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शनिवार, नवंबर 07, 2009

कपूतों के वंदेमारतम् न बोलने से फर्क नहीं पड़ता भारत माता को

उसको नहीं देखा हमने कभी
पर इसकी जरूरत क्या होगी
ऐ मां तेरी सूरत से अलग
भगवान की सूरत क्या होगी

बरसों पुराना यह गाना आज हमें याद आ रहा है। हमें यह तो याद नहीं है कि इस गीत के गीतकार कौन हैं। पर इतना जरूर है कि इस गीत के बाद कोई भी इंसान इस बात को आसानी से समझ सकता है कि इस दुनिया में मां का दर्जा किसी भी सूरत में भगवान से कम नहीं होता है। इस दुनिया में जो इंसान मां की कद्र नहीं करता है, उससे बड़ा पापी इस दुनिया में हो ही नहीं सकता है। आपने अगर अपनी मां का अपमान किया तो इसका मलतब है कि आपने भगवान का अनादार किया। लेकिन यह बात उन लोगों के समझ में कैसे आ सकती है जो अपनी जननी के सामने कभी सिर झुकाना भी गंवारा नहीं करते हैं। ऐसे इंसानों से यह कैसे उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे भारत मां की कद्र करेंगे और उसके सामने सिर झुकाने का काम करेंगे। अब ऐसे देशद्रोहियों को अपने देश में बर्दाश्त किया जा रहा है तो यह अपनी सरकार के निक्कमेपन और उसकी नपुंसकता का परिचायक है।

आपने ठीक समझा हम भी उसी वंदेमारतम् की बात कर रहे हैं जिसको लेकर बिना वजह विवाद खड़ा किया गया है। वंदेमारतम् को लेकर विवाद खड़ा करने का काम चंद लोग कर रहे हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि पूरी मुस्लिम कौम वंदेमारतम् के खिलाफ नहीं है। लेकिन कुछ लोग बिना वजह राजनीति करने का काम कर रहे हैं। ऐसा करने वाले निश्चित ही देशद्रोही की श्रेणी में आते हैं। वंदेमारतम् का विरोध करने वालों का तर्क बड़ा हास्याप्रद है कि जब वे अपने को जन्म देने वाली मां के सामने ही सजदा नहीं करते हैं तो फिर उनके लिए भारत मां क्या चीज हैं। ठीक फरमाते हैं वो लोग जिनको अपनी उस मां की कद्र नहीं है जिनकी बदौलत में वे इस दुनिया में सांस ले रहे हैं तो फिर भारत मां उनके लिए क्या चीज है। जिनको उन लोगों ने न कभी देखा है न कभी महसूस किया है।

एक कहावत है कि मानो तो देवता न मानो तो पत्थर। अब धरती को हम हिन्दुस्तानी अगर अपनी मां समझते हैं तो इसका यह मतलब थोड़े है कि यहां रहने वाले मुसलमान भी उसे मां समझे। जिस मां की कोख से ये जन्म लेते हैं उसके लिए भी इनके मन में जब प्यार नहीं है तो क्यों कर इनसे उम्मीद की जाए कि वे अपनी भारत मां से प्यार कर सकते हैं। इनको किससे प्यार है सब जानते हैं। शायद ये अल्ला के बंदे भूल गए हैं कि अगर उनका अल्ला नहीं चाहता तो वे इस दुनिया में पैदा भी नहीं होते। अल्ला के करम से ही उनको इस दुनिया में आने का मौका मिला है, और यह मौका उनको अपनी मां के माध्यम से ही मिला है, तो फिर पहले कौन बड़ा मां या अल्ला? अगर इतनी सी बात इनके समझ में आ जाती तो ये कभी इस बात का विरोध नहीं करते की वंदेमारतम् नहीं बालेंगे।

