु और भौगोलिक स्थिति के मुताबिक कौन सी फसल के लिए कहां का स्थान उपयुक्त है, इसके बारे में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय प्रबंध मंडल के सदस्य प्रोफेसर मनहर आडिल बताते हैं कि बस्तर संभाग की बात करें तो वहां की जलवायु के हिसाब से वहां पर काजू, कंदी फसलें इसमें जिमी कंद, अदरक, आलू, प्याज, लहसून की फसलें लगाई जाती हैं। सरगुजा, जशपुर, कोरिया का क्षेत्र पठारी क्षेत्र है इसमें चीकू, लीजी और सेब की फसल लगाई जाती है। मैदानी क्षेत्रों में कांकेर के बाद धमतरी, महासमुन्द, रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव और बिलासपुर हैं। यहां के लिए उपयुक्त फसलों में केला, नीबू, संतरा, जाम और आम है।

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सोमवार, जून 20, 2011

कोच की चाह में राजस्थान से छत्तीसगढ़ आए

भारतीय टीम के पूर्व कोच चन्दर सिंह के छत्तीसगढ़ आने की खबर मिलने के बाद हम लोगों ने भी सोचा कि यहां के नए साई सेंटर में आ जाते हैं। चन्दर सिंह से प्रशिक्षण लेने तो हम लोग कहीं भी जा सकते हैं, उनके प्रशिक्षण देने का अंदाज अलग है।
ये बातें यहां पर चर्चा करते हुए राजस्थान के वीरेन्द्र सिंह और सुनील कुमार ने कहीं। इन्होंने बताया कि ये जोधपुर के साई सेंटर में थे जहां पर उनको प्रशिक्षण देने का काम भारतीय टीम के कोच रहे चन्दर सिंह कर रहे थे। लेकिन जब इनको चंदर सिंह के छत्तीसगढ़ आने की खबर मिली तो इन्होंने सोचा कि चलो हम भी छत्तीसगढ़ में खुलने वाले साई सेंटर में प्रयास कर लेते हैं। छत्तीसगढ़ के साई सेंटर के बारे में इनको अपने कोच से ही मालूम हुआ था। इन खिलाड़ियों का कहना है कि चंदर सिंह जैसा कोई और दूसरा कोच नहीं हो सकता है। उनके प्रशिक्षण देने का तरीका इतना सरल और सहज रहता है कि हर खिलाड़ी उनके प्रशिक्षण देने के तरीके पर फिदा हो जाता है। यहां यह बताना लाजिमी है कि चंदर सिंह एक बार पिछले साल छत्तीसगढ़ की टीम को प्रशिक्षण देने आए थे, तो यहां के खिलाड़ी भी उनके प्रशिक्षण देने के अंदाज पर फिदा हो गए थे। चंदर सिंह को छत्तीसगढ़ के साई सेंटर में भेजने की मांग प्रदेश वालीबॉल संघ के मो. अकरम खान ने साई के डीजी गोपाल कृष्ण से की थी। इस मांग पर ही चंदर सिंह को यहां भेजा जा रहा है।
6.3 फीट के वीरेन्द्र सिंह बताते हैं कि उनको जोधपुर के साई सेंटर में लंबाई के कारण प्रवेश मिला था और यहां भी लंबाई के कारण प्रवेश मिला है। वे बताते हैं कि लंबाई और खेल अच्छा होने के बाद भी उनको ेराजस्थान वालीबॉल संघ की राजनीति का शिकार होना पड़ा है। वे कहते हैं कि उनको राजस्थान की टीम में स्थान ही नहीं दिया जाता है। वीरेन्द्र कहते हैं कि टीम में 8 खिलाड़ी तो जरूर ठीक रखे जाते हैं, लेकिन बाकी खिलाड़ी पदाधिकारियों की मर्जी से रखे जाते हैं जिसके कारण हम जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों का हक मारा जाता है। अब वीरेन्द्र की इच्छा रायपुर के साई सेंटर में रहते हुए छत्तीसगढ़ से खेलने की है। वे जोधपुर के सेंटर में एक साल रहे हैं, अब उनको यहां दो साल रहने का मौका मिलेगा।
इधर राजस्थान के दूसरे खिलाड़ी सुनील कुमार को अपने राज्य के संघ से कोई शिकायत नहीं है। वे बताते हैं कि 2009 से 11 तक वे तीन बार स्कूली राष्ट्रीय चैंपियनशिप में खेल चुके हैं। पिछले साल बेंगलुरु में खेली गई अंडर 19 की चैंपियनशिप में उनके राज्य की टीम तीसरे स्थान पर रही थी। सुनील भी कहते हैं कि उनको रायपुर के साई सेंटर में रहने का मौका मिला तो वे भी छत्तीसगढ़ के लिए खेलेंगे।

