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रविवार, मई 16, 2010

समाज के ठेकेदारों ने ले ली एक पत्नी की जान

अपने राज्य छत्तीसगढ़ में साहू समाज के कुछ ठेकेदारों ने एक असहाय पति से जहां उनकी पत्नी छिन ली, वहीं चार बच्चों के सिर से मां का साया उठा लिया। इन पत्नी का कसूर यह था कि उसने अपने गोत्र के आदमी से विवाह कर लिया था। अगर विवाह कुछ समय पहले हुआ रहता तो एक बार मामला समझ में आता कि चलो अभी कुछ नहीं बिगड़ा है। लेकिन विवाह के 25 साल बाद इस दंपति को जब समाज के ठेकेदारों से भाई-बहन की तरह रहने के लिए मजबूर किया तो अंत में दुखी पत्नी ने अपनी जान ही दे दी। अब इस परिवार के सामने भूखे मरने की नौबत आ गई है क्योंकि घर चलाने का काम मृतक महिला ही करती थी।
यह मामला हुआ गुरुर के एक गांव चिरचारी मेंं। इस गांव के मनोहर साहू का 25 साल पहले अपने ही गोत्र की कचरा बाई से विवाह हुआ था। विवाह के पूरे 25 साल बिताने के बाद अचानक समाज के ठेकेदारों ने इस दंपति को भाई-बहन की तरह रहने के लिए फरमान जारी कर दिया। इस दंपित का एक पुत्र और तीन पुत्रियां हैं। इनमें से दो पुत्री और एक पुत्र नाबालिग हैं। इस परिवार का सारा खर्च चलाने का जिम्मा कचरा बाई पर था। मनोहर लाल चूंकि दमे के मरीज हैं, ऐसे में वे काम नहीं कर पाते हैं। कचरा बाई सब्जी बेचकर अपने परिवार को चलाती थीं। समाज के ठेकेदारों ने समाज की बैठक बुलाकर जहां इस गरीब दंपति पर दस हजार रुपए का जुर्माना ठोंक दिया, वहीं फरमान जारी कर दिया कि तुम लोग पति-पत्नी की तरह नहीं सकते हो। तुम लोगों को भाई-बहन की तरह रहना होगा क्योंकि तुम लोग एक ही गोत्र के हो। इस फरमान से दुखी पत्नी ने खाना-पीना छोड़ दिया और अंत में उसने जहर खाकर अपनी जान दे दी।
सोचने वाली बात यह है कि जब यह दंपित पिछले 25 साल से साथ रह रही थी तब समाज के ठेकेदारों को क्यों कर आपत्ति नहीं हुई। उस समय ये ठेकेदार कहां गए थे जब इनका विवाह हुआ था। माना कि एक गोत्र में विवाह नहीं होता है, लेकिन अगर किसी ने ऐसा कर लिया था तो उसे उसी समय रोकना था। अगर उस समय नहीं रोका गया तो फिर 25 साल बाद उनको भाई-बहन की तरह रहने के लिए मजबूर करना कहां का न्याय है। समाज के ठेकेदारों की वजह से आज एक अहसाय पति को अपनी पत्नी और गरीब और बेबस बच्चों को अपनी मां खोनी पड़ी है। क्या ये समाज के ठेकेदार इस असहाय परिवार का खर्च उठाने की हिम्मत दिखा सकते हैं। अगर आप किसी के लिए कुछ कर नहीं सकते हैं तो फिर किसी का बिगाडऩे का आपको क्या हक है।

3 टिप्पणियाँ:

सूर्यकान्त गुप्ता रवि मई 16, 07:41:00 am 2010  

कल से मेरे दिमाग मे भी इस बारे मे कुछ लिख्नने को कर रहा था। आपने पूरा कर दिया। बिलकुल सही लिखा है आपने। बधाई।

ललित शर्मा रवि मई 16, 08:37:00 am 2010  

दुर्भाग्य जनक हादसा

नरेश सोनी रवि मई 16, 10:42:00 am 2010  

पीड़ित परिवार को अब भी न्याय नहीं मिल पाया है।

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