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शुक्रवार, अक्तूबर 08, 2010

पायका में हॉकी पर लगा ब्रेक

भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी का छत्तीसगढ़ में क्रेज न होने के कारण इस खेल को पायका से अलग करना पड़ा है। इसके स्थान पर तैराकी और हैंहबॉल के स्थान पर सायक्लिंग को शामिल किया गया है। राष्ट्रीय खेल की आज इसलिए दुर्गति हो रही है क्योंकि पिछले तीन साल से राष्ट्रीय फेडरेशन में विवाद चल रहा है। हॉकी को पायका से बाहर करने का अहम कारण यह है कि केन्द्र सरकार के नए निर्देशों के कारण अब किसी भी जिले में ८ टीमों का बन पाना संभव नहीं है।
केन्द्र सरकार ने इस बार पायका योजना में शामिल खेलों के लिए एक नया फरमान जारी किया है कि किसी भी खेल में जब तक जिला स्तर पर ८ टीमें खेलने नहीं आएंगी, वह खेल स्पर्धा में शामिल नहीं किया जाएगा। इस नए फरमान के बाद प्रदेश के सभी १८ जिलों के खेल अधिकारी परेशानी में पड़ गए और उन्होंने साफतौर पर खेल संचालक से बैठक में कह दिया था कि अगर इस फरमान पर अमल किया गया तो कई खेल बंद करने पड़ेंगे। ऐसे में खेल संचालक जीपी सिंह ने खेल बंद करने के स्थान पर खेलों को बदलने का सुझाव दिया था। इसी सुङााव पर अमल करते हुए रायपुर में हॉकी के स्थान पर तैराकी और हैंडबॉल के स्थान पर सायक्लिंग को रखा गया है। रायपुर के साथ राज्य के बाकी जिलों में भी हॉकी और हैंडबॉल को हटा दिया गया है। इस बारे में जिलों के खेल अधिकारी कहते हैं कि अब जिस खेल में ८ टीमें नहीं बन पाएगी तो उन खेलों को बदलने के अलावा हमारे पास चारा क्या है।
चार टीमों का पैमाना रखना था
खेलों के जानकारों का कहना है कि केन्द्र सरकार ने हर खेल के लिए ८ टीमों का पैमाना तय किया है जो कि सही नहीं है। इनका कहना है कि एक तो अपने राज्य में कई जिले ऐसे हैं जिन जिलों में ८ विकासखंड ही नहीं हैं, ऐसे में किसी भी खेल की ८ टीमें कैसे बन सकती है। यहां पर खेलों के जानकार छत्तीसगढ़ ओलंपिक के लिए तय किए गए पैमाने का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि इसके लिए यह तय किया गया है कि जिस जिले में किसी भी खेल की चार टीमें होंगी, उन खेलों को शामिल किया जाएगा। चार टीमें बनाना भी वैसे आसान नहीं होता है, लेकिन फिर भी इतनी टीमें बन जाती है।
ग्रामीण स्तर पर ८ टीमें संभव नहीं
खेलों के जानकार साफ कहते हैं कि पायका योजना ग्रामीण क्षेत्र के लिए हैं, ऐसे में हॉकी में भी ८ टीमों का बन पाना संभव नहीं है। इनका कहना है कि अगर शहरी खिलाडिय़ों को रखने की छूट होती तो एक बार जरूर ८ तो नहीं लेकिन चार टीमें जरूर बन जाती। लेकिन शहरी खिलाड़ी पायका में पूरी तरह से प्रतिबंधित हैं। यह योजना ग्रामीण खिलाडिय़ों को आगे लाने के लिए बनाई गई है।
फेडरेशन के विवाद का असर
छत्तीसगढ़ में आज अगर हॉकी पूरी तरह से खत्म नजर आ रही है तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण राष्ट्रीय फेडरेशन का विवाद बताया जा रहा है। पिछले तीन साल से राष्ट्रीय स्तर पर विवाद चल रहा है और आज तक इस विवाद का हल नहीं निकल पाया है। जिस राष्ट्रीय संघ को केन्द्र सरकार ने मान्यता दी है, उसे विश्व फेडरेशन से मान्यता नहीं है और जिसे विश्व फेडरेशन मान रहा है, उसे केन्द्र सरकार नहीं मान रही है। ऐसे में भला अपना राष्ट्रीय खेल का कैसे भला हो सकता है। हॉकी से जुड़े लोग साफतौर पर कहते हैं कि एक तो स्कूली स्तर पर ही इस खेल की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता है ऐसे में कहां से टीमें निकलेंगी। यह बात को सच है कि स्कूल स्तर पर ही नहीं बल्कि कॉलेज स्तर पर भी हॉकी का बुरा हाल है। जब स्कूली टीमों का चयन करने के लिए ट्रायल होता है को मुश्किल से रायपुर जिले में ही चार टीमें नहीं आ पाती हैं, यही हाल कॉलेज स्तर का रहता है। कॉलेज में दो-तीन टीमों से ज्यादा टीमें नहीं आ पाती हैं।

1 टिप्पणियाँ:

ali शुक्र अक्तू॰ 08, 09:00:00 am 2010  

अपनों की मारी हॉकी बेचारी वैसे ही बुरे दिन गुज़ारने को मजबूर है अब ये तकनीकी अड़चन :(

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