वैसे ऐसे कपूतों के वंदेमारतम् नहीं बोलने से हमारी भारत माता को कोई फर्क नहीं पडऩे वाला है। वैसे भी हर मां के सारे बेटे सपूत नहीं होते हैं। कुछ कपूत भी होते हैं और कोई भी मां ऐसे कपूतों की बातों का मलाल नहीं करती हैं। सो भारत माता को भी ऐसे कपूतों की बातों का मलाल नहीं होगा।

लेकिन यहां पर तरसा आता है अपने देश की उस निक्कमी सरकार पर जो अपने देश में रहने वाले ऐसे देशद्रोहियों को बर्दाश्त करती है। वास्तव में हमारे देश के नेता वोट की राजनीति में इतने अंधे हो गए हैं वो अपनी मां का अपमान भी बर्दाश्त करने को तैयार है। वैसे नेताओं से उम्मीद करना बेमानी है क्योंकि ये तो खुद भारत मां को बेचने से पीछे नहीं हटते हैं। तो ये क्या कहेंगे और क्या करेंगे।

भारत मां के अपमान का दर्द तो हम हिन्दुस्तानियों को होता है, क्योंकि हम लोगों की नजरों में ही भारत मां है बाकी नेताओं की नजरों में इसे मां समझना उसी तरह से गलत है जैसे वंदेमारतम् का विरोध करने वालों की नजरों में। वंदेमारतम् का विरोध करने वालों और अपने नेताओं में ज्यादा फर्क नहीं है। अपने नेताओं में बस दम नहीं है, लेकिन उनमें दम है इसलिए वे खुलकर अपने देश में रहते हुए ही अपने देश की खिलाफत करने का काम करते हैं। अब ऐसे देशद्रोहियों के साथ क्या होना चाहिए इसका फैसला सरकार पर छोडऩे से कुछ नहीं होने वाला है, इसके लिए हिन्दुस्तानियों को ही जागरूक होना पड़ेगा। आज वंदेमारतम् का विरोध किया जा रहा है, कल किसी और बात का विरोध होगा, फिर किसी और बात का और एक दिन ऐसा आएगा कि यहां के हिन्दुओं का विरोध होगा और कहा जाएगा कि आपके लिए यह देश नहीं है, आप यहां से जा सकते हैं। या फिर हम लोग उसी तरह से गुलाम हो जाएंगे जैसे बरसों पहले अंग्रेजों के गुलाम थे। अब इससे पहले की ऐसी कोई नौबात आए जाग जाना चाहिए हिन्दुस्तानियों को। नहीं जागे तो एक बार फिर से गुलाम बनने को तैयार रहे क्योंकि भारत को गुलाम बनाने की साजिश ही तो चल रही है।

15 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक शनि नव॰ 07, 06:29:00 am 2009  

अब इससे पहले की ऐसी कोई नौबात आए जाग जाना चाहिए हिन्दुस्तानियों को। नहीं जागे तो एक बार फिर से गुलाम बनने को तैयार रहे क्योंकि भारत को गुलाम बनाने की साजिश ही तो चल रही है।

ग्वालानी जी आपकी बात से सहमत हूँ!

घर के बडे़-बुजुर्गों से जो प्यार नही कर सकता,
अनदेखे परमेश्वर से वो कैसे प्यार करेगा?
"उच्चारण से साभार"

बेनामी,  शनि नव॰ 07, 08:05:00 am 2009  

किसी के वंदेमातरम न गाने से क्या हो जाएगा, क्या वंदेमातरम का महत्व समाप्त हो जाएगा या कोई आफत आ जाएगी। लेकिन ऐसे लाोगों को भारत में रहने का अधिकार है, इनको देश से बाहर कर देना चाहिए।

ajay शनि नव॰ 07, 08:13:00 am 2009  

कपूत तो कपूतो जैसा काम करेंगे, उनकी दुस्कर्मों का रोना रोने से क्या फायदा।

Mithilesh dubey शनि नव॰ 07, 09:02:00 am 2009  

बहुत सही कहा आपने, ऐसे कपुत गाये या ना गाये कोई फर्क नहीं पड़ता।

neha शनि नव॰ 07, 09:30:00 am 2009  

किसी भी बात को बिलकुल अलग अंदाज में लिखते हैं आप। आपकी लेखनी की मैं तो कायल हूं।

पी.सी.गोदियाल शनि नव॰ 07, 09:40:00 am 2009  

आपके लेख के शीर्षक का अक्षरस समरथन करता हूँ !

