राजनीति के साथ हर विषय पर लेख पढने को मिलेंगे....

राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, नवंबर 12, 2011

राजनीति अब धंधेबाजों का खेल

आज अपने देश की राजनीति पूरी तरह से धंधेबाजों का खेल बनकर रह गई है। यह बात हम हवा में नहीं कह रहे हैं। आज अपने राज्य और देश का विकास चाहने वाले राजनेताओं की जरूरत नहीं रह गई है। अच्छे राजनेता राजनीति से किनारा कर गए हैं। अपने राज्य छत्तीसगढ़ के पूर्व वित्त मंत्री डॉ. रामचंद्र सिंह देव भी ऐसे नेता हैं जिन्होंने राजनीति की गंदगी को देखते हुए राजनीति से किनारा कर लिया है। उनसे बात करने का मौका मिला तो उनका यह दर्द उभर कर सामना आया। उन्होंने जो कुछ हमें बताया हम उनके शब्दों में ही पेश कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में विकास का सपना लिए मैंने 1967 में पहला विधानसभा चुनाव रिकॉर्ड मतों से जीता था। मेरी जीत के पीछे मेरा नहीं बल्कि मेरे पिता डीएस सिंह देव का नाम था जिनके कारण मुझ जैसे अंजान को मतदाताओं ने सिर आंखों पर बिठाया था। यहां से शुरू हुए मेरे राजनीति के सफर के बाद मैंने छह बार चुनाव जीता। पांच बार कांग्रेस की टिकिट पर और एक बार निर्दलीय। लेकिन इधर राजनीति में जिस तरह से हालात बदले और आज राजनीति जिस तरह से व्यापार में बदल गई है उसके कारण ही मुझे सक्रिय राजनीति से किनारा करना पड़ा। राजनीति से भले मैंने संन्यास ले लिया है, लेकिन जब भी विकास की बात आती है तो मैं चाहे छत्तीसगढ़ हो या मप्र या फिर मेरा पुराना राज्य बंगाल, मैं सबके लिए  लड़ने हमेशा तैयार रहता हूं।
राजनीति में आने का पहला मकसद होता है अपने क्षेत्र और राज्य के विकास के लिए काम करना। मैंने अपने राजनीतिक जीवन में यही प्रयास किया, लेकिन जब मुझे लगने लगा कि अब राजनीति ऐसी नहीं रह गई जिसमें रहकर कुछ किया जा सके तो मैंने संन्यास लेने का फैसला कर लिया। आज का मतदाता वोट डालने के एवज में पैसा चाहता है। वैसे मैं आज भी कांग्रेस में हूं, लेकिन सक्रिय राजनीति से मेरा कोई नाता नहीं रह गया है। मैं वर्तमान में राजनीतिक हालात की बात करूं तो आज कांग्रेस हो या भाजपा दोनों पार्टियों में अस्थिरता का दौर चल रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य के 11 सालों की यात्रा की बात करें तो कांग्रेस शासन काल के तीन साल तो राज्य की बुनियाद रखने में ही निकल गए। भाजपा सरकार के आठ सालों की बात करें तो इन सालों में भाजपा सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया है जिसको महत्वपूर्ण माना जा सके।