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गुरुवार, मई 05, 2011

दस साल बाद भी नहीं मिले मैदान

छत्तीसगढ़ बनने के दस साल बाद भी प्रदेश कई खेलों के मैदानों के लिए तरस रहा है। हॉकी को जहां अब तक एस्ट्रो टर्फ नहीं मिल सका है, वहीं एथलीटों को सिंथेटिक ट्रैक का इंतजार है। तीरंदाजों के लिए एक भी नियमित मैदान नहीं है। तैराकी के लिए राष्ट्रीय स्तर का एक भी पूल न होने के कारण संघ राज्य में राष्ट्रीय स्पर्धाओं की मेजबानी नहीं ले पाता है। छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय खेलों की मेजबानी मिलने के बाद अब खिलाड़ियों की उम्मीद जागी है उनको मैदान मिल जाएंगे।
प्रदेश में ज्यादातर खेलों के मैदानों का टोटा है। राज्य बनने के दस साल बाद भी खिलाड़ी मैदान नहीं मिलने से निराश हैं। कई खेलों में सुविधाएं न होने से खिलाड़ी पलायन करके दूसरे राज्यों में जाकर खेल रहे हैं।
हॉकी खिलाड़ी पलायन कर गए
प्रदेश महिला हॉकी संघ की सचिव और पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी नीता डुमरे बताती हैं कि राज्य बनने के बाद एक भी एस्ट्रो टर्फ न होने के कारण अपने राज्य की महिला खिलाड़ी पलायन कर रही हैं। इस समय प्रदेश की छह खिलाड़ी बलविंदर कौर, रेणु राजपूत, पूजा राजपूत, हेमलता, सेवंती और किरण भोपाल के साई सेंटर में हैं। इन खिलाड़ियों के दम पर ही साई भोपाल ने पिछले माह राष्ट्रीय स्पर्धा में तीसरा स्थान प्राप्त किया। नीता कहती हैं कि राज्य की राजधानी में तो एस्ट्रो टर्फ जरूरी है। वह कहती हैं कि राज्य में जशपुर के साथ राजनांदगांव और रायपुर में एस्ट्रो टर्फ लगाने की घोषणा काफी पहले हो चुकी है, लेकिन अब तक कहीं भी एस्ट्रो टर्फ नहीं लगा है। इसके बिना राष्ट्रीय स्तर पर सफलता संभव नहीं है।
राजधानी में बने सिंथेटिक ट्रैक
अंतरराष्ट्रीय एथलीट पवन धनगर का कहना है कि यह अपने राज्य का दुर्भाग्य है कि दस साल बाद भी राज्य में एक भी सिंथेटिक ट्रैक नहीं है। इसके बिना राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता संभव नहीं है। वे बताते हैं कि रविशंकर विश्व विद्यालय में एक सिंडर ट्रैक है। ऐसा ही एक ट्रैक भिलाई में भी है। वे कहते हैं कि बस्तर की प्रतिभाओं को देखते हुए एक सिंथेटिक ट्रैक वहां भी होना चाहिए। पद्मश्री रूकमणी सेवा आश्रम  बस्तर के धर्मपाल सैनी भी कहते हैं कि बस्तर में आदिवासी प्रतिभाएं इतनी ज्यादा हैं कि वहां पर एथलेटिक्स का ट्रैक होने से वहां से राष्ट्रीय स्तर की बहुत खिलाड़ी निकल सकती हैं।
राष्ट्रीय स्तर का एक भी स्वीमिंग पूल नहीं
प्रदेश तैराकी संघ के अध्यक्ष गोपाल खंडेलवाल के साथ सचिव साई राम जाखंड कहते हैं कि अपने राज्य में राष्ट्रीय स्तर का एक भी स्वीमिंग पूल न होने के कारण हम राष्ट्रीय स्पर्धाओ का आयोजन नहीं कर पाते हैं। संघ ने खेल विभाग को भिलाई में राष्ट्रीय स्तर का पूल बनाने का प्रस्ताव दिया है।
दस साल में नहीं मिली तीरंदाजी अकादमी 
तीरंदाजी संघ के सचिव कैलाश मुरारका का कहना है कि हमने राज्य में दस सालों में एक हजार से ज्यादा तीरंदाज तैयार कर दिए हैं, लेकिन हमारी अकादमी खोलने की मांग अब तक खेल विभाग ने पूरी नहीं की है। इसी के साथ विभाग से संघ को अब तक कोई सामान भी नहीं मिला है, जबकि तीरंदाजी का सामान बहुत मंहगा आता है। श्री मुरारका ने बताया कि राजधानी में खिलाड़ियों के नियमित अभ्यास के लिए एक मैदान भी नहीं है।
सुविधाएं देने का प्रयास कर रहे हैं: खेल संचालक
खेल संचालक जीपी सिंह का कहना है कि हम हर खेल की सुविधाएं देने का प्रयास कर रहे हैं। तीरंदाजी और हॉकी की अकादमी बनाने का प्रस्ताव सरकार को भेजा गया है। साइंस कॉलेज में हॉकी के लिए एस्ट्रो टर्फ लगाने का काम भी तेजी से चल रहा है। बहुत जल्द लोक निर्माण विभाग इसके लिए टेंडर करेगा। तैराकी संघ की मांग पर भिलाई स्टील प्लांट को स्वीमिंग पूल बनाने के लिए पत्र लिखा जा रहा है। बीएसपी ने ही तैराकी को गोद लिया है, इसलिए उसको पूल बनाने कहा जा रहा है। एक स्वीमिंग पूल नगर निगम रायपुर संस्कृत कॉलेज में बनाने वाला है। जहां तक एथलेटिक्स के सिंथेटिक ट्रैक का सवाल है, तो वह साइंस कॉलेज में प्रस्तावित खेल हब में शामिल है, इसके लिए जल्द ही प्रस्ताव बनाकर सरकार को भेजा जाएगा।  

