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शुक्रवार, मई 21, 2010

टिप्पणी पांच दिखती है एक, बहुत नाइंसाफी है ये...

हमारी कल की पोस्ट मूछों वाला ब्लागर लापता में एक समय जब पांच टिप्पणियां आईं थी, तब ब्लागवाणी में तो ये पांच दिख रही थी, लेकिन राजतंत्र को खोलने पर एक ही टिप्पणी नजर आ रही थी। पांच टिप्पणी चिट्ठा जगत में भी नजर आ रही थी। आखिर ये कैसा गोल-माल होता है समझ से परे है। हमने कई बार राजतंत्र को रिफे्रश करके देखा लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। काफी समय बाद सारी टिप्पणियां नजर आईं।

7 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari शुक्र मई 21, 07:51:00 am 2010  

कल से ही ब्लोगस्पाट पर कुछ तकनीकी समस्या चल रही है...ब्लॉग भी एक दिखता है ५ टिप्पणियों को..जल्द निराकरण होना चाहिये. गुगल को जानकारी है समस्या की.

'उदय' शुक्र मई 21, 08:32:00 am 2010  

...बहुत नाइंसाफ़ी है ... कितने कितने कितने..कितने आदमी हैं... सबको मूछों वाले गब्बर की अदालत में पेश किया जाये ...!!!

Vivek Rastogi शुक्र मई 21, 09:02:00 am 2010  

हमें तो पता ही नहीं है कि क्या समस्या है, वैसे भी अब टिप्पणी के लिये लेखन बंद ही कर दिया है। लेखन केवल अपने लिये करते हैं। ओनलाईन डिजिटल डायरी है अपनी तो ।

सूर्यकान्त गुप्ता शुक्र मई 21, 09:05:00 am 2010  

इन्साफ़ की डगर पे…तकनोलोजिस्टो दिखाओ चल के।

KK Yadava शुक्र मई 21, 09:13:00 am 2010  

इधर लगभग हर रोज टिप्पणियों का यह तमाशा दिख रहा है. बारिश की तरह कभी आती हैं, कभी अचानक गायब हो जाती हैं....जरुर कोई साजिश लग रही है.
___________
'शब्द सृजन की ओर' पर आपका स्वागत है !!

Akanksha~आकांक्षा शुक्र मई 21, 11:14:00 am 2010  

यह हमारे साथ भी हो रहा है आजकल.


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'शब्द-शिखर' पर- ब्लागिंग का 'जलजला'..जरा सोचिये !!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, सम्पादक-प्रेसपालिका/Dr. Purushottam Meena Editor PRESSPALIKA रवि जून 20, 03:31:00 pm 2010  

जिन्दा लोगों की तलाश!
मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!


काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-

(सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666

E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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