छत्तीसगढ़ बना तो इसकी आबादी दो करोड़ 5 लाख थी। छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से परिपूर्ण राज्य है। यहां कोयला, लोहा, बाक्साइड, चूना, पत्थर भारी मात्रा में हैं। राज्य में इंद्रावती नदी से लेकर महानदी के कारण पानी की कमी नहीं है। इतना सब होने के बाद जिस तरह से राज्य का विकास होना था वह नहीं हो सका है। राज्य की 75 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है, लेकिन जहां तक विकास का सवाल है तो राज्य में दस प्रतिशत ही विकास किया गया है और वह भी शहरी क्षेत्रों में। राज्य में 35 लाख परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं। राज्य में उद्योग तो लगे लेकिन ये उद्योग प्राथमिक उद्योग ही रहे। प्राथमिक उद्योग से मेरा तात्पर्य यह है कि कच्चे माल को सांचे में ढालने का ही काम किया गया है। उच्च तकनीक का कोई उद्योग राज्य में स्थापित नहीं किया जा सका है। अपने राज्य की तुलना में हरियाणा और पंजाब में कोई खनिज संपदा नहीं है, फिर भी इन राज्यों में उद्योगों की स्थिति छत्तीसगढ़ से ज्यादा अच्छी है। छत्तीसगढ़ का कच्चा माल बाहर जा रहा है, यह स्थिति राज्य के लिए हानिकारक है।
छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है पर कृषि के लिए कुछ नहीं किया गया है। मैं इंडिया टूडे के एक सर्वे का उल्लेख करना चाहूंगा जिसमें देश के राज्यों में छत्तीसगढ़ को कृषि में 19वें स्थान पर रखा गया है। इसी तरह से अधोसंरचना में 19वां, निवेश में छठा, स्वास्थ्य में तीसरा सुक्ष्म अर्थव्यवस्था में 19वां और संपूर्ण विकास के मामले में देश में 16वें स्थान में रखा गया है। यह सर्वे भी साबित करता है कि राज्य में विकास नहीं हो सका है। जो 10 प्रतिशत विकास हुआ है, वह अमीरों का हुआ है।
मेरा ऐसा मानना है कि भाजपा विकास के सही मायने समझ ही नहीं सकी। भाजपा को कृषि, लघु उद्योग, हस्तशिल्प पर जोर देना था ताकि गांवों में रहने वाली 75 प्रतिशत आबादी का विकास होता। ऐसा क्यूं नहीं हुआ यह एक चिंता का विषय है। जिस तरह से राज्य में उद्योग आ रहे हैं और खनिज संपदा का दोहन कर रहे हैं उससे राज्य आने वाले 40-50 सालों में खोखला हो जाएगा। सरकार ने दो रुपए किलो चावल दिया, यह अच्छी बात है, लेकिन इससे आर्थिक विकास कहां हुआ? सरकार को गरीबी रेखा में जीवन यापन करने वालों को इस रेखा से बाहर करने की दिशा में काम करना था।
मैं अंत में अक्टूबर 2000 में मप्र के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को लिए गए अपने एक पत्र का उल्लेख करना चाहूंगा जिसमें मैंने उन्हें लिखा था कि  आपके पास तो बालाघाट का एक लांजी ही नक्सल प्रभावित क्षेत्र है, लेकिन छत्तीसगढ़ में बहुत ज्यादा क्षेत्र नक्सल प्रभावित है, अगर नक्सली क्षेत्र में सही विकास नहीं हुआ तो छत्तीसगढ़ नक्सलगढ़ हो जाएगा, आज लगता है कि मेरी यह भविष्यवाणी सच साबित हो गई है।

