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शनिवार, नवंबर 14, 2009

हिन्दी से हों मस्त-अंग्रेजी करे पस्त

अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी के बोलने से इंसान का दिमाग चुस्त-दुरुस्त रहता है और अगर आपको अंग्रेजी बोलने की बीमारी है तो मान कर चलिए कि आपका दिमाग हमेशा पस्त रहेगा। अरे अंग्रेजी बोलने वाले दोस्तों आप हम पर क्यों नाराज हो रहे हैं, भई ये हम नहीं कह रहे हैं यह तो एक शोध में साबित हुआ है कि हिन्दी मस्त करती हैं और अंग्रेजी बोलने से इंसान पस्त हो जाता है। वास्तव में यह बात ऐसे समय में सामने आई है जब हिन्दी को लेकर बवाल मचा है और अपनी इस राष्ट्रभाषा का लगातार अपमान हो रहा है। अब तो राष्ट्रभाषा का देश के एक सदन विधान सभा में भी अपमान हो गया है।

कल जब एक खबर पर नजरें पड़ीं तो अपने को हिन्दुस्तानी होने पर और ज्यादा गर्व हुआ। इसी के साथ इस बात पर और ज्यादा अभिमान हुआ कि यार चलो हम तो हिन्दी ही बोलते और लिखते हैं। दरअसल इस खबर में बताया गया है कि एक शोध में यह बात सामने आई है हिन्दी बोलने से दिमाग के दाएं और बाएं हिस्से सक्रिय रहते हैं। लेकिन यह बात अंग्रेजी के साथ लागू नहीं होती है। अंग्रेजी बोलने से दिमाग का केवल एक बाया हिस्सा ही सक्रिय होता है। राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र के इस शोध के बाद अब बिना वजह अंग्रेजी झाडऩे वालों को यह समझ लेना चाहिए कि वे हिन्दी से परहेज करके अपना ही नुकसान कर रहे हैं। अगर आपको हिन्दी बोलने में शर्म आती है तो अच्छा है आप शर्म ही करते रहे, पर एक दिन ऐसी शर्म करने के लिए आपका दिमाग की साथ देना बंद कर देगा तब करते रहना शर्म। अगर आप सच्चे हिन्दुस्तानी हैं तो फिर हिन्दी बोलने में शर्म कैैसी?
मनोज कुमार की फिल्म पूरब-पश्चिम का क्या वो गाना याद नहीं है

है प्रीति जहां की रीत सदा मैं गीत वहां के गाता हूं

भारत का रहने वाला हूं भारत का बात सुनाता हूं


अगर आप भारतीय हैं तो फिर अपने देश की राष्ट्रभाषा से प्रेम करें और गर्व के साथ हिन्दी बोले और अंग्रेजी को नमस्ते कर दें ताकि आपका दिमाग चुस्त और दुरुस्त रहे। अब इस शोध के बाद अपने राज ठाकरे को भी समझ लेना चाहिए कि वो हिन्दी का विरोध करके हिन्दी का नहीं अपने दिमाग का ही नुकसान कर रहे हैं। ऐसे लोगों को करने दें हम अपने दिमाग का कबाड़ा और देखते रहे तमाशा। जब ऐसे लोगों को अहसास होगा कि उन्होंने हिन्दी से किनारा करके कैसे अपने दिमाग के साथ खिलवाड़ किया है तब तक काफी देर हो चुकी होगी।

तो चलिए बोले जय हिन्दी, जय हिन्द, जय भारत, वंदेमातरम्

सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा

6 टिप्पणियाँ:

गिरिजेश राव शनि नव॰ 14, 06:25:00 am 2009  

यह इस विषय पर किसी ब्लॉग पर देखा गया आज का तीसरा लेख है। यह टिप्पणी सहारा वाली रिपोर्ट पढ़ने के बाद:
(1) अंग्रेजी में जोर जोर से बोलने को कहा गया जब कि हिन्दी में बात करने को कहा गया। दोनो प्रक्रियाओं में फर्क है लिहाजा मस्तिष्क की सक्रियता में भी फर्क होगा। अंग्रेजी में भी बात कराना था तब तुलना करनी थी।
(2) नागरी लिपि लिखने पढ़ने में मात्राओं के आगे पीछे, उपर नीचे वाली बात समझ में आती है लेकिन बोलते समय भी इसका प्रभाव होना चाहिए ऐसा नहीं समझ में आता।

गदगद निहाल होने के पहले थोड़ा वस्तुनिष्ट विचार कर लेना चाहिए। सम्भवत: सहारा में रिपोर्ट का प्रस्तुतिकरण ठीक नहीं है। अब मेरे उपर आप लोग जूते लेकर मत पड़ जाइएगा :)

MANOJ KUMAR शनि नव॰ 14, 07:04:00 am 2009  

विचारोत्तेजक!

ganesh शनि नव॰ 14, 09:08:00 am 2009  

हिन्दी जैसी भाषा से पूरे विश्व में नहीं है। हिन्दी और हिन्द को नमन।

guru शनि नव॰ 14, 09:28:00 am 2009  

चलो किसी ने तो हिन्दी को समझा गुरु

मुनीश ( munish ) शनि नव॰ 14, 11:43:00 pm 2009  

I adore Hindi since it is my mother tongue and i condemn Raj Thackeray , but it is useless exercise to compare Hindi versus English . English is the window to a large part of world !

neha रवि नव॰ 15, 12:43:00 am 2009  

एक सरल विषय में जोरदार प्रस्तुति के लिए बधाई

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