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बुधवार, मार्च 23, 2011

छत्तीसगढ़ पायका में नंबर वन

केन्द्र सरकार की योजना पायका में छत्तीसगढ़ नंबर वन है। इस बात का खुलासा ग्वालियर के मास्टर ट्रेनर प्रशिक्षण शिविर में हुआ। यहां पर 17 राज्यों से आएखेलों से जुड़े 128 लोगों ने जब अपने-अपने राज्यों में चल रही योजना की जानकारी दी तो इस जानकारी से ही यह बात सामने आई कि पूरे देश में छत्तीसगढ़ में ही इस योजना में सबसे अच्छा काम हो रहा है। कई राज्यों में तो अब तक एक साल की योजना पर ही काम प्रारंभ नहीं हो सका है जबकि छत्तीसगढ़ में दूसरे साल की योजना पर भी काम प्रारंभ कर दिया गया है।
राजधानी के वरिष्ठ खेल अधिकारी राजेन्द्र डेकाटे ने यह जानकारी देते हुए बताया कि ग्वालियर में सात से 21 फरवरी तक आयोजित प्रशिक्षण शिविर में 17 राज्यों के खेलों के जानकारों 128 लोगों ने भाग लिया। छत्तीसगढ़ से खेल विभाग के पांच अधिकारी जिनमें राजेन्द्र डेकाटे के अलावा जशपुर के प्रेम किशोर प्रधान, जांजगीर के नरेन्द्र सिंह बैस, राजनांदगांव के अशोक मेहरा एवं दुर्ग के ए. एक्का शामिल हैं के साथ दंतेवाड़ा के दो क्रीड़ाश्री और यूनीसेफ के चार लोग शामिल हैं, इन्होंने भाग लिया। श्री डेकाटे ने बताया कि प्रशिक्षण शिविर में जब अलग-अलग राज्यों से आए लोगों ने अपने-अपने राज्य में चल रही इस योजना के बारे में जानकारी दी तो यह बात सामने आई कि छत्तीसगढ़ में ही सबसे ज्यादा अच्छा काम हो रहा है। हमारे राज्य में जहां 2009-10 के सभी क्रीड़ाश्री नियुक्त किए जा चुके हैं, वहीं इनको पिछले साल प्रशिक्षण भी दिया जा चुका है। इसी तरह से 2010-11 के भी क्रीड़ाश्री नियुक्त हो गए हैं और इनको तैयार करने के लिए कोंड़ागांव में एक से सात फरवरी तक पहले चरण का प्रशिक्षण शिविर लग चुका है। अब दूसरे चरण के प्रशिक्षण की तैयारी चल रही है। यह शिविर रायपुर में 27 फरवरी से लगेगा।
श्री डेकाटे ने बताया कि जब छत्तीसगढ़ के बारे में अन्य राज्यों के लोगों को मालूम हुआ तो कई राज्यों के लोगों ने छत्तीसगढ़ के खेल अधिकारियों से चर्चा करके यह जानने का प्रयास किया कि आखिर छत्तीसगढ़ की सफलता के पीछे कारण क्या है। इनको यह भी बताया गया कि छत्तीसगढ़ सरकार भी पायका के लिए पूरी मदद कर रही है। इसी के साथ इनको बताया गया कि वैसे भी छत्तीसगढ़ की खेलनीति में प्रारंभ से ही पंचायत स्तर से खेलों को बढ़ाने की बात है।
बहुत कुछ सीखने को मिला
श्री डेकाटे ने पूछने पर बताया कि ग्वालियर में बहुत कुछ सीखने को मिला। वहां पर निदेशक एके दत्ता के मार्गदर्शन में अलग-अलग खेलों के जानकारों ने जहां मैदानों के बनाने के बारे में जानकारी दी, वहीं बताया गया कि कैसे ग्रामीण खिलाड़ियों को खेलों से जोड़ने का काम करना है। श्ाििवर में मुंबई के एक एनजीओ की एक मैजिक वैन आई थी। इस वैन में ग्रामीण खिलाड़ियों को जोड़ने के लिए मनोरंजक खेलों के बारे में बताया गया कि अगर ऐसे खेलों से शुरुआत की जाए तो ग्रामीण खिलाड़ियों की रुचि खेलों बढ़ेगी और वे खेलने सामने आएंगे। श्री डेकाटे का ऐसा मानना है कि इस मैजिक वैन को छत्तीसगढ़ में क्रीड़ाश्री के प्रशिक्षण शिविर में भी बुलाने से बहुत फायदा होगा। उन्होंने बताया कि हम लोग भी प्रशिक्षण शिविर में अपने अनुभव का लाभ क्रीड़ाश्री को देने का काम करेंगे।
पीटीआई को मिले प्रशिक्षण
श्री डेकाटे का ऐसा मानना है कि पायका के प्रशिक्षण के लिए राज्य के   खेल शिक्षकों (पीटीआई) को भेजना चाहिए। ज्यादातर क्रीड़ाश्री खेल शिक्षक हैं, ऐसे में इनके जाने से सीधा फायदा मिलेगा। उन्होंने बताया कि वैसे दो क्राड़ाश्री भेजे गए थे, लेकिन ज्यादा से ज्यादा क्रीड़ाश्री जाएंगे तो उसका फायदा राज्य को मिलेगा और वे गांवों में खिलाड़ी तैयार कर पाएंगे।

