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मंगलवार, मई 11, 2010

पदकों की नहीं राह-कुर्सी की चाह

छत्तीसगढ़ की मेजबानी में होने वाले ३७वें राष्ट्रीय खेलों में मेजबान  को ज्यादा से ज्यादा पदक कैसे मिले इसकी योजना किसी खेल संघ के पास नहीं हैं, लेकिन इन खेलों के लिए बनने वाले समिति में हर कोई कुर्सी पाने के जुगाड़ में है। कुर्सी को लेकर ही प्रदेश ओलंपिक संघ और खेल विभाग में ठन भी गई है। ओलंपिक संघ के साथ जहां एक तरफ भिलाई के खेल संघ खड़े हैं, तो वहीं रायपुर के खेल संघ कुर्सी के मोह के बिना ही राष्ट्रीय खेलों की तैयारी में अपना योगदान देने के लिए कमर कसे हुए हैं।
२०१३-१३ में होने वाले ३७वें राष्ट्रीय खेलों का जिम्मा छत्तीसगढ़ को मिला है। इन खेलों के आयोजन को ऐतिहासिक बनाने के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के आव्हान के बाद खेल विभाग इस दिशा में अभी से तैयारी करने के लिए जुट गया है। खेल विभाग ने इसी तैयारी के तहत रविवार को प्रदेश के खेल संघों की बैठक खेलमंत्री लता उसेंडी की अध्यक्षता में बुलाई थी। इस बैठक में किसी भी खेल संघ के पदाधिकारी ने इस बात को लेकर बात नहीं की कि किस तरह से मेजबान को पदक तालिका में अहम स्थान मिल सकता है। बैठक में प्रदेश ओलंपिक संघ के सचिव बशीर अहमद खान को बस इस बात की चिंता रही कि उनके संघ को आयोजन समिति और सचिवालय में अहम स्थान मिल सके। इस बात को लेकर बैठक में विवाद की भी स्थिति बनी।
योजना बनाने दो माह पहले पत्र भेजा है
खेल संचालक जीपी सिंह को भी इस बात की नाराजगी है कि खेल संघों को दो माह पहले पत्र भेजे जाने के बाद अब तक किसी भी खेल संघ ने ऐसी कोई योजना पेश नहीं की है कि प्रदेश को किस तरह से राष्ट्रीय खेलों में ज्यादा पदक मिल सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमारा विभाग हर तरह की मदद करने के लिए तैयार है, लेकिन कोई खेल संघ तो सामने आए और बताए कि उसके पास ऐसी योजना है और उनके पास इतने प्रतिभाशाली खिलाड़ी है और इनको ये सुविधाएं चाहिए।
हर खेल के लिए कोच बुलाने तैयार हैं
खेल संचालक का कहना है कि हमारा विभाग छत्तीसगढ़ को ज्यादा से ज्यादा पदक मिल सके इसके लिए हर तरह की सुविधाओं के साथ हर खेल के लिए बाहर से कोच बुलाने के लिए भी तैयार है। लेकिन कोई पहल तो हो। उनको इस बात का अफसोस है कि कोई खेल संघ बाहर से कोच बुलाने की बात तो नहीं करता है, बस प्रशिक्षण शिविर में खिलाडिय़ों को दिए जाने वाले भत्ते को बढ़ाने की बात करता है। खेल संचालक कहते हैं कि अगर जरूरत होगी तो भत्ता भी बढ़ाया जाएगा, लेकिन हमारी पहली प्राथमिकता पदकों के लिए योजना बनाना है। उन्होंने कहा कि हमारे पास  कोई भी खेल संघों खिलाडिय़ों की सूची लेकर आता है और यह बात तय हो जाती है कि इन खिलाडिय़ों में पदक दिलाने का दम है तो उनको देश की किसी भी अकादमी में प्रशिक्षण के लिए भेजने का जिम्मा खेल विभाग का है।
टीम का चयन अभी से करना जरूरी
वास्तव में खेल संघों में पदकों के लिए योजना बनाने का दम नहीं है, यह बात साबित हो गई है। अगर ऐसा नहीं होता तो कोई तो खेल संघ सामने आता। छत्तीसगढ़ की मेजबानी में होने वाले खेलों के लिए यह जरूरी है कि अभी से हर खेल के लिए कम से कम २० से ३० खिलाडिय़ों की संभावित टीम तैयार की जाए। इस टीम में सब जूनियर और जूनियर वर्ग के ऐसे प्रतिभाशाली खिलाडिय़ों को रखने की जरूरत है जिनकी उम्र १६ साल से ज्यादा न हो। यह बात तय है कि छत्तीसगढ़ में होने वाले राष्ट्रीय खेलों के आयोजन में चार से छह साल का समय लगेगा। ऐसे में अगर अभी से ज्यादा उम्र के खिलाडिय़ों को रख लिया जाएगा तो इनका प्रदर्शन इतना दमदार नहीं रह पाएगा। जिस तरह से विदेशों में ओलंपिक की तैयारी दीर्घकालीन योजना बनाकर की जाती है, उसी तर्ज पर राष्ट्रीय खेलों के लिए योजना बनाने से ही सफलता मिलेगी
खेल संघों में एका नही
राष्ट्रीय खेलों की आयोजन समिति में ओलंपिक संघ को प्रतिनिधित्व दिए जाने पर खेल संघों में ही एका नहीं है। यहां पर फिर से एक बात सामने आई कि भिलाई के खेल संघों और रायपुर के खेल संघों के पदाधिकारियों की सोच अलग-अलग है। एक तरफ जहां भिलाई के खेल संघ कुर्सी चाहते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ रायपुर के खेल संघ बस काम चाहते हैं। रविवार की बैठक में एक बात यह भी सामने आई कि ओलंपिक संघ की अगुवाई में कई खेल संघों के अध्यक्ष और सचिव खेलगांव में अपने-अपने लिए बंगले चाहते हैं। अभी खेल गांव बसा नहीं है और उसे अभी से बांटने की तैयारी हो रही है।