Read more...

मंगलवार, मार्च 30, 2010

धर्म को तो राजनीति से गंदा न करें

अपने देश के नेता जहां जाते हैं, वहां के माहौल को अपनी गंदी राजनीति से गंदा करने से बाज नहीं आते हैं। अब अपने छत्तीसगढ़ राज्य की भाजपा सरकार ने जब हरिद्वार कुंभ में स्नान करने की योजना बनाई तो इसके लिए विपक्षी पार्टी कांग्रेस के विधायकों को भी इस धार्मिक कार्यक्रम में सहभागी बनाने साथ ले गई। लेकिन यह बात कांग्रेसी नेताओं को रास नहीं आई और उन्होंने अपने विधायकों के पीछे जासूस लगा दिए कि कहीं भाजपा नेता हमारे विधायकों पर डोरे डालने का काम तो नहीं कर रहे हैं।

सच में अगर इस दुनिया में कोई चीज सबसे गंदी है तो वह निश्चित ही राजनीति है। राजनीति से ज्यादा गंदी और कोई चीज हो भी नहीं सकती है। अब अगर राजनीति गंदी है तो इसमें रहने वाले कैसे अच्छे हो सकते हैं। हमें नहीं लगता है कि आज राजनीति में रहने वाले किसी भी इंसान के लिए ऐसा दावा किया जा सकता है कि वह पाक और साफ है।
बहरहाल हम बात करें अपने राज्य छत्तीसगढ़ की, जहां पर एक अच्छे धार्मिक कार्यक्रम के लिए बनाई गई योजना में भी राजनीति करने वालों को साजिश नजर आई। दरअसल अपने राज्य की भाजपा सरकार ने जब अपने सभी मंत्रियों और विधायकों के साथ हरिद्वार कुंभ में जाकर स्नान करने का फैसला किया तो सरकार ने इस यात्रा में विपक्षी दल कांग्रेस के विधायकों को भी शामिल कर लिया ताकि वे भी कुंभ स्नान का लाभ उठा लें। यहां पर भाजपा की सोच तो साफ और अच्छी ही नजर आ रही थी,अब इसके पीछे अगर कोई राजनीति हो तो कहा नहीं जा सकता है, लेकिन किसी धार्मिक कार्यक्रम के लिए बनाई गई योजना पर एक बार तो भरोसा कर ही लेना चाहिए। फिर भाजपा जो कि सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ है उसे इस बात का तो डर है नहीं कि विधायकों के बिदकने से उसकी सत्ता चली जाएगी।

भाजपा की एक साफ-सुधरी नजर आ रही योजना में भी न जाने कांग्रेस को क्या राजनीति नजर आई कि उसने अपने विधायकों को कुंभ स्नान के लिए जाने से तो नहीं रोका, लेकिन इस स्नान के समय और वहां से दिल्ली आने के बाद कांग्रेस विधायकों की सारी गतिविधियों पर जासूसी नजरें रखीं गईं। इसका क्या मतलब निकाला जाए कि वास्तव में राजनीति इतनी गंदी है कि उसे धर्म के काम भी भरोसा नहीं है। वास्तव में यहां पर कांग्रेस को सोचना था और कम से कम धर्म को गंदी राजनीति से अगल रखना था। यहां पर भाजपा की सोच को जरूर सलाम किया जा सकता है जिनसे अपने विपक्षियों को भी कुंभ स्नान का पुन्य लाभ देने का काम किया।

Read more...

शुक्रवार, अक्टूबर 16, 2009

ईमानदार एएसपी ने मारा मंत्री के मुंह पर इस्तीफा



छत्तीसगढ़ में एक तरफ जहां भ्रष्ट मंत्री और अफसर बेसुमार हैं तो ईमानदार अफसरों की भी कमी नहीं है। पुलिस जैसे विभाग के एक ईमानदार एएसपी शशिमोहन सिंह ने इस्तीफा सीधे तौर पर मंत्री के मुंह पर मारा है। अभी उनके इस्तीफे के एक दिन पहले ही नगर निगम के ईमानदार आयुक्त अमित कटारिया को राजनीति के खेल में हटाया गया था। अब इससे पहले की शशिमोहन सिंह का भी हश्र ऐसा ही होता उन्होंने इस्तीफा देने में भला समझा और सीधे इस्तीफा देकर चर्चा में आ गए है।

वास्तव में यह अपने देश का दुर्भाग्य है कि यहां पर ईमानदार लोगों को न तो काम करने दिया जाता है और न ही चैन से जीने दिया जाता है। ईमानदारी किस चिडिय़ां का नाम है यह तो कम से कम अपने देश के मंत्री और नेताओं के साथ 90 प्रतिशत अफसरों को मालूम ही नहीं है। मालूम भी है तो इससे हासिल कुछ नहीं हो सकता है, यह बात वे जानते हैं ऐसे में इससे कोई नाता नहीं जोडऩा चाहता है। बेईमानी की रोटी खाने की जिनकी आदत पड़ चुकी है वे भला कैसे ईमानदारों की कद्र कर सकते हैं।
अपने राज्य छत्तीसगढ़ में इस समय दो अधिकारी ईमानदारी की वजह से बहुत ज्यादा चर्चा में हैं। नगर निगम रायपुर के आयुक्त अमित कटारिया को ईमानदारी का यह इनाम मिला कि उनको निगम के आयुक्त पद से हटा दिया गया। हम अभी इस पर कुछ नहीं लिखना चाह रहे हैं क्योंकि इस पर पहले ही अनिल पुसदकर लिख चुके हैं। हम तो यहां पर चर्चा कर रहे हैं पुलिस विभाग के उन ईमानदार अधिकारी शशिमोहन सिंह की जिनको नकली खोवे के आरोपियों को छोडऩे के दबाव के कारण इस्तीफा देना पड़ा।

