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मंगलवार, दिसंबर 07, 2010

एक पोस्ट के दस लाख से ज्यादा पाठक

अगर कोई कहे कि उनकी एक पोस्ट के दस लाख से ज्यादा पाठक हैं, तो आपको यकीन नहीं होगा। लेकिन यह बात पूरी तरह से सच है। हम ही नहीं और भी कई ऐसे ब्लागर हैं जिनकी एक पोस्ट के दस लाख से ज्यादा पाठक हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि ये कैसे  संभव है, तो हम खुलासा कर दें कि हम उस पोस्ट की बात नहीं कर रहे हैं जो पोस्ट ब्लाग में रहती है, बल्कि उस पोस्ट की बात कर रहे हैं जो एक अखबार में रहती है। कम से कम हम जिस अखबार दैनिक हरिभूमि में काम करते हैं, उस अखबार में जब हमारी एक खबर छत्तीसगढ़ के संस्करणों में प्रकाशित होती है तो उसको करीब 9 लाख पाठक पढ़ लेते हैं। अभी दो दिन पहले हमारी एक खबर हरिभूमि के सभी संस्करणों में पहले पेज पर प्रकाशित हुई, हमारी इस खबर को पढऩे वालों को संख्या 15 लाख से ज्यादा थी।
इसमें कोई दो मत नहीं है कि अभी ब्लाग जगत का दायरा उतना बड़ा नहीं है कि उसे लाखों पाठक पढ़ें। वैसे भी हिन्दी ब्लागों की ही संख्या अभी एक लाख में नहीं पहुंची है तो पाठक कैसे एक लाख हो सकते हैं।  ब्लाग जगत में ब्लाग की पोस्ट को ज्यादातर पढऩे वाले ब्लागर ही होते हैं। लेकिन अखबार जगत में अखबार खरीदने वालों के साथ अखबार न खरीद पाने वाले भी अखबार पढ़ लेते हैं।
बहरहाल जहां तक हमारी बात है तो हम तो अखबार में 20 साल से काम कर रहे हैं। हमारी खबरों के हमेशा से लाखों पाठक रहे हैं। हमारे कई ब्लागर मित्र भी ऐसे हैं जिनकी रचनाएं हमारे अखबार हरिभूमि के साथ और अखबारों में प्रकाशित होती हैं, ये सारे लेखक इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि उनकी एक रचना को पढऩे वालों की संख्या लाखों में होती है। लेकिन अखबार और ब्लाग में एक बड़ा अंतर यह है कि आप अखबार में अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं लिख सकते हैं, लेकिन ब्लाग आपकी अपनी संपत्ति है इसमें कुछ भी लिखने से आपको कोई नहीं रोक सकता है।
हम अपनी जिस खबर की बात कर रहे हैं, उस खबर को हमने अपने ब्लाग में डाला था। जिस खबर को अखबार में 15 लाख से ज्यादा पाठकों ने पढ़ा, उस खबर को ब्लाग बमुश्किल दो सौ ने भी नहीं पढ़ा। लेकिन इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि ब्लाग लेखन ठीक नहीं है। ब्लाग लेखन का अपना एक अलग स्थान है। हमें उम्मीद है कि आगे चलकर ब्लाग भी जरूर अखबारों की शक्ल लेंगे और ब्लागों के भी लाखों पाठक होंगे, लेकिन उसके लिए लंबा समय लगेगा।

12 टिप्पणियाँ:

डॉ॰ मोनिका शर्मा मंगल दिस॰ 07, 09:33:00 am 2010  

उम्मीद है आगे ब्लॉग के पाठकों का दायरा भी बढेगा ......

Shah Nawaz मंगल दिस॰ 07, 06:23:00 pm 2010  

बिलकुल सही कहा राजकुमार जी, वहां के लाखों की अहमियत तो है, लेकिन यहाँ के दो-चार सौ भी बहुत अहमियत रखते हैं. वहां पर लाखों भी हमारा लेख पढ़कर नहीं बताते की कैसा है? अच्छा है या बुरा? लेकिन यहाँ पर कुछ लोग भी पढ़कर बता तो देते हैं कि उन्हें पढ़कर कैसा महसूस हुआ? इसका मज़ा वहां कहाँ?

अशोक बजाज बुध दिस॰ 08, 12:41:00 am 2010  

आपने तो कमाल कर दिया ,साधुवाद !

शिवम् मिश्रा बुध दिस॰ 08, 04:14:00 am 2010  


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

अविनाश बुध दिस॰ 08, 06:26:00 am 2010  

इसका अर्थ यह लगाऊं कि
उसमें प्रकाशित व्‍यंग्‍य
के
5 लाख पाठक तो होंगे ही
फिर तो अनुरोध करना होगा
हरिभूमि में प्रकाशित रचनाओं
के लेखकों के ब्‍लॉग पते भी
प्रकाशित किए जाया करें
ताकि ब्‍लॉग का भी खूब
प्रचार/प्रसार हो।

Asha बुध दिस॰ 08, 06:44:00 am 2010  

जहां आशा है निराशा का क्या काम |आपका विचार एकदम सही है ,अखवार तक आम आदमी की पहुंच है पर ब्लॉग तक कम लोग ही पहुंच पाते हैं |
आशा

केवल राम बुध दिस॰ 08, 09:18:00 am 2010  

धीरे -धीरे रे मना धीरे सब कुछ होए ...शुक्रिया

प्रवीण शाह बुध दिस॰ 08, 09:34:00 am 2010  

.
.
.
अखबार के सर्कुलेशन या पाठक संख्या के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि उसमें छपी हर खबर को सभी पाठक पढ़ते ही हैं...


...

दिगम्बर नासवा बुध दिस॰ 08, 02:18:00 pm 2010  

आमीन .... जरूर बढेगा दायरा ..

बवाल गुरु दिस॰ 09, 09:21:00 am 2010  

बहुत बहुत बधाईयाँ।

निशांत मिश्र - Nishant Mishra गुरु दिस॰ 09, 10:20:00 am 2010  

बधाई. सचमुच बहुत बड़ी बात है.

Rahul Singh रवि दिस॰ 19, 07:44:00 am 2010  

अखबार की तुलना रेडियो और टीवी से भी करना रोचक हो सकता है. वैसे अखबार में लिखा, सिर्फ पढ़ा जाए (ज्‍यादातर मामलों में बस आज ही) इसलिए होता है. ब्‍लॉग इतना एकांगी नहीं.

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