8 टिप्पणियाँ:

anu मंगल मई 11, 08:29:00 am 2010  

सही मुद्दा उठाया है आपने

neha मंगल मई 11, 09:00:00 am 2010  

खिलाडि़यों से किसी को मतलब नहीं होता, सारे खेल संघ वाले पैसे के यार है

ललित शर्मा मंगल मई 11, 09:10:00 am 2010  

भैया हमें भी एकाध संघ की कुर्सी दिलवा दो।
कहो तो नया संघ बना लेते हैं।
गुल्ली डंडा संघ, पिट्ठुल संघ, भदौला संघ

अच्छी पोस्ट

ढपो्रशंख मंगल मई 11, 10:48:00 am 2010  

आज हिंदी ब्लागिंग का काला दिन है। ज्ञानदत्त पांडे ने आज एक एक पोस्ट लगाई है जिसमे उन्होने राजा भोज और गंगू तेली की तुलना की है यानि लोगों को लडवाओ और नाम कमाओ.

लगता है ज्ञानदत्त पांडे स्वयम चुक गये हैं इस तरह की ओछी और आपसी वैमनस्य बढाने वाली पोस्ट लगाते हैं. इस चार की पोस्ट की क्या तुक है? क्या खुद का जनाधार खोता जानकर यह प्रसिद्ध होने की कोशीश नही है?

सभी जानते हैं कि ज्ञानदत्त पांडे के खुद के पास लिखने को कभी कुछ नही रहा. कभी गंगा जी की फ़ोटो तो कभी कुत्ते के पिल्लों की फ़ोटूये लगा कर ब्लागरी करते रहे. अब जब वो भी खत्म होगये तो इन हरकतों पर उतर आये.

आप स्वयं फ़ैसला करें. आपसे निवेदन है कि ब्लाग जगत मे ऐसी कुत्सित कोशीशो का पुरजोर विरोध करें.

जानदत्त पांडे की यह ओछी हरकत है. मैं इसका विरोध करता हूं आप भी करें.

सूर्यकान्त गुप्ता मंगल मई 11, 02:12:00 pm 2010  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
सूर्यकान्त गुप्ता मंगल मई 11, 02:13:00 pm 2010  

पैसा पितू पैसा सखा पैसा ही भगवान। हो गया है पैसा राष्ट्र खेल, मान चाहे न मान। ब्लाग जगत के राजा हैं, रख शीर्षक जे राजतन्त्र आपहि से सब सब सीखत हैं "गुप्त" गुप्त कछु मन्त्र। बढिया है ग्वालानी जी।

Tue May 11, 02:12:00 PM 2010

ढपो्रशंख बुध मई 12, 12:15:00 pm 2010  

ज्ञानदत्त पांडे ने लडावो और राज करो के तहत कल बहुत ही घिनौनी हरकत की है. आप इस घिनौनी और ओछी हरकत का पुरजोर विरोध करें. हमारी पोस्ट "ज्ञानदत्त पांडे की घिनौनी और ओछी हरकत भाग - 2" पर आपके सहयोग की अपेक्षा है.

कृपया आशीर्वाद प्रदान कर मातृभाषा हिंदी के दुश्मनों को बेनकाब करने में सहयोग करें. एक तीन लाईन के वाक्य मे तीन अंगरेजी के शब्द जबरन घुसडने वाले हिंदी द्रोही है. इस विषय पर बिगुल पर "ज्ञानदत्त और संजयदत्त" का यह आलेख अवश्य पढें.

-ढपोरशंख

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