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गुरुवार, जनवरी 07, 2010

मंदिरों में दान करने से किसका भला होता है?

एक खबर पर नजरें पड़ीं कि पुराने और नए साल के बीच महज एक सप्ताह में ही शिरर्डी के साई मंदिर में करीब 10 करोड़ रुपए दान के रूप में मिले। इस दान ने एक बार फिर से यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि आखिर मंदिरों में दिए जाने वाले दान से किसका भला होता है। मंदिरों में दान करने वालों की मानसिकता क्या होती है? अपने देश में इतनी ज्यादा गरीबी है कि उनकी चिंता किसी को नहीं है। कई किसान भूख से मर जाते हैं, पर उनकी मदद करने के लिए कोई आगे नहीं आता है, लेकिन मंदिरों में लाखों नहीं बल्कि करोड़ का गुप्त दान किया जाता है। आखिर इस दान से हासिल क्या होता है। किसको मिलता है इसका लाभ।

हम एक बात साफ कर दें कि हम कोई नास्तिक नहीं हैं। भगवान में हमारी भी उतनी ही आस्था है जितनी होनी चाहिए। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या आस्था जताने के लिए मंदिरों में दान करना जरूरी है। अगर नहीं तो फिर जो लोग मंदिरों में बेतहासा दान करते हैं उनके पीछे की मानसिकता क्या है? क्या उनको भगवान से किसी बात का डर रहता है। क्या ऐसे लोगों जो कि काले धंधे करते हैं उनके मन में यह बात रहती है कि वे भगवान के मंदिर में कुछ दान करके अपने पाप से बच सकते हैं। हमें तो लगता है कि ऐसी ही किसी मानसिकता के वशीभूत होकर ये लोग लाखों रुपए दान करते हैं। लेकिन इनके दान से किसका भला होता है? हमारे देश के बड़े-बड़े मंदिरों की हालत क्या है किसी से छुपी नहीं है। लाखों दान करने वालों के साथ वीआईपी और वीवीआईपी के लिए तो इन मंदिरों के द्वार मिनटों में खुल जाते हैं। इनको भगवान के दर्शन भी इनके मन मुताबिक समय पर हो जाते हैं, लेकिन आम आदमी को घंटों लंबी लाइन में लगे रहने के बाद भी कई बार भगवान के दर्शन नहीं होते हैं। कभी-कभी लगता है कि भगवान भी अमीरों के हो गए हैं, खासकर बड़े मंदिरों में विराजने वाले भगवान।

शिरर्डी के साई बाबा के दरबार के बारे में कहा जाता है कि वहां पर सभी को समान रूप में देखा जाता है। लेकिन हमारे एक मित्र ने बताया कि वे जब शिरर्डी गए थे तो वीआईपी पास से गए थे तो उनको दर्शन करने में कम समय लगा। यानी वहां भी बड़े-छोटे का भेद है। संभवत: अपने देश में ऐसा कोई मंदिर है ही नहीं जहां पर बड़े-छोटे का भेद न हो। किसी वीआईपी या फिर अमीर को हमेशा लाइन लगाने से परहेज रहती है। वे भला कैसे किसी गरीब के साथ लाइन में खड़े हो सकते हैं।

लाखों का दान करने वालों को क्या अपने देश की गरीबी नजर नहीं आती है। क्या ऐसा दान करने वाले लोग उन खैराती अस्पतालों, अनाथ अश्रामों में दान करने के बारे में नहीं सोचते हैं जिन आश्रमों में ऐसे बच्चों को रखा जाता है जिन बच्चों में संभवत: ऐसे बच्चे भी शामिल रहते हैं जो किसी अमीर की अय्याशी की निशानी के तौर पर किसी बिन ब्याही मां की कोख से पैदा होते हैं।

क्या लाखों दान करने वालों को अपने देश के किसानों की भूख से वह मौते नजर नहीं आती हैं। आएगी भी तो क्यों कर वे किसी किसान की मदद करेंगे। किसी किसान की मदद करने से उनको भगवान का आर्शीवाद थोड़े मिलेगा जिस आर्शीवाद की चाह में वे दान करते हैं। ऐसे मूर्खों की अक्ल पर हमें तो तरस आता है। हम तो इतना जानते हैं कि किसी भूखे को खाना खिलाने से लाखों रुपए के दान से ज्यादा का पुन्य मिलता है। किसी असहाय और गरीब को मदद करने से उनके दिल से जो दुआ निकलती है, वह दुआ बहुत काम की होती है।

