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मंगलवार, दिसंबर 14, 2010

शेर की खाल पहनने से कुत्ता शेरा नहीं हो जाता

एक कहावत है हाथी चले बाजार, कुत्ते भोंके हजार। यह कहावत पूरी तरह से उन नामाकुलों पर खरी उतरती है जो बिना वजह दूसरों के फटे में टांगे अड़ाने का काम करते हैं। न जाने क्यों कर अच्छे खासे ब्लाग जगत को गंदा करने के लिए कुत्तों की फौज खड़ी हो गई है। अब ये कुत्ते कितनी भी गंदगी करें और भोंके इससे क्या फर्क पड़ता है उन हाथियों को जो लेखन में मस्त रहते हैं। एक तरफ हमारे ब्लागर मित्र लेखन में मस्त हैं तो दूसरी तरफ उनसे जलने वाले इतने ज्यादा पस्त हैं कि वे अपनी भड़ास निकालने के लिए रोज नए-नए नामों से कुत्तागिरी करने आ जाते हैं ब्लागों में गंदगी फैलाने के लिए। लेकिन ऐसे कुत्तों से खबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि भले कोई अपना नाम छत्तीसगढ़ शेर रख ले लेकिन यह सच्चाई है कि कोई शेर की खाल पहनने से शेर नहीं बन जाता है, कुत्ता को कुत्ता ही रहता है।
हम नहीं चाहते थे कि किसी भी तरह की असभ्य भाषा के साथ कुछ लिखे, लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि ऐसे लोग सभ्य भाषा को हम लोगों की कमजोरी समझ लेते हैं। ब्लाग में मॉडरेशन लगाने के बाद अब हमें थोड़ी सी राहत तो मिली है, लेकिन कुत्तागिरी करने वाले बाज नहीं आए हैं। हम जानते हैं कि ये बाज भी नहीं आएंगे। कहते हैं कि कुत्तों की एक खास आदत होती है, वे उसी खास आदत से ही अपने शरीर का पानी का छोड़ते हैं। अब उस आदत को अगर वे छोड़ दें तो उनको कुत्ता कौन कहेगा। कुत्ते तो कुत्तागिरी ही करेंगे, उनसे गांधीगिरी की उम्मीद कैसे की जा सकती है। अब कल की ही बात करें तो एक जनाब छत्तीसगढ़ शेर के नाम से हमारे ब्लाग में आए और अपनी गंदगी फैलाने के लिए छोड़ गए थे अपने गंदे शब्दों का कचरा। अब कोई कचरा छोड़ेगा तो उस कचरे का हश्र भी तो कचरा ही होगा, सो हमने भी उसे डाल दिया कचरा पेटी में।
अपने को शेर कहने का इतना ही दम है तो क्यों नहीं अपने असली नाम से सामने आते हैं ऐसे कुत्तेबाज। इस जनाब की कोई प्रोफाइल ही नहीं है। यानी एक और फर्जीबाज सामने आए हैं। खैरे ऐसे फर्जीबाजों की कुत्तागिरी से कुछ होने वाला नहीं है। न जाने क्यों ऐसे कुत्तेबाज ब्लाग जगत को गंदा करने के लिए आ जाते हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि जब भी किसी ब्लागर के लेखन की तारीफ होने लगती है तो ऐसे कुत्तेबाज आ जाते हैं, कुत्तागिरी करने। वैसे हम इतना जानते हैं कि हमारी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है, लेकिन इसके बाद भी न जानें क्यें कर ऐसे लोगे हमारे पीछे पड़े रहते हैं। इसका तो हमें एक ही कारण नजर आता है कि हमने गुटबाजी से जबसे किनारा किया है, ऐसे कुत्तों की फौज हमारे पीछे पड़ गई है। लेकिन ऐसे कुत्तों से हमें निपटना अच्छी तरह से आता है। हम किसी की कुत्तागिरी से अपना काम छोडऩा वाले नहीं है। हमने जो काम प्रारंभ किया है, उसे जब तक संभव होगा जारी रखेंगे। काफी कम समय होने के बाद भी हम अपना काम कर रहे हैं और करते रहेंगे।

2 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा मंगल दिस॰ 14, 08:56:00 am 2010  

कुत्ते अपनी फ़ितरत से बाज नहीं आते।
अपना काम करते रहिए,इनको छोड़िए भोंक कर चले जाएगें।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा मंगल दिस॰ 14, 07:13:00 pm 2010  

राज जी,
शांतचित्त हो अपना काम करना बेहतर है। आपा खोने से तो अगले की मुराद ही पूरी होगी।

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