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मंगलवार, मार्च 08, 2011

बालिकाओं को दिखाएंगी रास्ता

हमारे गांवों की बालिका खिलाड़ी बहुत शर्मीली होती हैं। ऐसे मं हमने सोचा कि अगर हमें छत्तीसगढ़ की बालिका खिलाड़ियों को रास्ता दिखाना है तो हमें आगे आना पड़ेगा। यही सोचकर हम सभी ने क्रीड़ाश्री  बनने का फैसला किया और यहां प्रशिक्षण लेने आई हैं। अब हम यहां से प्रशिक्षण लेकर जब अपने-अपने गांव जाएंगी तो वहां जाकर बालिका िखिलाड़ियों को मैदान में लाने का काम करेंगी।
ये बातें यहां पर चर्चा करते हुए क्रीड़ाश्री का प्रशिक्षण लेने आई  राज्य के कई जिलों की महिला क्रीड़ाश्री ने एक स्वर में कहीं। इन क्रीड़ाश्री में कुछ तो खेलों से जुड़ी हुई हैं, लेकिन जो खेलों से जुड़ी नहीं हैं, उनमें भी खेलों के लिए कुछ करने का जज्बा है। इनका कहना है कि हमें जब अपने राज्य और देश के लिए कुछ करने का मौका मिला है तो उस मौके को हम खोना नहीं चाहती हैं। धमतरी के ग्राम रतनबांधा की उमा साहू बताती हैं कि वह खो-खो और कबड्डी की खिलाड़ी रही हैं। लेकिन वह राज्य स्तर से आगे नहीं बढ़ सकीं। ऐसे में जब उनको क्रीड़ाश्री बनने का मौका मिला तो उन्होंने इस मौके को यह इस सोच के साथ स्वीकार किया कि गांव की लड़कियां तो बहुत ज्यादा शर्माती हैं, ऐसे में अगर गांव में बालिका खिलाड़ियों को खेल के बारे में जानकारी देने के लिए कोई महिला होंगी तो बालिका खिलाड़ियों को आसानी होगी। ऐसी ही सोच के साथ एमए और पीजीडीसीए करने वाली धमतरी के गांव मलहारी की मीनाक्षी कश्यप क्रीड़ाश्री बनी हैं।
उनका खेलों से कभी नाता नहीं रहा है, लेकिन खेलों से जुड़कर उनको बहुत अच्छा लग रहा है। वह बताती हैं कि उनको पहली बार यहां आकर सम­ा आया कि वास्तव में अनुशासन क्या होता है। पूछने पर वह कहती हैं कि वैसे उनकी रूचि संगीत में रही है, लेकिन जब खेलों से जुड़ने का मौका मिला तो वह इंकार नहीं कर पार्इं। वह कहती हैं कि वह यहां से जो कुछ सीखकर जाएंगी, उसके बाद अपने गांव में खिलाड़ियों को तैयार करने का काम करेंगी। धमतरी के गांव सांकरा की संगीता साहू कहती हैं कि उनकी हमेशा कुछ नया करने की तमन्ना रहती हैं। जब उनको क्रीड़ाश्री बनने का मौका मिला तो इस मौके को उन्होंने हाथ से जाने देना उचित नहीं सम­ाा। संगीता भी कभी खेली नहीं हैं, लेकिन खेल सीखकर दूसरों को भी सिखाने की उनमें ललक जरूर है।
