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सोमवार, जुलाई 19, 2010

बहुत ही अच्छी है मेरी घरवाली


मेरी घरवाली सबसे निराली
देती है रोज एक चाय की प्याली
नहीं है अपनी कोई भी साली
नहीं करनी पड़ती है उसको रखवाली
जब भी होते हैं हम दोनों खाली
मिलकर बातें करते हैं खूब निराली
हमारे बाग में नहीं कोई माली
हर तरफ है फूलों की डाली
घर में हमने प्यार की ऐसी चादर डाली
नहीं लगता है अपना घर कभी खाली
यूं हमने अब तक जिंदगी गुजारी
बहुत ही अच्छी है मेरी घरवाली 
घरवाली ने दिए हैं दो चांद के टुकड़े
सबसे सुंदर हैं उनके मुखड़े
एक मुखड़ा है हमारी बिटिया रानी का
दूसरा है बेटे सागर का
जब भी वे हैं घर में रहते
दोनों हैं हमेशा खूब मस्ती करते
दोनों हैं हमारे दिल में रहते
उनके बिना हम नहीं रह सकते


एक ताजा कविता पेश है जो हमने अभी-अभी लिखी है।

8 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari सोम जुल॰ 19, 08:45:00 am 2010  

हमारी तो साली भी है



फिर घरवाली निराली भी है




नहीं करनी पड़ती है उसको रखवाली

काहे, कि हम बहुते सज्जन हैं!! :)

ललित शर्मा सोम जुल॰ 19, 10:48:00 am 2010  

वाह वाह वाह बहुत खुब

शानदार चिंतन रचना की
जोरदार बधाई

अन्तर सोहिल सोम जुल॰ 19, 11:42:00 am 2010  

बहुत बढिया है जी घरवाली मेरा मतलब कविता

प्रणाम

arvind सोम जुल॰ 19, 02:32:00 pm 2010  

वाह बहुत खुब.

Science Bloggers Association सोम जुल॰ 19, 04:09:00 pm 2010  

आपकी घरवाली हमें भी पसंद आई।
...मैं कविता की बात कर रहा हूँ जी, आप कुछ अलग मतलब तो नहीं समझे?
................
नाग बाबा का कारनामा।
महिला खिलाड़ियों का ही क्यों होता है लिंग परीक्षण?

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" मंगल जुल॰ 20, 08:41:00 am 2010  

वाह भाई वाह ! ऐसी ही जिंदगी हंस कर गुजार दें ..

शिवम् मिश्रा मंगल जुल॰ 20, 11:50:00 am 2010  

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं

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