मंदिरों में दान करने के खिलाफ कताई नहीं है, लेकिन किसी भी मंदिर में दान उतना ही करना चाहिए, जितने से उस मंदिर में होने वाले किसी काम में मदद मिले। जो मंदिर पहले से पूरी तरह से साधन-संपन्न हैं उन मंदिरों में दान देने से क्या फायदा। अपने देश में ऐसे मंदिरों की भी कमी नहीं है जिनके लिए दान की बहुत ज्यादा जरूरत है, पर ऐसे मंदिरों में कोई झांकने नहीं जाता है। क्या ऐसे मंदिरों की मदद करना वे दानी जरूरी नहीं समझते नहीं है जिनको दान करने का शौक है।

क्या बड़े मंदिरों में किए जाने वाले करोड़ों के दान का किसी के पास हिसाब होता है। किसी भी गुप्त दान के बारे में कौन जानता है। मंदिरों के ट्रस्टी जितना चाहेंगे उतना ही हिसाब उजागर किया जाएगा, बाकी दान अगर कहीं और चले जाए तो किसे पता है। अब कोई गुप्त दान करने वाला यह तो बताने आने वाला नहीं है कि उसने कितना दान किया है। हमारे विचार से तो बड़े मंदिरों में दान करने से किसी असहाय, लाचार, गरीब का तो भला होने वाला नहीं है, लेकिन मंदिर के कर्ताधर्ताओं का जरूर भला हो सकता है। अगर दानी इनका ही भला करना चाहते हैं तो रोज करोड़ों का दान करें, हमें क्या।

6 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari गुरु जन॰ 07, 06:19:00 am 2010  

सो तो है मगर बहुत से मंदिर न्यास धर्मादा अच्छा कार्य भी कर रहे हैं..आपकी सोच भी अपनी जगह ठीक है.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari गुरु जन॰ 07, 08:51:00 am 2010  

जिसकी जितनी श्रद्धा उसकी उतनी भक्ती. पहले श्रद्धा दिखाई नही जाती थी अब जताई जाती है.

ab inconvenienti गुरु जन॰ 07, 09:14:00 am 2010  

मंदिरों की आलोचना करते हुए आपको अपने नास्तिक न होने की दुहाई क्यों देनी पड़ रही है? क्या ईश्वर पर विश्वास न रखने वालों को धर्म के नाम पर फैले जाल के बारे में बोलने का अधिकार नहीं है? या की वे असामाजिक तत्व हैं? गोया की "भाई हमें नास्तिक-वास्तिक न समझ लेना, हम तो बस आपका मंदिरों के जरिये होने वाली काली करतूतों की तरफ थोडा ध्यान खींच रहे थे बस."

Suresh Chiplunkar गुरु जन॰ 07, 11:25:00 am 2010  

बाकी जगहों का तो पता नहीं, अलबत्ता तिरुपति मन्दिर में आये हुए चढ़ावे को आंध्रप्रदेश सरकार लूट ले जाती है, ताकि मदरसों-मस्जिदों को उसमें से अनुदान दिया जा सके तथा ईसाईयों को यरुशलम जाने के लिये सब्सिडी दी जा सके… चाहें तो दस्तावेज दिखा सकता हूं…।
नोट - मैं साम्प्रदायिक कहलाना अधिक पसन्द करता हूं सेकुलर कहलाये जाने की अपेक्षा… :) :) जय हो

निर्मला कपिला गुरु जन॰ 07, 12:03:00 pm 2010  

आपकी एक एक बात से सहमत हूँ। धर्म के नाम पर केवल कुछ लोग अपनी झोलियाँ भर रहे हैं बस। बहुत अच्छा आलेख है धन्यवाद्

Anil Pusadkar गुरु जन॰ 07, 12:09:00 pm 2010  

छोटे मंदिरों मे जाओ राजकुमार वंहा न भीड़ होती है और न भेदभाव्।

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