छत्तीसगढ़ में दीपावली के कारण लगातार नकली खोवा पकड़ में आ रहा है। ऐसे में एक मामले में एएसपी शशिमोहन सिंह ने तेलीबांधा इलाके में 25 बोरी खोवा जब्त किया। इस मामले के बाद मालूम हुआ कि खोवे का यह कारोबार करने वाले एक मंत्री के करीबी हैं। ऐसे में आने लगा दबाव मामले को रफा-दफा करने के लिए। इस मामले को लेकर एएसपी को अपने आला अफसरों की फटकार भी खानी पड़ी। इस फटकार के बाद शशिमोहन सिंह इतने ज्यादा विचलित हुए कि उन्होंने इस्तीफा ही दे दिया। यह कदम उनका एक अच्छा कदम है। अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया होता तो जरूर उनको ईमानदारी के तोहफे के रूप में तबादला आदेश ठीक उसी तरह से थमा दिया जाता जिस तरह से अमित कटारिया को थमाया गया था।

अमित कटारिया और शशिमोहन सिंह के मामले ऐसे हैं जो अपने देश के राजनीति के गंदे चेहरे को एक बार फिर उजागर करते हैं। यह कोई नई बात नहीं है हमेशा से ही राजनीति में ईमानदार अफसरों की बलि ली जाती है। यही कारण है कि अपने देश में ईमानदार अफसरों की फसल उगनी ही बंद हो गई है। भूले भटके कोई ईमानदार अफसर सामने आता है तो उनका भी ऐसा ही हश्र होता है, ऐसे में या तो ईमानदार अफसर नौकरी छोड़ देते हैं या फिर वे काम ही नहीं करते हैं।

देश में ईमानदार अफसरों को भ्रष्ट बनाने का काम तो अपने नेता और मंत्री ही करते हैं। कोई भी अफसर यही सोचता है कि जब मंत्री को पैसे लेकर ही मामले को समाप्त करना है तो मैं ही क्यों न पैसे लेकर किसी भी मामले को समाप्त कर दूं। यही एक मानसिकता ईमानदारों को भी भ्रष्ट बना देती है। यह बात हर क्षेत्र में लागू होती है। यही बात आज मीडिया में भी लागू है। मीडिया में भी कम भ्रष्टाचार नहीं है।

Read more...