ललित शर्मा शनि नव॰ 07, 10:22:00 am 2009  

ग्वालानी जी आपकी बात से सहमत हूँ!

Suresh Chiplunkar शनि नव॰ 07, 10:27:00 am 2009  

जब शरीयत के मुताबिक चार-चार शादियों के मजे लेना कबूल है तो शरीयत के मुताबिक चोरी की सजा, हाथ कटवाना मंजूर है क्या? वन्देमातरम गाने से धर्म भ्रष्ट होता है यानी कि अब्दुल तेलगी, सलेम, दाऊद सभी धर्मात्मा होंगे? क्योंकि इस्लाम में ठगी, धोखाधड़ी, बेईमानी, दारू का धंधा, हत्या, सुपारी किलिंग, स्मगलिंग आदि के बारे में पता नहीं क्या कहा गया है… देवबन्दी ही सही बता सकते हैं, जैसा कि उन्होंने वन्देमातरम के मामले में फ़रमाया है…

rohan शनि नव॰ 07, 11:35:00 am 2009  

हर देश और समाज में गंदे लोग रहते हैं अब ऐसे गंदें लोग तो गंदगी ही करेंगे न।

guru शनि नव॰ 07, 12:38:00 pm 2009  

सही फरमाते हैं आप गुरु

mehta शनि नव॰ 07, 02:14:00 pm 2009  

achha lekh
hinduo se apil jagrit ho jao
isai muslim rus ki tarha bharat ke tukre karna chahte hai

कुरआन शनि नव॰ 07, 04:50:00 pm 2009  

जानो मुझे
समझो मुझे

atul kumar,  शनि नव॰ 07, 06:28:00 pm 2009  

ग्वालानी जी आपकी बात से सहमत हूँ!

जी.के. अवधिया शनि नव॰ 07, 06:47:00 pm 2009  

स्वतन्त्रता के पूर्व क्रान्तिकारी वन्देमातरम् गाकर भारतमाता की वन्दना करते थे और वन्देमातरम् का नारा लगाया करते थे। वन्देमातरम् क्रान्ति का प्रतीक बन गया था। ब्रिटिश शासन वन्देमातरम् से इतना भयभीत हो गई थी कि इस पर बैन लगा दिया और अनेक लोगों को वन्देमातरम् गाने और नारा लगाने के अपराध में सजा देकर जेलों में डाल दिया था।

रवीन्द्रानाथ टैगोर के अनुसारः

"Vande Mataram! These are the magic words which will open the door of his iron safe, break through the walls of his strong room, and confound the hearts of those who are disloyal to its call to say Vande Mataram." (Rabindranath Tagore in Glorious Thoughts of Tagore, p.165)

यह गीत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सन् 1896 के अधिवेशन में पहली बार राजनैतिक रूप से गाया गया था और तभी से इसे कांग्रेस ने राष्ट्रगीत के रूप में मान लिया था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् यही निश्चय किया गया था कि वन्देमातरम को ही राष्ट्रगीत (National Anthem) बनाया जाये किन्तु उस समय भी कुछ मुसलमानों के विरोधस्वरूप और कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के कारण वन्देमातरम् को अस्वीकार करके जनगणमन को राष्ट्रगीत बना दिया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति के अनुसारः

The composition consisting of words and music known as Jana Gana Mana is the National Anthem of India, subject to such alterations as the Government may authorise as occasion arises, and the song Vande Mataram, which has played a historic part in the struggle for Indian freedom, shall be honored equally with Jana Gana Mana and shall have equal status with it. (Applause) I hope this will satisfy members. (Constituent Assembly of India, Vol. XII, 24-1-1950)

वन्देमातरम् का विरोध करने वाला वास्तव में भारतमाता का कपूत है।

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