सरगुजा के सलका गांव की राष्ट्रीय खो-खो खिलाड़ी फूलमती टोपो को  हमेशा अपने लिए कोच की कमी खली। वह कहती हैं कि कोच न होने के कारण वह आगे नहीं बढ़ पार्इं। वह पहले क्रीड़ा परिसर में थीं, वहीं पर उनको देवेन्द्र सिंहा ने क्रीड़ाश्री बनने कहा और वह बन गर्इं। कोरबा के मुडानी गांव की संगीता दुबे कहती हैं कि उनका ऐसा सोचना है कि छत्तीसगढ़ के गांवों की प्रतिभाओं को सामने लाकर देश के लिए कुछ किया जाए। वह बताती हैं कि उनके पति आर्मी में हैं और देश की सेवा कर रहे हैं, ऐसे मेरे हाथ भी देश सेवा का मौका लगा है तो मैं क्यों इसे जाने दूं। जांजगीर के किरारी गांव की पूनम सूर्यवंशी कहती हैं वह अपने गांव के खिलाड़ियों को रास्ता दिखानी चाहती हैं। कोरिया के गिदमुड़ी गांव की फूलकुंवर शाडिल्य बताती हैं कि वह कबड्डी के साथ मैराथन और एथलेटिक्स की खिलाड़ी रही हैं। पूछने पर उन्होंने बताया कि उनके गांव में एक मैदान है जिसमें कई खेल होते हैं।
मैनपुर विकासखंड के जादापदर गांव की पुष्पलता नेताम बताती हैं कि वह पिछले पांच साल से मैराथन में ब्लाक की चैंपियन हैं। एक बार जिला मैराथन में वह तीसरे स्थान पर रहकर पुरस्कार जीत चुकी हैं। वह पूछने पर कहती हैं उनका गांव जंगल में होने के कारण वह 10 किलो मीटर से ज्यादा दौड़ने का अभ्यास नहीं कर पार्इं जिसके कारण वह मैराथन में आगे नहीं बढ़ सकीं। पुष्पा कहती हैं कि जब मैं खिलाड़ियों को अभ्यास करवाऊंगी तो मु­ो भी अभ्यास करने का मौका मिल जाएगा।
पाराडोल कोरिया की कुमारी भगवनिया बताती हैं कि वह राज्य स्तर पर कबड्डी, खो खो के साथ एथलेटिक्स में खेली हैं, अब खिलाड़ियों को तैयार करना चाहती हैं।  कोरिया के घुघरा गांव की सरिता राजवाड़े का सपना भी अपने राज्य के लिए खिलाड़ी तैयार करने का है। एथलेटिक्स की खिलाड़ी रहीं कोरबा के दमऊमुंडा की पंचदेवी मरावी कहती हैं कि वह चाहती हैं कि उनके गांव से भी खिलाड़ी निकले और अपने गांव के साथ राज्य और देश के लिए जीतने का काम करें। 

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