रविवार, अप्रैल 12, 2009

नेता रहो या अभिनेता: शेखर

फिल्मों से राजनीति के मैदान में कूदने वाले शेखर सुमन का साफ तौर पर मानना है कि अभिनेता के साथ नेता का भी चोला पहनने वाले कभी सफल नहीं होते हैं। अगर वास्तव में देश की सेवा करनी है तो एक ही काम करें। अभिनेता का काम भी फिल्मों के जरिए अच्छा संदेश देते हुए देश की सेवा करना होता है और नेता का काम भी देश की सेवा करना होता है। (अब यह बात अलग है कि शायद शेखर जी यह सब जानते हुए भी नहीं मानते कि नेता देश की सेवा कम और अपनी सेवा ज्यादा करते हैं।) मैं आज राजनीति में आया हूं तो जरूर अब राजनीति में ही रमने के काम करूंगा। मैं बिहार को पुराने रूप में लाने के लिए ही राजनीति में आया हूं। बिहार का आज का रूप देखकर मुझे बहुत तकलीफ होती है।
लोकसभा चुनाव में पटना साहिब से बिहारी बाबू के नाम से जाने जाने वाले लोकप्रिय अभिनेता शत्रुधन सिंहा के खिलाफ चुनाव लडऩे वाले शेखर सुमन का अचानक रायपुर आना हुआ। शेखर साहब यहां पर अचानक इसलिए आएं क्योंकि उनको इस बात की जानकारी लगी थी कि रायपुर में एक ज्योतिषी हैं महेश जैन जो राजनीति में कूदने वालों का भविष्य बताने में महारथ रखते हैं। फिल्म जगत के कई ऐसे अभिनेता रहे हैं जो राजनीति में आए हैं तो उन्होंने श्री जैन से जरूर संपर्क किया है और राजनीति की पारी में अपना भविष्य जानने का प्रयास किया है। ऐसे में शेखर जी भी यहां श्री जैन से मिलने ही आए थे। अब यह बात अलग है कि उन्होंने इस बात का खुलासा नहीं किया कि वे यहां श्री जैन से ही मिलने आए थे। लेकिन उन्होंने राजनीति पर जरूर खुलकर बात की। कांग्रेस की टिकट से चुनाव लडऩे वाले शेखर सुमन जहां खुद को बिहारी बाबू मानते हैं, वहीं उन्होंने साफ किया कि वे भले अटल बिहारी वाजपेयी को अपना आदर्श मानते हैं लेकिन चूंकि उनका पूरा परिवार कांग्रेस में आस्था रखता है और उनका मानना है कि इस देश को अगर विकास के रास्ते पर कोई पार्टी ले जा सकती है तो वह कांग्रेस पार्टी है। बकौल शेखर सुमन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ श्रीमती सोनिया गांधी और राहुल गांधी ही देश को सही दिशा दिखा सकते हैं। शेखर का अटल जी के बारे में ऐसा मानना है कि वे गलत पार्टी में हैं, अगर वे कांग्रेस में होते तो जरूर आज देश के सर्वोच्च पद पर रहते। लालकृष्ण अडवानी को शेखर प्रधानमंत्री के लायक मानते ही नहीं हैं।
एक समय नेताओं की पोल खोलने का काम एक टीवी सीरियल पोल खोल में करने वाले शेखर राजनीति में आने के बारे में कहते हैं कि उनकी अंतिम मंजिल राजनीति ही थी। उन्होंने कहा कि वे बिहार के वर्तमान हालात देखकर काफी दुखी हैं। उनका कहना है कि वे बिहार से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं इसलिए चाहते हैं कि बिहार फिर से पहले ही तरह हो जाए। शेखर का एक तरह से यह कहना है कि वे बिहार को लालू यादव की गिरफ्त से मुक्त करना चाहते हैं। उनका ऐसा मानना है कि आज का बिहार काफी अराजक हो गया है। शेखर के राजनीति में आने का एक कारण यह भी नजर आया कि वे राज ठाकरे के व्यवहार से काफी दुखी हैं। उन्होंने राज ठाकरे के बारे में कहा कि उन्होंने उनकी बातों का एक आम आदमी की हैसियत से विरोध किया है। शेखर चाहते हैं कि वे बिहारी युवकों को रोजगार दिलाने का काम करें ताकि उनको दूसरों राज्यों का मुंह देखना न पड़े। शेखर का यह बिहार प्रेम है तो तारीफ के काबिल लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि वे इसमें कहां तक सफल होते हैं। आज शेखर साहब राजनीति को अच्छा मानने लगे हैं जबकि एक समय वे राजनीति की बुराई करते नहीं थकते थे। फिल्मी सितारों के राजनीति में आने को वे गलत नहीं मानते हैं लेकिन उनका कहना है कि एक तो फिल्मी सितारों का केवल प्रचार के लिए उपयोग करना गलत है, दूसरे फिल्मी सितारों को राजनीति में आने के बाद अभिनय से किनारा कर लेना चाहिए। जिसने भी राजनीति के साथ अभिनय से नाता जोड़े रखा है, वह सफल नहीं हुआ है। वैसे शेखर जी का यह कथन बिलकुल ठीक है दो नावों पर सवार रहने वाले फिल्म अभिनेता कभी सफल नहीं हुए हैं। शेखर को इस बात पर इतराज है कि मुंबई फिल्म जगत का नाम बॉलीवुड रख दिया गया है, उनका कहना है कि हिन्दी फिल्म जगत को किसी ऐसे किसी नकली नाम की जरूरत नहीं है। मायानगरी को फिल्म जगत ही कहना चाहिए। अपनी जीत के प्रति भरोसा रखने वाले शेखर कहते हैं कि यह तो चुनाव के परिणाम आने के बाद मालूम होगा कि शाटगन यानी शत्रु की गन में कितना दम है। बिहार में उनके और शत्रु साहब के बीच में बिहारी बाबू होने को लेकर एक तरह की जंग चल रही है। दोनों प्रत्याशी अपने को बिहारी बाबू बताने में लगे हैं। अब अंतिम फैसला को जनता को करना है कि वास्तव में बिहारी बाबू कौन हैं और किसके लिए बिहार के लोगों के दिलों में ज्यादा जगह है।

