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मंगलवार, मार्च 03, 2009

अंग्रेजी को अपने ऊपर हावी होने न दें: स्तुति

महज तीन साल की उम्र से रामकथा पर प्रवचन करने वाली कक्षा 8वीं की छात्रा स्तुति देवी का मानना है कि अंग्रेजी पढऩे और बोलने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन अंग्रेजी को अपने ऊपर हावी होने देना गलत है। आज देश को अंग्रेजी की नहीं उस संस्कृत भाषा की जरूर है जो हमें अध्यात्म से जोडऩे के साथ हमारी संस्कृति से भी जोड़ती है। हमें अंग्रेजी के मोहजाल में कदापि नहीं पडऩा चाहिए।
इस छोटी सी किशोरी ने पत्रकारों को भी हैरात में डाल दिया। इस बालिका ने साफ शब्दों में कहा कि आज देश में लोग अंग्रेजी बोलना अपनी शान समझते हैं। लेकिन अपनी जो मूल भाषा संस्कृत है उसको बोलने वालों की काफी कमी है। संस्कृत ही एक ऐसी भाषा है जो हमारी संस्कृति के सबसे करीब है। इस मर रही भाषा को आज जरूरत है कि इसका इस तरह से प्रचार हो कि इसको नवजीवन मिल जाए। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी भाषा में कोई बुराई नहीं है। वैसे भी कोई भाषा कभी बुरी नहीं होती है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी का जिनता जरूरी हो उतना ही उपयोग करना चाहिए। आप बेसक अंग्रेजी पढ़ें, बोलें लेकिन इसको अपनी न तो मजबूरी बनने दें और न ही इसको हावी होने दें। जब कोई भाषा किसी पर हावी हो जाती है तो इंसान उसका गुलाम हो जाता है।
अब तक 150 स्थानों पर रामकथा का प्रवचन करने वाली इस बालिका ने टीवी संस्कृति पर हमला करते हुए कहा कि टीवी आज बच्चों के लिए खतरनाक साबित हो रही है। टीवी पर आज जो कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं उनमें अच्छी बातें कम और बुरी बातें ज्यादा हैं। उन्होंने कहा कि जहां तक मेरा सवाल है तो मैं कभी टीवी देखती हूं तो मैं टीवी में आस्था चैनल या फिर ज्ञान-विज्ञान से जुड़े चैनल ही देखना पसंद करती हूं। उन्होंने कहा कि मेरा ऐसा मानना है कि बच्चे टीवी पर क्या देखें और क्या न देखें इसका निर्धारण माता-पिता को करना चाहिए। माता-पिता को इस बात का पता होना चाहिए कि उनका बच्चा आखिर टीवी पर क्या देख रहा है।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि मैं प्रवचन करने के क्षेत्र में इसलिए आई हूं ताकि बच्चों को टीवी संस्कृति से बाहर लाकर अध्यात्म से जोडऩे का काम कर सकू। उन्होंने बताया कि जब मैं एक टीवी कार्यक्रम देख रही थी तब उस कार्यक्रम में मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अच्छे खासे पढ़े-लिखे विद्यार्थियों को भी इस बात की जानकारी नहीं थी कि रामायण किसने लिखी है। ऐसे में दुख होता है कि अपने देश के भावी कर्णधार ही अपने देश के धर्म-पुराणों के बारे में नहीं जानते हैं।

6 टिप्पणियाँ:

pankaj vyas मंगल मार्च 03, 11:52:00 am 2009  

stuti devi se puchi ki vaha kitani sansakarat janti hai? sansakrat ke liyen kya kar sakati hai? ya kival bato me hi...?

filhal to mujhen lagata hen ve aadarsvadita ki bat karati hai, hame yathartha ke dharatal par jina padata hai.

neeshoo मंगल मार्च 03, 12:40:00 pm 2009  

स्तुति जी की अपनी राय है । जहां तक भाषा का सवाल है तो बिल्कुल सही है कि यह समारे संस्कृति के बिल्कुल करीब है । पर भाषाएं यदि अपना स्वरूप नहीं बदलेगी तो उनका अस्तित्व समाप्त हो ही जायेगा । धर्म ग्रंथ की जानकारी हमें परिवार और घर कर माहौल पर निर्भर करता है न कि भाषा पर । यहां परिवार को यह कल्चर बच्चों में देना चाहिए । तभी भाषा और संस्कृति बच सकेगी ।

neeshoo मंगल मार्च 03, 12:42:00 pm 2009  

स्तुति जी की अपनी राय है । जहां तक भाषा का सवाल है तो बिल्कुल सही है कि यह हमारे संस्कृति के बिल्कुल करीब है । पर भाषाएं यदि अपना स्वरूप नहीं बदलेगी तो उनका अस्तित्व समाप्त हो ही जायेगा । धर्म ग्रंथ की जानकारी हमें परिवार और घर के माहौल पर निर्भर करता है न कि भाषा पर । यहां परिवार को यह कल्चर बच्चों में देना चाहिए । तभी भाषा और संस्कृति बच सकेगी ।

अनुनाद सिंह मंगल मार्च 03, 02:18:00 pm 2009  

स्तुति ने अपनी उम्र के हिसाब से बहुत ऊंची बात कही है। वस्तुत: मेरा अपना मानना है कि हमे अंग्रेजी के अपने ज्ञान का उपयोग अंग्रेजियत की जड़ें काटने के लिये करना चाहिये; भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी से भी उपर का स्थान दिलाने के लिये करना चाहिये; अंग्रेजी की गुलामी से देश को बाहर निकालने के लिये करना चाहिये।

कभी स्तुति देवी के बारे में और विस्तार से लिखिये।

thatlovedflower रवि मार्च 08, 02:28:00 am 2009  

The root of English language is so deep rooted in India that it is next to impossible to uproot that huge tree. And to think of this kind of things is nothing but "Khayali Pulav" So better concentrate on your language and dont forget what English can do to you at this moment in India. It is the sole factor of national integration that binds the length and breadth of the country. Stuty woh to tuti ki tarah bol rahi hai. Leave her and her philosophy. Today no one talks in Sanskrit and why shedding tears for something that is having a natural state change. Love your language but when you hate other language then i must say that you dont love your language. many languages are dying natural death and many new streams of languages are coming up on the debris of such demised languages. So, this is but a natural process.

One thing is certain that English will stay come what ever may. So, it is not the right time to think on language. I have the freedom to talk and write in any language that i like provided the person in front understands me and no force on earth can deter me from doing so. That is my fundamental right. I speak four languages fluently and can understand seven languages of India. And i write in three languages fluently.

Thanks

Arkjesh सोम मार्च 09, 11:19:00 am 2009  

संस्कृत का साहित्य इतना समृद्ध है की यह मर नहीं सकती और इसका व्याकरण इतना क्लिष्ट है की यह जी भी नहीं सकती | शायद यह कोमा में चली गई है | इसने अपनी शुद्धता की कीमत चुकाई है |

bhasha ka sambandh rojagaar se bhi hai.

ab haal yah hai ki jo bikega wahi tikega.

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