Read more...

गुरुवार, अप्रैल 09, 2009

तो नेताओं की रोज बजाते....


लातों के भूत बातों से नहीं मानते

यह बात गर सब जान जाते

देश के भ्रष्ट नेता-मंत्री

देश को खोखला नहीं कर पाते

हर घर में गर एक जनरैल जैसे

इंसान हो जाते

तो नेताओं की गलतबयानी पर

रोज उनकी बजाते

नेता फिर काफी सोच-समझ कर

राजनीति में आते

ऐसे में ईमानदारों के लिए

राजनीति के रास्ते खुल जाते

और फिर मंत्रियों की कुर्सियों पर हम

ईमानदार नेता ही पाते

Read more...

गुरुवार, मार्च 05, 2009

देश को सही दिशा में ले जाने वाले नेताओं की कमी है: नयन

भागवत कथाकार राजीव नयन का मानना है कि आज देश को सही दिशा में ले जाने वाले नेताओं की भारी कमी है। जो साधु-संत राजनीति में आ रहे हैं वे भी अपना स्वार्थ ही सिद्ध करने में लगे हैं। मैं तो राजनीति में कभी भी आने के बारे में नहीं सोच सकता।
उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि साधु-संतों का राजनीति में जाना अच्छा है, लेकि न जो साधु-संत आज राजनीति में आ रहे हैं, वो पद की खातिर जा रहे हैं। उन्होंने साफ कहा कि आज राजनीति में अच्छे नेताओं की भारी कमी है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि अच्छे लोग राजनीति में आएं और देश को सही दिशा में ले जाने का काम करें। राजनीति में आने के सवाल पर श्री नयन ने कहा कि मुझे एक तो पद की कोई भूख नहीं है। दूसरे यह कि राजनीति में सब आगे चलकर भूतपूर्व हो जाते हैं। आज मैं जिस पद पर हूं उसमें मैं कभी भी भूतपूर्व नहीं बनने वाला हूं।
श्री नयन ने एक सवाल के जवाब में कहा कि आज साधु की पहचान करना कठिन है। उन्होंने कहा कि आज राजनीति का मतलब ही अपना स्वार्थ सिद्ध करना है। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि आज देश के युवा पश्चिम की संस्कृति की तरफ जा रहे हैं तो इसका एक बड़ा कारण यहां की शिक्षा है। उन्होंने कहा कि सरकार को शिक्षा का स्तर उठाना होगा। देश के युवा बाहर शिक्षा लेने जाते हैं और विदेशी संस्कृति में रच-बसकर लौटते हैं। उन्होंने कहा कि वैसे आज देश में लोगों की धर्म के प्रति आस्था बढ़ी है। उन्होंने पूछने पर कहा कि धर्म आज व्यापार नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि जब हिन्दु साधु-संत प्रचार-प्रसार करते हैं तो इसको व्यापार का नाम दे दिया जाता है। श्री नयन ने कहा कि आज देश में लाखों लोगों का धर्मांतरण करवाया जा रहा है। इसके खिलाफ कोई बोलने वाला नहीं है।

Read more...
Related Posts with Thumbnails

ब्लाग चर्चा

मेरी ब्लॉग सूची

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP